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कविता

हजारों मील दूर
प्रयाग शुक्ल


बच्चों को नींद में
छोड़ कर हम चले आते हैं।
हमारी नींद में
बच्चे आते हैं
सुबह हम एक-दूसरे को
अलग-अलग
शहरों में पाते हैं।
एक-दूसरे से बातें करते
हजारों मील दूर।


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