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विमर्श

औपनिवेशिक आधुनिकता और लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय की इतिहास-दृष्टि
शीतांशु


हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद यूरोपीय प्राच्यविदों के लेखन का बृहद अध्ययन करने वाले विद्वानों में लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय का नाम महत्वपूर्ण है। लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय पहले साहित्येतिहासकार थे जिन्होंने उपनिवेशवादी दौर में देशी भाषाओं, धर्म, साहित्य, भूगोल इत्यादि का ज्ञान जुटाने, साथ ही अँग्रेज अधिकारियों को उनकी शिक्षा देने के लिए स्थापित प्रारंभिक संस्थानों द्वारा तैयार की गई सामग्री की जमकर छानबीन की थी। देश-विदेश के विभिन्न पुस्तकालयों में उपलब्ध सामग्री और अभिलेखागारों में उपलब्ध दस्तावेजों को जाँचने के बाद ही लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने अपनी पुस्तकों 'हिंदी साहित्य का इतिहास' और 'फोर्ट विलियम कॉलेज' की रचना की थी। निश्चित रूप से यह अध्ययन विस्तृत था इसलिए पूर्ववर्ती इतिहासकारों द्वारा की गई कई तथ्यपरक भूलों को वो दुरुस्त कर सके हैं। किंतु दूसरी तरफ प्रस्थान बिंदुओं के अलगाव, पश्चिमी इतिहास-दृष्टियों के प्रति प्रभाववादी रवैये और वैचारिक-राजनैतिक मतवैभिन्न्य के कारण लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे हिंदी साहित्य के सुधी अध्येताओं द्वारा स्थापित कई मान्यताओं के विश्लेषण में अवनतिकारी नतीजों तक जा पहुँचे हैं। इस आलेख में ऐसी ही कुछ मान्यताओं पर विचार किया गया है।

वार्ष्णेय जी की पुस्तक 'हिंदी साहित्य का इतिहास' की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि उन्होंने शुक्ल जी और आचार्य द्विवेदी के काल-विभाजन से अलग जाकर अपनी मान्यता रखी है। मध्यकाल नाम में उपनिवेशवाद की छाया देखने के कारण और यह समझने के कारण कि हिंदी साहित्य के इतिहास का मध्यकाल कोई अंधकार काल नहीं था, अपने परवर्ती लेखन में द्विवेदी जी ने मध्यकाल नाम का प्रयोग नहीं किया। इस संदर्भ में प्रो. मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ''द्विवेदी जी भारतीय समाज और साहित्य के इतिहास के मध्यकाल को योरोपीय मध्यकाल के समान नहीं मानते, इसे वे पतनोन्मुख या जकड़ी हुई मनोवृत्ति का काल नहीं कहते। भारतीय साहित्य के इतिहास के इस काल में ही अखिल भारतीय व्यापक जनसंस्कृति के जागरण की अभिव्यक्ति करने वाला भक्ति साहित्य आता है। ...भारतीय साहित्य के इतिहास के मध्यकाल को पतनोन्मुख और जबदी हुई मनोवृत्ति का काल न मानने के कारण ही द्विवेदी जी ने अपने दूसरे इतिहास ग्रंथ हिंदी साहित्य में मध्ययुग नाम का प्रयोग नहीं किया है।''1 किंतु प्राच्यविदों का एकरेखीय अध्ययन करने का फल यह हुआ कि वार्ष्णेय जी अपने इतिहास में मध्यकाल नाम का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। वार्ष्णेय जी दो गलतियाँ करते हैं - पहला कि वे यह मानकर चलते हैं कि सामान्य भारतीय इतिहास का यह काल मध्यकाल है और दूसरा यह कि यह मानते हुए भी कि इसका आधार कोई साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं है इस नाम को हिंदी साहित्य के इतिहास पर चस्पाँ कर देते हैं। इस मध्यकाल नामकरण के बारे में उनका यह तर्क बहुत असंगत है कि मध्यकाल कहने से एक विशेष प्रकार की पौराणिकता का बोध होता है इसलिए मध्यकाल के साथ भक्तिकाल चल जाएगा। इसके साथ ही वार्ष्णेय जी रीतिकाल को यह कहते हुए अपने मध्यकाल से अलग कर देते हैं कि इसमें पौराणिक प्रवृत्तियों का बोध न होने के कारण इसे मध्यकाल में रखना असंगत है। यह कहकर रीतिकाल को वे उत्तरमध्यकाल की ही संज्ञा देते हैं। भक्तिकाल और रीतिकाल के लिए कौन से नाम समीचिन हैं, इसका पर्याप्त विश्लेषण आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी ने किया है। वार्ष्णेय जी अपने इतिहास में नामकरण को लेकर अगर त्रुटियाँ करते हैं तो इसका कारण यही है कि उक्त दोनों विद्वानों की तरह अपनी 'परंपरा की निरंतरता का अनुशीलन' करने में वे पूर्णतः समर्थ न हो सके।

इसी अभाव का प्रभाव आधुनिक काल के नामकरण और साहित्य के विवेचन में भी दिखाई देता है। आधुनिक काल को लेकर किया गया वार्ष्णेय जी का विश्लेषण रुचिकर है। आधुनिक काल के लिए आधुनिक नामकरण से उन्हें आपत्ति है। उनका तर्क है कि यह आधुनिक काल आखिर कब तक चलेगा। उन्हें यह विचित्र मालूम होता है कि भारतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त सब आधुनिक काल में ही हैं। आधुनिकता पर कहीं पूर्ण विराम नहीं है। इसीलिए अँग्रेजों की शिक्षा और सभ्यता के आधुनिक प्रभाव को देखते हुए उन्होंने इसे 'ब्रिटिश काल' नाम दिया है। आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी ने जीवन की स्वाभाविक सरणियों और भारतीय संस्कृति और परंपरा की गंभीर समझदारी के आधार पर जो तर्क गढ़े थे, उसे वार्ष्णेय जी एकदम से विस्मृत कर देते हैं। 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना उन्हें आधुनिकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण लगता है। वार्ष्णेय जी के लिए यह संभव नहीं था कि 1800 ई. के बाद के हिंदी साहित्य का कोई समय रीतिकाल के अंतर्गत रखा जाए। उनका तर्क है - '1800 में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा के प्रतीक फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई और इसी समय से आधुनिक खड़ी बोली गद्य का क्रमबद्ध इतिहास प्रारंभ होता है और गद्य हिंदी साहित्य में आधुनिकता का प्रतीक बन कर आया। उस पर हिंदी कविता पर अँग्रेजो भाषा और साहित्य का प्रभाव स्पष्ट है।"2 कहना न होगा कि उनकी दृष्टि में यह प्रभाव इतना अधिक था कि 1800 ई. से 1947 ई. तक के दौर को उन्होंने ब्रिटिश काल नाम दे दिया। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के साहित्य के लिए कौन से नाम उपयुक्त हैं इस पर काफी विचार किया जा चुका है। यहाँ एक और महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान देना जरूरी है कि एक तरफ तो वार्ष्णेय जी पूरे डेढ़ सौ साल के हिंदी साहित्य के इतिहास को ब्रिटिश काल कहते हैं और दूसरी तरफ फोर्ट विलियम कॉलेज पुस्तक के आखिरी पैराग्राफ में लिखते हैं - ''लल्लूलाल और सदल मिश्र की रचनाओं के नाते हिंदी साहित्य के इतिहास में फोर्ट विलियम कॉलेज का उल्लेख करना तो आवश्यक है, किंतु हिंदी भाषा और गद्य साहित्य के विकास या उन्हें एक कदम आगे बढ़ाने की दृष्टि से उसका कोई महत्व नहीं है। कॉलेज से हिंदुस्तानी या उर्दू गद्य को प्रोत्साहन मिला न कि हिंदी गद्य को। जो कार्य कैरे ने बांग्ला के लिए किया वह कार्य किसी ने हिंदी के लिए न किया।''3 हिंदी साहित्येतिहास का पूरा दौर ब्रिटिश काल और भाषा और गद्य साहित्य अविकसित! वस्तुतः हिंदी साहित्य की परंपरा को 'दुरुस्त' करने की चिंता ने वार्ष्णेय जी में इस किस्म के द्वंद्व को जन्म दिया।

बैताल पच्चीसी को वार्ष्णेय जी लल्लूलाल की रचना नहीं मानते और फोर्ट विलियम कॉलेज का उल्लेख उन्हें सिर्फ लल्लूलाल और सदल मिश्र की रचनाओं की दृष्टि से जरूरी लगता है। ऐसे में हिंदी साहित्य की परंपरा में वे भी बैताल पच्चीसी का उल्लेख जरूरी नहीं समझते। बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी की भाषा के बारे में वार्ष्णेय जी लिखते हैं - 'बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी में से सिंहासन बत्तीसी में और चारों ग्रंथों में से माधोनल और शकुंतला नाटक में उर्दूपन सबसे अधिक है, किंतु उर्दूपन है सबमें। स्वयं लेखक ने चारों की रचना रेख्ता में बताई है। फोर्ट विलियम कॉलेज के विवरणों में चारों ग्रंथ हिंदुस्तानी भाषा में लिखे बताए गए हैं, न कि प्रेमसागर की भाँति हिंदवी या ठेठ हिंदी में।"4 मजेदार बात यह है कि वार्ष्णेय जी इन ग्रंथों के बारे में शुक्ल जी की अवधारणा से थोड़ा ज्यादा स्पष्ट दिखाई देते हैं, किंतु बनी बनाई इतिहास की लीक से नहीं हटते। शुक्ल जी के लिए चारों पुस्तकें बिल्कुल उर्दू में हैं, वार्ष्णेय जी बस उसमें यह फर्क बताते हैं कि किसमें ज्यादा है किसमें कम। खैर, वार्ष्णेय जी ने यहाँ यह तो बताया कि सभी ने अपनी रचनाओं को रेख्ता कहा है, बस यह नहीं बताया कि बैताल पच्चीसी के रचनाकार ने यह भी कहा है कि मैं एक ऐसी भाषा में रचना करना चाहता था जिसे समाज के हर तबके का, हर समुदाय का व्यक्ति समझ सके।"5 वार्ष्णेय जी को औपनिवेशिक परियोजना में गिलक्रिस्ट की भाषा नीति के हिसाब से गढ़ी गई प्रेमसागर हिंदी के प्राथमिक रूप के हिसाब से स्वीकृत है (जिसकी स्वाभाविकता पर आचार्य शुक्ल ने भी प्रश्नचिह्न लगाया है) किंतु स्वाभाविक भाषा का प्रतिनिधित्व करने वाली बैताल पच्चीसी नहीं। फिर से एक बार प्रेमसागर की ठेठ हिंदी को आधार बनाकर सिंहासन बत्तीसी और बैताल पच्चीसी को उर्दू के खेमे में डालकर हिंदी साहित्य से अलग कर दिया।

बैताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी हिंदी साहित्य की उन रचनाओं में से हैं जो अलगाववादी भाषा नीतियों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं और यह प्रमाणित करती हैं कि हिंदी-उर्दू-रेख्ता-हिंदुस्तानी में एक लचीलापन था और खड़ी बोली की ऐसी शैलियाँ मौजूद थीं जो एक जातीय संस्कृति और एक संतुलित शब्दावली युक्त भाषा का प्रतिनिधित्व करती हैं। निश्चय ही औपनिवेशिक अलगाववाद और पुनरुत्थानवाद से प्रभावित वार्ष्णेय जी की इतिहास दृष्टि भी अरबी-फारसी के स्वीकृत शब्दों को पचा सकने में सक्षम नहीं थी। वार्ष्णेय जी हिंदी के अरबी-फारसी मुक्त स्वरूप के प्रति इतने आकर्षित थे कि ग्रिलक्रिस्ट की भाषा नीति के स्पष्ट अलगाववादी स्वरूप की ओर उनका ध्यान नहीं गया। ग्रिलक्रिस्ट की भाषा नीति की चर्चा करते हुए मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोध-पत्रिका 'संकल्प' में प्रकाशित अपने एक लेख में यह दिखाने का प्रयास किया है कि दसियों कारण थे जो स्पष्ट संकेत करते हैं कि हिंदी और हिंदुस्तानी के अलगाववादी बिंदुओं की तरफ ही ग्रिलक्रिस्ट क्यों आकर्षित हुआ और उस भाषा की ओर क्यों नहीं हुआ जिसका प्रतिनिधित्व बैताल पच्चीसी या सिंहासन बत्तीसी जैसी रचनाएँ करती हैं। वार्ष्णेय जी को अपनी अस्मिता के हिसाब से रुचिकर हिंदी इतनी आकर्षित करती है कि अंततः औपनिवेशिक व्याख्याओं के जाल में वे फँस जाते हैं और ग्रिलक्रिस्ट की भाषा नीति को स्वाभाविक ठहराते दिखाई देते हैं।

वस्तुतः वार्ष्णेय जी की दृष्टि में हिंदू और हिंदी के प्रति एक तरह का आकर्षण है जिसने उनकी इतिहास दृष्टि को प्रभावित किया। इस्लाम शब्द को इस तरह से उन्होंने प्रयोग किया है कि पूरा धर्म ही संकीर्णता की चपेट में आ जाता है। उन्होंने लिखा है कि "इस्लाम ने फिर संकीर्णता प्रकट की जिसके फलस्वरूप देश का वातावरण विषाक्त होने लगा।"6 मुसलमानों का दौर उन्हें विषाक्त लगता है और ब्रिटिश काल उन्हें आधुनिक। मुसलमानों का शासनकाल पौराणिक धर्म के प्रभाव से मध्यकाल नाम से सूचित होता है और जिस दौर में भारत लूट लिया गया अँग्रेजों द्वारा, वह आधुनिकता के प्रभाव से ब्रिटिश काल! ब्रिटिश काल को पुनरुत्थान काल नाम कहने में भी उन्हें हिचक नहीं है, जो यह सूचित करता है कि जैसे हमारा पतन हो गया था। इस तरह के तर्क वार्ष्णेय जी और भी जगहों पर देते हैं।

वार्ष्णेय जी ने अपने इतिहास की शुरुआत में भारत के परास्त होने के, उपनिवेशित होने के, वस्तुतः अलसाए होने के कारण उपनिवेशित होने के पीछे जलवायु को सर्वाधिक प्रमुख कारण के रूप में स्थापित कर दिया है। उन्होंने लिखा है - 'हिंदी प्रदेश की पिछली कई शताब्दियों का इतिहास बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा। इसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व जलवायु संबंधी परिवर्तन पर था।' वार्ष्णेय जी का मत है कि हिंदी प्रदेश उष्ण कटिबंध में है, अर्थात वह पृथ्वी की कर्क और मकर रेखाओं के बीच पड़ता है। इस प्रकार की जलवायु में रहने वालों के जीवन में प्रायः तेजी नहीं रहती और जीवन में कामुकता रहती है।

वार्ष्णेय जी आर्थिक कारणों की तह में न जाकर औपनिवेशिक व्याख्याओं में ही खोकर रह गए जिसके कारण उन्हें यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्नीसवीं सदी में अँग्रेजों के नियंत्रण में हम इसलिए चले गए क्योंकि यहाँ की राजनीतिक परिस्थिति उनके अनुरूप थी। साथ ही सभ्यता के विकास के इस दौर में परिस्थितियाँ उनके अनुकूल थीं। उन्नीसवीं सदी में आर्थिक दबाव उनके विस्तारवाद का प्रमुख कारण था। यह औद्योगिक पूँजीवाद की देन था, जिसका पदार्पण यूरोप में हुआ था। इन परिस्थितियों को भारत के अलसाए हुए जीवन के रूप में व्याख्यायित करना गलत है। श्रम को यहाँ की संस्कृति ने कितना मूल्य दिया है, इसके साहित्य को पढ़ कर स्वभावतया ही कोई समझ सकता है। वार्ष्णेय जी अपना उक्त मत रखते हुए भूल गए कि जलवायु के कारण अलसाए हुए हिंदी प्रदेश के लोगों ने ही 1857 में अँग्रेजों को धूल चटा दिया। विद्रोह का स्वर इतना आक्रामक था कि रामविलास जी ने इसे नवजागरण के प्रथम चरण के रूप में याद किया है। साथ ही यह भी रुचिकर है कि जहाँ एक व्याख्या हमें आध्यात्मिक बताने में लगी हुई है वहीं दूसरी कामुक। कामुकता के संदर्भ में वार्ष्णेय जी का उक्त कथन बिना प्रमाणों के इतने सरलीकृत रूप में रखा गया है कि आश्चर्य होता है। यूरोप में भी देह व्यापार जिस बड़े पैमाने पर चल रहा है, उसके लिए वार्ष्णेय जी क्या तर्क देंगे नहीं पता। कामुकता को भारतीय जाति की पहचान बताना सच में आश्चर्यजनक है।

इसी तरह अँग्रेजों को भारतीय इतिहास का एक तथ्य बताते हुए उन्होंने भारतवासियों को यह सुझाव दिया है कि ऐतिहासिक क्रम में जो कुछ हुआ, और जो अब तक बना हुआ है, उसे नकारना घोर अवैज्ञानिकता होगी। अब अँग्रेज यहाँ हैं तो नहीं, किंतु वे यहाँ थे और उन्होंने 200 वर्ष तक हमारे देश में राज्य किया, इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार करने में लज्जा और संकोच से काम नहीं लेना चाहिए। किंतु वार्ष्णेय जी ने इस ऐतिहासिक तथ्य को जिस रूप में अपने इतिहास में स्वीकार कर लिया बस उसे उसी रूप में नहीं करना था। उस ऐतिहासिक तथ्य का समुचित विवेचन होना चाहिए था। उसके प्रभाव में पड़कर यह भूल नहीं जाना चाहिए था कि देश का जिस तरह से शोषण किया गया उसने साहित्य के स्वाभाविक विकास को भी बाधित किया, उसके विस्तृत हो रहे स्वरूप को अवरुद्ध किया। हिंदी प्रदेश को इस कदर लहूलुहान किया गया कि आज तक वह उससे उबर नहीं पाया, अपनी संस्कृति और साहित्य के प्रति अनुराग पैदा नहीं कर पाया। निश्चय ही ये सारी बातें भी होनी चाहिए थीं।

वार्ष्णेय जी लिखते हैं कि आज के हमारे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, भाषाई जीवन की जड़ें ब्रिटिश काल में जमी थीं, उनकी प्रेरणा का मूल स्रोत ब्रिटिश है। उस परंपरा को नकारने से क्या फायदा। वार्ष्णेय जी यह नहीं देख सके कि वस्तुतः सवाल परंपरा को नकारने का नहीं, उसकी वास्तविकता को उद्घाटित करने का है। उससे अभिभूत होने का नहीं, बल्कि यह बताने का है कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और साहित्य पर ब्रिटिश प्रभावों ने ऐसी अनेक विकृतियों को जन्म दिया है जिससे पीछा छुड़ा पाने में हम असमर्थ हैं। जो सार्थक प्रभाव हमारे समाज पर पड़े उसमें निश्चय ही पश्चिम में (मात्र ब्रिटेन में नहीं) पैदा हुए अनेक मूल्यों का योगदान है, किंतु औपनिवेशिक आधुनिकता ने हमारे साथ जो अन्याय किया है उसका उद्घाटन भविष्य के साम्राज्यवाद के चरित्र को उजागर करने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।

वार्ष्णेय जी के ऊपर यह प्रभाव ऐसे पड़ा कि बाद के भी हिंदी साहित्य के कई प्रगतिशील तत्वों को वे स्वीकृत न कर सके और अपने इतिहास-ग्रंथ में उसका विरोध किया। जैसे, प्रगतिवाद का विवेचन। आचार्य द्विवेदी के बारे में विवेचन करते हुए मैनेजर पांडेय ने यह तर्क दिया है कि आचार्य द्विवेदी के साहित्येतिहास संबंधी दृष्टिकोण का निर्माण भारतीय साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन के काल में हुआ था। उनके साहित्य विवेक पर प्रगतिशील आंदोलन का प्रभाव कई रूपों में पड़ा है और इस प्रभाव के कारण ही आचार्य द्विवेदी साहित्य के विचारधारात्मक पक्ष को अधिक महत्व देते हैं। इस तरह मैनेजर पांडेय प्रगतिवाद का प्रभाव इतना महत्वपूर्ण मानते हैं कि हिंदी साहित्येतिहास की चली आ रही परिपाटी को और भी परिपक्व बनाने, लोकोंमुखी बनाने और अपनी संस्कृति के और भी निकट लाने में उसकी भूमिका देखते हैं। द्विवेदी जी ने प्रगतिवाद के संबंध में बहुत ही आशावादिता व्यक्त की थी। उसे वे गंभीर सामाजिक भावनाओं से संचालित साहित्य मानते थे। किंतु वार्ष्णेय जी एक तरफ जहाँ औपनिवेशिक व्याख्याओं से अपना पीछा छुड़ा पाने में असमर्थ हैं, वहीं प्रगतिवादी मूल्यों को जो इन व्याख्याओं से हमें मुक्त करने वाले हैं, को आत्मसात कर पाने में। प्रगतिवाद के बारे में उनके कथन बहुत ही सरलीकृत हैं।

जैसे कि - 1. रागात्मकता अर्थात हृदय पक्ष के स्थान पर उसमें बौद्धिकता या बुद्धि पक्ष अधिक है। 2. रोटी और सेक्स के आगे प्रगतिवादी कवि जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पक्षों का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करता। 3. व्यक्ति की स्वतंत्रता में भी उसे विश्वास नहीं। 4. प्रगतिवादी काव्य में साहित्य और राष्ट्रीयता कम और प्रचार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, बौद्धिक दासत्व अधिक है। वह मास्को की खूँटी से बँधा है। दिल्ली, काशी और मथुरा के प्रति उसमें अनुराग नहीं है। 5. प्रगतिवादी कवि खून बहाकर विश्व शांति और विश्व कल्याण के नारे लगाता है। 6. जगत के रूप सौंदर्य की ओर से मुख मोड़कर कवि उसकी कुरूपता का गान करता है। 7. उसके लिए अंतिम लक्ष्य ही सब कुछ है, साधन की पवित्रता में उसे विश्वास नहीं। 8. हिंसा-अहिंसा, घृणा-प्रेम आदि में से कौन अच्छा है कौन बुरा, इस पचड़े में वह नहीं पड़ता। 9. प्रगतिवाद कोई प्रतिनिधि कवि, कलाकार या समालोचक नहीं दे सका। इसका कारण प्रगतिवादियों का सीमित और संकुचित दृष्टिकोण और उनका फ्रस्ट्रेशन है। 10. प्रगतिवाद की जड़ देश की धरती में नहीं है।

इस तरह वार्ष्णेय जी हमारे देश की एक महत्वपूर्ण साहित्यिक परंपरा को अपने प्रतिक्रियावादी रवैये के कारण पचा नहीं पाते हैं और उसका संतुलित विश्लेषण करने के बजाए उसपर छींटाकशी करने लगते हैं। प्रगतिवाद संबंधी उनके उक्त कथन उनकी विश्वसनीयता को धूमिल करते हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में किसी भी इतिहासकार ने प्रगतिवाद के संबंध में इतने सीमित और अतार्किक वक्तव्य नहीं दिए थे। औपनिवेशिक आधुनिकता के प्रभाव का एक रूप जैसे मिश्रबंधुओं की विवेचन क्षमता को सीमित करने वाला था वैसे ही एक रूप वार्ष्णेय जी की। इस तरह कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा को आचार्य शुक्ल या आचार्य द्विवेदी ने जितना समृद्ध किया और जो स्थापनाएँ दीं, लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय उसे बहुत आगे न ले जा सके। वार्ष्णेय जी साहित्य की विभिन्न धाराओं के बारे में आचार्य शुक्ल या द्विवेदी जी द्वारा स्थापित मान्यताओं को परिवर्तित करने में समर्थ नहीं हो सके हैं। विडंबना तो यह है कि जहाँ उन्होंने ऐसा प्रयास किया है वहाँ वे गंभीर गल्तियाँ कर गए हैं। कालविभाजन - नामकरण, आधुनिकता संबंधी दृष्टिकोण, प्रगतिवाद का मूल्यांकन इसके प्रमाण हैं।

संदर्भ

1. मैनेजर पांडेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.144

2. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1987, पृ.57

3. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, फोर्ट विलियम कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रकाशन, इलाहाबाद, 1947, पृ.72

4. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, आधुनिक हिंदी साहित्य की भूमिका, इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971, पृ.386

5. विलियम प्राइस (सं), हिंदी एंड हिंदुस्तानी सेलेक्शंस, टू विच आर प्रीफिक्स्ड दी रूडीमेंट्स ऑफ हिंदुस्तानी एंड ब्रज भाखा ग्रामर, भाग-1, हिंदुस्तानी प्रेर, कलकत्ता, 1827, बैताल पच्चीसी से-

इबतिदाय दास्तान यों है, ...बुमजिब फ़रमाने जनाबि जान गिलक्रिस्ट साहिब (दाम इकबालहु) के, जबानि सहल में खास ओ आम बोलते हैं, और जिसे आलिम ओ जाहिल, गुनी कूढ़, सब समझें और हर एक की तबीअत आसान हो, मुशकिल किसी तरह की जिहन पर न गुजरे और ब्रज की बोली अकसर उसमें रहे, श्री लल्लूलालजी कवि की मदद दे बयान किया था।

6. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, हिंदी साहित्य का इतिहास, वही, पृ.112


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