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कविता

बसंत
अखिलेश कुमार दुबे


चुपचाप फिर बसंत आया
दबे पाँव
शहर या गाँव में नहीं
न ही इनके बाशिंदों में के बीच
पेड़ों की डालों
सरसों के फूलों,
आम की बौरों
और बसंती कपड़ों, में भी नहीं।
बसंत आया
निःशब्द, अमादक और बीमार।
खेतों, खलिहानों, किसानों और मजदूरों
में नहीं
घर के बड़े आँगन में भी नहीं
न ही सीढ़ियों और छतों पर
फिर-फिर बसंत आया,
बेसुध, उदास और बदहवाश
जवान दिलों और उनके राग-रंग में नहीं
न ही फाग और चैती में
बसंत आया वैलेंटाइन डे के कार्ड
विदेशी लोकेशनों में तैयार किए गए
सुंदर मॉडलों वाले कैलेंडरों में
और कैलेंडरों के पन्ने में।


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