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नाटक

अंडे के छिलके
मोहन राकेश


 

पात्र

श्याम वीना राधा गोपाल जमुना माधव
 

परदा उठने पर गैलरी वाला दरवाज़ा खुला दिखाई देता है। बायीं ओर के दरवाज़े के आगे परदा लटक रहा है जिससे पता नहीं चलता कि दरवाज़ा खुला है या बन्द। कमरे में कोई नहीं है।

श्याम सीटी बजाता गैलरी से आता है, पतलून और कमीज़ के ऊपर बरसाती पहने। सिर भीगा है। बरसाती से पानी निचुड़ रहा है।

अन्दर आकर वह इधर-उधर नज़र दौड़ाता है।

श्याम : अरे! कमरा ख़ाली! न भैया न भाभी! (पुकारकर) भाभी!

दूसरे कमरे से वीना की आवाज़।

वीना : कौन?...श्याम?...क्या बात है?

श्याम : इधर आओ तो बताऊँ, क्या बात है।

वीना उधर से आती है।

वीना : तुम्हें भी आकर इस तरह आवाज़ देने की ज़रूरत पड़ती है? इस तरह पुकार रहे थे जैसे किसी पराये घर में आये हो।

श्याम : पराया घर तो लगता ही है, भाभी! तुमने आते ही वह न$क्शा बदला है इस कमरे का कि मेरा अन्दर पैर रखने का हौसला ही नहीं पड़ता। पहले तो इस कमरे की वही हालत रहती थी जो आजकल मेरे कमरे की है। जूते को छोडक़र हर चीज़ या चारपाई पर या मेज़ पर। अब तो मुझे इस कमरे में सिर्फ़ वही एक कोना गोपाल भैया का नज़र आता है जहाँ पतलूनें और कोट एक-दूसरे के ऊपर टँगे हैं। बाकी कमरे की सरकार ही बदल गयी है। भैया की टेबल भी क्या याद करती होगी कि किसी का हाथ लगा है। आजकल ऐसे चमकती है जैसे नई-नई पॉलिश होकर आयी हो।

वीना : खड़े गाँव से आये हो जो खड़े-खड़े ही बात करोगे? बरसाती बाहर रख दो, सारा कमरा भिगो रहे हो। फिर बैठकर आराम से बात करो। अभी तुम्हारे भैया आते हैं तो तुम्हें चाय बना देती हूँ।

श्याम : सिर्फ़ चाय? ग़लत बात। ऐसे सुहाने मौसम में सूखी चाय नहीं पी जा सकती। हरगिज़ नहीं।

उसके सिर पर हाथ रखकर उसका मुँह बाहर की तरफ़ कर देती है।

वीना : यह सुहाना मौसम पहले गैलरी में छोड़ जाओ। सारा फ़र्श गीला कर रहे हो।

फिर पीछे से खुद ही उसकी बरसाती उतारने लगती है।

: लाओ, उतार दो बरसाती। मैं ही बाहर रख आती हूँ।

श्याम उतारते-उतारते जैसे कुछ ध्यान आ जाने से फिर बरसाती पहन लेता है।

श्याम : भाभी, एक बात कहता हूँ।

वीना : क्या बात? बरसाती तुमने फिर से पहन ली? मैं कहती हूँ, तुम तो बस...।

श्याम : भाभी, बात तो सुन लो। मैं कहता हूँ कि बरसाती आकर एक ही बार उतारूँ। चाय के साथ खाने के लिए भागकर कोई चीज़ ले आऊँ। सूखी चाय का मज़ा नहीं आएगा। इस वक़्त पानी ज़रा थमा है, फिर ज़ोर से बरसने लगेगा।

वीना : फिर वही खाने की बात? कोई ऐसा भी वक़्त होता है जब तुम्हें खाने की बात नहीं सूझती?...अच्छा जाओ, मगर लाओगे क्या?

श्याम : तुम जो कहो ले जाऊँ। इस वक़्त गर्म-गर्म कचौरी और समोसे भी मिल जाएँगे और...।

वीना : और क्या?

श्याम : और...और...कहो तो कोई और अच्छी चीज़ भी मिल सकती है...।

वीना : बरसते पानी में जाओगे तो अच्छी चीज़ ही लाओ। समोसे कचौरी क्या खाओगे?

श्याम : अच्छी चीज़...अं...अं...तो अच्छी चीज़ हो सकती है...अं...।

वीना : जाओ, चार-छह अंडे ले आओ। मैं तुम्हें अंडे का हलुआ बना देती हूँ।

श्याम : शिव, शिव, शिव! किसी और चीज़ का नाम लो, भाभी! इस घर में अंडे का नाम ले रही हो? जाओ, जल्दी से जाकर कुल्ला कर लो। मुँह भ्रष्ट हो गया होगा।

वीना : क्या बात करते हो? (दबे स्वर में) यहाँ रोज़ सुबह अंडे का नाश्ता होता है। तुम्हारे भाई साहब ने यह बिजली का स्टोव किसलिए लाकर रखा है? माँ जी से तो कहा था कि सुबह बेड-टी लेनी होती है, रसोईघर से बनाकर लाने में ठंडी हो जाती है, इसलिए ये सोलह रुपये ख़र्च किये हैं। माँ जी भी भोली हैं, झट मान जाती हैं। कोई इनसे पूछे कि, स्टोव तो बेड-टी के लिए लाये हैं, मगर यह फ्राइंग पेन किसलिए लाये हैं? इसमें क्या दूध गर्म होता है?

श्याम : संयम, संयम, संयम! ज़रा संयम से काम लो, भाभी! चार दिन जो अंडे खा लिये हैं वे छिलकों समेत वसूल हो जाएँगे। अम्मा के कान में भनक भी पड़ गयी तो सारे घर का गंगा-इश्नान हो जाएगा। और तुम देख ही रही हो कि बादलों का दिन है। किसी को कुछ हो-हवा गया तो...।

वीना : भई, तुम लोगों की यह बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आती। अगर खाना ही है तो उसमें छिपाने की क्या बात है? सबके सामने खाओ। माँ जी नहीं खातीं, इसलिए रसोईघर की बजाय यहाँ कमरे में बना लेते हैं। और अंडे में जीव कहाँ होता है? जैसे दूध, वैसे अंडा।

श्याम : हरि, हरि, हरि! फिर वही नाम! भाभी, आज इस बरसते पानी में तुम जान निकलवाओगी। तुमसे कोई कुछ नहीं कहेगा। अम्मा मेरे सिर हो जाएँगी कि सब तेरी ही करनी है। तुम खाओ, बनाओ, जो चाहे करो। मगर इस चीज़ का नाम मुँह पर मत लाओ।...लाओ, पैसे निकालो। मैं तुम्हारे रिस्क पर ले आता हूँ। चोरी पकड़ी जाने पर अगर मेरा नाम लिया कि यह लाया है तो मैं साफ़ मुकर जाऊँगा और बेड-टी के साथ फ्राइंग पेन का रिश्ता अम्मा को अच्छी तरह समझा दूँगा। कितने ले आऊँ-चार कि छह?...एकाध मेरे कमरे में भी रखा होगा।

वीना : अच्छा, तो यह बात है। आप अपने कमरे में...।

श्याम : (बात कटकर) फिर कहता हूँ भाभी, कि नाम मत लो। अपने कमरे में न फ्राइंग पेन है न स्टोव, जो कोई चीज़ साबित की जा सके। कच्चा लाते हैं और कच्चा खाते हैं। इसीलिए सुबह दूध की तलब कमरे में होती है। रखने-रखाने का इन्तज़ाम पक्का है। मगर तुम कहो कि अम्मा के सामने भी यह बात ज़ाहिर कर दें तो हरगिज़ नहीं। हमें अपनी अम्मा से भी प्यार है और अपनी $खुराक से भी।

वीना : बहुत अच्छी बात है न! अम्मा की रसोई के बरतन रोज़ भ्रष्ट करते हो, यह अच्छा प्यार है! देख लेना, कल से तुम्हारा दूध का गिलास अलग न रखवा दिया तो...।

श्याम : अच्छी बात है। तुम हमारा दूध का गिलास अलग रखवा देना और हम यह फ्राइंग पेन यहाँ से उठवा देंगे। वैसे चाहो तो अब भी समझौता हो सकता है। तुम ज़बान से खाने का काम लो, शोर मचाने का नहीं, और मैं अभी जाकर आधी दर्जन वह जो तुम कह रही थीं, लाये देता हूँ। इस समझौते की खुशी में पैसे भी अपनी जेब से ख़र्च किये देता हूँ। मं$जूर? अच्छा, टा-टा!

गैलरी की तरफ़ चल देता है।

वीना : साथ थोड़ी किशमिश भी ले आना।

श्याम : ओ.के.। तुम इस बीच चाय का पानी रख दो। आते ही एक प्याली पीऊँगा।

चला जाता है। वीना खूँटी की तरफ़ जाकर वहाँ टँगे हुए कपड़े उतारने और तहाने लगती है।

वीना : मैं भी इस घर में आकर बस यहाँ की-सी हुई जा रही हूँ। दो दिन से कपड़े ही प्रेस नहीं किये।...साहब के कपड़ों का यह ढेर तो कभी ठीक ही नहीं होगा। मैं टाइयाँ और कपड़े अब कुरसियों के पीछे नहीं टाँगने देती, इसलिए हर चीज़ खूँटी पर!

कपड़े उतारते हुए मोज़े का एक जोड़ा नीचे जा गिरता है।

: लो, यह पुराना मोज़ा भी खूँटी पर लटकाने की चीज़ है!

कपड़े सन्दूक पर रखकर मोज़ा उठा लेती है। मोज़ा कुछ भारी लगता है, इसलिए उसे हाथ से मलकर देखती है।

: तो यह बात है। कल और परसों के छिलके साहब ने मोज़े में भरकर यहाँ लटका रखे हैं। इनको यह कैसी आदत है, यह मेरी समझ में नहीं आता। छिलके नाली में डाल दिए जाएँ, गन्दगी दूर हो। मगर नहीं। ह$फ्ता-भर छिलके इकट्‌ठे करेंगे, फिर डिब्बे में भरकर बाहर ले जाएँगे, जैसे किसी के लिए सौगात ले जा रहे हों।

मोज़ा कोने में डाल देती है।

: अच्छा, श्याम के आने तक चाय का पानी तो रख दूँ।

केतली उठाकर बायीं ओर के दरवाज़े की तरफ़ जाती है। परदा उठाने पर दरवाज़ा बन्द मिलता है। किवाड़ खटखटाती है।

: राधा जीजी!...राधा जीजी! इतनी देर में दरवाज़ा बन्द करके क्यों पड़ गयीं? ज़रा खोलना, मुझे अन्दर नल से पानी लेना है।

कुछ क्षणों के बाद दरवाज़े की कुंडी खुलती है।

: क्या बात है, जीजी? अभी संझा भी नहीं हुई और तुम दरवाज़े बन्द करके पड़ गयीं? मैंने सोचा कि कहीं जेठजी न आ गये हों...।

राधा दरवाज़े से निकलकर अँगड़ाई लेती है, जैसे सचमुच बिस्तर से उठी हो।

राधा : आज दोपहर से ही शरीर कुछ टूट-सा रहा था। मैंने कहा कि थोड़ी देर लेट लूँ, फिर उठकर रोटी-वोटी का धन्धा करना होगा।

वीना : यह लेटने का वक़्त थोड़े ही है, बीबी? बैठो, मैं चाय बना रही हूँ, अभी सब लोग चाय पिएँगे। ये भी दफ्तर से आनेवाले ही होंगे। बैठो, मैं उधर से पानी लेकर आती हूँ।

अन्दर चली जाती है। राधा अनमनी-सी खड़ी रहती है। क्षण-भर बाद अन्दर से वीना के हँसने का स्वर सुनाई देता है। राधा चौंककर उधर देखती है।

राधा : क्या बात है, वीना? अपने-आप ही हँस रही हो?

वीना एक हाथ में पानी की केतली और दूसरे हाथ में एक किताब लिये हँसती हुई उधर से आती है।

वीना : हँसने की बात नहीं है, जीजी?...यह तुम्हारी चन्द्रकान्ता...।

राधा झपटकर किताब उसके हाथ से छीनना चाहती है, मगर वीना उसे झाँसा देकर उसके पास से निकल जाती है। केतली मेज़ पर रखकर वह किताब पीछे छिपा लेती है। राधा पास आकर किताब उससे छीनने का प्रयत्न करती है।

: छीनाझपटी में नहीं दूँगी, जीजी? ऐसे माँग लो तो दे दूँगी। मगर इसमें इस तरह छिपाकर पढऩे की क्या बात है? मैंने तो चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति और भूतनाथ सब पढ़ रखी हैं। जब हम मिडिल में थीं तो स्कूल की लाइब्रेरी से लेकर पढ़ी थीं। इसमें ऐसा तो कुछ भी नहीं है कि इसे तकिये के नीचे छिपाकर रखा जाए और दरवाज़े बन्द करके पढ़ा जाए।

राधा : न भइया, न! हम माँ जी के सामने ऐसी चीज़ कभी नहीं पढ़ सकते। कोई ख़राब बात चाहे न हो, मगर माँ जी देखेंगी तो क्या सोचेंगी कि रामायण नहीं, महाभारत नहीं, दिन-भर बैठकर ऐसे किस्से ही पढ़ा करती हैं। और हम पढ़ते भी कहाँ हैं? हमको तो कौशल्या भाभी ने ज़बरदस्ती दे दी तो हम उठा लाये, नहीं हम तो ऐसी चीज़ कभी नहीं पढ़ते। घर के काम-धन्धे से $फुरसत लगे, तो कुछ पढ़ें भी। और हमारे पास अपनी गुटका रामायण है, कभी-कभी उसमें से ही थोड़ा-बहुत बाँच लेते हैं। तुम जानो इस घर में ये सब पढ़ेंगे तो जान नहीं निकाल दी जाएगी? यह तो कौशल्या भाभी हमारे पीछे पड़ गयीं कि ज़रूर पढ़ो, नहीं तो क्या...!

वीना : यह तो मैं भी कहती हूँ, जीजी, कि ज़रूर पढ़ो। बहुत ही इंट्रेस्टिंग किताब है। ज़रा बचकाना टेस्ट की ज़रूर है, मगर...।

राधा : (चिढक़र) हाँ भई, हम तुम्हारी तरह पढ़े-लिखे तो हैं नहीं...।

वीना : मेरा यह मतलब थोड़े ही है, जीजी! मेरा मतलब तो यह है कि तुम रामायण, महाभारत पढऩेवाली हो, तुम्हें यह किताब ज़रा बचकाना टेस्ट की मालूम होगी।

राधा : वह बात तो है ही।...मगर सच कहें, वीना, तो इसमें भी तो शूरवीरता की ही कहानी है। जिस तरह भगवान राम सीता के लिए वन-वन में मारे-मारे फिरते हैं, उसी तरह कुँअर वीरेन्द्र सिंह चन्द्रकान्ता के लिए तिलिस्म के अन्दर घूमता-फिरता है और...।

वीना : (हँसती हुई) और जिस तरह भगवान राम समुद्र लाँघकर सीता का उद्धार करते हैं, उसी तरह कुँअर वीरेन्द्र सिंह तिलिस्म तोडक़र चन्द्रकान्ता का उद्धार करते हैं। तिलिस्म तोडऩा बल्कि समुद्र लाँघने से ज़्यादा मुश्किल काम है।

राधा : (उत्सुकतापूर्वक) अच्छा, एक बात तो बताओ, वीना! तुमने तो सारी किताब पढ़ी है। अन्त में जाकर वनकन्या का क्या होता है? कुँअर वीरेन्द्र सिंह के साथ उसका ब्याह हो जाता है कि नहीं? मेरा दिल तो कहता है कि हो जाता है।

वीना : हाँ, हाँ, ज़रूर हो जाता है।

राधा : और चन्द्रकान्ता के साथ?

वीना : उसके साथ भी हो जाता है।

राधा : दोनों के साथ ही हो जाता है?

वीना : हाँ भी और नहीं भी।

राधा : हाँ भी और नहीं भी, यह कैसे?

वीना : यही बता दिया तो फिर पढऩा क्या रह गया? जब पढ़ लोगी तो अपने-आप पता चल जाएगा ( किताब देती हुई)। यह किताब ले लो। मगर अभी से दरवाज़ा बन्द करके नहीं पढऩे दूँगी। रात को जब सब लोग सो जाएँगे तो मोमबत्ती जलाकर पढऩा। मैं भी कई दिनों से सोचती थी कि रात को तुम मोमबत्ती जलाकर क्या करती रहती हो!...अभी यहाँ बैठो।

उसे बाँह पकडक़र पलँग पर बैठा देती है और दी हुई किताब भी उसके हाथ से लेकर पलँग पर फेंक देती है।

राधा : अच्छा बीना, ये बाबाजी महाराज कौन हैं?

वीना : कौन-से बाबाजी महाराज?

राधा : वही जो वीरेन्द्र सिंह को आत्महत्या से रोकते हैं।

वीना : तुम अभी तक उसी दुनिया में घूम रही हो, जीजी? अब थोड़ी देर के लिए तो तिलिस्म से बाहर निकल आओ।

केतली स्टोव पर रखकर स्विच ऑन कर देती है। बाहर से गोपाल आता है। वर्षा की फुहार से उसके कपड़े ज़रा-ज़रा भीग रहे हैं।

गोपाल : वाह, आज केतली पहले से ही रखी हुई है! बहुत सही अन्दाज़ा है वक़्त का।

वीना : इस ग़लतफ़हमी में मत रहिए कि आपके लिए चाय का पानी रखा गया है। यह केतली श्याम के लिए रखी गयी है। आप आ गये हैं, इसलिए एक प्याली आपको भी मिल जाएगी।

गोपाल : क्या बात है, आजकल श्याम पर बहुत मेहरबान हो रही हो? सुना है, देवर-भाभी का रिश्ता बहुत ख़तरनाक होता है।

वीना : बस सुना ही सुना है? जीजी बैठी हैं, ये तो मुझसे ज़्यादा जानती होंगी।

गोपाल : देखो, हमारी भाभी के लिए कुछ मत कहना। हमारी भाभी देवी की प्रतिमा हैं, तुम्हारी तरह नहीं हैं। तुम तो दिन-भर बैठी 'सन्ज़ एंड लव$र्ज' पढ़ती रहती हो और भाभी पढ़ती हैं रामायण, महाभारत।

वीना : (शरारत के लहजे में) सच?

गोपाल : सच नहीं तो क्या? क्यों, भाभी?

राधा : (खिसियायी-सी) भई, हम नहीं कुछ भी पढ़ते। हमें दिन-भर काम से $फुरसत मिलती है जो पढ़ें-पढ़ाएँ? कभी दस मिनट मिल गये तो चार अक्षर बाँच लिये।

गोपाल : वक़्त न मिले, यह और बात है। पर पढऩे के लिए तुमने गुटका रामायण रख तो छोड़ी है? मन में भावना होनी चाहिए।

वीना : आज जीजी की गुटका रामायण मैं इधर उठा लायी हूँ। जीजी तो लाने ही न देती थी। अभी-अभी आपके आने से पहले मैं इनसे समुद्र-लंघन की कथा सुन रही थी।

गोपाल : यह तो बहुत ही अच्छी बात है। तुमने बी.ए. पास तो किया है, मगर जो विद्या तुम्हें भाभी से मिल सकती है, वह स्कूल-कॉलेजों में नहीं पढ़ाई जाती। क्यों, भाभी?

राधा : भैया, हम किसी को क्या पढ़ाएँगे? हम तो आप ही अनपढ़ हैं। हम तो वीना के पास इसीलिए आ बैठते हैं कि दो-चार अच्छे अक्षर इससे सीख जाएँ।

गोपाल : तुम, और इससे सीखोगी? यह उलटी रीत यहाँ नहीं चल सकती, भाभी! दस्तूर यही है कि बड़ा बड़े की जगह और छोटा छोटे की जगह...।(जेब से सिगरेट की डिब्बी निकालता हुआ) इजाज़त हो तो...अ...अ...यह ज़रा...यह एक सिगरेट सुलगा लूँ। बहुत देर से नहीं पी। (सिगरेट सुलगाता हुआ) बारिश का दिन है, इसलिए तबीयत नहीं मानती।

वीना : आप तो कहते थे कि आप घर में किसी के सामने नहीं पीते।

गोपाल : बस सिर्फ़ भाभी के सामने पी लेता हूँ। वह भी इसलिए कि भाभी ने एक बार गैलरी में छिपकर पीते हुए देख लिया था। जब चोरी पकड़ ही ली गयी तो हमने इ$कबाल कर लिया। उसके बाद से भाभी की इतनी मेहरबानी रही कि जब-जब ज़रूरत पड़ती थी, इनके कमरे में छिपकर पी लेते थे। आज पाँच बरस हो गये, मगर मजाल है कि जो भाभी के अलावा किसी को पता तक चला हो।

वीना : हाँ, हाँ, क्यों पता चला होगा? बीबी ने जेठजी को बताया थोड़े ही होगा?

राधा : हमसे कोई कसम उठवा ले जो हमने बताया हो। हमारी यह आदत नहीं है कि इधर की बात उधर और उधर की बात इधर लगाते फिरें। जब एक बार हमने कह दिया कि किसी से नहीं कहेंगे, तो किसी से नहीं कहा। दिल में रखने की बात हम दिल में ही रखते हैं।

गोपाल : और क्या? दिल में रखने की बात दिल में रखनी ही चाहिए।...पानी खौल गया कि नहीं?

वीना : बस अभी हुआ जाता है। उतनी देर में श्याम भी आ जाएगा...।

श्याम बरसाती की जेबों में हाथ डाले हुए बाहर से आता है।

श्याम : लो भाभी, ले आया। अब तुम जानो और तुम्हारा काम।

राधा को देखकर ज़रा असमंजस में पड़ जाता है।

: अरे, बड़ी भाभी भी यहाँ पर हैं? तब तो...।

गला साफ़ करता हुआ चुप कर जाता है।

वीना : यह अपनी बरसाती तो बाहर उतार दो। अभी तक इससे पानी टपक रहा है।

श्याम : वह बात तो ठीक है भाभी, मगर...।

वीना : मगर क्या?

श्याम : मगर यह कि भाभी वह जो...वह जो तुमने कहा था, वह...।

वीना : लाये नहीं?

श्याम : ल-लाया तो ज़रूर हूँ, म-मगर...।

वीना : मगर जीजी से डर लगता है, यही न? डरने की कोई बात नहीं, जीजी किसी से नहीं कहेंगी। लाओ, निकालो।

श्याम : (ज़रा खँखार कर) और अगर बाद में...?

वीना : नहीं, बाद में कुछ नहीं होता। लाओ, निकालो।

गोपाल : क्या चीज़ है जिसके लिए इतनी हील-हुज्जत हो रही है?

वीना : कुछ नहीं, आधा दर्जन अंडे मँगवाए हैं। कह रहा था कि सूखी चाय नहीं पीऊँगा, तो मैंने कहा कि अंडे का हलुआ बनाए देती हूँ।

गोपाल : अंडे का हलुआ? यह तुम्हें क्या सूझी है? मैंने तुम्हें अच्छी तरह समझा दिया था, फिर भी तुम...?

वीना : (श्याम से) तुम क्यों काठ से वहाँ खड़े हो? अंडे मुझे दे दो, और बरसाती उतारकर बाहर रख दो (गोपाल से) आपको जब दीदी से सिगरेट का छिपाव नहीं है, तो अंडे का छिपाव रखने की क्या ज़रूरत है? (श्याम से) लाओ श्याम, दो मुझे।

श्याम क्षण-भर की हिचकिचाहट के बाद दोनों जेबों से हाथ निकालता है। उसके एक-एक हाथ में तीन-तीन अंडे हैं। वीना अंडे उससे ले लेती है और वह बरसाती उतारकर गैलरी में छोड़ आता है।

गोपाल : (अव्यवस्थित-सा) देखो वीना...मैंने तुमसे कहा था कि घर में...घर में यह चीज़ ठीक नहीं है। आदमी बाहर जाकर खा ले, वह और बात है। मगर घर में...!

वीना : घर में घर के आदमी देख लेंगे, इतनी ही तो बात है न? तो जीजी से तो किसी बात का परदा है नहीं। ये आज न देखतीं तो किसी और दिन देख लेतीं। जब रोज सवेरे...।

गोपाल : अललललल, क्या बक रही हो? कुछ होश की दवा करो...।

राधा : सच पूछो गोपाल, तो हमें इस चीज़ का पहले से ही पता है।

श्याम मुसकराता है। गोपाल बेबस-सा आराम-कुरसी पर पड़ जाता है।

गोपाल : किस चीज़ का पता है?

राधा : इस चीज़ का कि रोज़ सवेरे चाय के साथ तुम्हारे कमरे में क्या बनता है। तलने की आवाज़ तो छोड़ो, तुम जानो खुशबू भी तो उधर जाती है।

गोपाल : किस चीज़ की खुशबू जाती है?

राजधा : जो चीज़ बनती है, उसी की खुशबू जाती है, और किस चीज़ की जाएगी?

वीना : लीजिए, और छिपाइए। जीजी तो खुशबू से यह भी पहचान लेती होंगी की किस दिन आमलेट बनता है और किस दिन अंडे फ्राई होते हैं!

राधा : ज़रूर जान लेते हैं। आज सवेरे तुमने आमलेट बनाए थे। बनाए थे कि नहीं?

वीना : जीजी, जब तुम खुशबू पहचानती हो, तब तो ज़रूर तुम भी...।

राधा : (बात काटकर) न। हम कभी नहीं खाते चाहे हमें किसी की $कसम दिला लो। खुशबू तो तुम जानो हर चीज़ की अलग ही होती है। खाया नहीं है तो क्या...!

श्याम : सूँघा भी नहीं है?...बड़ी भाभी, तुम्हारी नाक बहुत तेज़ है।

वीना इस बीच अंडे एक कप में तोडऩे लगती है और छिलके मेज़ पर रखती जाती है।

राधा : बड़ी भाभी की नाक ही नहीं, आँखें भी बहुत तेज़ हैं। तुम अपने कमरे में जो करतूत करते हो, बड़ी भाभी को उसका भी सब पता है।

श्याम : (चौंककर) हें? मेरी किस करतूत का तुम्हें पता है?

राधा : रहने दो, चुप ही रहो तो अच्छा है। मैंने माँ जी से तो नहीं कहा, मगर तुम्हारा दूधवाला गिलास मैंने मेहरी से अलग रखवा रखा है और उसे अलग से मँजवाती हूँ। और सर्दियों में जो तुम दो चम्मच बुख़ार-मिक्स्चर बीच में मिलाया करते थे, उसका भी मुझे पता है।

वीना : बुख़ार-मिक्स्चर? क्या सर्दियों में इसे बुख़ार हो गया था?

राधा : इसी से पूछो जो मिक्स्चर पिया करता था। अलमारी में किताबों के पीछे शीशी लाकर रख रखी थी, पन्द्रह रुपये वाली।

गोपाल : (कुछ हैरान होकर) पन्द्रह रुपये वाली!

राधा : और नहीं तो क्या? पूछ लो इससे।

श्याम कानों पर हाथ रखकर सिर झुका लेता है।

वीना : मगर जीजी, वह शीशी पन्द्रह रुपये वाली थी और चौदह रुपये वाली नहीं, इसका तुम्हें कैसे पता चला? यह भी क्या सूँघकर ही...?

राधा : (खिसियानी पडक़र) हमें सूँघने की क्या ज़रूरत है? हम तो ऐसी चीज़ के पास भी नहीं जाते। हमारे भैया को एक बार डॉक्टर ने बतायी थी, सो वे पन्द्रह रुपये में लाये थे।

गोपाल : (वीना से) क्यों तुम भाभी को ख़ामख़ाह परेशान करती हो? भाभी बेचारी तो अनजाने भी हमारा हित ही करती हैं। (राधा से) देखो भाभी, अब तुम्हें सब मालूम ही है, मगर भैया को नहीं बताना। उनका स्वभाव तो तुम जानती ही हो। माफ़ कर दें तो बड़ी-बड़ी बात माफ़ कर दें। और नाराज़ हो जाएँ तो बस छोटी से छोटी बात पर...।

राधा : वे नाराज़ होते हैं तो किसी बात पर ही नाराज़ होते हैं। मगर तुम कहते हो कि उन्हें न बताऊँ, तो मैं नहीं बताऊँगी। मगर यह बात ठीक नहीं कि सब दरवाज़े खुले हैं और तुम यहाँ अंडे बना रहे हो। कोई बाहर से आ गया तो हमारा कहना, न कहना सब बराबर है।

केतली में पानी खौलने लगता है। वीना अंडे फेंटती है।

गोपाल : यह बात तुम ठीक कह रही हो, भाभी। मैंने कितनी ही बार इससे कहा है कि कुछ बनाना ही हो तो सब दरवाज़े बन्द कर लिया करो। श्याम, बाहर का दरवाज़ा बन्द कर दे।

वीना : श्याम, पहले ज़रा यह केतली स्टोव से उतारकर उधर रख दे और मुझे घी का डिब्बा पकड़ा दे। मैं झट से हलुआ पका दूँ। बनने में तो दो-एक मिनट ही लगेंगे।

श्याम उस तरफ़ चला जाता है और उसका काम करने लगता है।

: अलमारी से प्लेटें भी निकाल लो। (राधा से) जीजी, थोड़ा-सा हलुआ तो तुम भी लोगी न?

फ्राइंग पेन स्टोव पर रखकर उसमें घी डालती है।

राधा : (अनमने स्वर में) भैया, हमने कह दिया कि हमने न कभी खाया है और न ही कभी खा सकते हैं। पास बैठे हैं, इसलिए चाय की एक प्याली ज़रूर लेंगे।

वीना अंडे का घोल चीनी मिलाकर फ्राइंग पेन में डाल देती है और जल्दी-जल्दी हिलाने लगती है। श्याम प्लेटें निकालकर लाता है।

वीना : तुमसे कहा था, साथ किशमिश भी लाना, लाये हो?

श्याम : किशमिश तो भूल ही गया, भाभी! कहो तो अब जाकर...!

वीना : अब रहने दो। मुझसे यह नहीं कहना कि हलुआ अच्छा नहीं बना। बग़ैर किशमिश के अंडे का हलुआ...!

दूर जमुना देवी की आवाज़ सुनाई देती है।

जमुना : वीना! ओ वीना! गोपाल अभी आया है कि नहीं...?

गोपाल : (दबे हुए स्वरों में) श्याम! तुमसे कहा था, दरवाज़ा बन्द कर दो और तुम...!

श्याम : अभी कर रहा हूँ।

जल्दी से जाकर दरवाज़े के किवाड़ मिला देता है और वहीं खड़ा हो जाता है।

राधा : माँ जी आ रही हैं, अब जल्दी से कुछ इन्तज़ाम करो।

गोपाल : हाँ, हाँ, जल्दी कुछ इन्तज़ाम करो। यह छिलके...यह हलुआ...।

जल्दी से वीना का जम्पर उठाकर छिलकों पर डाल देता है। और चीनी की एक प्लेट लेकर फ्राइंग पेन को उससे ढँक देता है।

जमुना : वीना!...वीना!

दरवाज़े के पास आकर दरवाज़े को धकेलकर खोलती है। श्याम कन्धे हिला करके पास से हट जाता है।

जमुना : क्या बात है, इस तरह दरवाज़ा बन्द क्यों कर रखा था? श्याम तो दरवाज़े के आगे ऐसे खड़ा था जैसे अन्दर किसी और को रोक रखा हो। क्या बात है, सब लोग इस तरह चुपचाप क्यों हो गये हो?

गोपाल : कु-कुछ नहीं, माँ! तु-तुम अ-आओ, आओ। दरवाज़ा खुला ही था। श्याम तो ऐसे ही वहाँ खड़ा था। आओ, बैठो।

जमुना : आज दो घंटे से मेरे कमरे की छत चू रही है। मैंने कितनी बार कहा था कि लिपाई करा दो, नहीं तो बरसात में तकलीफ़ होगी। मगर मेरी बात तो तुम सब लोग सुनी-अनसुनी कर देते हो। कुछ भी कहूँ, बस हाँ माँ, कल करा देंगे माँ कहकर टाल देते हो। अब देखो चलकर, कैसे हर चीज़ भीग रही है!...क्या बात है, सब लोग गुमसुम क्यों हो गये हो?...वीना, तू इस वक़्त यह चम्मच लिये क्यों खड़ी है? और गोपाल, तू वहाँ क्या कर रहा है कोने में?

गोपाल : कु-कुछ न-नहीं, माँ, यह...वह...वह वहाँ पर...क्या नाम है उसका...वह...वह...वीना का हाथ ज़रा जल गया था। मैं इसके लिए मरहम ढूँढ़ रहा था।

जमुना : हाथ जल गया? कैसे? मैं देखूँ तो।

पास जाकर वीना के दोनों हाथ पकडक़र देखती है।

वीना : नहीं माँ जी, ऐसा कुछ नहीं जला है। ये तो बस यूँ ही...यूँ ही चिन्ता करने लगते हैं। बस ज़रा-सा ही था। हाथ से मल दिया, ठीक हो गया।

गोपाल : हाँ, वैसे तो बिल्कुल ठीक हो गया। मगर मैंने कहा कि मरहम मिल जाएे तो फिर भी लगा दूँ। कभी वक़्त पर पता नहीं चलता और बाद में तकलीफ़ बढ़ जाती है। कहते हैं कि प्रिवेंशन इज़ बैटर दैन क्योर, मतलब कि बाद में इलाज करने से पहले एहतियात बरतना ज़्यादा अच्छा है। इसलिए मैंने सोचा कि एहतियात के तौर पर थोड़ा मरहम लगा दूँ।

जमुना : मगर इसका हाथ जला कैसे? इस वक़्त यह ऐसा क्या काम कर रही थी?

गोपाल : कुछ नहीं, कुछ नहीं। कर कुछ नहीं रही थी। श्याम ने कहा था, ज़रा चाय बना दो तो उसके लिए चाय बना रही थी। यूँ चाय बनाने में हाथ जलना नहीं चाहिए, मगर बाज वक़्त होता है। जलना था, सो जल गया। वैसे चिन्ता की कोई बात नहीं। मैं अभी मरहम लगा देता हूँ। और मरहम नहीं भी मिलता तो कोई बात नहीं। अपने-आप ठीक हो जाएगा। बिल्कुल मामूली-सा भी क्या, यही समझो कि जला ही नहीं है। अब तो महसूस भी नहीं होता होगा। क्यों, वीना?

वीना : जी हाँ, बिल्कुल महसूस नहीं होता।

गोपाल : और क्या? महसूस होने की कोई बात नहीं थी। तुम नाहक फ़िक्र कर रही हो अम्मा, फ़िक्र करने की कोई बात ही नहीं है। तुम खुद देख रही हो, हाथ बिल्कुल ठीक हो गया है।

जमुना : मैं पहले ही कह रही थी कि यह मरदूद बिजली का चूल्हा घर में न लाओ। मगर माँ की बात किसी के कान में जाती हो तो न! यह मरदूद हाथ नहीं जलाएगा, तो करंट मारेगा, करंट नहीं मारेगा तो हाथ जलाएगा। हमारे ज़माने में किसी ने ऐसी चीज़ों का नाम भी नहीं सुना था...यह इसके ऊपर क्या रखा है?

गोपाल : यह स्टोव के ऊपर? यह...यह...अम्मा, फ्राइंग पेन है...फ्राइंग पेन...मतलब तलने की वह...क्या कहते हैं, वह...।

जमुना : तलने की क्या? क्या बहू यहाँ अलग से तुम्हें चीज़ें तल-तलकर खिलाती है? लगता है, इसमें कोई चीज़ बनाकर रखी है।(पास जाती हुई) मैं भी तो देखूँ कि नई बहू क्या-क्या बनाकर खिलाती है?

फ्राइंग पेन से प्लेट उठाने लगती है। गोपाल जाकर उसे बीच में ही रोक देता है।

गोपाल : न न न न न अम्मा, इसे हाथ मत लगाना, हाथ मत लगाना। तु-तुम आप ही कह रही थीं कि यह हाथ नहीं जलाएगा तो करंट मारेगा, और करंट नहीं मारेगा तो हाथ जलाएगा। ऐसी मरदूद चीज़ का कुछ पता थोड़े ही है, अम्मा! मैं तो पछता रहा हूँ कि क्यों इसे घर में ले आया। वह वापस ले ले तो मैं अभी जाकर इसे वापस कर दूँ। मुझे पता थोड़े ही था कि इसकी वजह से...।

श्याम इस बीच चारपाई से 'चन्द्रकान्ता' उठाकर उसके पन्ने पलटने लगता है। एक बार राधा की ओर देखकर वह थोड़ा खँखारता है। राधा गम्भीर मुद्रा बनाए बैठी रहती है।

जमुना : मगर यह तो बुझा हुआ है। यह बुझा हुआ भी करंट मारता है क्या?

गोपाल : हाँ अम्मा, कभी-कभी यह बुझा हुआ भी करंट मार देता है। इसका कोई भरोसा थोड़े ही है? ऐसी चीज़ से दूर ही रहा जाए तो अच्छा है। कहीं तुम्हारा भी हाथ जल-जला गया तो मुसीबत होगी।

जमुना : अच्छा, नहीं हाथ लगाती। मगर बता तो सही कि इस पर छोटी बहू तेरे लिए बनाती क्या-क्या है? इस वक़्त भी तो कुछ बना रखा है।

गोपाल : कुछ नहीं अम्मा, इसमें कुछ ख़ास चीज़ नहीं है। वह श्याम ज़रा कह रहा था, तो उसके लिए...।

श्याम : (सहसा चौंककर जैसे सफ़ाई देता हुआ) भैया, मैंने कहाँ कहा था? वह तो खुद भाभी का ही ख़याल था। क्यों, भाभी?

वीना : हाँ, हाँ, मैं कब कहती हूँ कि मैंने नहीं कहा था? ठीक है, मैंने ही तुमसे कहा था...!

राधा सहसा उठकर पास आ जाती है।

राधा : वीना ने भी नहीं, बल्कि हमने कहा था...!

गोपाल : (जैसे आसमान से गिरकर) भाभी!

राधा : हाँ, हाँ, ठीक बात तो है। हमीं ने वीना से ज़ोर देकर कहा था कि पुलटिस बनाकर श्याम के बाँध दो। इसे अपने तन-बदन की होश तो रहती नहीं। क्रिकेट खेलने में कहीं टखने पर गेंद लग गयी है। दो दिन से कह रहा है कि चलने में ज़ोर पड़ता है। हमने कहा कि ठंड का दिन है, कहीं दर्द बढ़-बढ़ा गया तो बैठकर दो दिन हमीं से मालिश करवाते रहेंगे। वीना ने पुलटिस बना दी है। अभी बाँध देंगे तो रात तक ठीक हो जाएगा।

गोपाल कृतज्ञता के भाव से राधा की तरफ़ देखता है।

गोपाल : यही तो मैं कह रहा था। यह लडक़ा अपनी सेहत का ज़रा ख़याल नहीं रखता। बाद में जब ज़्यादा बिगाड़ हो जाता है तो मुसीबत घर वालों की होती है (श्याम को आँख से इशारा करके) अब पुलटिस बँधवाकर चुपके से लेट रहना। समझे?

जमुना : लाओ, मैं ही पुलटिस बाँध देती हूँ। कोई पुराना कपड़ा-वपड़ा हो तो दो। कहीं कोई नई धोती न फाड़ देना।...यह देखो, नए कपड़ों का क्या हाल कर रखा है? यह रेशमी जम्पर मेज़ पर क्यों डाल रखा है? यह मेज़ साफ़ करने के लिए है?

मेज से जम्पर उठाना चाहती है। मगर गोपाल फिर बीच में आकर रोक देता है।

गोपाल : रहने दो, रहने दो अम्मा, क्या गज़ब करती हो? ये काम तुम्हारे करने के हैं जो तुम कर रही हो? मैला कपड़ा है, खूँटी से मेज़ पर गिर गया होगा। अभी वीना उठाकर रख देगी।

जमुना : यह मैला कपड़ा है? और वहाँ उतनी दूर खूँटी से कूदकर यहाँ मेज़ पर आ गया? तुम लोगों के लच्छन ज़रा भी मेरी समझ में नहीं आते। नया जम्पर है, अभी दो बार भी नहीं पहना होगा, और इस तरह यहाँ गिरा रखा है! हटो, तुम लोग घर उजाडऩे पर तुले हो, तो मुझे तो घर की चिन्ता है। इतने कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, इनमें टिड्डियाँ लग जाएँगी तो?

फिर जम्पर उठाने लगती है, मगर गोपाल उसे कन्धे से पकडक़र पलँग की तरफ़ ले चलता है।

गोपाल : अम्मा, नहीं लगेंगी टिड्डियाँ। तुम तो ख़ामख़ाह चिन्ता करती हो। यहाँ पलँग पर बैठो और थोड़ी देर आराम करो। बैठो-बैठो...यह इस तरफ़...!

उसे दोनों कन्धों से पकडक़र पलँग पर बिठा देता है।

जमुना : हाँ, हाँ, बैठकर आराम करूँ और मेरी जगह काम कोई दूसरा करेगा! घर में करने को इतने काम पड़े हैं। इसे पुलटिस बाँध दूँ तो जाऊँ। दूसरों की मुसीबत कर देता है और आप किताबें पढ़ता रहता है।...ला, मुझे दे यह किताब और यहाँ आकर लेट जा।

उठकर श्याम के हाथ से किताब ले लेती है।

: यह कौन-सी किताब है?

श्याम : यह किताब?...यह अम्मा...यह मेरे कोर्स की...मतलब मेरे कोर्स की किताब नहीं है यह...शायद यह भाभी की किताब है...।

वीना : यह जीजी की गुटका रामायण है, माँ जी! जीजी पढ़ती-पढ़ती यहाँ ले आयी थीं।

श्याम : हाँ, हाँ, हाँ! भाभी की गुटका रामायण ही तो है। मैं कह रहा था कि लगती तो गुटका रामायण जैसी ही है।

जमुना : मगर गुटका रामायण तो बहुत छोटी होती है। यह तो इतनी बड़ी किताब है।

श्याम : हाँ अम्मा, पहले यह छोटी थी, अब यह-मेरा मतलब है अम्मा कि इसका पहला एडीशन छोटा था, मगर जो नया एडीशन आया है, वह पहले से बड़ा है। इनके साइज़ बदलते रहते हैं, यह कोई ख़ास बात नहीं है। चलो अम्मा, तुम्हें बहुत काम है, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे में पहुँचा दूँ। गैलरी में अँधेरा है, कहीं पैर उलटा-सीधा पड़ गया तो और मुसीबत होगी।

चलने को तैयार हो जाता है।

जमुना : पाँव मेरा उलटा पड़ेगा या तेरा, जिसे चोट लगती है? मैं कह रही हूँ लेट जा, और वह मुझे कमरे में छोडऩे जाएगा!

श्याम : अरे हाँ! मेरे तो पाँव में चोट लगी है। मैं यह बात भूल ही गया था। मैं भाभी से पुलटिस बँधवाता हूँ। गोपाल भैया तुम्हें छोड़ आते हैं।

गोपाल : हाँ अम्मा, चलो, मैं छोड़ आता हूँ।

जमुना : मगर मैं कहती थी कि मैं इसे पुलटिस बाँध देती...।

गोपाल : उसकी तुम चिन्ता न करो, अम्मा! वीना बहुत अच्छी तरह बाँध देगी। आओ, मेरा हाथ पकडक़र साथ-साथ आ जाओ। गैलरी में वा$कई बहुत अँधेरा है।

बाँह पकडक़र उसे साथ ले चलता है। उसके बाहर निकलते ही श्याम फ्राइंग पेन पर झपट पड़ता है।

श्याम : भाभी, मैं ज़रा जल्दी से यह पुलटिस निगल लूँ। अगर बड़े भैया भी आ गये तो कहीं सचमुच ही इसे टखने पर न बँधवाना पड़े।

वीना : ठहरो, ज़रा सब्र से काम लो, उन्हें भी आ जाने दो।

श्याम : ग़लत बात है।

चम्मच भर-भरकर हलुआ मुँह में डालने लगता है।

: भाभी, सच कहता हूँ कि बग़ैर किशमिश के भी इतना मज़ेदार बना है, इतना मज़ेदार बना है कि जितनी तारीफ़ करूँ थोड़ी है।

गोपाल घबराया-सा जल्दी-जल्दी आता है।

गोपाल : इस पुलटिस को जल्दी से इधर-उधर करो, भैया आ रहे हैं।

श्याम : पुलटिस की तो आप ज़रा चिन्ता न करें। इसे तो मैं अभी साफ़ किये देता हूँ, आप छिलकों के इन्तज़ाम की सोचें।

जल्दी-जल्दी खाता है। गोपाल जम्पर उठाकर वीना को देता है।

गोपाल : इस जम्पर को इधर रखो और ये छिलके...इन्हें तुम जल्दी से मेरे किसी मोज़े में डाल दो।

वीना : मगर आपके सब मोज़े तो पहले ही पुराने छिलकों से भरे हुए हैं।

गोपाल छिलके मेज़ से उठा लेता है और उन्हें हाथों में लिये हुए असमंजस में इधर-उधर देखता है।

गोपाल : तो और किस चीज़ में डाल दें? मेरा टोप ही ले आओ, या जल्दी से मेरे कोट की जेब में भर दो।

सहसा माधव गैलरी से अन्दर आ जाता है।

माधव : क्यों भाई, क्या भर रहे हो कोट की जेबों में? कोई मेरे न देखने की चीज़ तो नहीं?

गोपाल : (हताश भाव से), आइए, आइए भैया? आ जाइए, आ जाइए। मैं यूँ ही ज़रा इन लोगों से मज़ाक कर रहा था।

माधव : मज़ाक कर रहे थे कि छिलके तुम्हारी जेब में छिपा दिये जाएँ!

हँसता हुआ स्टोव की तरफ़ जाता है।

गोपाल : जी हाँ...जी नहीं...मज़ाक नहीं...मेरा मतलब यह है कि...!

माधव : तुम्हारा मतलब मैं समझता हूँ। और तुम क्या खाकर मुँह पोंछ रहे हो, श्याम बाबू?

श्याम : मैं? मैं भैया...यह मेरे लिए...मेरे लिए भाभी ने पुलटिस बनायी थी...।

माधव : पुलटिस बनायी थी? और तुम वह पुलटिस गले से नीचे उतार गये! (हँसकर) खूब! तो आजकल पुलटिस खाने के काम भी आने लगी! भला यह तो बताओ कि किस चीज़ की पुलटिस थी? जिस चीज़ के यह छिलके हैं, उसी की या...?

श्याम बिल्कुल घबरा जाता है।

श्याम : भैया, थी तो यह पुलटिस ही, मगर जल्दी में मैंने...मेरा मतलब है कि मैंने जल्दी में...।

माधव : तुमने जल्दी में सोचा कि इसे खा डाला जाए! (फिर हँसकर) बहुत अच्छा किया। बनी हुई चीज़ का कोई तो इस्तेमाल होना ही चाहिए। और तुम गोपाल, तुम ये छिलके जेब में क्यों भरते हो? बाहर जाकर इन्हें नाली में डाल दो। आगे से डिब्बे में भरकर बाहर ले जाने की ज़रूरत नहीं...।

गोपाल : मगर, भैया...!

माधव : भैया सब जानते हैं, राजा! वे यह भी जानते हैं कि तुम्हारे बायें हाथ की उँगलियाँ किस तरह पीली हुई हैं। यह भी जानते हैं कि श्याम बाबू का दूध कमरे में क्यों जाता है। और यह भी जानते हैं कि उनके सो जाने पर उनकी बीवी मोमबत्ती जलाकर कौन-सी किताब पढ़ा करती है।

सबके मुँह से आश्चर्य से तरह-तरह के शब्द निकलते हैं। माधव हँसता रहता है।

गोपाल : भैया, अब आपसे क्या छिपाना है, आप तो सब कुछ जानते हैं। मगर देखिए, अम्मा से नहीं कहिएगा। अम्मा को पता चल गया तो बस किसी की ख़ैर नहीं...।

माधव : अम्मा से न कहूँ? (हँसकर) तुम समझते हो कि अम्मा यह सब नहीं जानतीं?

श्याम और गोपाल : ऐं? अम्मा भी जानती हैं?

माधव : क्यों नहीं जानतीं? अम्मा तो शायद मेरी वे बातें भी जानती हैं जो मैं समझता हूँ कि वे नहीं जानतीं। (हँसकर) आज से छिलके नाली में डाल दिया करो, इनके लिए डिब्बा रखने की ज़रूरत नहीं।...और जहाँ तक अम्मा का सवाल है, अम्मा इन्हें नाली में पड़े हुए भी नहीं देखेंगी।

हलकी-हलकी हँसी हँसता रहता है।


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हिंदी समय में मोहन राकेश की रचनाएँ