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विमर्श

भाषा की अंतर्वस्तु
कृष्णमोहन


निराला ने गद्य को जीवनसंग्राम की भाषा कहा था। आधुनिक युग को गद्ययुग भी कहा गया है। जाहिर है कविता पर विचार करते हुए अब हमारे सामने मसला गद्य बनाम काव्य का नहीं है, बल्कि गद्य बनाम बेहतर गद्य का है। गद्य की बेहतरी को आँकने के लिए भाषा की सरलता, प्रवाहमयता, विचारशीलता और सार्थकता जैसे परंपरागत पैमानों से सहमत होते हुए हम ये मानते हैं कि ये विशेषताएँ भाषा के रूप आकार की हैं। काव्यभाषा की वास्तविक विशेषता अपने पाठक की सोई हुई मानसिक क्षमताओं को जगाने, उसकी प्रश्नाकुलता को धार देने, उसके अंदर की मानवीय भावनाओं और उसके उदात्त आशयों को उसके सम्मुख प्रकट करने में निहित होती है। इसी भूमिका में वो काव्यरचना की सहयोगी बन सकती है। आइए कुछ और निकट से देखें कि वह ऐसा कैसे कर पाती है।

आम तौर पर ये मान्यता है कि भाषा में जो कुछ कहते या लिखते हैं, उसी से से वांछित अर्थ निकल आता है, उसे कैसे कहा या लिखा गया इसकी भूमिका गौण है। भाषा एक माध्यम है जिसे सुविधाजनक होना चाहिए, यानी सरलतापूर्वक किसी कथन का मनोवांछित अर्थ निकल आए। सिद्धांतरूप में हम अभिधा, लक्षणा, व्यंजना जैसी शब्दशक्तियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्हें रचनाकार के वांछित अभिप्रायों से अलग करके नहीं देखते। लेखक की इच्छा के मुताबिक किसी कथन से प्रत्यक्ष तौर पर आने वाले अभिधार्थ, और अप्रत्यक्ष तौर पर आने वाले लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ की अपेक्षा तो करते हैं, पर स्वयं भाषा में ये शक्तियाँ लेखक की इच्छा से निरपेक्ष तौर पर भी निहित हो सकती हैं, इस संभावना पर विचार नहीं करते।

उदाहरण के लिए, अपने रोजमर्रा के जीवन में हम देखते हैं कि हमारी कही हुई बातें कई बार हमारे मंतव्य के विपरीत प्रभाव छोड़ती हैं। हम किसी उद्विग्न व्यक्ति को सांत्वना देना चाहते हैं और वो हमारी बात से चिढ़ जाता है क्योंकि हमारी भाषा शैली और हावभाव उस व्यक्ति की मनःस्थिति के अनुरूप नहीं होते। ऐसे में हमारे शब्द बिलकुल उपयुक्त हो सकते हैं लेकिन उनका अर्थ हमारे अनजाने ही बदल जाता है। इसी प्रकार अगर हम अपनी रचना में कोई सामाजिक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करते हैं लेकिन वह संदेश वस्तुगत परिस्थितियों की उचित समझ पर आधारित नहीं है तो उसका परिणाम उल्टा निकल सकता है। कहने का आशय यह कि भाषा में दिए गए किसी वक्तव्य का वास्तविक अर्थ जितना वाचक के मन में होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण तरीके से वाह्य परिस्थितियों और उन व्यक्तियों के मन में होता है जो उससे अपने को संबंधित पाते हैं। जब दोनों पक्षों के बीच भाषा एक जैसा संवाद बना पाती है तो यह आदर्श स्थिति होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी रचना की वास्तविक भूमिका उसके शब्दकोशीय अर्थ और रचनाकार की इच्छा से परे सामाजिक परिस्थितियों में विद्यमान होती है।

इस प्रकार भाषा में अंतर्वस्तु का निवेश दो स्तरों पर होता है। पहला स्तर वह है जब रचनाकर अपनी रचना में अपने मनोनुकूल भावों को शब्दबद्ध करता है, और दूसरा वह जब रचना पाठक के पास आती है और वह अपनी स्थिति के अनुरूप उसका अर्थ ग्रहण करता है। पहले को मनोगत स्तर और दूसरे को वस्तुगत स्तर कह सकते हैं। वस्तुगत स्तर पर भले ही आरम्भ में पाठकों में अंतर्वस्तु को लेकर मतभेद दिखें लेकिन लोकतांत्रिक बहस मुबाहिसे की प्रक्रिया में वे मतभेद सिमटते चले जाते हैं और न्यूनतम संभव स्तर पर पहुँच जाते हैं। जैसे पानी जिस बर्तन में जाता है उसीका आकार ग्रहण कर लेता है, किंतु विकास की प्रक्रिया में अंततः कुछ खास आकार के बर्तन पानी के अनुकूल पड़ते हैं और वे पानी के समुचित आकार की सूचना देते हैं। हम थाली में पानी नहीं पीते गिलास में पीते हैं क्योंकि गिलास का आकार पानी की प्रकृति के अनुरूप होता है।

यहाँ एक सवाल यह उठता है कि अगर किसी भाषिक रचना का अभिप्राय वाह्य परिस्थितियों अथवा उसके पाठक के अनुसार तय होता है तो उसे भाषा की अंतर्वस्तु कैसे कह सकते हैं। इसका जवाब यह है कि यह गुंजाइश खुद भाषा के अंदर होती है। उसकी संरचना में अनेक अर्थ छिपे होते हैं जो मौके के मुताबिक खुद को जाहिर करते हैं। जिस तरह पत्थर के अंदर अनेक मूर्तियाँ छिपी होतीं हैं, लेकिन मूर्तिकार उसके फालतू हिस्सों को तराश कर अपने मनमाफिक मूर्ति गढ़ लेता है, उसी तरह कविता का पाठक भी उससे अपने अनुरूप अर्थ ग्रहण करता है। शर्त बस यह है कि वह अर्थ कविता की भाषिक संरचना से वैध ढंग से निकलना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं। एक बार जब रचना पाठक के सामने चली जाती है तो रचनाकार के मंतव्य का प्रश्न समाप्त हो जाता है। रचना के बारे में उसकी राय किसी पाठक की राय से अधिक महत्व नहीं रखती। इस प्रक्रिया में एकाधिक वैध अर्थ भी हो सकते हैं, और यह विशेषता रचना की ताकत है कमजोरी नहीं। अर्थों के इस बहुलतावादी लोकतंत्र में एक बार फिर पाठक अपने काव्यार्थ को चुनता है और अलग अलग पाठकों पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार रचना की सामाजिक भूमिका तय होती है। जाहिर है कि इस प्रक्रिया में भाषा की अंतर्वस्तु की निर्णायक भूमिका होती है।

उदाहरण के लिए मान लें कि कोई कवि वर्तमान में दलितों के बारे में पूरी हमदर्दी के साथ सोचना और लिखना चाहता है लेकिन अपने संस्कारों से बाध्य होकर वह उनके प्रति दया का प्रचार करता है। वह पूरी ईमानदारी से सोचता है कि अगर दलित प्रतिरोध और संघर्ष के रास्ते पर चलना छोड़ दें तो सामंती शक्तियों के अंदर उनके प्रति सहनशीलता पैदा हो सकती है और धीरे धीरे दलितों का उत्थान संभव हो सकता है। ऐसी स्थिति में उसकी इच्छा के विपरीत उसकी रचना दलितों के अपमान और उनकी अवमानना का कारण बनेगी और दलित विरोधी शक्तियों को मजबूत करेगी।

ग़ालिब का मशहूर शेर है :

     जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
         कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

प्रत्यक्ष तौर पर इस शेर का अर्थ है कि किसी की मृत्यु के बाद उसके शरीर को जला दिया गया है और इस प्रक्रिया में उसका दिल, जो समस्त भावनाओं का आधार हुआ करता था, भी जल कर खत्म हो चुका है इसलिए बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। शाब्दिक रूप से इस व्याख्या पर आपत्ति नहीं हो सकती और इसकी सदिच्छा पर भी सवाल नहीं उठ सकता। इस व्याख्या का इस्तेमाल किसी प्रियजन के बिछोह पर सांत्वना देने से लेकर अनात्मवाद की स्थापना के लिए भी हो सकता है। लेकिन इसमें जो राख कुरेदने का प्रसंग है और जिसके पीछे छिपी ख्वाहिश को लेकर उत्सुकता भी जाहिर की गई है, वह इस शेर में एक अलग अर्थ की संभावना पैदा करता है।

ध्यान से देखें तो खुद कविता भी राख कुरेदने के अलावा क्या है। यह बात प्रायः स्वीकृत है कि वास्तविक जीवन प्रसंगों के गुजर जाने के बाद और उनसे थोड़ी दूरी बन जाने पर ही स्मृति के सहारे बड़ी कविता अस्तित्व में आती है। यथार्थ और स्वप्न भी कविता के स्रोत हैं लेकिन कालजयी रचनाएँ अक्सर स्मृति को अपना माध्यम बनाती हैं। इसी तरह भावनाएँ भी अपने आलंबन के गुजर जाने के बाद अधिक तीव्र और मर्मस्पर्शी होकर सामने आती हैं। कहने का आशय यह कि किसी पाठक के लिए इस शेर का वास्तविक और वैध अभिप्राय यह भी हो सकता है कि शरीर के न रहने पर प्रियजन की यादें अधिक प्रभावी होती हैं।

अब ये दोनों व्याख्याएँ पाठकों के मन मस्तिष्क में उनकी अभिरुचियों के मुताबिक जगह बनाती रहती हैं। अंततः इनमें से कोई एक ही व्याख्या समय की कसौटी पर खरी उतरेगी, लेकिन इसमें कितना वक्त लगेगा यह नहीं कहा जा सकता। कबीर और तुलसी जैसे कवियों के अभिप्रायों पर अब भी अनेक राय है। इसी श्रेणी में ग़ालिब भी आते हैं। जो कविता जितनी समर्थ होती है उसे लेकर मत मतांतर की गुंजाइश उतनी ही अधिक होती है। इस प्रसंग में अंतिम बात फिलहाल यह है कि हिंदी समाज और साहित्य में बहस का अवकाश कम होता जा रहा है। हमारे लेखकों और पाठकों को इस परिस्थिति में निहित खतरे को समझना चाहिए और अपने समाज को इस दिशा में चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।


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