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कविता

प्रेम
प्रयाग शुक्ल


बहुत दूर था चंद्रमा
उसकी आभा थी
पास

एक हाथ था
मेरे हाथ में

धमनियों में बह
रही थी
पृथ्वी।


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हिंदी समय में प्रयाग शुक्ल की रचनाएँ