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कविता

आलिंगन
प्रयाग शुक्ल


आलिंगन हवाओं का।

और ऐसा भी कि गुजर ही
न सके हवा बीच उसके।
और वह भी कि
हल्का हो स्पर्श।
हो बस सरसराहट एक
वस्त्रों की।
कंधे पर, पीठ पर हल्की-सी एक थाप।

कुछ है आलिंगन में
जो यों दिखता नहीं
अपने भी पार चला जाता पर।
अदृश्य कुछ सौम्य मधुर
आता उतर दो के मिल जाने पर
वापस आ भिन्न दो दिशाओं से।


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