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कविता

बातूनी लड़की
घनश्याम कुमार देवांश


बातूनी लड़की बातों का पंखा झलती थी दिन-रात लगातार
इस तरह वह वक्त को बैठने नहीं देती थी
अपनी आत्मा पर
लड़की दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानती थी
न ही दुनिया को पता था कुछ
उसकी दुनिया के बारे में
लड़की और दुनिया के बीच यह लड़ाई लंबे समय
से चल रही थी
और इस लड़ाई में वक्त भी दुनिया के तरकश में
शामिल था
लड़की कितनी अकेली थी
और कितनी अकेली थीं उसकी बातें
कैमरे और आईने से
उसकी मोहब्बत दिन-ब-दिन बढ़ती जाती
वह अपने अक्स में अपने आपको ढूँढ़ती
अपने बालों में, अपनी आँखों में, अपने माथे पर
अपनी हथेलियों में
वह अपनी त्वचा को अपनी उँगलियों से छूती
और अपने आप से पूछती क्या यही हूँ मैं
पूरी रात वह अकेली सोती
पूरी रात वक्त उसके सिरहाने बैठा रहता
पूरी रात चाँद छत पर टहलता
पूरी रात हवा खिड़की पर बैठी रहती
पूरी रात दुनिया में सन्नाटा पसरा रहता
जब थकी हुई बातूनी लड़की चुपचाप
अपनी आँखों के भीतर सोई रहती
 


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