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विमर्श

हीनता-ग्रंथि से उद्भूत पुनरुत्थानवादी दृष्टि : मिश्रबंधु
शीतांशु


दो प्रवृत्तियों की वजह से उत्तर-उपनिवेशवादी सैद्धांतिकी के विकास के इस दौर में मिश्रबंधुओं पर पुनर्विचार आवश्यक है - पहला यह कि प्राच्यवाद की पूरब पर अधिकार जमाने की जिस पश्चिमी शैली की ओर एडवर्ड सईद इशारा करते हैं उसकी अवस्थिति अगर हिंदी के किसी साहित्येतिहासकार में स्पष्ट दिखाई देती है तो वे हैं मिश्रबंधु। दूसरी बात यह कि अँग्रेजी हुकूमत और सभ्यता की खिलाफत में जो पुनरुत्थान भावना बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में आकार ग्रहण करती है, उसके बीज अगर हिंदी के किसी साहित्येतिहासकार में बिल्कुल साफ दृष्टिगोचर होती है तो वे भी हैं मिश्रबंधु।

यह चिंता मिश्रबंधुओं के इतिहास-लेखन में बराबर दिखाई देती है कि जीवन के अन्य क्षेत्रों में हम अँग्रेजों से बहुत अधिक पिछड़ चुके हैं और मात्र साहित्य ही एक ऐसा क्षेत्र बचा है जिसमें हम अभी भी अँग्रेजों से स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर सकते हैं। अपने सामान्य जीवन में मिश्रबंधु अँग्रेजी रीति-नीति के पोषक थे और साहित्य में अपनी परंपरा के सभी सुंदर-असुंदर की श्रेष्ठता के प्रचारक। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीयों के पिछड़ेपन के बारे में मिश्रबंधु उन्नीसवीं सदी के इस दुष्प्रचार का शिकार दिखाई देते हैं कि भारत अविकसित ग्राम समाजों वाला देश है। जो सदियों से एक ही तरह से रहता आ रहा है। जिसमें आर्थिक परिवर्तन के अभाव में कोई व्यापक सामाजिक परिवर्तन घटित नहीं हुआ है। इस दुष्प्रचार ने पश्चिम के अकादमिक जगत को गहरे प्रभावित किया था। इस प्रभाव का असर ऐसा था कि अपने लेखकीय जीवन के एक दौर में मार्क्स भी इस स्थापना को सत्य मान कर चल रहे थे। मिश्रबंधु औपनिवेशिक शासन के इस तर्क से सहमत दिखाई देते हैं कि सांसारिक उन्नति के लिए होड़ का हमारे यहाँ अभाव था। इतना ही नहीं, एक कदम आगे जाकर वे यहाँ तक कहते हैं कि इसी अभाव की वजह से यहाँ के लोग परिश्रम नहीं करना चाहते थे और दूसरों की दया पर जीते थे। उन्होंने लिखा है कि 'भारत में गौतम बुद्ध के समय से दया का आविर्भाव बहुत अधिक रहा है। धर्मोन्नति भी यहाँ अन्य देशों की अपेक्षा खूब हुई। इन दोनों ने मिल कर हमारे यहाँ विज्ञान वृद्धि में जीव-दया एवं संसार की असारता वाले विचारों का बहुत बड़ा प्राबल्य कर दिया। यहाँ दया बाहुल्य से पर दुख हानीच्छा ऐसी बलवती हो गई कि करुणाकर को यह सोचने का समय न रहा कि अनुकंपापात्र के दुखों का जन्म उसी के दोषों से हुआ है या अन्य कारणों से। इसका फल यह हुआ कि लाखों हृष्ट पुष्ट मनुष्य यहाँ काम करना नहीं चाहते और पीढ़ियों तक दूसरों की दया पर छकते रहते हैं। ...जीवन होड़ का हमारे यहाँ पूर्व काल में प्राबल्य नहीं हुआ, परंतु सांसारिक उन्नति के लिए जीवन होड़ संबंधी प्रबलता परमावश्यक है। बिना इसके कोई व्यक्ति परिश्रम करना न चाहेगा और परिश्रमी जनों की न्यूनता से देश की सभी प्रकार से अवनति होगी। ...दुर्भाग्यवश हमारे यहाँ ईर्ष्या का बल भारी रहा है। इसने एवं जीवन होड़ निर्बलता ने ऐक्य को बड़ी ही मंद दशा में पहुँचाया। इन कारणों से समाज बल कई अन्य बातों में चूर्ण हो गया और देश की अधिकाधिक अवनति होती गई, परंतु यह अवनति उत्तम भावों के उचित से अधिक प्रभाव बढ़ जाने से हुई थी, सो अवनति के साथ देश में नीचता नहीं आई और बुद्धि का ह्रास विद्वान मनुष्यों में नहीं हुआ, केवल जिन बातों में अनुचित सिद्धांत मान लिए गए थे, उन्हीं में देशीय बुद्धिवैभव दबा रहा।"1

यह औपनिवेशिक सत्ता और ज्ञान के अनुकूलन के कारण हुआ कि मिश्रबंधु यह स्थापित करने में लगे हुए थे कि भारतीय आध्यात्मिक थे और सांसारिक चेतना का उनमें अभाव था। हिंदुस्तान अगर प्रगति नहीं कर सका तो इसकी वजह यह आध्यात्मिकता है जिसने हमारे भीतर होड़ की भावना को नहीं बढ़ने दिया। अपनी इस हीन भावना से उबरने के लिए मिश्रबंधु समाधान पाते हैं अपने साहित्य के विभिन्न पहलुओं को महत्वपूर्ण साबित करने में। यूरोप के साहित्य में भी विषयवस्तु की दृष्टि से बहुत कुछ श्रेष्ठ था, ऐसे में मिश्रबंधु रास्ता निकालते हैं रूपवाद के रास्ते जाकर। उन्होंने लिखा है कि ''साहित्य गरिमा पर स्वतंत्रतापूर्वक उचित विचार करने से प्रकट होगा कि लाभदायिनी पुस्तकें तो हमारे यहाँ कम हैं, परंतु उक्तियुक्तिपूर्ण अलौकिक आनंददायक ग्रंथ भरे पड़े हैं। यहाँ साहित्यिक गांभीर्य खूब है, परंतु अँग्रेजी की भाँति विषयों में फैलाव नहीं है...। हमारे यहाँ अवनति में रहते रहते और सभी बातों में हीनता देखते-देखते लोगों में आत्मनिर्भरता इतनी कम रह गई है कि वह अपनी किसी वस्तु को पाश्चात्य पदार्थों के सम्मुख प्रशंसनीय नहीं समझते हैं। इस कारण से साहित्य गरिमा की अलौकिक छटा रखते हुए भी हिंदी काव्य उन्हें पाश्चात्य कवियों की रचनाओं के सामने तुच्छ जँचता है। हमने हिंदी नवरत्न में नव सर्वश्रेष्ठ हिंदी कवियों पर समालोचनाएँ लिखी थीं। उनमें यत्र-तत्र उन कवियों की प्रशंसा करते हुए हमने अन्य भाषाओं की आपेक्षक हीनता का कथन किया था।''2 रामविलास शर्मा और अन्य प्रगतिशील इतिहासकारों के लेखन से आज यह स्पष्ट हो चुका है कि व्यापारिक पूँजीवाद के दौर में हिंदुस्तान की व्यापारिक प्रगति बहुत ही अधिक थी और भारत सांस्कृत धरातल पर अत्यधिक समृद्ध था। बाद में अँग्रेजों ने इसी धन-धान्य की मदद से, भारत की लूट से, अपने देश की औद्योगिक क्रांति संपन्न की और उसे समृद्ध किया। अपने समाज की निरंतर प्रगति के बोध के अभाव में और औपनिवेशिक दुष्प्रचार के प्रभाव में ही मिश्रबंधु ऐसे निष्कर्षों तक पहुँचते हैं जो दुविधा में डालने वाली हैं। अपनी समस्याओं का समाधान वे औपनिवेशिक शासन में ही ढूँढ़ने लगते हैं, अँग्रेजों के संपर्क में ही ढूँढ़ने लगते हैं।

जब गाँधी 'हिंद स्वराज' पुस्तक के माध्यम से हिंदुस्तान की सभ्यता को विदेशी प्रभाव से मुक्त करने का प्रयास कर रहे थे, उसी दौर में मिश्रबंधु अँग्रेजी सभ्यता को इस बात का श्रेय दे रहे थे कि अब संसारी लाभदायक बातों की ओर हिंदुस्तान के लोगों की प्रवृत्ति होने लगी। उनका मानना था कि हिंदुस्तान के साहित्य में बहुत सारी रोचक सामग्री है किंतु उपयोगी सामग्री का यहाँ अभाव है। यह अँग्रेजों के उपकार की वजह से हुआ की अब उपयोगी विषयों पर यहाँ लेखन होने लगा है। मिश्रबंधुओं की दृष्टि थी कि कला-कौशल, विज्ञान, रसायन, अर्थशास्त्र, इतिहास, जीवन चरित, समालोचना, पुरातत्व इत्यादि शाखाओं में अब तक हमारा साहित्य प्रायः एकदम शून्य था। बीसवीं शताब्दी में होते हुए भी इन बातों में योरोप के देखते हम प्रायः सोलहवीं सदी में ही पड़े हुए थे। ऐसे में मिश्रबंधुओं ने एकमात्र बचे हुए विषय साहित्य को अपनी पुनरुत्थान भावना को तृप्त करने का माध्यम बनाया।

अँग्रेजों के प्रति मिश्रबंधुओं के इस रवैये के बारे में किशोरीदास वाजपेयी ने लिखा है कि 'मैं कट्टर स्वातंत्र्यवादी और वे परम राजभक्त। कोई मेल न था। मैं उस तरह के लोगों से चिढ़ता था और वे भी मेरे जैसे लोगों से दूर रहते थे।" 3 महारानी विक्टोरिया के मरने पर मिश्रबंधुओं ने विक्टोरिया अष्टादशी लिखकर अठारह छंदों द्वारा शोक मनाया था। 4 इन छंदों में राजभक्ति की भावना एकदम स्पष्ट रूप से प्रकट होती है -

छाँड़ि साहस धीर जब सब लोग हाहा खाय।

छुधा पीड़ित लगे डोलन चहुँ दिसि बिलिलाय।।

...रहे जब नर चहत सुख सों जान कारागार।

मिलै जासों साँझ लौं भरि पेट तत्र अहार।।

गई सो जग जननि श्री विक्टोरिया कित हाय।

देखि व्याकुल सुतन कत नहिं गहति कर इत धाय।।

प्रस्थान बिंदु के रूप में ऐसी दृष्टि के साथ अग्रसरित होने के कारण ही उनके इतिहास का ढाँचा चरमरा गया और बहुत सारे गलत निष्कर्षों को उन्होंने प्रतिपादित किया।

भक्तिकाल हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है लेकिन इस भक्ति साहित्य के महत्व को समझने में मिश्रबंधुओं की दृष्टि उक्त सीमाओं से ग्रस्त रही। भक्ति आंदोलन ने जिस चेतना को जन्म दिया वह चेतना धार्मिक होते हुए भी इतनी परिवर्तनकारी थी कि हिंदुस्तान के कई अधार्मिक प्रगतिशील इतिहासकारों ने भी उसकी क्रांतिकारी भूमिका को याद किया है। मिश्रबंधुओं ने हिंदी साहित्य के इतिहास के इस अमूल्य धरोहर को पहचानने से ज्यादा अपना ध्यान देव को स्थापित करने में लगा दिया। उन्होंने लिखा है कि "जैसे संस्कृत में कालिदास कविता में प्रायः सबसे बड़े माने जाते हैं, वैसे ही हिंदी साहित्य में महाकवि देव का जोड़ खोजना कठिन काम है। महात्मा तुलसीदास और सूरदास की उपमा सूर्य और चंद्र से दी गई है, पर अनेक हिंदी मर्मज्ञों का यह मत है कि ऐसी दशा में देवजी को नभमंडल मानना पड़ेगा कि जिसमें सूर्य, चंद्र और तारागण उदय और अस्त होते एवं इधर-उधर परिभ्रमण किया करते हैं, पर जिसका कहीं ओर-छोर ही नहीं मिलता।" 5 यह वही समय है जब महावीर प्रसाद द्विवेदी कविता से नख-शिख वर्णन और नायिका भेद जैसी प्रवृत्तियों को दूर करने का प्रयास कर रहे थे और साहित्य को ज्ञानराशि के संचित कोश के रूप में देख रहे थे और इसके लिए प्रयास भी कर रहे थे। शिवकुमार मिश्र ने इस संबंध में ठीक लिखा है कि ''सच कहा जाए तो रीतिवाद और कलावाद से जीवनधर्मी समाजधर्मी समीक्षा के संघर्ष का जो सिलसिला भारतेंदु युग में शुरू हुआ था वह द्विवेदी युग में भी जारी रहा। एक ओर मिश्रबंधु थे, पद्मसिंह शर्मा थे, कृष्ण बिहारी मिश्र थे - जो देव बिहारी की अपनी प्रतिस्पर्धा में रीतिवादी कला मूल्यों की पुनःप्रतिष्ठा कर रहे थे, दूसरी ओर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी थे जो रीतिकालीन कला मूल्यों और जीवन मूल्यों के कट्टर आलोचक थे।''6

हीनता ग्रंथि से उबरने के लिए मिश्रबंधु अपने साहित्य की उन प्रवृत्तियों की प्रशंसा करने लगते हैं जो विश्व के अन्य साहित्य में दिखाई तो नहीं देतीं किंतु रूढ़िवादी सामंती मूल्यों को प्रतिष्ठित करती दिखाई देती हैं, जिन्हें बीसवीं सदी के उस दौर में त्याग कर आगे बढ़ने की जरूरत थी। मिश्रबंधुओं की रीति प्रवृत्ति का पता चलता है उनके इस कथन से कि "हमारे साहित्य की कमी यह है कि हम विषयों की विविधता और बहुलता तो चाहते हैं किंतु रूप (आर्टिफिशियल्टी) की ओर कम ध्यान देते हैं।" अपने पक्ष में मिश्रबंधु यह तर्क देते हैं कि "योरोप में ऐसी गुणग्राहकता की बन पड़ी हुई है कि लोग थोड़े भी गुण की बहुत बड़ी प्रशंसा करते हैं। विद्वद्वर शा महाशय ने अँग्रेजी साहित्य का एक अच्छा इतिहास लिखा है, जो हमारे यहाँ प्रायः एम.ए. के कोर्स में रहता है। उसमें उन्होंने सौ-सवा-सौ बार यह कहा है कि अमुक कवि का अमुक गुण संसार साहित्य में सर्वश्रेष्ठ है। इधर हमारे यहाँ लोग अच्छे पदार्थों की भी मुक्त कंठ से प्रशंसा नहीं करते।"7

भक्त कवि तुलसीदास की श्रेष्ठता अगर मिश्रबंधुओं को याद आती भी है तो वे उसके विस्तार में नहीं जाते बल्कि पुनरुत्थान भावना के साथ प्रस्थान करने के कारण योरोपीय साहित्य से उसकी श्रेष्ठता प्रतिपादित करने में लग जाते हैं। मिश्रबंधुओं ने हिंदी में तुलनात्मक आलोचना की जिस प्रवृत्ति को जन्म दिया उसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि हिंदी साहित्य में बहुत सारी बातों की उच्चता को उन्हें स्थापित करना था। भारतीयों में एक गौरव की अनुभूति पैदा करने के लिए और उन्हें हीनताबोध से उबारने के लिए मिश्रबंधुओं ने यह आवश्यक समझा कि तुलसी की तुलना शेक्सपीयर से ही की जाए क्योंकि वही विजेता जाति का था और वही अँग्रेजी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ था। उन्होंने लिखा है कि "इसमें संदेह नहीं कि उसके (शेक्सपीयर) हैमलेट, मैकबेथ, विंटर्सटेल, ऑथेलो, किंगलियर, जूलियस सीजर और वेनिस का सौदागर इत्यादि नाटक नामी और प्रशंसनीय हैं, परंतु कुल बातों पर ध्यान देने से गोस्वामीजी में उससे अधिक चमत्कार पाया जाता है। विंटर्सटेल में प्रेम और उसकी जाँच का अच्छा चित्र खींचा गया है, पर सीताजी के प्रेम वर्णन के सामने वह फीका पड़ जाता है। ...किंग लियर में कार्नीलिया का पितृप्रेम एवं गानरिल और रीगन की चालाकी तथा लियर पर उनका प्रभाव अच्छा वर्णित हुआ है, पर कैकेयी की कुटिलता पर दशरथ की दशा एवं श्रीराम का पितृप्रेम वाले वर्णनों के सामने बरबस कहना पड़ेगा कि किंगलियर किसी लड़के की रचना है। जूलियस सीजर का परम पुरुषार्थ ब्रूटस की मूर्खता एवं एंटनी की वक्तृता है, पर इन की प्रभा अयोध्याकांड के अनेकानेक व्याख्यानों के सामने एकदम मंद पड़ जाती है...। गोस्वामीजी के वर्णनों को पढ़कर मनुष्य नीची और उच्च सभी प्रकार की प्रकृतियों को भली-भाँति जान कर उत्तम मार्ग की ओर ही प्रवृत्त होगा। भक्तिरस का जो गंभीर और हृदयद्रावक भाव इनकी रचनाओं में हर स्थान पर वर्तमान रहता है, उसके सामने शेक्सपियर कुछ भी उपस्थित नहीं कर सकता।"8 इस तरह औपनिवेशिक चेतना, धार्मिक अस्मिता और जातीय पुनरुत्थान को प्रस्थान बिंदु के रूप में स्वीकार कर लेने के कारण मिश्रबंधु इतिहास को परंपरागत कमियों से मुक्त नहीं कर सके।

अँग्रेजों की तरह हिंदी साहित्य को हिंदू जनमानस से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति भी इन्हीं प्रभावों की वजह से थी। कविता पर विचार करते हुए मिश्रबंधुओं ने लिखा है कि पश्चिमी लोग अपनी उपयोगितावादी दृष्टिकोण के कारण कविता की ओर आकर्षित नहीं हुए किंतु हमारे साथ कुछ दूसरा ही हुआ। हिंदू जो कि भावुक और आध्यात्मिक प्रकृति के होते हैं, उनके साहित्य में विलक्षण मोती आ गए जब सोलहवीं सदी का धार्मिक पुनरुत्थान हुआ।"9 हिंदी जातीयता की उनकी समझदारी की कमजोरी का भान इसी बात से लग जाता है कि परंपरा के सामासिक स्वरूप की तो वे कहीं चर्चा नहीं करते पर इस बात पर जोर देते हैं कि औरंगजेब के समय से उसके अत्याचारों एवं अन्य कारणों से भारत में जातीयता जागृत हुई और हिंदुओं में शूर वीर उत्पन्न होकर हिंदू साम्राज्य के लिए प्रयत्न करने लगे। ये लोग स्वभावतः कवियों का मान करते और वीर कविता को पसंद करते थे। अतः विविध विषयों की परिपाटी ने और भी बल पाया और वीर कविता भी हिंदी में बहुतायत से बनने लगी।"10 जातीयता की इसी खंडित समझदारी की परिणति हुई कि हिंदी-उर्दू के समान धरातल का बोध होने पर भी वे उर्दू की परंपरा के अलगाव पर जोर देते हैं।

मिश्रबंधुओं को संस्कृत और हिंदी के व्याकरण के अलगाव की सही समझदारी थी। हिंदी को संस्कृत के प्रभाव से मुक्त करने के उन्होंने प्रयास भी किए। हिंदी के प्रति संस्कृत को लेकर जो अतिरिक्त आग्रह पैदा किया जा रहा था उसके वे खिलाफ थे। उन्होंने लिखा है कि जो लोग बात-बात में संस्कृत के नियमों का सहारा हिंदी लिखने में भी ढूँढ़ते हैं, वे हमारी समझ में हिंदी के अस्तित्व से भी इनकार करने वालों में हैं और उनको हम हिंदी के प्रचंड शत्रु समझते हैं। इसी तरह हिंदी में फारसी के शब्दों तथा भावों के आने का भी वे स्वीकार करते हैं। यह भी वे स्वीकार करते हैं कि अकबर के समय फारसी और हिंदी के मिलने से एक नई भाषा दृढ़ हो रही थी, जिसने समय पाकर उर्दू का रूप ग्रहण किया और जो अब फारसी अक्षरों में लिखी जाने तथा फारसी शब्दों की प्रचुरता के कारण पुस्तकों में हिंदी से एक पृथक भाषा सी देख पड़ती है, यद्यपि साधारण जन समूह के बोल-चाल में ऐसा कोई भेद नहीं है। किंतु इस स्वीकार के बाद भी धार्मिक अस्मिता के प्रभाव में और तद्युगीन हिंदी को हिंदू जनमानस के आलोक में देखने के कारण मिश्रबंधु विरोधाभासी लेखन करते हैं और लिखते हैं कि 'कुछ दिन खिचड़ी भाषा के व्यवहार का प्रश्न हिंदी में रहा, जिसका तात्पर्य यह है कि उन्नत श्रेणी की हिंदी एकदम लोप होकर केवल उर्दू मिश्रित साधारण बोलचाल की भाषा रह जाए। विद्वानों और अपढ़ों की बोली में सदा ही सभी देशों में अंतर रहता है, सो हम लोगों को यह कैसे पसंद हो सकता है कि हमारे पढ़े-लिखे लोग भी तुलसी, देव और बिहारी की रचनाओं को समझें ही नहीं। भाषा सुगम अवश्य होनी चाहिए और बोलचाल में प्रचलित विदेशी एवं अन्य भाषाओं के शब्द उसमें जरूर रखने चाहिए पर यह कदापि नहीं हो सकता कि हिंदी साधु भाषा को एकदम तिलांजलि दे दी जाए।" 11

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि 'मिश्रबंधु विनोद' लिखे जाने तक मिश्रबंधु एक व्यवस्थित इतिहास दृष्टि विकसित नहीं कर सके थे। इतिहास लिखे जाने के लिए जिस आलोचनात्मक विवेक की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की समझदारी की जरूरत होती है उसकी मिश्रबंधुओं में कमी थी। रीति काव्य की उन्हें पर्याप्त जानकारी थी, किंतु यह जानकारी उनके आलोचनात्मक विवेक पर हावी होने वाली थी। मिश्रबंधुओं के इतिहास लेखन की असमर्थता को औपनिवेशिक प्रभाव से जोड़कर देखा ही जाना चाहिए। अगर उनकी चेतना औपनिवेशिक चेतना से ग्रस्त न हुई होती तो कवियों के जीवन, कविता के ब्यौरों और रूपवादी मूल्यों पर ध्यान देने की बजाए वे गंभीरता से इतिहास लेखन कर रहे होते, हिंदी साहित्य के अंतर्वस्तु को सामाजिक परिस्थितियों के बीच रखकर पहचान रहे होते। मिश्रबंधु अगर शिवसिंह सेंगर के वृत्त-संग्रह के इतने वर्षों बाद भी इतिहास लेखन को पारंपरिक प्रवृत्ति से बाहर निकालने में बहुत समर्थता हासिल नहीं कर सके, एक व्यवस्थित काल-विभाजन और नामकरण करने में असमर्थ रहे तो इस कारण कि हिंदी साहित्य के विषय-वस्तु को भारतीय सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक ढाँचे के साथ उसे वे समायोजित नहीं कर सके। उनकी इस असफलता में ही उपनिवेशवाद की सफलता थी।

संदर्भ

1. मिश्रबंधु, मिश्रबंधु विनोद 1, हिंदी ग्रंथ प्रसारक मंडली, खंडवा व प्रयाग, 1913, पृ.28

2. वही, पृ.31

3. विष्णुदत्त राकेश (सं), पं किशोरी दास वाजपेयी ग्रंथावली, भाग 3, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, पृ.480

4. मिश्रबंधु, मिश्रबंधु विनोद 1, पृ.90

5. वही, पृ.136

6. शिवकुमार मिश्र, यथार्थवाद, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1975, पृ.124

7. मिश्रबंधु, मिश्रबंधु विनोद 1, पृ.32

8. मिश्रबंधु, मिश्रबंधु विनोद 1, पृ.121

9. वही, आमुख से

10. वही, पृ.127

11. वही, पृ.161


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