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विमर्श

भाषा के तराजू पर धर्म का पासंग : गार्सां द तासी
शीतांशु


एडवर्ड सईद ने अपनी पुस्तक 'प्राच्यवाद : पूरब की पाश्चात्य अवधारणाएँ' में जो निष्कर्ष निकाले हैं उसका आधार मूलतः उन्होंने मध्य-पूर्व के देशों और इस्लाम को बनाया है जबकि ऐसे किसी भी अध्ययन में स्रोतों के बतौर भारत, चीन जैसे अन्य कई देशों के साहित्य को भी लिया जाना चाहिए था। इन देशों के साहित्य और संस्कृति को और पश्चिम के साथ इसके संबंध को उन्हीं मानकों के हिसाब से नहीं समझा जा सकता जिनके हिसाब से मध्य-पूर्व के देशों की संस्कृति और साहित्य को। इन देशों का यूरोप ही नहीं मध्य-पूर्व से भी ठीक वही संबंध नहीं रहा जो कि यूरोप का मध्य-पूर्व से रहा है। इन देशों के बारे में प्राच्यविदों द्वारा तैयार किया गया ज्ञान भी 'प्राच्यवाद' (पुराने अर्थों में) के तहत ही स्वीकार किया जाता है और जाँचा-परखा जाता है। अगर आरंभ से ही सईद इन देशों की संस्कृति और साहित्य के प्रति उतने ही गंभीर रहते जितने कि वे मध्य-पूर्व के देशों को लेकर थे तो शायद वे उन्हीं निष्कर्षों तक नहीं पहुँचते जहाँ वे पहुँचे। उन्हें अपने निष्कर्षों में थोड़ा-बहुत जोड़ना-घटाना जरूर पड़ता। सईद की इस पद्धति से क्षुब्ध होकर हरीश त्रिवेदी ने उनके द्वारा परिकल्पित 'ओरिएंट' पर व्यंग्य करते हुए बनारस में दिए अपने एक व्याख्यान में यहाँ तक कहा है कि ''इस पुस्तक को पहली बार पढ़कर मुझे कितना धक्का लगा, मैं बता नहीं सकता। हम तो समझ बैठे थे कि हम ओरिएंट हैं लेकिन हमारा तो यहाँ नाम ही नहीं है। अगर भारत ओरिएंट नहीं है तो और कहाँ है ओरिएंट? इस पुस्तक में भारत नहीं है, चीन नहीं है, जापान नहीं है। ये कहीं नहीं है तो फिर ओरिएंट कहा हैं? उनका ओरिएंट है 'पैलेस्टाइन' में। उनका ओरिएंट है अरब देशों में, जिसको मिडिल ईस्ट कहते हैं। अरे भाई! इसके पहले ओरिएंट किसी ने कहा था कि पैलेस्टाइन में है? यह पूर्वाग्रह है एडवर्ड सईद का। ओरिएंट से उनका मतलब सिर्फ इस्लाम से है। ओरिएंटलिज्म पुस्तक का हिंदी अनुवाद कभी हो तो मेरा सुझाव है कि उसका नया शीर्षक रखा जाय 'ग़मे इस्लाम'।''1 खैर।

आइए अब देखते हैं कि कैसे गार्सां द तासी सईदी फ्रेम में काफी मुफीद भी बैठते हैं, साम्राज्य की अत्यंत गहरी पैरोकारिता करते भी दिखाई देते हैं, विभिन्न अस्मिताई सीमाओं से ग्रस्त भी दिखाई देते हैं, लेकिन सईद की उक्त पद्धति के कारण उनके प्राच्यवाद के अपने ही कुछ महत्वपूर्ण मानदंडों पर खरे नहीं उतरते। हिंदी साहित्य के इस पहले इतिहासकार को पढ़ते हुए भी हम यह समझ सकते हैं कि ज्ञान की और विचारधाराओं की द्वंद्वात्मक भूमिका को भूलकर औपनिवेशिक प्रक्रिया को एक सामान्यीकृत ढंग से समझने से कई बारीक बातें हाथ से छूट जाती हैं। इस लेख में यही प्रयास किया गया है कि तासी की उक्त सीमाओं को संपूर्णता में पहचानने का प्रयास किया जाए, लेकिन साथ ही उन बातों और विशेषताओं तक पहुँचने का प्रयास किया जाए जहाँ मात्र सईदी फ्रेम के आधार पर हम नहीं पहुँच सकते।

उक्त पद्धति का मसला पहली नजर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में अठारहवीं सदी में प्रारंभिक ब्रिटिश प्राच्यविदों के अध्ययनों के पश्चात और बाद में उनके प्रभाव के ह्रास के पश्चात जब अँग्रेजों के लिए यह जरूरी हो चुका था कि भारत में अपने विस्तृत हो चुके साम्राज्य के स्थायित्व के लिए ज्ञान को संरचित करें, अपने पक्ष में अनुकूलित और व्याख्यायित करें और साहित्य के इतिहास को भी नए सिरे से अपने पक्ष में तैयार करें तब हिंदी साहित्य के इतिहास का पहला विस्तृत वृत्त-संग्रह कोई ब्रिटिश विद्वान नहीं बल्कि एक फ्रांसीसी विद्वान प्रस्तुत कर रहा था। साथ ही यह भी विचार किया जाना चाहिए कि आखिर इस विद्वान ने प्राच्य के अध्ययन के लिए सईद की ही तरह मध्य-पूर्व के अपेक्षाकृत निकट क्षेत्रों को चुनने के बजाए इस सुदूर प्रदेश को क्यों चुना? प्राच्य की उसकी समझ में सईद से क्या अंतर था?

1839 में गार्सां द तासी की पुस्तक 'इस्तवार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐं ऐंदुस्तानी' प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक के प्रकाशन के समय तक हिंदुस्तान के इतिहास में गोता लगाने वाले प्राच्यविदों के प्रभाव का ह्रास हो चुका था और भारत की शिक्षा-नीति पर मैकाले और ट्रैवेलियन जैसे आंग्लवादी हावी हो चुके थे। प्राच्यविदों ने अपनी सक्रियता द्वारा ज्ञान के क्षेत्र में जिन महत्वपूर्ण संस्थानों को प्रतिष्ठा दिलाई थी उन सभी का पतन हो रहा था। कोई भी संस्थान अपनी प्रारंभिक प्रतिष्ठा कायम रख पाने में असमर्थ था। वस्तुतः यह ईस्ट इंडिया कंपनी की अर्थ-नीति और शिक्षा-नीति की ही परिणति थी कि एशियाटिक सोसाइटी के प्रारंभिक दौर जैसे कार्यों को प्रोत्साहन मिलना बंद हो गया था। कंपनी की नीतियों के कारण ही फोर्ट विलियम कॉलेज अपनी स्थापना के कुछ ही वर्षों में बर्बादी की ओर बढ़ गया। हिंदी-हिंदुस्तानी के क्षेत्र में कॉलेज के अध्यापक जॉन बॉर्थविक गिलक्रिस्ट के बाद किसी भी विद्वान को कंपनी का इतना समर्थन प्राप्त नहीं हुआ था कि वह भाषा और साहित्य के क्षेत्र में कुछ मानीखेज प्रस्तुत कर सके। गिलक्रिस्ट भी इतने अधिक अकादमिक कार्यों को करने में सफल इसलिए हो सके थे क्योंकि उनके ऊपर वेलेजली जैसे पैट्रॉन का हाथ था।" 2 कुल मिलाकर फोर्ट विलियम कॉलेज के विनाश के पीछे कंपनी के अलावा और कोई कारक नहीं दिखाई देता जबकि प्राच्यवाद की वर्तमान अवधारणा को मानें तो होना यह चाहिए था कि ज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय रहे ये संस्थान साम्राज्यवाद की स्थापना के लिए कुछ और सुदृढ़ किए जाएँ। इन तथ्यों से आप यह भी लक्षित कर सकते हैं कि अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब कंपनी का साम्राज्य अभी पूर्णतः स्थापित भी नहीं हुआ था तब प्राच्य ज्ञान का विस्तार अधिक तीव्र था और जब साम्राज्य के लिए ज्ञान के अनुकूलन की वास्तविक आवश्यकता थी तब इन पुराने संस्थानों का पतन होता जाता है! यह स्थिति प्रमाणित करती है कि प्राच्यवाद के प्रारंभिक स्वरूप का सरलीकृत विश्लेषण हमें बहुत ही गलत निष्कर्षों तक ले जा सकता है। इसलिए, गार्सां द तासी, जो एक फ्रेंच विद्वान था, जिसका भारत के साम्राज्य से सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं था, अगर वह हिंदी-हिंदुस्तानी साहित्य का प्रथम इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयास करता है तो अध्येताओं के लिए यह जरूरी हो जाता है कि प्राच्यवाद की परिभाषा और उसके क्रमिक विकास को थोड़े विस्तृत नजरिए से देखें। यह करके हम प्राच्यवाद के क्षेत्र में और साम्राज्यवाद की बारीकियों को समझने में सईद के योगदान को और व्यवस्थित रूप ही प्रदान करेंगे।

उल्लेखनीय है कि हिंदुस्तान में फ्रांसीसियों और अँग्रेजों के बीच उपनिवेश स्थापना को लेकर तीखे संघर्ष हुए थे और उसमें फ्रांसीसियों को मुँह की खानी पड़ी थी। पूरी अठारहवीं सदी में विभिन्न भारतीय इलाके फ्रांसीसियों के हाथ से निकलकर अँग्रेजों के हाथ में पहुँच गए थे। इन स्थितियों के बावजूद एक फ्रांसीसी विद्वान ही ब्रिटिश और भारतीय सहयोगियों के माध्यम से हिंदी-हिंदुस्तानी साहित्येतिहास के क्षेत्र में प्रारंभिक कार्य कर रहा था। फ्रांस में इतनी दूर बैठकर एक ऐसे समय में तासी अपना वृत्त-संग्रह तैयार कर रहे थे जब इस विषय पर सामग्री एकत्रित करना हिंदुस्तान में भी विद्वानों के लिए दुष्कर था। तासी ने बहुत ही गर्व के साथ अपनी पुस्तक में सूचित किया है कि गिलक्रिस्ट ने सिर्फ तीस विद्वानों की ही सूची दी है किंतु मेरे पास सामग्री की कमी होने के बावजूद मैंने केवल पहली ही जिल्द में सात सौ पचास लेखकों और नौ सौ से भी अधिक रचनाओं का उल्लेख किया है।"3 निस्संदेह उनका यह प्रयास उल्लेखनीय था और यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि एक ऐसे दौर में जब फ्रांसीसी हिंदुस्तान में अपनी प्रतिष्ठा खो चुके थे तथा फ्रेंच औपनिवेशिक 'संस्कृति' और साम्राज्य की कोई बहुत गहरी प्रेरणा की संभावना भी खत्म हो चुकी थी, वह कौन सी चीज थी जो तासी को इस अध्ययन की ओर धकेल रही थी। क्या इसे सिर्फ 'प्राच्यवाद' की सईदी पद्धति से समझा जा सकता है या ज्ञान की द्वंद्वात्मक भूमिका पर भी एक हल्की नजर डाली जानी चाहिए?

वस्तुतः भारतीय इतिहासकार और आलोचक तासी के ग्रंथ की अनेक त्रुटियों के बावजूद, साम्राज्य और अस्मिता से जुड़ी अनेक सीमाओं के बावजूद, जबर्दस्त सामंती और बुर्जुआ मानसिकता के बावजूद, उनके प्रति लगातार सम्मान दिखाते हैं तो इसीलिए क्योंकि वे ज्ञान की उस द्वंद्वात्मक भूमिका को विस्मृत नहीं करना चाहते जो कि परंपरा से हमें प्राप्त हुई है। तासी अपनी अनेक सीमाओं के बाद भी जो काम फ्रांस में बैठकर कर रहे थे वही काम यहाँ बैठकर अगले कई दशकों तक भारतीय नहीं कर सके थे। यह बीसवीं सदी में आकर ही हुआ कि तासी के इतिहास-लेखन की पद्धति को भारतीय विद्वानों में मिश्रबंधुओं ने अस्वीकार किया। इसीलिए तासी की सारी अस्मितागत सीमाओं पर प्राच्य ज्ञान के क्षेत्र में उसका योगदान हिंदी आलोचकों की दृष्टि में महत्वपूर्ण हो जाता है और उसे इतिहास लेखन की परंपरा में स्थान देकर या उसकी चर्चा कर उसे महत्व दिया जाता है।

अब जब इतिहास पर से काफी धुंध छँट चुका है, जरूरी है कि हम तासी की सीमाओं पर पूरी नजर डालते हुए उपनिवेशवाद और ज्ञान की द्वंद्वात्मक भूमिका दोनों ही चश्मों से तथ्यों को देखें। अगर हिंदुस्तान में ज्ञान के विकास में बाधा डालने के लिए औपनिवेशिक प्रक्रिया गहरे जिम्मेदार है तो इसका बदला लेने के लिए तासी के लेखन को पूर्णतया उसी चश्मे से देखना कोई समझदारी का काम नहीं होगा। ठीक उसी तरह जैसे उपनिवेशवाद के गंभीर और आक्रामक आवरण को विस्मृत कर उनके साहित्य को देखना भी बहुत समझदारी का काम नहीं होगा। तराजू पर अनावश्यक ढंग से कोई पासंग डालना अतार्किकता की ओर ही ले जाएगा। इक्कीसवीं सदी में भी यह करना उन्नीसवीं सदी में तासी जैसे अनेक विद्वानों से हुई विभिन्न गल्तियों को दोहराने जैसा होगा।

गार्सां द तासी फ्रांस में हिंदुस्तानी के प्रोफेसर थे। उन्होंने फ्रांस में रहकर ही हिंदुस्तानी की विधिवत शिक्षा ली थी। हिंदी-हिंदुस्तानी से संबंधित उनके अन्य महत्वपूर्ण योगदानों में 'ले ओत्यूर ऐंदुस्तानी ऐल्यूर डबरज', 'ल लाँग अ ल लितरेत्यूर ऐंदुस्तानी द 1850 अ 1869', 'दिस्कुर द उवरत्यूर दु कूर द ऐंदुस्तानी', 'ल लाँग अ ल लितरेत्यूर ऐंदुस्तानी रेव्यू एन्यूएल 1870-76', 'रुदिमाँ द ल लाँग ऐन्दुई', 'रुदिमाँ द ल लाँग ऐंदुस्तानी' आदि का नाम लिया जा सकता है। तासी ने तहसीनुद्दीन की मसनवी कामरूप, गुल बकावली और बागो बहार का फ्रेंच अनुवाद किया, सर सैयद की पुस्तक असरारुस सनादीद का फ्रेंच अनुवाद भी तैयार किया। तासी एशिया और यूरोप में प्राच्य विद्या के अध्ययन में संलग्न कई महत्वपूर्ण संस्थाओं के सदस्य भी थे। पेरिस के फ्रांसीसी इंस्टीट्यूट, एशियाटिक सोसाइटी (लंदन, कलकत्ता, मद्रास, बंबई), इंपीरियल ऐकेडमी ऑव साइंसेज, म्यूनिख, रॉयल ऐकेडमी, लिस्बन, रॉयल सोसाइटी, कोपेनहेगेन, और अलीगढ़ इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों के वह सदस्य थे। तासी को फ्रांस में 'नाइट ऑव दी लिजियन ऑव ऑनर' और 'स्टार ऑव द साउथ पोल' जैसी उपाधियों से भी नवाजा गया था। तासी के इतने प्रभावपूर्ण स्थान और इस दौर की गूढ़ संरचनाओं को देखते हुए कई कोणों से उसकी सामाजिक चिंताओं और साहित्यिक मान्यताओं का विश्लेषण जरूरी है।

जिस दौर में तासी सक्रिय थे उस दौर के विद्वान बड़े स्तर पर अस्मिताई सीमाओं से ग्रस्त थे। धर्म का आवरण अभी भी बहुत मजबूत था। धर्म और जाति की अस्मिताएँ और वर्गीय संरचनाएँ इस दौर के साहित्यिक परिदृश्य को गहरे प्रभावित कर रही थीं। यह धार्मिक या जातीय अस्मिता भारत के हिंदुओं और मुसलमानों में भी कम नहीं थी, बाद में जाकर जिसका भरपूर फायदा अँग्रेज उठाने में कामयाब हुए थे। तासी ब्रिटिश नहीं थे, परंतु निश्चय ही इन प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं थे और इसका पूरा प्रभाव उनके साहित्येतिहास की अवधारणा पर भी दिखाई देता है। जातिगत श्रेष्ठता की भावना, राजतंत्र का घोर समर्थन, ईसाईयत के प्रति अत्यधिक समर्पण और इन सबसे ऊपर बुर्जुआ मानसिकता तासी के लेखन में प्रत्यक्षतः चिह्नित की जा सकती है। अपनी पुस्तक 'इस्तवार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी' के द्वितीय संस्करण की तीसरी जिल्द (1871) की भूमिका में तासी ने स्पष्टतः यह माना है कि इस अंतिम जिल्द में 'मानव जातियों में छठा स्थान रखने वाली आधुनिक भारतीय जाति के साहित्यिक इतिहास का अधिकांश है।" 4

किंतु सबसे रुचिकर प्रसंग यह है कि तासी ने 1839 में प्रकाशित अपने ग्रंथ को समर्पित किया है ब्रिटेन की साम्राज्ञी के नाम। तासी बुर्जुआ मानसिकता का प्रमाण देते हुए भारत में अँग्रेज उपनिवेश को आवश्यकता के रूप में स्थापित कर रहे थे। स्वयं को साम्राज्ञी का अत्यंत तुच्छ और अत्यंत आज्ञाकारी दास मानते हुए तासी इस समर्पण में यह बता रहे थे कि ब्रिटिश शासन के अंतर्गत न तो लूट का भय है और न तो देशी सरकारों का अत्याचार और हिंदुस्तान की जनता इतनी सुखी कभी नहीं थी जितनी की आज है -

''ग्रेट ब्रिटेन की साम्राज्ञी को

देवि,

यह नितांत स्वाभाविक है कि मैं साम्राज्ञी से एक ऐसा ग्रंथ समर्पित करने का सम्मान प्राप्त करने की प्रार्थना करूँ जिसका संबंध भारतवर्ष, आपके राजदंड के अंतर्गत आए हुए इस विस्तृत और सुंदर देश, और जो इतना खुशहाल कभी नहीं था जितना कि वह इंग्लैंड के आश्रित होने पर है, के साहित्य के एक भाग से है। यह तथ्य सर्वमान्य है और इसके अतिरिक्त आधुनिक हिंदुस्तानी लेखक इसका प्रमाण देते हैं, जिस ब्रिटिश शासन के अंतर्गत न तो लूट का भय है और न तो देशी सरकारों के अत्याचार है, उसका उनकी रचनाओं में यशगान हुआ है।

हिंदुस्तान के प्राचीन शासकों में एक महिला ही थी जिसने अपने व्यक्तिगत गुणों के कारण ही संभवतः अत्यधिक ख्याति प्राप्त कर ली थी। ...वास्तव में, विक्टोरिया रानी के भीतर उन्होंने रजिया का तारुण्य और उसके अलभ्य गुण फिर पाए हैं और केवल यही बात उनका उस देश के साथ संबंध और दृढ़ बना सकती है जिसके उनका अधीन होना ईश्वरेच्छा थी।

...अत्यंत तुच्छ और अत्यंत आज्ञाकारी दास

गार्सां द तासी

पेरिस 1839''5

उक्त उद्धरण तासी की सामंती-बुर्जुआ मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण है। तासी के लिए हिंदुस्तान का अँग्रेजों के अधीन चला जाना मात्र ईश्वरेच्छा थी और भारत खुशहाल है यह उनके लिए एक सर्वमान्य तथ्य था। अठारहवीं सदी के बाद की राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों ने यह स्थापित किया है कि अँग्रेजों के आधिपत्य के कुछ ही वर्षों में भारत घोर दुर्दशा का शिकार हो गया था। तासी जिस भारतीय जनता को सर्वाधिक खुशहाल मान रहे हैं उसी जनता ने बीस वर्ष के भीतर ही ऐसा विद्रोह किया जिससे अँग्रेजों की नींद हराम हो गई और कंपनी सरकार के सारे अधिकार सीधे ब्रिटिश गद्दी ने अपने हाथ में ले लिए। तासी के लिए निश्चय ही ऐसा विद्रोह समझ से परे था क्योंकि पेरिस में हुए विद्रोह के संदर्भ में उनकी दृष्टि का कुछ आभास द्वितीय संस्करण की तीसरी जिल्द में प्रकाशित विज्ञप्ति से मिल जाता है जिसमें तासी सर्वहारा के पहले महत्वपूर्ण विद्रोह पेरिस कम्यून को बहुत ही नकारात्मक नजरिए से देखते हैं। तासी के लिए ये मजदूर विद्रोही नृशंस अत्याचारियों से अधिक कुछ न थे। तासी ने इस विज्ञप्ति में लिखा है - ''महासरों के समय नृशंस अत्याचारियों का शासन था जिन्होंने, तिरंगे झंडे में, अन्य दो रंगों से घिरे हुए, हमारे बादशाहों के सफेद झंडे के स्थान पर लाल झंडा स्थापित किया है, जो, प्रतीत होता है, अंत में पहले द्वारा हटा दिया जाएगा और ऐसे स्मारकों के, जिन पर फ्रांस को गर्व हो सकता है, और असंख्य व्यक्तिगत जायदादों के नष्ट या विकृत करने में ही संतोष न कर जिन्होंने बेगुनाह और संभ्रांत व्यक्तियों का वध करने में नीचता प्रदर्शित की है, विशेषतः हमारे प्रसिद्ध आर्च-बिशप दरबॉय, मधुर वक्ता अबे दगेरी, विद्वान सभापति बौजाँ का, जो सब मेरी तरह, नए संप्रदाय द्वारा अन्यायपूर्वक निंदित, फ्रांस के पुराने चर्च से संबंधित थे...।'' 6

हिंदी, हिंदुवी, रेख्ता, हिंदुस्तानी, उर्दू के लचीलेपन को और एक जातीय भाषा के रूप में उसके मिश्रण की प्रक्रिया को ब्रिटेन की अर्थनीति ने और औपनिवेशिक नीतियों ने जो क्षति पहुँचाई थी, उन्नीसवीं सदी में वह कैसे बढ़ता गया इसे तासी के लेखन से समझा जा सकता है। औपनिवेशिक प्रक्रिया का हिस्सा होने के कारण अँग्रेज विद्वान यह समझने में असमर्थ थे कि भाषा के विकास की पूरी प्रक्रिया उनकी आर्थिक नीतियों से कितने बृहद रूप में प्रभावित हुई है। हिंदी भाषा के जातीय संस्कार के बाधित होने के पीछे हिंदुस्तान के आर्थिक ढाँचे का तहस-नहस होना कितना बड़ा कारक है इसकी पहचान बाद के प्रगतिशील इतिहासकार ही कर सके। ऐसे में इस अलगाव के बुनियादी कारक कहीं और ढूँढ़े जाने थे। निश्चय ही धर्म और जाति की अस्मिताएँ इसमें बहुत मददगार हो सकती थीं। संस्कृत- हिंदी-हिंदू और फारसी-उर्दू-मुस्लिम का जो हल प्रारंभिक प्राच्यविदों को दिखा वह किसी बाँटो और राज करो की नीति की वजह से नहीं था (देखें - शोध-ग्रंथ - फोर्ट विलियम कॉलेज और हिंदी भाषा, 2009, ज.ने.वि.) बल्कि उनकी आलोचनात्मक दृष्टि और उनके देश काल की यह सीमा थी कि वे भाषा समस्या को इससे अधिक समझ नहीं पाए थे। तासी भी हिंदी-हिंदुस्तानी के संबंध में धार्मिक आधारों की मान्यता को लेकर आगे बढ़ रहे थे किंतु अपने प्रारंभिक लेखन में तासी परिष्कृत उर्दू के उतने पक्षधर नहीं थे जितना कि अपने परवर्ती लेखन में हो गए थे। प्रथम संस्करण (1839) की पहली जिल्द की भूमिका में तासी हिंदी, उर्दू, हिंदुस्तानी और दखनी के बारे में अपनी मान्यता कुछ इस प्रकार रखते हैं - ''ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सन की सोलहवीं शताब्दी से पूर्व भारत की आधुनिक भाषाओं ने सर्वत्र वेदों की पवित्र भाषा का स्थान ग्रहण कर लिया था। भारत के प्राचीन साम्राज्य में जिसका विकास हुआ उसे सामान्यतः 'भाषा' या 'भाखा' और विशेषतः हिंदवी और हिंदुई (हिंदुओं की भाषा) के नाम से पुकारा जाता है। महमूद गजनवी के आक्रमण के समय इस नवीन भाषा का पूर्ण विकास न हो पाया था। बहुत बाद को, सत्रहवीं शताब्दी के लगभग अंत में, दिल्ली में पठान वंश की स्थापना के समय, हिंदुओं और ईरानियों के पारस्परिक संबंधों के फलस्वरूप, मुसलमानों द्वारा विजित नगरों में विजयी और विजित की भाषाओं का एक प्रकार का मिश्रण हुआ। प्रसिद्ध विजेता तैमूर के दिल्ली पर अधिकार प्राप्त कर लेने के समय यह मिश्रण और भी स्थायी हो गया। सेना का बाजार नगर में स्थापित किया जाता था और जो तातारी शब्द उर्दू द्वारा संबोधित होता था, जिसका ठीक-ठाक अर्थ है सेना और शिविर। यहाँ पर खास तौर से हिंदू-मुसलमानों की नई (मिश्रित) भाषा बोली जाती थी, साथ ही उसे सामान्य नाम उर्दू भाषा भी मिला, यद्यपि कविगण उसे रेख्ता नाम से भी पुकारते हैं। इसी समय के लगभग, भारत के दक्षिण में, नर्मदा के दक्षिण में उत्तरोत्तर स्थापित किए गए विभिन्न राज्यों के शासक मुसलमान वंशों के अंतर्गत समान भाषा संबंधी घटना घटित हुई, और हिंदू-मुसलमानों की मिश्रित भाषा ने एक विशेष नाम दक्खिनी ग्रहण किया। मध्ययुगीन फ्रांस की उई और ओक की भाँति इन दोनों बोलियों का भारत में प्रचार हो गया है, एक का उत्तर मे, दूसरी का दक्षिण में, जहाँ कहीं भी मुसलमानों ने अपने राज्य स्थापित किए, जब कि पुरानी बोली का प्रयोग अब भी गाँवों मे, उत्तरी प्रांतों के हिंदुओं में होता है, किंतु यद्यपि शब्दों के चुनाव में ये बोलियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं, तो भी उचित बात तो यह है कि वे अपनी-अपनी वाक्य रचना पद्धति के अंतर्गत एक ही और समान बोलियाँ हैं और वे हमेशा हिंदी या हिंदवी के अनिश्चित नाम से तथा यूरोपियनों द्वारा हिंदुस्तानी के नाम से पुकारी जाती है। और जिस प्रकार जर्मन लैटिन या गोथिक अक्षरों में लिखी जाती है, उसी प्रकार स्थान और व्यक्तियों की रुचि के अनुसार हिंदुस्तानी लिखने के लिए यद्यपि आज कल फारसी अक्षरों का प्रयोग गिया जाता है, हिंदू, अपने पूर्वजों की भाँति प्रायः देवनागरी अक्षरों का प्रयोग करते हैं।'' 7

इस उद्धरण में स्पष्ट द्रष्टव्य है कि तासी अपनी सारी सीमाओं के बाद भी अपने प्रारंभिक लेखन में कुछ समान धरातल ढूँढ़ पाने में समर्थ थे किंतु जैसे-जैसे हिंदी-उर्दू विवाद गहराता गया तासी ने अपनी एक पक्षधरता तय करनी शुरू कर दी और कुछ हद तक यह जानते हुए भी कि गाँव-देहातों की भाषा उर्दू नहीं है, उर्दू और फारसी लिपि के प्रति अतिरिक्त आग्रह दिखाने लगे। यह अतिरिक्त आग्रह कुछ कुछ गिलक्रिस्ट के अतिरिक्त आग्रह से मिलता-जुलता है। प्राच्यविदों ने परंपरा में ही धर्म और भाषा का जो गूढ़ संबंध स्थापित किया था वह गिलक्रिस्ट से होते हुए तासी तक पहुँचती है। गिलक्रिस्ट की ही तरह अरबी-फारसी के शब्दों को खड़ी बोली से जोड़ने की तासी की अवधारणा में कोई भूल नहीं थी, भूल इस बात में थी कि उन्होंने उर्दू को अनिवार्यतः मुसलमानों से संबंधित मान लिया और एक जनभाषा के रूप में उसके विकास की प्रक्रिया को नहीं समझ सके।

तासी का सामंतवाद के संदर्भ में क्या मंतव्य था और राजतंत्र में उनकी कितनी गूढ़ आस्था थी, इसका उदाहरण ऊपर देखा जा चुका है। यह अभिजात्यपन तासी को उर्दू के प्रति आकर्षित करता है। सामंतवाद का ह्रास तासी के लिए बहुत कष्टकर था ऐसे में भारत में जो भाषा उसके निकट ठहरती है उसका ह्रास भी उनके लिए अत्यधिक कष्टकर था। अँग्रेज फारसीदाँ हिंदी के प्रति इसलिए झुके थे क्योंकि प्रशासनिक क्षेत्रों में, सरकारी कार्यालयों में इसका प्रचलन था और अँग्रेज कोई परिवर्तन चली आ रही परिपाटी में नहीं करना चाह रहे थे। तासी इस फारसीदाँ हिंदी के लिए भी झुके तो इसका प्रमुख कारण शहरों और सरकारी कार्यालयों में इसका स्थापित स्वरूप था, अभिजात्य के बीच स्वीकृति थी। तासी द्वितीय संस्करण की पहली जिल्द की भूमिका (1870) में लिखते हैं कि - ''जब तक मुसलमान राज्य जारी रहा, फारसी अक्षरों में लिखित उर्दू समस्त भारत में स्वीकार कर ली गई थी, यद्यपि, न केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए, वरन अदालतों और सरकारी दफ्तरों के लिए भी, राज्य की सरकारी भाषा फारसी थी। 1831 में लोगों के हित के लिए विभिन्न प्रांतों की सामान्य भाषाओं को स्थान दिया, और स्वभावतः उर्दू उत्तर तथा उत्तर पश्चिम प्रांतों के लिए अपना ली गई। यह सुंदर कार्य सबको पसंद आया और अगले तीस वर्षों में इस व्यवस्था को पूर्ण सफलता मिली है तथा कोई शिकायत सुनने में नहीं आई है। किंतु इन पिछले वर्षों में भारत की प्राचीन जातियों से संबंधित वही आंदोलन उठ खड़ा हुआ है जिसने यूरोप को आंदोलित कर रखा है, अब मुसलमानों के अधीन न होने के कारण हिंदुओं में एक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो गई है, अपने हाथ में शक्ति न ले सकने के बाद, वे कम से कम मुसलमानों की दासता के समय की अरुचिकर बातें दूर कर देना और स्वयं उर्दू को ही अवरुद्ध कर देना चाहते हैं, अथवा केवल उचित रूप में रखते हुए फारसी अक्षरों को जिसमें वह लिखी जाती है, जिन्हें वे मुसलमानों की छाप समझते हैं। अपनी इस प्रतिक्रियावादी अजीब बात के पक्ष में वे जो तर्क प्रस्तुत करते हैं वे बिल्कुल स्वीकार योग्य नहीं हैं। बिना इस बात की ओर ध्यान दिए हुए कि जब कि हिंदी जिसे वे राष्ट्रीयता की संकीर्ण भावना से प्रेरित हो पुनर्जीवित करना चहते हैं, अब साहित्यिक दृष्टि से लगभग लिखी ही नहीं जाती, जो हर एक गाँव में, वस्तुतः प्रदेश के लोगों की तरह बदल जाती है, जबकि उर्दू का सुंदर काव्यात्मक रूप स्थिर हो चुका है, वे कहते हैं देश की (अर्थात गाँवों की) भाषा हिंदी है न कि उर्दू।'' 9

तासी स्पष्टतः यहाँ कई बातों को नजरंदाज करते हैं। तासी यह मान कर चलते हैं कि देश के लोगों ने फारसी लिपि में लिखित उर्दू भाषा को स्वीकार कर लिया है जबकि वास्तविकता इससे कोसों दूर थी। गाँव-देहात के लोगों को अतिरिक्त फारसी का भार वहन करना बहुत कठिन था जिसके कारण बहुत सारे अँग्रेजों ने उर्दू के स्थान पर हिंदी को सरकारी कार्यालयों में प्रतिष्ठित करने की बात की थी किंतु पढ़े-लिखे सरकारी कार्यालयों में कार्यरत हिंदू-मुसलमानों ने ही फारसी लिपि और उर्दू को सरकारी कार्यालयों में प्रतिष्ठित करवाया। आज आजादी के बाद भी जब सत्तर प्रतिशत हिंदुस्तान गाँवों में रहता है और जिनके लिए अतिरिक्त फारसी भार की तरह है, तासी की यह सोच उनके अतिरिक्त आग्रह को प्रमाणित करती है। तासी अगर सिर्फ भाषा के बारे में बात कर रहे होते तो भी गनीमत थी, तासी फारसी लिपि को भी वैसे ही प्रतिष्ठित करना चाहते थे जैसे परिनिष्ठित उर्दू को। गिलक्रिस्ट की ही तरह तासी की ट्रेनिंग का भी इसमें बहुत बड़ा हाथ है। उर्दू के बड़े कवियों की रचनाओं को पढ़कर अपनी दृष्टि बनाने वाले तासी भारतीय यथार्थ को समझ पाने में निश्चय ही असमर्थ थे। उनके काफी पहले विलियम प्राइस हिंदुस्तान में रहते हुए उनकी तुलना में कहीं अधिक व्यवस्थित विचार रख रहे थे।

तासी हिंदी-उर्दू में स्थापित हुए भेद को बिल्कुल विपरीत दृष्टि से देखते हैं। धार्मिक आधार पर हिंदी-उर्दू के अलगाव को प्रतिष्ठित करने का कार्य किया ब्रिटिश प्राच्यविदों ने, किंतु तासी यह मत रखते हैं कि यूरोपियों ने सामान्य नाम हिंदुस्तानी ही दिया जिसके अंतर्गत वे हिंदी, उर्दू, और दक्खिनी को शामिल करते हैं, किंतु भारतवासियों ने यह नाम स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे देवनागरी में लिखित हिंदू बोली को हिंदी शब्द से और फारसी में लिखित मुसलमानी बोली को उर्दू नाम से अलग-अलग करना अधिक पसंद करते हैं।" 10

विदित है कि सईद ने पूरब के अपने अध्ययन में इस्लाम के प्रति पश्चिम के व्यवहार को सर्वाधिक प्रमुख आधार बनाया है। पीछे मैंने यह बताया है कि इस आधार की गंभीरता को देखते हुए हरीश त्रिवेदी ने यह पेशकश की है कि अगर इस पुस्तक का अनुवाद हो तो इसका नाम गम-ए-इस्लाम भी रखा जा सकता है। सईद ने यह मान्यता रखी है कि प्राच्यवाद का विकास औपनिवेशिक प्रक्रिया से बहुत पहले तब शुरू हुआ जब इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से पश्चिम आक्रांत हुआ और उसने इस्लाम को अपने अन्य के रूप में स्थापित करना शुरू किया। पश्चिम ने पूरब को जो रूप विकसित किया वह बर्बरता, रहस्यात्मकता, क्रूरता और कामुकता इत्यादि से लबरेज था। किंतु उन्नीसवीं सदी के भारत में कई ऐसे प्राच्यविद हुए जो इस्लाम के प्रति एक अलग ही नजरिया रखते हैं। तासी उन्हीं में से एक हैं। तासी का उर्दू की ओर झुकाव उनका इस्लाम की ओर झुकाव से संबंधित है। आचार्य शुक्ल ने इस्लाम के प्रति तासी के अतिरिक्त आग्रह को चिह्नित किया है। आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि ''हिंदी उर्दू का झगड़ा उठने पर अपने मजहबी रिश्ते के खयाल से उर्दू का पक्ष ग्रहण किया और कहा - हिंदी में हिंदू धर्म का आभास है- वह हिंदू धर्म जिसके मूल में बुतपरस्ती और उसके आनुषंगिक विधान हैं। इसके विपरीत उर्दू में इस्लामी संस्कृति और आचार व्यवहार का संचय है। इस्लाम भी सामी मत है और एकेश्वरवाद उसका मूल सिद्धांत है, इसलिए इस्लामी तहजीब में ईसाई या मसीही तहजीब की विशेषताएँ पाई जाती हैं।

संवत 1927 के अपने व्याख्यान में गार्सां द तासी ने साफ खोलकर कहा - मैं सैयद अहमद खाँ जैसे विख्यात मुसलमान विद्वान की तारीफ में और ज्यादा नहीं कहना चाहता। उर्दू भाषा और मुसलमानों के साथ मेरा जो लगाव है वह कोई छिपी हुई बात नहीं है। मैं समझता हूँ कि मुसलमान लोग कुरान को तो आसमानी किताब मानते ही हैं, इंजील की शिक्षा को भी अस्वीकार नहीं करते, पर हिंदू लोग मूर्तिपूजक होने के कारण इंजील की शिक्षा को नहीं मानते।''11

तासी इस पूरे विवाद को गंभीर सांप्रदायिक दृष्टि से देखते हैं। द्वितीय संस्करण की पहली जिल्द की भूमिका में वे इस पूरे विवाद को, हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता को बहुदेववाद का एकेश्वरवाद के विरुद्ध, वेदों का बाइबल के विरुद्ध (जिसके अंतर्गत मुसलमान आ जाते है) संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लिपि के मसले पर पूर्णतः पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए यह कहते हैं कि फारसी अक्षरों, साथ ही शिकस्ता के मुकाबले में भद्दी घसीट नागरी पढ़ना अधिक कठिन है। प्रो. शंभुनाथ ने तासी की इस दृष्टि के संदर्भ में ठीक ही लिखा है कि ''जिस समय हिंदी आबादी में सामाजिक गतिशीलता काफी बढ़ गई थी, जातीय संहति कायम हो रही थी, नागरी लिपि में खड़ी बोली हिंदी के कई दैनिक पत्र निकलने लगे थे और भारतेंदु हरिश्चंद्र लगातार नाटक और टिप्पणियाँ लिख रहे थे, गार्सां द तासी के उपर्युक्त कथन को सतही और उत्तेजनात्मक ही कहा जा सकता है।'' 13

ईसाई होते हुए तासी का इस्लाम के प्रति यह रवैया प्राच्यवाद को और गंभीरता से विश्लेषित करने की माँग करता है। अनेक अँग्रेजों को भारतीय आध्यात्मिकता और संस्कृत ग्रंथों की वैचारिकता बहुत आकर्षित करती है। किंतु तासी जब हिंदुओं और मुसलमानों को सामने रख कर देखते हैं तो प्राच्यवादी परिभाषा में जो उनका अन्य होना चाहिए था वही उनका आत्मीय हो जाता है और इस सारी आत्मीयता में तासी कहीं भी अपनी ईसाईयत की बलि नहीं देते। भारतीय रीति रिवाजों, धर्म, जाति इत्यादि के संदर्भ में जब तासी अपना मत रखते हैं तो उनके कट्टर ईसाई होने का साफ प्रमाण मिलता है। प्रेमसागर के उनके विश्लेषण में भी यह भावना एक दम स्पष्ट देखी जा सकती है। उनका मानना है कि गंगा यमुना की घाटी में ईसा मसीह ईसवी सन के प्रारंभ में प्रवेश कर चुके थे और बाद के कृष्ण जैसे चरित्रों में उनका प्रतिबिंब देखा जा सकता है। प्रथम संस्करण के द्वितीय जिल्द की भूमिका में तासी यह स्पष्ट कहते हैं कि कोई भी बात जो कैथोलिक ईसाई मत के खिलाफ जाती है उसका विरोध करना मेरा दायित्व है। तासी लिखते हैं कि ''...अपने अनुवादों में मिलने वाले कुछ ऐसे अंशों के लिए जिनमें कैथलिक ईसाई मत से साम्य न रखने वाले विचार पाए जा सकते हैं विरोध प्रकट करना मेरा कर्तव्य है...'' 14

किंतु हिंदी-उर्दू विवाद की बात अगर छोड़ भी दी जाए तो भी इस बात को लेकर विवाद नहीं है कि तासी साहित्यिक सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदुस्तानी की बहुत सी श्रेष्ठ बातों को स्थापित करने का भी प्रयास करते हैं। प्रथम संस्करण (1839) के पहली जिल्द में तासी लिखते हैं कि हिंदुस्तानी को समस्त एशिया में कोमलता और विशुद्धता की दृष्टि से जो ख्याति प्राप्त है वह अन्य किसी को नहीं। हिंदुस्तानी उनके लिए कला और साहित्य की भाषा, इतिहास और उच्च स्तर के पत्र व्यवहार की भाषा थी। इस वक्त तक हिंदुस्तानी के फारसीदाँ रूप के प्रति तासी उतने पक्षपाती नहीं हुए थे जितने परवर्ती काल में हुए थे। हिंदुस्तानी उनके लिए भारत की सबसे अधिक अभिव्यंजना शक्ति-संपन्न और शिष्ट भाषा के रूप में प्रचलित थी। यह तासी के लेखन का वह दौर था जब कबीर, नानक, दादू, इत्यादि को हिंदुस्तानी की परंपरा में ही देख रहे थे। उन्होंने लिखा है कि ''जहाँ तक दार्शनिक महत्व से संबंध है, यह उसकी विशेषता है और यह विशेषता हिंदुस्तानी को एक बहुत बड़ी हद तक उन्नत आत्माओं द्वारा दिया गया अपनापन प्रदान करती है। वह भारत वर्ष के धार्मिक सुधारों की भाषा है। जिस प्रकार यूरोप के ईसाई सुधारकों ने अपने मतों और धार्मिक उपदेशों के समर्थन के लिए जीवित भाषाएँ ग्रहण कीं, उसी प्रकार, भारत में हिंदू और मुसलमान संप्रदायों के गुरुओं ने अपने सिद्धांतों के प्रचार के लिए सामान्यतः हिंदुस्तानी का प्रयोग किया है। ऐसे गुरुओं में कबीर, नानक, दादू, बीरभान, बख्तावर और अंत में अभी हाल के मुसलमान सुधारकों में अहमद नामक एक सैयद हैं। न केवल उनकी रचनाएँ हिंदुस्तानी में हैं, वरन उनके अनुयायी जो प्रार्थना करने हैं, वे जो भजन गाते हैं, वे भी उसी भाषा में हैं।''15 बाद में तासी इस्लाम, फारसीदाँ हिंदुस्तानी और सैयद अहमद के मोह में भाषा के इस मिश्रित स्वरूप के और लचीलेपन के अपने ही रेखांकन से दूर होते चले गए।

संदर्भ

1. हरीश त्रिवदी - एडवर्ड सईद का प्राच्यवाद और भारत, साखी पत्रिका 15-16, जनवरी-जून 2007,1. पृ.15

2. शीतांशु कुमार, फोर्ट विलियम कॉलेज और हिंदी भाषा, एम.फिल. शोध प्रबंध, जे.एन.यू. नई दिल्ली, http://172.16.21.5:8000/theses/TH17848.pdf. (opac, JNU)

3. गार्सां द तासी, इस्तवार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी (अनुवाद - हिंदुई साहित्य का इतिहास, लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय), हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, संस्करण- सं.2000, 3. पृ.3

4. वही, 4. पृ.127

5. वही, 5. पृ.1

6. वही, 6. पृ.127

7. वही, 7. पृ.4

8. देखिए, लेख - जॉन गिलक्रिस्ट की भाषा-नीति, संकल्प 2008-09, शोध-पत्रिका, कलकत्ता विश्वविद्यालय, पृ.123

9. गार्सां द तासी, वही, 9. पृ.58

10. वही, पृ.56

11. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, संवत 2035, 10. पृ.296

12. गार्सां द तासी, वही, 11. पृ.58

13. शंभुनाथ, हिंदी नवजागरण और संस्कृति, आनंद प्रकाशन, कोलकाता, 2004, 12. पृ.31

14. गार्सां द तासी, वही, 13. पृ.20

15. वही, 14. पृ.4


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हिंदी समय में शीतांशु की रचनाएँ