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विमर्श

हिंदी साहित्य की परंपरा की चिंता : संदर्भ - फोर्ट विलियम कॉलेज
शीतांशु


''इसके लिए कॉलेज के प्रिंसिपल गिलक्राइस्ट ने अपनी समझ के हिसाब से हिंदी-हिंदुस्तानी गद्य में पुस्तकें लिखवाईं।'' 1 - रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास

''गिलक्राइस्ट ने आगे आकर कहा - फोर्ट विलियम कॉलेज में हमने मुंशी सदासुख लाल और मौलवी मीर अम्मन को बुलाकर इनकी सम्मिलित भाषा की रीढ़ तोड़ दी।'' 2 - कमलेश्वर, कितने पाकिस्तान

न तो गिलक्रिस्ट कभी फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रिंसिपल थे और न ही सदासुख लाल कभी कॉलेज में मुंशी के रूप में नियुक्त हुए थे!

फोर्ट विलियम कॉलेज के संदर्भ में ऐसी अनेक भ्रांतियाँ हिंदी साहित्य के इतिहास-ग्रंथों में बिखरी पड़ी हैं। जो इतिहासकार इन भ्रांतियों से बचना चाहते थे वे या तो इसकी चर्चा में ही नहीं गए या थोड़े में ही इसे समेट लिया। इस स्थिति का सबसे मुख्य कारण है - फोर्ट विलियम कॉलेज से संबंधित ज्यादातर सामग्री की उपलब्धता में कठिनाई। जो थोड़ी-बहुत सामग्री प्रकाश में आई वह भी एक खास दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करने वाली थी। फोर्ट विलियम कॉलेज की सर्वाधिक चर्चा प्रेमसागर के ही संबंध में की जाती है। हिंदी के अरबी-फारसी मुक्त रूप को स्थापित करने के लिए प्रेमसागर की भाषा बहुत फायदेमंद थी। उर्दू को अलग-थलग करने के लिए इसे बहुत महत्व दिया गया। ऐसे में कई ग्रंथ जो फोर्ट विलियम कॉलेज की एक दूसरी ही छवि की ओर ध्यान ले जाते हैं, चर्चा में ही नहीं आ पाए। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध की वास्तविक छवि को समझने के लिए उन विचारधारात्मक आग्रहों, पक्षधरताओं और अस्मिताओं की पहचान जरूरी है जिसके प्रभाव में प्राच्यविदों, आंग्लवादियों, सरकारी कर्मचारियों, हिंदू-मुस्लिम धर्म के पुरोधाओं और हिंदी साहित्य के प्रारंभिक इतिहासकारों ने कॉलेज के साहित्यिक योगदान की व्याख्या की।

हिंदी साहित्येतिहास लेखन पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि का गहरा प्रभाव रहा है इसलिए शुरुआत उन्हीं से। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस कथन को देखें - ''इन अनुवादकों (ईसाई धर्म पुस्तकों के) ने सदासुख और लल्लूलाल की विशुद्ध भाषा को ही आदर्श माना, उर्दूपन को बिल्कुल दूर रखा, इससे यह सूचित होता है कि फ़ारसी-अरबी मिली भाषा से साधारण जनता का लगाव नहीं था जिसके बीच मत का प्रसार करना था।''3

दो पृष्ठ पहले ही शुक्ल जी का यह मानना था कि - ''लल्लूलाल की काव्य भाषा गद्यभक्तों के काम की ही अधिकतर है, न नित्य व्यवहार के अनुकूल है, न संबद्ध विचारधारा के योग्य।''4

वस्तुतः प्रेमसागर की भाषा के उबाऊपन की परख होने के बावजूद हिंदी साहित्य के इतिहास में इस ग्रंथ को स्थापित करने में आचार्य शुक्ल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने ही सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी, शकुंतला नाटक और माधोनल की भाषा को एक ही साँचे में रखकर यह घोषणा कर दी कि 'चारों पुस्तकें बिल्कुल उर्दू में हैं।'5 उर्दू से अलग हिंदी की एक साहित्यिक परंपरा के रेखांकन के लिए यह जरूरी था कि इन चारों रचनाओं को भिन्न टोकरी में डाल दिया जाए। माधोनल की भाषा में फ़ारसी-अरबी के शब्द अधिक हैं और वह व्यापक जनसमुदाय की भाषा का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती लेकिन सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को भी उसी श्रेणी के अंतर्गत रख देना ठीक नहीं था। इसी प्रारंभिक दिशा-निर्देश की परिणति है कि आज भी विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य के ज्यादातर पाठ्य-क्रम संस्कृतवादी हिंदी साहित्येतिहास की परंपरा में ही बँधे हुए हैं।

लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पहले इतिहासकार थे जिन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज से जुड़ी सामग्री की जमकर छानबीन की। देश-विदेश के विभिन्न पुस्तकालयों में उपलब्ध कॉलेज से संबंधित सामग्री और 'प्रोसीडिंग्स ऑफ दी कॉलेज ऑफ फोर्ट विलियम' के दस्तावेजों को जाँचने के बाद ही उन्होंने अपनी पुस्तकों 'फोर्ट विलियम कॉलेज (1800-1854)' और 'हिंदी साहित्य का इतिहास' की रचना की। विस्तृत अध्ययन के फलस्वरूप ही वे शुक्ल जी द्वारा की गई तथ्यपरक भूलों को दुरुस्त कर सके। कॉलेज द्वारा कोश और व्याकरण के क्षेत्र में किए गए कई महत्वपूर्ण योगदानों का रेखांकन भी इन्होंने किया। वार्ष्णेय जी के 'हिंदी साहित्य के इतिहास' की विशिष्टता है कि उसके काल-विभाजन में उन्होंने शुक्ल जी के काल-विभाजन को अस्वीकार करने का साहस दिखाया है और 1800 ई. के बाद के काल को 'ब्रिटिश काल' नाम से अभिहित किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास में 1800 ई. से 1843 ई. का दौर रीतिकाल के अंतर्गत आता है। फोर्ट विलियम कॉलेज की सक्रियता भी इन्हीं वर्षों के दौरान थी। वार्ष्णेय जी के लिए यह संभव न था कि फोर्ट विलियम कॉलेज का कार्यकाल साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के अंतर्गत रखा जाए। उनका तर्क है - ''1800 में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा के प्रतीक फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई और इसी समय से आधुनिक खड़ी बोली गद्य का क्रमबद्ध इतिहास प्रारंभ होता है और गद्य हिंदी साहित्य में आधुनिकता का प्रतीक बन कर आया। उस पर और हिंदी कविता पर अँग्रेजी भाषा और साहित्य का प्रभाव स्पष्ट है।''6

उनकी दृष्टि में यह प्रभाव इतना अधिक था कि 1800 ई. से 1947 ई. तक के दौर को उन्होंने 'ब्रिटिश-काल' नाम दे दिया। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के साहित्य के लिए कौन से नाम उपयुक्त हैं इस पर इतिहासकारों ने पर्याप्त विचार-विमर्श किया है। यहाँ मेरा उद्देश्य यह दिखाना है कि एक तरफ तो वार्ष्णेय जी पूरे डेढ़ सौ साल के हिंदी साहित्य के इतिहास को 'ब्रिटिश-काल' कहते हैं और दूसरी तरफ 'फोर्ट विलियम कॉलेज' पुस्तक के आखिरी पैराग्राफ में लिखते हैं - ''लल्लूलाल और सदल मिश्र की रचनाओं के नाते हिंदी साहित्य के इतिहास में फोर्ट विलियम कॉलेज का उल्लेख करना तो आवश्यक है, किंतु हिंदी भाषा और गद्य साहित्य के विकास या उन्हें एक कदम आगे बढ़ाने की दृष्टि से उसका कोई महत्व नहीं है। कॉलेज से हिंदुस्तानी या उर्दू गद्य को प्रोत्साहन मिला न कि हिंदी गद्य को। जो कार्य कैरे ने बांग्ला के लिए किया वह कार्य किसी ने हिंदी के लिए न किया। हाँ, कोश, व्याकरण, टाइप, विराम चिह्न आदि आधुनिक विषयों के सूत्रपात की दृष्टि से कॉलेज आधुनिक भारतीय भाषाओं के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगा।'' 7

फोर्ट विलियम कॉलेज के संदर्भ में उनकी इस दृष्टि के पीछे भी हिंदी साहित्य की परंपरा की चिंता दिखाई देती है। बैताल पच्चीसी को वार्ष्णेय जी लल्लूलाल की रचना नहीं मानते और फोर्ट विलियम कॉलेज का उल्लेख उन्हें सिर्फ लल्लूलाल और सदल मिश्र की रचनाओं की दृष्टि से जरूरी लगता है। ऐसे में हिंदी साहित्य की परंपरा में वे भी बैताल पच्चीसी का उल्लेख जरूरी नहीं समझते। बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी की भाषा के बारे में वार्ष्णेय जी लिखते हैं - ''बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी में से सिंहासन बत्तीसी में और चारों ग्रंथों में से 'माधोनल' और 'शकुंतला नाटक' में उर्दूपन सबसे अधिक है, किंतु उर्दूपन है सब में। स्वयं लेखक ने चारों ग्रंथों की रचना रेख़्ता में बताई है। फोर्ट विलियम कॉलेज के विवरणों में चारों ग्रंथ हिंदुस्तानी भाषा में लिखे बताए गए हैं, न कि 'प्रेमसागर' की भाँति हिंदवी या ठेठ हिंदी में। गिलक्राइस्ट ने रेख़्ता, हिंदुस्तानी और उर्दू का एक ही अर्थ में प्रयोग किया है।'' 8

फिर से एक बार प्रेमसागर की ठेठ हिंदी को आधार बना कर सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को उर्दू के खेमे में डालकर हिंदी साहित्य से अलग कर दिया गया। निश्चय ही वार्ष्णेय जी की ठेठ हिंदी भी अरबी-फ़ारसी के शब्दों को पचा सकने में सक्षम नहीं थी।

हिंदी साहित्य के इतिहास में व्याप्त इस असंगति की पहचान डॉ. बच्चन सिंह ने अपनी पुस्तक 'आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास' में की है। बच्चन सिंह का मानना है कि सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी की भाषा में अरबी-फ़ारसी के शब्द मूलतः बोल-चाल के हैं। प्रेमसागर से इन दोनों रचनाओं की भाषा की तुलना करते हुए थोड़ा आक्रामक लहजे में वे कहते हैं - ''स्पष्ट है कि प्रेमसागर की भाषा केवल ब्रजभाषा रंजित ही नहीं है। इसमें शब्द-रूपों की अनिश्चितता भी दिखाई देती है। शैली पर पंडिताऊपन की गहरी छाप है। मुहावरों का वैसा प्रयोग नहीं हुआ है जैसा बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी में दिखाई पड़ता है। सच तो यह है कि उन्हें न तो संस्कृत का ज्ञान था न ब्रज भाषा का। इसलिए न तो वे मूल ग्रंथों का मर्म समझ सके थे और न अनुवादों की भाषा को ही औचित्यपूर्ण ढंग से प्रयुक्त कर सके।''9

बैताल पच्चीसी और सिंहासन बतीसी हिंदी साहित्य की उन चंद रचनाओं में से हैं जो अलगाववादी भाषा-नीतियों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं और यह प्रमाणित करती हैं कि हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी-रेख़्ता में एक लचीलापन था और फोर्ट विलियम कॉलेज में अगर खड़ी बोली साहित्य में ऐसी शैलियाँ मौजूद हैं जिनमें कि प्रचुर मात्र में अरबी-फ़ारसी के शब्द हैं या फिर अरबी-फ़ारसी शब्दों की मात्र बहुत कम है तो फिर ऐसी शैली भी अस्तित्व में है जो हिंदू-मुस्लिम की साझी संस्कृति और एक संतुलित शब्दावली युक्त भाषा का प्रतिनिधित्व करती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का तर्क है कि हिंदुस्तानी के समर्थक होने के बावजूद गिलक्रिस्ट को ठेठ हिंदी में भी रचनाएँ करवानी पड़ीं क्योंकि इस भाषा का उन्होंने स्वतंत्र अस्तित्व पाया। कुछ इसी तर्क के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी जैसी रचनाएँ कॉलेज में इसलिए करवाई गईं क्योंकि ऐसी भाषा का भी अस्तित्व था। गिलक्रिस्ट के कार्यकाल में ऐसी कई रचनाएँ मिलती हैं जिनमें फ़ारसी के शब्द कूट-कूट कर भर दिए गए हैं या छाँट-छाँट कर अलग कर दिए गए हैं। उन रचनाओं की तुलना में बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी की भाषा आधुनिक भारतीय मानस के ज्यादा नजदीक ठहरती है। इसलिए विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को प्रेमसागर पर वरीयता दी जानी चाहिए। अगर अध्यापन के क्रम में प्रेमसागर के महत्व का विश्लेषण किया जाता है जिसमें कि अरबी-फ़ारसी शब्दों को छाँटकर अलग कर दिया गया है तो ऐसी भाषा का प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाओं को भी शामिल करना चाहिए जो सिक्के का दूसरा पहलू भी पेश कर सकें।

सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी की भाषा खड़ी बोली व्याकरण के आधार पर खड़ी है। उसमें संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, ब्रज आदि भाषाओं के शब्दों का मेल-जोल दिखाई देता है। दोनों ही रचनाओं की भाषा मुहावरेदार और लच्छेदार है। ठेठ देशज शब्द भी भरे पड़े हैं। देखिए, सिंहासन बत्तीसी की भाषा का उदाहरण -

''दूसरी पुतली चित्ररेखा बोली - राजा तेरे योग्य नहीं है और ऐसी अनीति कोई करता नहीं जैसी तू करने पर तैयार हुआ है। इस सिंहासन पर वह बैठे जो विक्रम सा राजा हो। तब राजा बोला, विक्रम में क्या गुण थे सो मुझसे कह। तब वह बोली एक दिन राजा विक्रम कैलास को गए और वहाँ एक यती से मुलाकात हुई। उसने राजा को योग की रीति सब बताई। राजा ने अपने जी में इरादा किया कि योग कमावें। योग करने को तैयार हुआ। राजतिलक भतृहरि को दिया। राजपाट पर उसे बिठाया आप राजकाज धनदौलत छोड़ कथा पुरान में मन लगा, भस्म लगा, संन्यासी बनकर जंगल को निकल गया और उत्तराखंड में जागकर योग साधने लगा। उस शह्र के जंगल में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। ब्राह्मण की तपस्या देख के देवता खुश हुए, वर उसे देने लगे और उसने न लिया तब आकशवाणी हुई कि हम अमृत भेजते हैं सो तू ले। एक आदमी की सूरत में आकर देवता उसे फल दे यह कह गए कि जो तू उसको खावेगा चिरंजीवी होगा।'' 10

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसी भाषा को 'बिल्कुल उर्दू' की श्रेणी में रखा है। विडंबना यह है कि उर्दू इतिहास ग्रंथों में फोर्ट विलियम कॉलेज से संबंधित पुस्तकों में लैला-मजनूँ, हफ्त पैकर, बाग़ोबहार, गंज-ए-खूबी तारीख़-ए-नादिरी, तोता कहानी, अराइश-ए-महफिल, गुल-ए-मग़ाफिरत आदि की चर्चा तो होती है लेकिन सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को उतना महत्व नहीं दिया जाता।

बैताल पच्चीसी की भूमिका से साफ पता चलता है कि इसकी रचना एक ऐसी जबान में की गई थी जिसे पढ़े-लिखे, अनपढ़, गुणी-मूढ़, खास और आम सभी समझ सकें, किसी को भी इस भाषा को समझने में परेशानी न हो। इसी भूमिका से यह भी पता चलता है कि बैताल पच्चीसी का जो प्रारंभिक प्रारूप तैयार हुआ था उसमें संस्कृत और 'भाषा' के और भी शब्द थे। यह भाषा मजहर अली खान 'विला' की थी, जिसमें लल्लूलाल ने सहायक की भूमिका निभाई थी। यानी कि बैताल पच्चीसी के प्रारंभिक प्रारूप की भाषा बहुत लचीली थी। बाद में तारिणीचरण मित्र ने 'संस्कृत और भाषा के ऐसे अल्फ़ाज़ जो देखने के मुहावरे में कम आते हैं', को छाँट दिया। फिर भी भाषा ऐसी रखी गई कि उसका रूप सभी कबूल कर लें - ''इबतिदाय दास्तान यों है, कि मुहम्मदशाह बादशाह के जमाने में राजा जैसिंह सवाई ने जो मालिक जैनगर का था, सूरत नाम कबीश्वर से कहा कि बैताल पच्चीसी को जो जबानि संस्कृत में है तुम ब्रज भाषा में कहो, तब उसने बमुजिब हुक्म राजा के ब्रज की बोली में कही, सो अब शाहि आलम बादशाह के अहद के बीच, और असर में अमीरूल उमरा जुदए नोईनानि अजीमुश्शान, मुशीरि खासि शाहि क़ैवां बारगाहि इंगलिस्तान, अशरफ़ुल अशराफ़ मारकुइस वलिजली गवरनर जनरल बहादुर (दाम मुलकहु) के, मजहर अली खानि शाइर ने, जिसका तख़ल्लुस विला है, व़ास्ते सीखने और समझने साहिबानि आलीशान के, बुमजिब फ़रमाने जनाबि जान गिलक्रिस्ट स़ाहिब (दाम इक़बालहु) के, जबानि सहल में जो खास ओ आम बोलते हैं, और जिसे आलिम ओ जाहिल गुनी कूढ़ सब समझें, और हर एक की तबीअ़त पर आसान हो, मुशकिल किसी तरह की जिहन पर न गुजरे और ब्रज की बोली अकसर उसमें रहे, श्री लल्लूजी लाल कवि की मदद से बयान किया था।

फिर मुवाफिक इरशादि मुदरिसि हिंदी, खुदाबंदि निअमत जनाबि कपतान जिमिस मोअट साहिब (दाम इकबालहु) के, तारिनीचरण मित्र ने छापे के वास्ते संस्कृत और भाषा के अलफ़ाज को जो देखने के मुहावरे में कम आते हैं, निकालकर मुरव्व्ज अलफ़ाज को दाखिल किया, मगर बअजी इस्तिलाह हिंदुओं की, जिसके निकालने से खलल जाना, बहाल रखी, उम्मेद है कि हुस्नि कबूल पावे।''11

बैताल पच्चीसी की पहली कहानी की भाषा का स्वरूप देखिए - ''एक राजा प्रतापमुकुट नाम बनारस का था, और उसके बेटे का नाम बज्रमुकुट, जिसकी रानी का नाम महादेवी, एक दिन वुह अपने दीवान के बेटे को साथ ले शिकार को गया और बहुत दूर जंगल में जा निकला और उसके बीच एक सुंदर तालाब देखा कि उस के किनारे हंस चकवा-चकवी बगुले मुर्गाबियाँ सब के सब कलोल में थे, चारों तरफ पुखतः घाट बने हुए, कँवल तालाब में फूले हुए, किनारों पर तरह बतरह के दरख्त लगे हुए कि जिनकी घनी-घनी छाँव में ठंढी-ठंढी हवाएँ आतियाँ थीं और पंछी पखेरू दरख्तों पर चह-चहों में थे, और रंग बरंग के फूल बन में फूल रहे थे, उन पर भौरों के झुंड के झुंड गूँज रहे, कि ये उस तालाब के किनारे पहुँचे और मुँह हाथ धोकर ऊपर आये।'' 12

रोचक है कि 1854 में इलाहाबाद के प्रेस्बिटेरियन मिशन प्रेस से छपी 'राजनीति' के एक संस्करण में कुछ पुस्तकों की प्रचारार्थ सूची दी गई है जिसमें सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को हिंदुस्तानी की बजाए हिंदी के खेमे में रखा गया है।13

लल्लूलाल की 'लतायफ-ए-हिंदी' की भाषा बहुत सरल और सभी के लिए सुबोध है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसकी भाषा 'हिंदुस्तानी' के ऐसे विद्यार्थियों के लिए तैयार कराई गई थी जिन्होंने हिंदुस्तानी के अध्ययन की नई-नई शुरुआत की हो। प्राइस ने अपनी भाषा-नीति के हिसाब से पुस्तक तैयार करवाने के लिए 'लतायफ-ए-हिंदी' को ही चुना था। (प्राइस की हिंदी हिंदुओं की ओर ज्यादा झुकी हुई थी) प्राइस की हिंदी के हिसाब से लतायफ-ए-हिंदी की कहानियों को ढालना आसान काम था। तारिणीचरण मित्र ने कुछ अरबी-फ़ारसी शब्दों को छाँटकर यह कार्य संपन्न किया। कई कहानियों में उन्हें यह भी करने की जरूरत नहीं पड़ी। दोनों प्रकार की भाषाओं के नमूने देखिए - लल्लूलाल की 'लतायफ़-ए-हिंदी' -

''नक़्ल 4

ऐक बनियाँ कहीं गया था दो-तीन दिन बअद वहाँ से आया तो उसने अपने घर का दरवाजा बंद पाया - पुकारा किवाड़ा खोलियो - भीतर से उसकी जोरू ने जवाब दिया खोलूँहू बाबा - इसने सुनकर कहा एै राड़ क्या बकती है - वुह बोली मेरी आँख दुखे है - कहा आँख की तो सच है मैया।''14

प्राइस और तारिणीचरण मित्र की 'मनोहर कहानियाँ सुगम बोली में' (हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस से)

''कहानी 4

एक बनियाँ कहीं गया था, दो-तीन दिन पीछे वहाँ से आया, तो उसने अपने घर का द्वार बंद पाया - पुकारा किवाड़ा खोलियो - भीतर से उसकी जोरू ने उत्तर दिया, कि खोलू हूँ बाबा! इसने सुनकर कहा, ऐ राड़ क्या बकती है? वह बोली, मेरी आँख दुखती है। कहा, आँख की तो सच है मैया।''15

गौरतलब है कि जिन शब्दों को तारिणीचरण मित्र ने उपर्युक्त कहानी में बदला (बअद, दरवाजा, जवाब) वह शब्द आज की बोल-चाल की भाषा में बहुतायत में इस्तेमाल होते हैं। फारसी के कई शब्दों को 'हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस' की कहानियों में जगह मिलता है लेकिन कई ऐसे शब्द छाँट दिए गए हैं जिनको छाँटने की कोई जरूरत नहीं थी। खास तौर पर तब जब इसकी भाषा को 'सुगम बोली' का नाम दिया जा रहा था। फिर भी व्याकरणिक सुधारों की दृष्टि से 'हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस' का महत्व कहीं अधिक है।

रामस्वरूप चतुर्वेदी की पुस्तक 'हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास' और 'हिंदी गद्य : विन्यास और विकास' में फोर्ट विलियम कॉलेज से संबंधित मुद्दों पर कई गंभीर निष्कर्ष दिए गए हैं जिन पर और भी विचार की आवश्यकता है। इन दोनों पुस्तकों के प्रथम संस्करण क्रमशः 1986 और 1996 में प्रकाशित हुए थे। लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय की पुस्तक फोर्ट विलियम कॉलेज का प्रकाशन 1947 ई. में ही हो चुका था। वार्ष्णेय जी की इतिहास संबंधी अन्य पुस्तकें भी चतुर्वेदी जी की पुस्तकों के प्रकाशन से पहले आ चुकी थीं। ऐेसे में हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए चतुर्वेदी जी का इतिहास महत्वपूर्ण हो जाता है। 1986 से 2001 के बीच उनकी पुस्तक 'हिंदी सहित्य और संवदेना का विकास' के पंद्रह संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। आश्चर्यजनक है कि 2001 में प्रकाशित इस पुस्तक के पंद्रहवें संस्करण में भी गिलक्रिस्ट को फोर्ट विलियम कॉलेज का प्रिंसिपल माना गया है।

चतुर्वेदी जी द्वारा दिए गए निष्कर्षों में सबसे महत्वपूर्ण है 'प्रेमसागर' को 'व्यापक प्रभाव' की ऐसी रचना मानना जो उत्तर भारत के जनमानस का प्रतिनिधित्व करती है। उनका मानना है कि प्रेमसागर के प्रकाशन से यह प्रमाणित हो गया कि उत्तर-भारत के लोगों की भाषा हिंदवी है। चतुर्वेदी जी लिखते हैं - ''कृष्णाचार्य ने ठीक लिखा है कि प्रेमसागर के प्रकाशित होने के अनंतर हिंदी का जादू फैला और इस पुस्तक के रूप में पहली बार अँग्रेजों ने समझा कि उत्तर-भारत में बहुत बड़े समुदाय की भाषा हिंदुस्तानी के नाम पर उर्दू या रेख़्ता नहीं हिंदवी या हिंदी है। उत्तर-भारत के अनेक घरों में राम-कथा के लिए जैसे तुलसीकृत 'रामचरित मानस' का प्रचार था, उससे कम सही, पर लगभग वैसी ही मुद्रा में, कृष्ण कथा के रसास्वादन के लिए 'प्रेमसागर' पढ़ा-सुना जाता रहा।'' 16

उन्हें प्रेमसागार की भाषा शैली और स्वरूप का अवमूल्यन कैसे भी स्वीकार नहीं। 17 लेकिन प्रेमसागर की भाषा के संदर्भ में चतुर्वेदी जी का उपर्युक्त उद्धरण उन्हीं निष्कर्षों की पूर्ति करता है जिनका पिछले पन्नों में जिक्र किया गया है। जैसे कि (1.) प्रेमसागर की भाषा हिंदू जनमानस की दृष्टि से तैयार करवाई गई थी इसलिए उसका प्रचलन धार्मिक हिंदू घरों में ही था। (2.) धार्मिक अस्मिता और भाषा का संबंध प्रगाढ़ होता जा रहा था, प्रेमसागर हिंदू और हिंदी का प्रतीक बन चुका था, ऐसे में प्रेमसागर का प्रचार-प्रसार करने वाले अनेक लोग और संस्थाएँ उभर कर सामने आने लगे।

अपने निष्कर्षों को प्रमाणित करने के लिए चतुर्वेदी जी ने जो तर्क-पद्धति अपनाई उस पर ध्यान दें। उनकी तर्क-पद्धति से उनकी इतिहास दृष्टि और वैचारिक आग्रह के सूत्र भी मिलते हैं -

1. उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज पर अपनी पुस्तक 'हिंदी गद्य : विन्यास और विकास' में सात-आठ पृष्ठों में विचार किया है जिसमें चार-पाँच पृष्ठ सिर्फ यह प्रमाणित करने में जाते हैं कि प्रेमसागर को हिंदी साहित्य में और भी महत्व दिया जाना चाहिए।

2. उनकी पुस्तक के प्रकाशन से पहले फोर्ट विलियम कॉलेज पर एक महत्वपूर्ण शोध हो चुका था। बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी की भाषा के संदर्भ में वार्ष्णेय जी अपने विचार दे चुके थे। शुक्ल जी के इतिहास में भी इन ग्रंथों का कम-से-कम जिक्र तो मिल ही जाता है। लेकिन चतुर्वेदी जी की दोनों ही पुस्तकों में इन ग्रंथों का जिक्र तक नहीं मिलता। प्रेमसागर के लिए पाँच पृष्ठ और इनका नामोल्लेख भी नहीं!

3. प्रेमसागर और नासिकेतोपाख्यान की भाषा का महत्व प्रतिपादित करते वक्त क्या यह जरूरी नहीं था कि सिंहासन बत्तीसी, बैताल पच्चीसी या लतायफ-ए-हिंदी की भाषा से उसकी तुलना की जाए!

4. लल्लूलाल की भाषा की और भी शैलियाँ थी फिर किस तर्क के आधार पर प्रेमसागर की भाषा को ही स्वाभाविक माना गया?

5. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमसागर की भाषा को 'स्वाभाविक' और 'सुगम' दिखाने के लिए ही चतुर्वेदी जी यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि गिलक्रिस्ट 'हिंदी' को भी महत्व देते थे। चतुर्वेदी जी यह भी स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि लल्लूलाल की रचना 'प्रेमसागर' की भाषा उन्हीं की थी उसमें गिलक्रिस्ट का हस्तक्षेप नहीं था। इस संदर्भ में यह उद्धरण महत्वपूर्ण है - ''फोर्ट विलियम कॉलेज के अंतर्गत स्पष्ट ही नीति-निर्धारण और तदनुरूप व्याकरण, कोश आदि बनवाने का दायित्व गिलक्रिस्ट का था, पर प्रशिक्षणार्थियों के लिए वास्तविक रूप मे गद्य के पाठ्य-ग्रंथों का निर्माण तो लल्लूजीलाल और सदल मिश्र को ही करना था।''19

यह तर्क देते वक्त शायद चतुर्वेदी जी को यह ध्यान नहीं था कि लल्लूलाल ने कॉलेज में प्रेमसागर के अलावा और भी कई महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की है या सहयोग किया है।

हिंदी साहित्य के विकास में फोर्ट विलियम कॉलेज के संदर्भ में और भी कई मुद्दों का रेखांकन जरूरी है।

गद्य-ग्रंथों के निर्माण में और हिंदी भाषा को दिशा देने में लल्लूलाल, सदल मिश्र और जॉन गिलक्रिस्ट के अलावा 'जवाँ' और 'विला', टॉमस रोएबक, विलियम हंटर, विलियम प्राइस और तारिणीचरण मित्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। तारिणीचरण मित्र लगभग तीस साल तक कॉलेज में रहकर हिंदी की सेवा करते रहे। पॉलीग्लॉट ट्रांसलेशंस और 'हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस' की भूमिका से पता चलता है कि गिलक्रिस्ट और प्राइस दोनों ही मित्र जी की विद्वत्ता के कायल थे। पॉलीग्लॉट ट्रांसलेशन के हिंदुस्तानी भाग का अनुवाद मित्र जी ने ही किया है। बैताल पच्चीसी की भाषा को अंतिम प्रारूप मित्र जी ने ही दिया था। हिंदुस्तानी कोश तैयार करने में रोएबक की भी इन्होंने काफी मदद की। संस्कृत की 'पुरुष परीक्षा' को हिंदुस्तानी में प्रस्तुत करने की योजना भी इन्हीं की थी। 'हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस' के प्रारूप से लेकर संकलन और संपादन तक सब मित्र जी के ही कठिन परिश्रम का फल था। हिंदी साहित्य के बहुत कम लोग इस विद्वान की क्षमता और भूमिका से परिचित हैं। विलियम प्राइस के बारे में भी यह बात लागू होती है।

भाषा की दृष्टि से 'कोश, व्याकरण, टाइप, विराम-चिह्न आदि आधुनिक विषयों के सूत्रपात' के संदर्भ में कॉलेज की 'चिरस्मरणीय' भूमिका का रेखांकन वार्ष्णेय जी ने किया है। आधुनिक विषयों के चुनाव, एक व्यापारिक और पूँजीवादी परिवेश में उपनिवेशों की भाषा और साहित्य का गंभीर अध्ययन, हिंदी-हिंदुस्तानी गद्य के विकास और सुगठन, साहित्य इतिहास की परंपरा के रेखांकन, गद्य-ग्रंथों के विषयों के चुनाव, रीतिकालीन सामंती विषय वस्तुओं से अलग हिंदी साहित्य का नए विषय-वस्तुओं से संपर्क, खड़ी बोली और ब्रजभाषा के व्याकरणों के निर्माण, भाषा-साहित्य के क्षेत्र में नए तरीके के प्रयास आदि की दृष्टि से कॉलेज ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। रीतिकालीन परिवेश में 'सती प्रथा' जैसे विषय साहित्य के लिए वर्जित थे। प्राच्यविदों के प्रभाव स्वरूप साहित्य के विषय बदलने लगे। 29 मार्च 1803 के वाद-विवाद में विलियम चैपलिन ने सती प्रथा जैसे विषय पर अपनी थीसिस प्रस्तुत की थी - ''सती होने की रीति हिंदुओं में अपने पति के साथ भलमनसी और मया के चलन से बाहर है। क्या ईसवी क्या और अच्छी जातों के लोग किसी पंथ के होय जाना जाता है कि मेरे वाद के मिटाने को कोई एक भी प्रमाण न ला सकेगा हे महाराजो मेरी बुद्धि से तो यिह रीति प्रसिद्ध साँच ही जानी जाती है और यिह भी निश्चय कर जानता हूँ कि इस कठिन और अनजानी बोली में सकत जैसी चाहिए वैसी नहीं रखता कि इस बात को भली-भाँति सेत्योरे समेत समझाऊँ तिस पर भी मन चलाय बुद्धि दौड़ाता हूँ जो मेरे वचनों को ध्यान देकर सुनों तो आपके मन की दुवधा जाए सच है जो इस भयानक चाल का सार जिसे अब में दोषता हूँ जब धीरज की दृष्ट से देखिएगा तब इसकी अनीति और कठोरी औ कुरीति को जानिएगा तो आपकी मति भी मेरी ही मति के समान हो जाएगी।''20

कहना न होगा कि फोर्ट विलियम कॉलेज का साहित्य सामंती पतनशीलता से मुक्ति का साहित्य है। साथ ही सामंतवाद के पतन के साथ भारतीय समाज के बुनियादी ढाँचे में जो तब्दीली आई, साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों का जैसा विकास हुआ, श्रेष्ठता-ग्रंथि से ग्रस्त जो एक नया वर्ग तैयार हुआ, प्राच्य ज्ञान और सत्ता का 'न्यूनतम साझा कार्यक्रम' के तहत जो गठबंधन कायम हुआ और अंततः उनके संबंधों में जो दरार पड़ी उसकी पहचान के लिए कॉलेज का साहित्य सर्वथा उपयुक्त है।

खड़ी बोली हिंदी-हिंदुस्तानी के क्षेत्र में कॉलेज की भूमिका भले ही विवादास्पद रही हो लेकिन ब्रजभाषा गद्य, कविता और व्याकरण के क्षेत्र में कॉलेज की भूमिका सर्वस्वीकृत रही है। राजनीति, सभाविलास, माधवविलास और ब्रजभाषा व्याकरण कॉलेज में तैयार की गई महत्वपूर्ण रचनाएँ है। उसमें सबसे अधिक लोकप्रियता राजनीति को प्राप्त है जो कि हितोपदेश का अनुवाद है। कई वर्षों तक विलियम प्राइस ने कॉलेज में ब्रजभाषा का अध्यापन किया। तारिणीचरण मित्र द्वारा संकलित 'हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस' में भी ब्रजभाषा की रचनाएँ शामिल हैं। 'साधारण हिंदी गान' शीर्षक के अंतर्गत ब्रज और खड़ी बोली के कई पद इस संग्रह में रखे गए हैं। इनमें कई रचनाएँ आनंदघन, सूरदास और तुलसी की हैं। कुछ पदों की भाषा बहुत आकर्षक बन पड़ी है21 -

1. परदेसिया रे बालम काहे को नैंना लगाया रे

नैना लगाया क्या फल पाया नाहक भरम गँवाया

परदेसिया रे बालम काहे को नैंना लगाया रे

2. तेरा अहिसान री

पिया को मिला दे आली तेरो अहिसान दी

3. आज लिया हम मोल री हो गोविंदा

कोई कहे सस्ता कोई कहे मँहगा

हमने अपने काँटे प्रेम के लिया धरि तोल री गोविंदा

मीरा के प्रभु गिरधर नायक जियरा डावांडोल री मुकुंदा

आज लिया हम मोल री हो गोविंदा।

4. मैं जब जानूँगी चतुर खेलार, होरी खेलन आवोगे,

मैं जब जानूँगी सुधड़ खेलार होरी

5. तू मेरा उमराव राज लाडिला बना मियाँ,

तू मेरा उमराव राज बना मियाँ

सिर पर तेरे वे सोने दा सिहरा

विराजै गले फूलों दा हार

लाडिला बना मियाँ तू मेरा उमराव राज।

6. भूल आई छोड़ आई डाल आई कंगना

जो मेरे कंगने की खबर ले आवे पाँच मोहर दूँ मैं दक्षिना

कंगना पहन के मैं नहाने को गई थी

बंहियाँ मलते गिरा कंगना

नद्दी नाले में भूल आई कंगना

भूल आई छोड़ आई डाल आई कंगना।

हिंदी भाषा और साहित्य की ऐसी अमूल्य निधियों को एक उपनिवेशवादी परिवेश में एक साथ संकलित-संपादित और प्रकाशित कर आने वाले कई सौ सालों तक के लिए बचा लिया गया। विलियम प्राइस और तारिणीचरण मित्र के इस योगदान का अद्वितीय महत्व हिंदी साहित्य के इतिहास में हमेशा बना रहेगा।

हिंदी अनुवाद के क्षेत्र में फोर्ट विलियम कॉलेज की भूमिका के मूल्यांकन के संदर्भ में हालिया तक कोई भी महत्वपूर्ण शोध कार्य नहीं हुआ था। हालाँकि इधर एक शोध-कार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ है। फोर्ट विलियम कॉलेज में न सिर्फ हिंदी और ब्रज में ग्रंथों का अनुवाद हुआ बल्कि हिंदी और ब्रज से अन्य भाषाओं में भी ग्रंथों का अनुवाद हुआ। लल्लूलाल, सदल मिश्र आदि ग्रंथकारों की ज्यादातर रचनाएँ मौलिक न होकर अनूदित ही हैं। अनुवाद की दृष्टि से एक अत्यंत आकर्षक रचना है 'पॉलीग्लॉट ट्रांसलेशंस'। इस रचना में ईसप की एक-एक कहानी का छह भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इसके अलावा कॉलेज के ग्रंथों का महत्व इतना अधिक था कि वह अँग्रेजों के भी आकर्षण का केंद्र था। हिंदवी-हिंदुस्तानी और ब्रज की अनेक रचनाएँ अँग्रेजी में भी अनूदित हुईं। हालाँकि इन अनुवादों में कॉलेज के बाहर के विद्वानों की भूमिका अधिक रही है। कुछ महत्वपूर्ण अनुवाद इस प्रकार हैं -

1. राजनीति ऑर टेल्स एक्जीबीटिंग द मोरल डॉक्ट्रीन्स एड द सीविल एंड मिलिटरी पॉलीसीज ऑफ हिंदूज, ट्रांसलेटेड लिटरली फ्रॉम द हिंदी ऑफ स्री लल्लूलाल कब इनटू इंगलिश, बाई एन्साइन जे.आर.ए.एस.लो, कलकता, पी.एस.डी रोजारियो एंड कंपनी, 1853

2. प्रेमसागर ऑर दी ओसन ऑफ लव, बाई एडवर्ड बी- ईस्टवीक, डब्ल्यू-एच-एलेन एंड कंपनी, लंदन, 1867

3. द टेल ऑफ फोर दरवेश ऑफ मीर अम्मन, बाई लेविस फर्डिनंड स्मिथ, पी-एस-डी-रोजारियो एंड कंपनी, कलकत्ता, 1850

4. दी बैताल पच्चीसी ऑर दी ट्वेंटी फाइव टेल्स ऑफ डेमोन, ट्रांसलेटेड बाई डब्ल्यू. बी. बार्कर, एडिटेड बाई ई. बी. ईस्टवीक, पब्लिश्ड बाई स्टीफेन ऑस्टीन, हर्टफोर्ड।

स्पष्ट है कि हिंदी भाषा और साहित्य के व्यवस्थित अध्ययन की नींव डालने वाला यह पहला सांस्थानिक प्रयास था। ओरिएंटल सेमिनरी के कार्य-काल में कोई महत कार्य न हो सका था लेकिन फोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर जो प्रयोग किए गए आज भी हिंदी भाषा और साहित्य उसके प्रभाव से मुक्त नहीं है। हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में कॉलेज की भूमिका का अधूरा मूल्यांकन ही दिखाई देता है। इस स्थिति का प्रमुख कारण या तो फोर्ट विलियम कॉलेज से संबंधित सामग्री की जानकारी का अभाव है या फिर विचारधारात्मक आग्रहों से युक्त इतिहास-लेखन यानी कि उन्हीं 'तथ्यों' का चुनाव जिससे अपने आग्रह केा प्रतिष्ठा दी जा सके।

संदर्भ

1. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ-81

2. कमलेश्वर, कितने पाकिस्तान, राजपाल एंड संस, दिल्ली, 2006, पृ-325

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, अशोक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2004, पृ-252

4. वही, पृ-251

5. वही,

6. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1987, पृ-57

7. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, फोर्ट विलियम कॉलेज (1800-1854), इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रकाशन, इलाहाबाद, 1947, पृ-172

8. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, आधुनिक हिंदी साहित्य की भूमिका, पृ-386

9. बच्चन सिंह, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1987, पृ-57

10. लल्लूलाल, सिंहासन बत्तीसी, (राजा) रामकुमार प्रेस, लखनऊ, 1951, पृ-15

11. विलियम प्राइस (संपादक), हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शनस्, टू विच आर प्रीफिक्स्ड दी रूडीमेंटस ऑफ हिंदुस्तानी एंड ब्रज भाखा ग्रामर, कंपाइल्ड फॉर दी यूज ऑफ द इंटरप्रेटर्स टू द नैटिव कॉर्प्स ऑफ दी बंगाल आर्मी (दो भागों में), भाग-1, हिंदुस्तानी प्रेस, कलकता, 1827, बैताल पच्चीसी से।

12. वही, (इस पुस्तक में पृष्ठ संख्या का कोई निश्चित क्रम नहीं है।)

13. लल्लूलाल, राजनीति, प्रेसवीटेरियन मिशन प्रेस, इलाहाबाद, 1854

14. लल्लूलाल, लतायफ़-ए-हिंदी या द न्यू साइक्लोपीडिया हिंदुस्तानिका ऑफ विट, इंडिया गजट प्रेस, कलकत्ता, 1810, पृ-3

15. विलियम प्राइस (संपादक), हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस, मनोहर कहानियाँ सुगम बोली में से।

16. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी गद्य : विन्यास और विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1996, पृ-58

17. वही, पृ-57

18. वही, पृ-59

19. वही, पृ-59

20. प्रीमिटिया ओरिएंटलस, भाग 2, कंटेनिंग द थीसिस इन दी ओरिएंटल लैंग्वेज बाई दी स्टूडेंट्स ऑफ दी कॉलेज ऑफ फोर्ट विलियम, कलकत्ता, 1803, पृ-49

21.

विलियम प्राइस, हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस, साधारण हिंदी गान से।


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हिंदी समय में शीतांशु की रचनाएँ