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कविता

मेरी स्त्री
हरप्रीत कौर


एक

जूड़े का क्लिप
टाँक देती है कहीं
किसी भी दीवार पर
लगा देती है बिंदी
कहीं से भी शुरू करके
कैसे भी बुहार लेती है घर
किसी भी गीत को
बीच में से गुनगुना कर
छोड़ देती है अधबीच
'वह देखो तुम्हारे जैसा आदमी'
कह कर खिलखिला कर हँस देती है
बीच बाजार
किसी भी वक्त
कर लेती है कुछ भी
कितनी उन्मुक्त है
मेरी स्त्री

दो

धुलने के लिए
रख आया हूँ स्वेटर
अभी किसी रंग की
गिरफ्त में है वह
'दूध में थोड़ा केसर मिला दूँ
कई बार रंग बदलने से भी
बदल जाती है तासीर'
कह कर देख रही है मुझे
मेरी स्त्री

तीन

जाने क्या था
इतना उधड़ा
घर में
रात भर
चलती रही मशीन
सिलती रही
मेरी स्त्री

चार

दूध वाले से
बतियाती रही
देर तक
फोन पर
बनी रही चुप
मेरी स्त्री

पाँच

चलता रहा नल
धोती रही कपड़े
पोंछती रही रोशनदान
धो-धो कर जमाती रही बर्तन
उतारती रही जाले
जीवन भर
झाड़ती रही धूल
जाने क्या था
इतना मैला
घर में
 


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