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उपन्यास

चंद्रकांता संतति
खंड 3

देवकीनंदन खत्री

अनुक्रम

अनुक्रम नौवां भाग     आगे

बयान - 1

अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहां की सैर करावें, क्योंकि कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह तथा मायारानी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं जिसे एक तरह तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। पिछले भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देवीसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाडिली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुंची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुंअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दारोगा वाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुंचाकर छोड़ दिया था और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुंचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफा उस तिलिस्मी बाग में जायंगे इसलिए वहां के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।

तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहां का पूरा हाल तो तब मालूम होगा जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा मगर जाहिरा हाल जिसे कुंअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहां पहुंचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।

उस हिस्से में फूल-फल और पत्तों की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते, हां चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहु-तायत से बनी हुई थीं जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मानकर लिखते हैं जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेकदिल खैरख्वाह और मुहब्बत का नायाब नमूना दिखाने वाली नायिकाएं तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसा कि नाम से समझा जाता है वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवचल सुर्ख पत्थर का बना हुआ एक मकान था जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था जिसके बीचोंबीच में दस हाथ के घेर का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस, इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी। उस देवमन्दिर वाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊंची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहने वाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियां बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ भी सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु के बने हुए थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस खयाल से उसे हम बाग कहें तो हो सकता है और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा बाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियां भी जगह-जगह बनी हुई थीं।

उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियां और मकान भी बने थे जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा जो कि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक-एक कोठरी और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कुआं भी बना हुआ था।

पूरब की तरफ वाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊंची दीवार थी इसलिए उस मकान का केवल ऊपर वाला हिस्सा दिखाई था और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हां छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भ निकला हुआ जरूर दिखाई दे रहा था जिसका दूसरा सिर उसके पास वाले कुएं के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखाई देता था जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिए खड़े थे।

पश्चिम तरफ वाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा-सा ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएं के अन्दर गया था।

उत्तर तरफ वाला मकान गोलाकार स्याह पत्थरों का बना हुआ था और उसके चारों तरफ चर्खियां और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पास वाले कुएं के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गई थी।

दक्खिन की तरफ वाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियां थीं और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे जो हर वक्त नाचा करते थे।

आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाडिली और ऐयार लोग बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तग्रन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब कुंअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द को देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आई है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है। उसी तरह लाडिली भी छिपी निगाहें कुंअर आनन्दसिंह पर डाल रही है।

कमलिनी - (इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहां तक जल्द हो सके यह रिक्तग्रंथ पढ़ जायं।

इन्द्रजीसिंह - हां, मैं भी यही चाहता हूं, परन्तु पहले उन कामों से छुट्टी पा लेनी चाहिए जिनके लिए तेजसिंह चाचा को और ऐयारों को हम लोग यहां तक साथ लाए हैं।

कमलिनी - मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहां तक लाई थी सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहां से जाना और कोई नया काम करना चाहिए और आपको भी रिक्तग्रंथ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में लग जाना चाहिए।

इन्द्रजीतसिंह - राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ाकर जब हम आ जायं तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।

तेजसिंह - उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूं!

आनन्दसिंह - जी हां, आप वहां तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देखकर) ये चंडूल की सूरत बनाकर आपके पास आई थीं, मगर हमें यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा जिसे सुन सभी की अवस्था बदल गई थी। जहां तक मैं समझता हूं, शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।

कमलिनी - जी हां, यही बात है। राजा गोपालसिंह को कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम की जड़ है।

इन्द्रजीतसिंह - (हंसकर) धनपत इस काम की जड़ है!

कमलिनी - जी हां, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपत वास्तव में औरत नहीं है बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फंसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपत का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बनकर रह सकता है। एक तो वह नाटा है। दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मूंछ की निशानी नहीं आई। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।

इन्द्रजीतसिंह - (ताज्जुब से) यह तो एक नई बात तुमने सुनाई। अच्छा तब?

लाडिली - क्या धनपत मर्द है?

कमलिनी - हां, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था और जब कोई पांचवां आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था जब मैंने चंडूल बनकर उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गए हैं और वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गई है।

आनन्दसिंह - ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा?

कमलिनी - इसका एक खास सबब है।

इन्द्रजीतसिंह - वह क्या?

कमलिनी - बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी पात्रों का खून किया है जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।

इन्द्रजीतसिंह - (हंसकर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है! मगर देखना चाहिए तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं!

कमलिनी - (हाथ जोड़कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों (लाडिली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं! इसका एक सबब भी है।

इन्द्रजीतसिंह - वह क्या?

कमलिनी - मेरे पिता की दो शादियां हुई थीं। मैं और लाडिली एक मां के पेट से हुईं और कम्बख्त मायारानी दूसरी मां के पेट से, इसलिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।

इन्द्रजीतसिंह - (हंसकर) शुक्र है, खैर यह कहो कि चंडूल बनने के बाद तुमने क्या किया?

कमलिनी - चंडूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंहजी को राजा गोपालसिंह के पास ले जाकर दोनों की मुलाकात कराई, इसके बाद वहां रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब, और फिर उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर मैं तेजसिंहजी से विदा हुई और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जो कुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हां, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंहजी ने क्या-क्या किया सो आप इन्हीं से पूछिए।

अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ाने वाले तेजसिंह थे और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गई थी तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।

 

बयान - 2

ऐयारों को जो कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।

इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आए हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहां असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था। यहां की ऐसी अवस्था देखकर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, ''राजा गोपालसिंह ने कहा था कि 'चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं खाने-पीने की तकलीफ न होगी' मगर यहां तो कुछ भी दिखाई नहीं देता! हम लोगों को यहां कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा' इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, ''आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहां मेवों के पेड़ नहीं हैं मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है, बाहर से एक नहर दीवार तोड़कर उसके अन्दर पहुंचाई गई है और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते हैं और कई नये पैदा होते रहते हैं। इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे कभी उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहां जाने का रास्ता आपको बता दूंगी!''

ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाडिली को लेकर दोनों कुमारों से यह कहकर बिदा हुई - ''कई जरूरी कामों को पूरा करने के लिए मैं जाती हूं, परसों यहां आऊंगी।''

तीन दिन तक कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती मेवों वाले बाग में चले जाते और पेट भरकर फिर उस देवमन्दिर में चले आते। इस बीच में दोनों भाइयों ने मिलकर 'रिक्तग्रंथ' (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तग्रंथ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की-सब बखूबी समझ में न आईं क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।

यद्यपि कुंअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कमलिनी और लाडिली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था फिर भी किशोरी और कामिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाए जाते थे।

दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछाने का कोई सामान न होने पर भी उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहां के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलने वाली हवा ने नर्म थपकियां लगा-लगाकर दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायगा और नर्म कलाइयों का आनन्द लेने वाला हाथ सिर तक पहुंचने का उद्योग करेगा।

यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंककर उठ बैठे और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहां से आ रही है। ज्यादा ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है, हां, इतनी बात मालूम हो गई कि देवमन्दिर के पूरब तरफ वाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों राजकुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतरकर उस मकान के पास जाना उचित मालूम न हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और गौर से उस तरफ देखने लगे।

आधे घंटे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गई। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखाई पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कुएं की तरफ लौटा जो पूरब की तरफ वाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कुएं के पास पहुंचकर थोड़ी देर तक वहां भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहां तक कि घूमता-फिरता छोटे - छोटे मकानों की आड़ में जाकर वह न जाने कहां नजरों से ओझल हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आई।

इन्द्रजीतसिंह - जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।

आनन्दसिंह - तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूं कि क्या मामला है

इन्द्रजीतसिंह - जाने में कोई हर्ज नहीं है, मगर... खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूं।

आनन्दसिंह - यदि ऐसा ही है तो चलिये हम दोनों आदमी चलें।

इन्द्रजीतसिंह - नहीं, एक आदमी का यहां रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ, कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।

दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूंटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोंबीच वाले गोल खम्भे के पास पहुंचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रखकर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल खम्भे के अन्दर घुस गये, और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखाई देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुंचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहां मुख्तसर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।

आनन्दसिंह भी उस तरफ गये, जिधर वह आदमी गया था या जिधर से किसी औरत के रोने की आवाज आई थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुंचे जिसका दरवाजा खुला हुआ था। वहां औरत तो कोई दिखाई न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।

आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किए बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियां थीं और हर एक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।

यद्यपि कुमार तेजी के साथ पीछा किए हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिरकर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूमकर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे, इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहां से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था जिसकी राह से कुमार मकान के अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आई, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है जिसे सुनकर यहां तक आए थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न लगा।

इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गए, पर कुछ भी न बन पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औरत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।

जो कुछ रात थी खड़े-खड़े बीत गई। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुंअर आनन्दसिंह को वहां की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा, जो इसके पहले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गए और वहां ऊपर की तरफ गई हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियां देखीं। धड़धड़ाते हुए दूसरी मंजिल पर चढ़ गए और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियां एक ही रंग-ढंग की देखने में आईं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे। एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहां की हर एक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहां सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हुआ था और उसके ऊपर एक कमान और पांच तीर रखे हुए थे। कुमार ने तीर और कमान पर हाथ रखा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हुआ है और किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहां एक लाश पड़ी देखी जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देख-भालकर तीसरी कोठरी में पहुंचे।

इसके चारों तरफ दीवार में कई खूंटियां थीं और हर एक खूंटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारें नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं मगर हर एक पर जंग चढ़ा हुआ था। जब चौथी कोठरी में पहुंचे तो वहां चांदी के सिंहासन पर बैठी हुई एक मूरत दिखाई पड़ी। वह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हुई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहन लाडिली की मूरत है। कुमार मुहब्बत भरी निगाहें उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपने माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यद्यपि वह माशूक असली नहीं, बल्कि केवल उसकी एक छवि मात्र थी तथापि इस सबब से कि यहां पर कोई ऐसा आदमी न था जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसके हर एक अंग की खूबसूरती को देखते रहे। इसी बीच बगल वाली कोठरी में से यकायक एक खटके की आवाज आई। कुमार चौंक पड़े और यह सोचते हुए उस कोठरी की तरफ बढ़े कि शायद वह आदमी उसमें मिले जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आए हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखाई न दी।

इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुंचे हैं, चांदी का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्फों में यह लिखा हुआ था -

''इस छेद में हाथ डाल के देखो, क्या अनूठी चीज है।''

कुंअर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हाथ निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानो लोहे की हथकड़ी पड़ गई जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झुककर सन्दूक के नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।

 

बयान - 3

कुंअर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन होता जाता था। यहां तक कि तमाम रात बीत गई, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर भर से ज्यादा दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह बहुत ही बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फंस गये।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चलके आनन्दसिंह का पता लगाना चाहिए कि इतने ही में लाडिली को साथ लिए हुए कमलिनी वहां आ पहुंची। इन्हें देख कुमार की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखाई देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुद्धिमान औरत तुरत ही समझ गई कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखाई देते, जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गए हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात नहीं है क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है, और यहां का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।

कमलिनी ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुंअर आनन्दसिंह के न दिखने का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि ''आनन्द को गए हुए नौ घंटे के लगभग हो गये।''

इस समय कोई लाडिली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद से ज्यादा रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कमलिनी और इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आंखों को डबडबाने और आंसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चत था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दुःख गया था। कौन ऐसा है जो अपने प्यारे पर आई हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो

कमलिनी - (सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हां, किसी औरत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आई थी।

लाडिली - ठीक है, जहां तक मैं समझती हूं सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे किसी चौथी औरत को यहां आने का रास्ता मालूम नहीं है, हां, मर्दों में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहां आ सकते हैं।

कमलिनी - मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन सब बातों को जाने दो, अब यहां से चलकर कुंअर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहां किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग ही सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे, तो उस हरामजादे के आ पहुंचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था! इसी तरह कौन ठिकाना यहां भी कोई दुष्ट आ पहुंचा हो!

आखिर कुंअर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहां से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुंचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी। इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुंचकर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुंअर इन्द्रजीतसिंह और लाडिली को साथ लिए हुए, कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गई। हर एक मकान का दरवाजा बन्द था, और हर एक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा, लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुंची, जिसमें कुंअर आनन्दसिंह गये थे तो रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजे को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, ''बेशक कुंअर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उंगली से दरवाजे के ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) देखिये, यह स्याह पत्थर की तीन खूंटियां नीचे की तरफ झुक गई हैं।''

कुमार - इन खूंटियों से क्या मतलब है

कमलिनी - इस मकान के अन्दर जितने आदमी जायेंगे, उतनी खूंटियां नीचे की तरफ झुक जायंगी।

कुमार - (ऊपर वाले चौखटे की तरफ इशारा करके) ऊपर कुल बारह खूंटियां हैं, मान लिया जाय कि बारहों खूंटियां उस समय झुक जायंगी, जब बारह आदमी इस मकान के अन्दर जा पहुंचेंगे, मगर जब बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जायंगे, तब क्या होगा

कमलिनी - बारह से ज्यादा आदमी इस मकान के अन्दर जा ही नहीं सकते! तिलिस्मी बातों में किसी की जबर्दस्ती नहीं चल सकती।

कुमार - ठीक है, मगर तुमने यह कैसे जाना कि आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर है

कमलिनी - सिर्फ अन्दाज से समझती हूं कि आनन्दसिंह इसी मकान में होंगे, क्योंकि इस बाग में एक आदमी का आना आपने बयान किया था, इसके बाद कहा था कि किसी औरत के रोने की आवाज आई थी, दो तो हो चुके, तीसरे आनन्दसिंह भी पीछा किये हुए इधर ही आये हैं और इस तरह इस मकान के अन्दर तीन आदमियों का होना साबित होता है। इन्हीं सब बातों से मुझे विश्वास होता है कि वे ही तीन आदमी इस मकान के अन्दर हैं।

कुमार - तुम्हारा सोचना बहुत ठीक है, मगर जहां तक जल्द हो सके, इस बात का निश्चय करके आनन्द को छुड़ाना चाहिए, न मालूम वह किस आफत में फंस गया है।

कमलिनी - देखिये, मैं बहुत जल्द इसका बन्दोबस्त करती हूं।

इसके बाद कमलिनी ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, ''इस मकान का दरवाजा खोलना तो जरा मुश्किल है, मगर चौखट के ऊपर जो बारह खूंटियां हैं उनमें से तीन नीचे की तरफ झुक गई हैं, और बाकी नौ ऊपर की तरफ उठी हुई हैं, उनमें से किसी एक को आप उछलकर थाम लीजिए और जोर करके नीचे की तरफ झुकाइए, देखिये, क्या होता है।'' कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर एक खूंटी को थाम लिया और झटका देकर उसे नीचे की तरफ झुकाया तथा जब वह नीचे को झुक गई तो उसे छोड़कर अलग हो गये। यकायक मकान के अन्दर से इस तरह की आवाज आने लगी, जैसे बड़े-बड़े कलपुर्जे और चरखे घूमते हों, या कई गाड़ियां मकान के अन्दर दौड़ रही हों। तीनों आदमी दरवाजे से हटकर खड़े हो गये और राह देखने लगे कि अब क्या होता है।

थोड़ी ही देर बाद मकान की छत पर से एक आवाज आई - ''इधर देखो'' जिसे सुनते ही तीनों आदमी चौंके और ऊपर की तरफ देखने लगे। एक आदमी, जो अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए था, छत से नीचे की तरफ झांकता हुआ दिखाई दिया। उसने कमलिनी, लाडिली और कुंअर इन्द्रजीतसिंह को अपनी तरफ देखते देख एक लपेटा हुआ कागज नीचे गिरा दिया, जिसे झट कमलिनी ने उठा लिया और बढ़कर कुंअर इन्द्रजीतसिंह से कहा, ''बस अब जिस तरह हो सके आप इस खूंटी को, जिसे झुकाया है, ज्यों-की-त्यों सीधी कर दीजिए।''

इन्द्रजीतसिंह - आखिर इसका क्या सबब है इस पुर्जे में क्या लिखा हुआ है

कमलिनी - पहले आप उसे कीजिए, जो मैं कह चुकी हूं। देर करने में हमारा ही हर्ज होगा।

लाचार कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने वैसा ही किया। उछलकर नीचे की तरफ से एक झटका ऐसा दिया कि वह खूंटी सीधी हो गई और इसके साथ ही मकान के अन्दर सन्नाटा छा गया, अर्थात् वह जोर-शोर की आवाज, जो खूंटी झुकने के साथ ही आने लगी थी, एकदम बन्द हो गई। इसके बाद कमलिनी ने वह कागज का पुर्जा जो मकान की छत पर से गिराया गया था, कुमार के हाथ में दे दिया। कुमार ने उसे देखा, यह लिखा हुआ था -

1 2 3 4 5 6

एच मेमचे काटनो केआरेयां डेड नेपो

7 8 9 10 11 12

किमटू च्वाला मेम कुम नीपो इच्चो

13 लव

14 कचीचा

15 टेप

इस चीठी का मतलब तो कुमार तुरत समझ गए, क्योंकि यह ऐयारी भाषा में लिखी हुई थी और कुमार ऐयारी भाषा बखूबी जानते थे, मगर यह उनकी समझ में न आया कि चीठी लिखने वाला कौन है, क्योंकि उसने अपना नाम टेप लिखा था। कुमार ने कमलिनी से 'टेप' का अर्थ पूछा, जिसके जवाब में उसने कहा, ''थोड़ी देर सब्र कीजिए, आप-से-आप उस आदमी का पता लग जायगा।'' कुमार चुप हो रहे और दरवाजे की तरफ देखने लगे। हमारे पाठक महाशय ऐयारी भाषा शायद न जानते होंगे, अस्तु उन्हें समझाने के लिए उस चीठी का अर्थ हम नीचे लिखे देते हैं -

1 2 3 4 5 6

यहां मैं हूं डरो मत कुमार को तकलीफ न होगी

7 8 9 10 11 12

थोड़ी देर सब्र करो मैं स्वयं नीचे आता हूं

13 वही

14 दिलजला

15 टेप

बयान - 4

मायारानी आज यह विचार कर बहुत खुश है कि आधी रात के समय कमलिनी इस बाग में आयेगी और मैं उसे अवश्य गिरफ्तार करूंगी, मगर इस बात को जानने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा है कि उसके सोने वाले कमरे में रात को कौन आया था वह चारों तरफ खयाल दौड़ाती थी, मगर कुछ समझ में न आता था और आखिर दिल में यही कहती थी कि आने वाला चाहे कोई हो, मगर काम कमलिनी ही का है। आज अगर कमलिनी गिरफ्तार हो जायगी तो सब टण्टा मिट जायगा। जितनी बेफिक्री राजा गोपालसिंह के मरने से मिली है, उतनी ही कमलिनी के भी मारने से मिलेगी, क्योंकि उसके मरने के बाद मेरे साथ दुश्मनी करने का साहस फिर कोई भी नहीं कर सकता।

आधी रात जाने के पहले ही मायारानी धनपत को साथ लिए हुए उस दरवाजे के पास आ पहुंची जिधर से कमलिनी के आने की खबर सुनी थी। मायारानी के कहे मुताबिक पहरा देने वाली कई औरतें भी नंगी तलवारें लिए उस चोर दरवाजे के पास पहुंचकर इधर-उधर पेड़ों और झाड़ियों की आड़ में दुबक रही थीं और धनपत भी उस चोरदरवाजे के बगल ही में एक झाड़ी के अन्दर घुस गई थी। मायारानी अपने को हर बला से बचाये रहने की नीयत से कुछ दूर पर छिपकर बैठ रही।

अब वह समय आ गया कि चोर-दरवाजे की राह से कमलिनी बाग के अन्दर आवे, इसलिए धनपत अपने छिपे रहने वाले स्थान से उठकर चोर-दरवाजे के पास आई और यह विचारकर बैठ गई कि बाहर से कोई आदमी दरवाजा खोलने का इशारा करे तो मैं झट से दरवाजा खोल दूं। इस समय धनपत अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए थी और हाथ में खंजर लिए मौका पड़ने पर लड़ने के लिए भी तैयार थी। थोड़ी देर के बाद बाहर से किसी ने चोरदरवाजे पर थपकी मारी। धनपत खुश होकर उठी और झट से दरवाजा खोलकर एक किनारे हो गई। दो आदमी बाग के अन्दर दाखिल हुए। इन दोनों ही का बदन स्याह कपड़ों से ढंका हुआ था और दोनों ही के चेहरों पर नकाब पड़ी हुई थी जिससे रात के समय यह जानना बहुत ही कठिन था कि ये औरतें हैं या मर्द, हां एक का कद कुछ लम्बा था इसलिए उस पर मर्द होने का गुमान हो सकता था।

जब दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर आ गए तो धनपत ने चोर-दरवाजा बन्द कर दिया और उन दोनों को अपने पीछे-पीछे आने का इशारा किया। मालूम होता था कि वे दोनों नकाबपोश बेफिक्र हैं और उन्हें इस बात की जरा भी खबर नहीं कि यहां का रंग बदला हुआ है। उन दोनों को साथ लिए धनपत जब उस जगह पहुंची जहां पहरा देने वाली लौंडियां नंगी तलवारें लिए हुए छिपी हुई थीं, तो खड़ी हो गई और उन दोनों की तरफ देखकर बोली, ''आपकी आज्ञानुसार मैंने अपना काम पूरा कर दिया अब मुझे इनाम मिलना चाहिए!'' इसके जवाब में उस नकाबपोश ने, जिसका कद बनिस्बत दूसरे के छोटा था, जवाब दिया, ''धनपत को जो मर्द होकर औरत की सूरत में मायारानी के साथ रहता है, किसी से इनाम लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं मालदार है, मगर मैं समझता हूं कि कम्बख्त मायारानी भी लोगों को गिरफ्तार करने की नीयत से इसी जगह आकर कहीं छिपी होगी, उसे जल्द बुला, क्योंकि खास उसी को इनाम देने के लिए हम लोग यहां आये हैं।''

धनपत वास्तव में मर्द था, मगर यह हाल किसी को मालूम न था, इसलिए हम भी उसे अभी तक औरत ही लिखते चले आए मगर अब पूरी तरह से निश्चय हो गया कि वह मर्द है और हमारे पाठकों को भी यह बात मालूम हो गई इसलिए अब हम उसके लिए उन्हीं शब्दों का बर्ताव करेंगे, जो मर्दों के लिए उचित हैं।

उस आदमी की बात सुनकर धनपत परेशान हो गया, उसे यह फिक्र पैदा हुई कि अब हमारा भेद खुल गया और इसलिए जान बचाना मुश्किल है। केवल धनपत ही नहीं बल्कि मायारानी और उन लौंडियों ने भी उस आदमी की बातें सुन लीं जो उसी के आसपास पेड़ों के नीचे छिपी हुई थीं। मायारानी के दिल में भी तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। उसने पहचानने की नीयत से उस नकाबपोश की आवाज पर ध्यान दिया, मगर कुछ काम न चला क्योंकि उसकी आवाज फंसी हुई थी और इस समय हर एक आदमी जो उसकी बात सुनता कह सकता था कि वह अपनी आवाज को बिगाड़कर बातें कर रहा है।

धनपत यद्यपि इस फिक्र में था कि दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करना चाहिए मगर इस नकाबपोश की गहरी और भेद से भरी हुई बात ने उसका कलेजा यहां तक दहला दिया कि उसके लिए बात का जवाब देना भी कठिन हो गया, मगर वे लौंडियां जो उस जगह छिपी हुई थीं चारों तरफ से आकर जरूर वहां जुट गईं और उन्होंने दोनों नकाबपोशों को घेर लिया। धनपत सोच रहा था कि मायारानी भी इसी जगह आ पहुंचेगी लेकिन यह आशा उसकी वृथा ही हुई, क्योंकि उस नकाबपोश की आवाज का सबसे ज्यादा असर मायारानी पर ही हुआ। वह घबड़ाकर वहां से भागी और अपने दीवानखाने में जाकर बैठ रही, जहां कई लौंडियां पहरा दे रही थीं। आते ही उसने एक लौंडी की जुबानी अपने सिपाहियों को जो बाग के पहले दर्जे में रहा करते थे, कहला भेजा कि ''खास बाग में फलां जगह पर दो दुश्मन घुस आये हैं, उन्हें जाकर फौरन गिरफ्तार करो और उनका सिर काटकर मेरे पास भेजो।'' इधर धनपत ने देखा कि बहुत-सी लौंडियां हमारी मदद पर आ पहुंची हैं तो उसे भी कुछ हिम्मत हुई और वह उस नकाबपोश की तरफ देखकर बोला -

धनपत - तुम लोग यहां किस काम के लिए आये हो

नकाब - इसका जवाब हम तुझ कम्बख्त को क्यों दें

धनपत - मालूम होता है कि मौत तुम दोनों को यहां तक खींच लाई है।

नकाब - (हंसकर) हां, मैं भी यही समझता हूं कि तेरी मौत हम दोनों को यहां तक खींच लाई है।

इतना सुनते ही धनपत ने नकाबपोश पर खंजर का वार किया। मगर उसने फुर्ती से पैंतरा बदलकर वार खाली कर दिया, मगर दूसरे नकाबपोश ने चालाकी से धनपत के पीछे जाकर एक लात उसकी कमर में ऐसे जोर से मारी कि वह औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा। मगर तुरन्त ही सम्हलकर उठ बैठा और दोनों नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए लौंडियों को ललकारा। लौंडियां दोनों नकाबपोशों की अवस्था देख परेशान हो रही थीं। एक तो उन्हें विश्वास हो गया कि ये दोनों नकाबपोश मर्द हैं, दूसरे धनपत की ताकत पर उन सभी को बहुत-कुछ भरोसा था सो उसकी भी दुर्दशा आंखों के सामने देखने में आई। तीसरे, नकाबपोश की जुबानी यह सुनकर कि धनपत मर्द है और उसके जवाब में धनपत को चुप पाकर लौंडियों का खयाल बिल्कुल ही बदल गया था, तिस पर भी, वे सब दोनों नकाबपोशों को घेरकर खड़ी हो गईं। धनपत ने फिर ललकारकर कहा, ''देखो, ये दोनों चोर हैं, भागने न पावें।''

लम्बे नकाबपोश ने लपककर बहादुरी के साथ धनपत की दाहिनी कलाई जिसमें खंजर था, पकड़ ली और कहा, ''हम लोग भागने के लिए नहीं आये हैं, बल्कि गिरफ्तार होकर एक अनूठा तमाशा दिखाने के लिए आये हैं। मगर तुमको भाग जाने का मौका न देंगे। (लौंडियों की तरफ देखकर) हम लोग स्वयं यहां से टलने वाले नहीं हैं और जहां कहो चलने के लिए तैयार हैं।''

धनपत को मालूम हो गया कि ये दोनों नकाबपोश कोई साधारण आदमी नहीं हैं और इनके सामने ताकत का घमंड करना वृथा है। वह सोचने लगा - ''अफसोस, अब भारी मुसीबत का सामना हुआ चाहता है।''

इतने ही में 'चोर-चोर' का गुल मचा और कई मशालों की रोशनी दिखाई दी। यह रोशनी उन सिपाहियों के साथ थी जो बाग के पहले दर्जे में रहने वाले सिपाहियों में से थे और इस समय वे सब मायारानी की आज्ञानुसार दोनों चोरों को अर्थात् इन नकाबपोशों को गिरफ्तार करने के लिए यहां आये थे। बात की बात में वे सब वहां पहुंच गये और उन्होंने देखा कि लौंडियों के घेरे में दो नकाबपोश छाती ऊंची किये खड़े हैं और उनमें से एक धनपत की कलाई पकड़े हुए है।

इसके पहले कि सिपाहियों को दोनों नकाबपोशों के साथ किसी तरह के बर्ताव की नौबत आवे, छोटे नकाबपोश ने ऊंची आवाज में ललकारकर कहा, ''भाइयो, तुम लोग यह न समझो कि हम लोग भाग जायेंगे, मैं भागने के लिए नहीं आया हूं, मैं तुम लोगों का दुश्मन नहीं हूं और न तुम लोगों के दुश्मनों का साथी हूं, बल्कि तुम्हारा सच्चा दोस्त और खैरखाह हूं। जिस समय सूर्य भगवान के दर्शन होंगे और मैं अपने चेहरे पर से नकाब उठाऊंगा, तुम लोगों को मालूम हो जायगा कि मैं तुम्हारा पुराना साथी हूं। इस समय मैं तुम लोगों की वह बेवकूफी जाहिर करने आया हूं, जिसे तुम लोग खुद नहीं जानते हो। हाय, तुम्हारे प्यारे मालिक राजा गोपालसिंह के गले पर छुरी फिर जाय और तुम लोगों को खबर तक न हो इससे भी बढ़कर अफसोस की बात तो यह है कि राजा गोपालसिंह को मारने वाला, उनकी उम्मीदों का खून करने वाला, उनकी रिआया के दिल पर सदमा पहुंचाने वाला, उनकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला, उनके धर्म और अर्थ का सत्यानाश करने वाला दिन-रात तुम्हारे पास रहे, तुम पर हुकूमत करे, तुम्हें बेवकूफ बनावे, और तुम उसका कुछ भी न कर सको! यह मत समझो कि राजा गोपालसिंह को मरे हुए कई वर्ष हो गये, मैं साबित कर दूंगा कि उनके खून से गीली हुई जमीन भी अभी तक सूखी नहीं है और अगर तुम मुझसे पूछने और यह जानने की इच्छा करोगे कि तुम्हारे राजा गोपालसिंह को किसने मारा या उनका कातिल कौन है तो मैं जरूर उसका भी पता दूंगा और वास्तव में मैं इसी काम के लिए यहां आया भी हूं।''

छोटे नकाबपोश की इस बात ने सिपाहियों और पहरा देने वाली लौंडियों का दिल हिला दिया। राजा गोपालसिंह की याद ने और इस खबर ने कि - ''उन्हें मरे बहुत दिन नहीं हुए और उनका कातिल इसी जगह रहकर उन पर हुकूमत करता है'' उनके दिलों को बेचैन कर दिया। सभी की आंखों से आंसू की बूंदें जारी हो गईं और हर तरफ से आवाज आने लगी - ''कहो-कहो, जल्द कहो, नेकदिल गरीबपरवर और हमारे हितैषी राजा को मारने वाला दुष्ट कौन है और कहां है' इसके जवाब में छोटे नकाबपोश ने पुनः कहा, ''यही कम्बख्त, जिसे इस समय मेरे साथी ने पकड़ रखा है, तुम्हारे राजा का कातिल तथा उसकी इज्जत और हुर्मत को बिगाड़ने वाला है। इस बात से मत डरो कि इसकी इज्जत मायारानी के दरबार में बहुत है, बल्कि आजमाओ और देखो कि यह मर्द है या औरत! मैं सच कहता हूं कि यह कई वर्ष से तुम लोगों की आंखों में धूल डालकर अर्थात् औरत बनकर तुम्हारे घर में रहता है और इस राज्य को चौपट कर रहा है, मगर तुम लोगों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। इतना ही नहीं, मैं तुम लोगों से एक बात और कहूंगा, मगर अभी नहीं, जरा ठहरो, घंटे भर और गम खाओ, सवेरा होने दो और हम दोनों को इसी जगह रहने देकर और कहीं ले जाने का उद्योग मत करो!''

छोटे नकाबपोश की इस दूसरी बात ने रंग और भी चोखा कर दिया। चारों तरफ सिपाहियों और लौंडियों में गुरचूं-गुरचूं और काना-फूसी होने लगी। किसी की आंखों से आंसू जारी था, किसी भी गर्दन शर्म से नीची हो रही थी, किसी ने अफसोस से अपना हाथ अपने कलेजे पर रख लिया, कोई ठुड्डी पकड़कर सोच रहा था, और कोई दांत पीस-पीसकर धनपत की तरफ देख रहा था। यद्यपि रात का समय था मगर उन मशालों की रोशनी बखूबी हो रही थी, जो मायारानी के सिपाहियों के हाथ में थे और इस सबब से वहां की हर एक चीज साफ दिखाई दे रही थी। सिपाहियों ने धनपत का चेहरा गौर से देखा और उसमें बहुत फर्क पाया। खौफ और तरद्दुद ने धनपत को अधमरा कर दिया था और उसका रंग जर्द हो रहा था। दोनों नकाबपोशों ने जब देखा कि इस समय सिपाहियों के दिलों में जोश बखूबी पैदा हो गया है और वे लोग अब सब्र करना पसन्द नहीं करेंगे तो आपस में कुछ इशारा करने के बाद छोटे नकाबपोश ने धनपत की साड़ी का ऊपरी भाग फुर्ती से खींच लिया और उसकी चोली भी फाड़ डाली, इसके साथ ही दो बनावटी गेंद बाहर गिर पड़े और उसकी सूरत से मर्दानापन झलकने लगा। अब तो मायारानी के सिपाहियों को पूरे दर्जे पर क्रोध चढ़ आया और उन्हें निश्चय हो गया कि उनके मालिक राजा गोपालसिंह इसी कम्बख्त के सबब से मारे गए हैं। पहरा देने वाली जितनी औरतें थीं, सब ताज्जुब में आकर एक-दूसरे की सूरत देखने लगीं और उधर सिपाहियों ने पास पहुंचकर धनपत को घेर लिया तथा उसकी दुर्गत करने लगे। ऐसी अवस्था में दोनों नकाबपोश धनपत को छोड़कर अलग जा खड़े हुए। सिपाहियों ने बारी-बारी से धनपत से प्रश्न करना शुरू किया, मगर उसकी अवस्था इस लायक न थी कि किसी के प्रश्न का उत्तर देता। बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद यह राय पक्की हुई कि धनपत को राजदीवान के पास ले चलना चाहिए और इसी के साथ-साथ इन दोनों नकाबपोशों को भी उन्हीं के सामने पेश करना उचित होगा।

सिपाही लोग जिस समय धनपत के विषय में सोच-विचार कर रहे और क्रोध में भरे हुए थे दोनों नकाबपोशों से जो धनपत को छोड़ अलग हो गये थे, थोड़ी देर के लिए बिल्कुल बेफिक्र और लापरवाह हो गए थे, मगर इस समय जब यह राय पक्की हुई कि धनपत के साथ ही साथ उन दोनों को भी दीवान साहब के पास ले चलना चाहिए तो उन दोनों की खोज करने लगे, मगर वे, दोनों नकाबपोश मौका पाकर ऐसा गायब हुए कि उनकी झलक तक दिखाई न दी। एक बोला, ''अभी इसी जगह तो थे!'' दूसरे ने कहा, ''यह तो हम भी जानते हैं। मगर यह बताओ कि वे चले कहां गए' तीसरे ने कहा, ''भाई वे दोनों भागने वाले तो हैं नहीं, इसी जगह कहीं छिपकर हम लोगों का तमाशा देखते होंगे!'' इत्यादि तरह-तरह की बातें सब लोग आपस में करने और दोनों नकाबपोशों को चारों तरफ ढूंढने लगे, लेकिन दोनों वहां थे कहां, जो पता लगता! आखिर खोजते-ढूंढते सुबह हो गई और इतनी ही देर में इस आश्चर्यजनक घटना की खबर जादू की तरह हवा के साथ मिलकर दूर-दूर तक फैल गई। इस समय मायारानी के सिपाही बिल्कुल ही स्वतन्त्र और खुदराय बल्कि बागियों की तरह हो रहे थे। बहुत खोजने और ढूंढने पर भी उन्हें जब दोनों नकाबपोशों का पता न लगा तब लाचार होकर कम्बख्त धनपत को घसीटते हुए, वे बाग के बाहर की तरफ रवाना हुए।

जब इन बातों की खबर मायारानी को पहुंची तो वह बहुत ही घबड़ाई। अपनी तथा धनपत की जान से नाउम्मीद होकर सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए इस समय उसकी सूरत से उसके दिल का बहुत-कुछ पता लगता था। उसका चेहरा जर्द और पलकें नीचे की तरफ झुकी हुई थीं। कभी-कभी उसके बदन में कंप हो जाता और कभी आंखें चंचल होकर सुर्ख हो जातीं। मगर थोड़ी ही देर बाद उसके होंठ कांपने लगे और आंखों की सुर्खी बढ़ जाने के साथ ही उसका चेहरा भी लाल हो गया जिसे देखते ही वे लौंडियां जो उसके सामने मौजूद थीं, समझ गईं कि अब उसे हद दर्जे का क्रोध चढ़ आया है, कुछ क्षण सोच-विचार कर मायारानी बोल उठी, ''इस समय उन कम्बख्तों को समझाने-बुझाने का उद्योग करना वृथा समय नष्ट करना है, दूसरे, मैं तिलिस्म की रानी ही क्या ठहरी, जो इन थोड़े-से कम्बख्तों को काबू में न कर सकी या इन थोड़े सिपाहियों को आज्ञा भंग करने की सजा न दे सकी!'' इतना कहते ही मायारानी अपने स्थान से उठी और दीवानखाने में से होती हुई उस कोठरी में जा पहुंची, जहां से बाग के तीसरे दर्जे में जाने का वह रास्ता था जिसका जिक्र हम उस समय कर आये हैं जब पागल बने हुए तेजसिंह मायारानी की आज्ञानुसार हरनामसिंह द्वारा बाग के तीसरे दर्जे में पहुंचाए गये थे।

मायारानी कोठरी के अन्दर गई। वहां एक दूसरी कोठरी में जाने के लिए दरवाजा था, उस दरवाजे को खोलकर दूसरी कोठरी में गई। वहां एक छोटा-सा कुआं था, जिसमें उतरने के लिए जंजीर लगी हुई थी। वह इस कुएं के अन्दर उतर गई और एक लम्बे-चौड़े स्थान में पहुंची, जहां बिल्कुल ही अंधकार था। मायारानी टटोलती हुई एक कोने की तरफ चली गई और वहां उसने कोई पेंच घुमाया, जिसके साथ ही उस स्थान में बखूबी रोशनी हो गई और वहां की हर एक चीज साफ-साफ दिखाई देने लगी। यह रोशनी शीशे के एक गोले में से निकल रही थी, जो छत के साथ लटक रहा था। यह स्थान, जिसे एक लम्बा-चौड़ा दालान या चारों तरफ दीवार होने के कारण कमरा कहना चाहिए, अद्भुत चीजों और तरह-तरह के कल-पुर्जों से भरा हुआ था। बीच में कतार बांधकर चौबीस खम्भे संगमरमर के खड़े थे और हर दो खम्भों के ऊपर एक-एक महराबदार पत्थर चढ़ा हुआ था, जिसे मामूली तौर पर आप बिना दरवाजे का फाटक कह सकते हैं। इन महराबी पत्थरों के बीचोंबीच बड़े-बड़े घण्टे लटक रहे थे और हर एक घण्टे के नीचे एक गरारीदार पहिया था।

मायारानी ने हर एक महाराब को, जिस पर मोटे-मोटे अक्षर लिखे हुए थे, गौर से देखना शुरू किया और एक महाराब के नीचे पहुंचकर खड़ी हो गई जिस पर यह लिखा हुआ था - ''दूसरे दर्जे का तिलिस्मी दरवाजा।'' मायारानी ने उस पहिये को घुमाना शुरू किया जो उस महराब में लटकते हुए घण्टे के नीचे था। पहिया चार-पांच दफे घूमकर रुक गया, तब मायारानी वहां से हटी और यह कहती हुई घूमकर सामने वाली दीवार के पास गई कि 'देखें अब वे कम्बख्त क्योंकर बाग के बाहर जाते हैं!' दीवार में नम्बरवार बिना पल्ले की पांच आलमारियां थीं और हर एक आलमारी में चार दर्जे बने हुए थे। पहिली आलमारी में शीशे की सुराहियां थीं, दूसरी में तांबे के बहुत से डिब्बे थे, तीसरी कागज के मुट्ठों से भरी थी, जिन्हें दीमकों ने बर्बाद कर डाला था, चौथी में अष्ट धातु की छोटी-छोटी बहुत-सी मूरतें थीं और पांचवीं आलमारी में केवल चार ताम्रपत्र थे जिनमें खूबसूरत उभरे हुए अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था।

मायारानी उस आलमारी के पास गई जिसमें शीशे की सुराहियां थीं और एक सुराही उठा ली। शायद उसमें किसी तरह का अर्क था, जिसे थोड़ा-सा पीने के बाद सुराही हाथ में लिए हुए, वहां से हटी और दूसरी आलमारी के पास गई, जिसमें तांबे के डिब्बे थे। एक डिब्बा उठा लिया और वहां से रवाना हुई। जिस तरह उसका आना हम लिख आये हैं, उसी तरह घूमती हुई वह अपने दीवानखाने में पहुंची। जिसके आगे तरह-तरह के खुशनुमा पत्तों वाले खूबसूरत गमले सजाये हुए थे। वहां पहुंचकर उसने वह डिब्बा खोला। उसके अन्दर एक प्रकार की बुकनी भरी हुई थी। उसमें से आधी बुकनी अपने हाथ से खूबसूरत गमलों में छिड़कने के बाद बची हुई आधी बुकनी डिब्बे में लिए हुए वह दीवानखाने की छत पर चढ़ गई और अपने साथ केवल एक लौंडी को जिसका नाम लीला था और जो उसकी सब लौंडियों की सरदार थी, लेती गई। यह सब काम, जो हम ऊपर लिख आये हैं, मायारानी ने बड़ी फुर्ती से उसके पहले-पहले ही कर लिया जब तक कि उसके बागी सिपाही धनपत को लिए हुए बाग के दूसरे दर्जे के बाहर जायं।

जब मायारानी लीला को साथ लिये हुए दीवानखाने की छत पर चढ़ गई तब उसने एक सुराही दिखाकर लीला से कहा, ''चुल्लू कर, इसमें से थोड़ा सा अर्क तुझे देती हूं उसे पी जा और आफत से बची रह, जो थोड़ी ही देर में यहां के रहने वालों पर आने वाली है।''

लीला - (हाथ फैलाकर) मैं खूब जानती हूं, कि आपकी मेहरबानी जितनी मुझ पर रहती है उतनी और किसी पर नहीं।

मायारानी - (लीला की अंजुली में अर्क डालकर) इसे जल्दी पी जा और जो कुछ मैं कहती हूं उसे गौर से सुन।

लीला - बेशक मैं पूरा ध्यान देकर सुनूंगी, क्योंकि इस समय आपकी अवस्था बिल्कुल ही बदल रही है और यह जानने के लिए मेरा जी बहुत बेचैन है कि अब क्या किया जायगा!

मायारानी - मैं अपने भेद तुझसे छिपा नहीं रखती। जो कुछ मैं कर चुकी हूं तुझे सब मालूम है। केवल दो भेद मैंने तुझसे छिपाए, जिनमें से एक तो आज खुल ही गया और एक का हाल मैं तुझसे फिर किसी समय कहूंगी। इन भेदों के विषय में मेरा विश्वास था कि यदि किसी को मालूम हो जायगा तो मेरी जान आफत में फंस जायगी और आखिर वैसा ही हुआ। तू देख ही चुकी है कि दो कम्बख्त नकाबपोशों ने यहां पहुंचकर क्या गजब मचा रखा है। अब जहां तक मैं समझती हूं, धनपत का भेद छिपा रहना बहुत मुश्किल है और साथ ही इसके कम्बख्त फौजी सिपाहियों का भी मिजाज बिगड़ गया है। मान लिया जाय कि अगर मैंने किसी तरह की बुराई की भी तो उनको मेरे खिलाफ होना मुनासिब न था। खैर, सिपाही लोग तो उजड्ड हुआ ही करते हैं, मगर मुझसे बुराई करने का नतीजा कदापि अच्छा न होगा। अफसोस, उन लोगों ने इस बात पर ध्यान न दिया कि आखिर मायारानी तिलिस्म की रानी है! देख, मैंने इस बाग के बाहर जाने का रास्ता बन्द कर दिया, अब उन लोगों की मजाल नहीं कि यहां से बाहर जा सकें, बल्कि थोड़ी ही देर में तू देखेगी कि उन लोगों को मैं कैसे हलाल करती हूं। यह दवा जो मैंने गमलों में छिड़की है, बहुत ही तेज और अपनी महक दूर-दूर तक फैलाने वाली है, इससे बढ़कर बेहोशी की कोई दवा दुनिया में न होगी, और यही उन बदमाशों के साथ जहर का काम करेगी। तू उन सभी के पास जा और उन्हें ऊंच-नीच समझाकर मेरे पास ले आ - या - नहीं, अच्छा देख - खैर जाने दे - मैं तुझसे एक बात और कहती हूं - यह तो मैं समझ ही चुकी कि अब मेरी जान जाना चाहती है मगर तो भी हजारों को मारे बिना मैं न छोड़ूंगी। अफसोस, वे दोनों कम्बख्त नकाबपोश न मालूम कहां चले गए। खैर, देखा जायगा - ओफ, (अपनी ठुड्डी पकड़ के) मुझे शक है - एक तो उनमें से जरूर - हां जरूर-जरूर - बेशक वही है और होगा, दूसरा भी - मैं समझ गई, मगर ओफ, उस चीज का जाना ही बुरा हुआ। अच्छा अब मैं दूसरे काम की फिक्र करती हूं, अब तो जान पर खेलना ही पड़ा, एक दफे तो मुझे तुझे छोड़ - हां, तू मेरा मतलब तो समझ गई न इस समय मेरी तबीयत - अच्छा, तू जा, देख मान जायं तो ठीक है, नहीं तो आज इस बाग को मैं उन्हीं के खून से तर करूंगी!

इस समय मायारानी की बातें यद्यपि बिल्कुल बेढंगी और बेतुकी थीं तथापि चालाक और धूर्त लीला उसका मतलब समझ गई और यह कहती हुई वहां से रवाना हुई, ''आप चिन्ता न कीजिए, मैं अभी जाकर उन सभी को ठीक करती हूं। जरा आप अपना मिजाज ठिकाने कीजिए और तिलिस्मी कवच को भी झटपट...।''

 

बयान - 5

मायारानी के सिपाही जो दोनों नाबपोशों को गिरफ्तार करने आए थे, धनपत को लिए हुए बाग के पहले दर्जे की तरफ रवाना हुए जहां वे रहा करते थे, मगर वे इच्छानुसार अपने ठिकाने न पहुंच सके, क्योंकि बाग के दूसरे दर्जे के बाहर निकलने का रास्ता मायारानी की कारीगरी से बन्द हो गया था। ये दरवाजे तिलिस्मी और बहुत ही मजबूत थे और इनको खोलना या तोड़ना कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव था। पाठकों को याद होगा कि बाग के दूसरे दर्जे और पहले दर्जे के बीच में एक बहुत लम्बी-चौड़ी दीवार थी जिस पर कमन्द लगाकर चढ़ना भी असम्भव था और सीढ़ियों के जरिए उस दीवार पर चढ़ और उसे लांघकर ही एक दर्जे से दूसरे दर्जे में जाना होता था। इस समय जो दरवाजा मायारानी ने तिलिस्मी रीति से बन्द किया है इसी के बाद वह दीवार पड़ती थी जिसे लांघकर सिपाही लोग पहले दर्जे में जाते थे। उस दीवार पर चढ़ने के लिए जो सीढ़ियां थीं वे लोहे की थीं और इस समय दोनों तरफ की सीढ़ियां दीवार के अन्दर घुस गई थीं इसलिए दीवार पर चढ़ना एकदम असम्भव हो गया था।

दरवाजे को तिलिस्मी रीति से बन्द देखकर सिपाही लोग समझ गए कि यह मायारानी की कार्रवाई है। इसलिए उन लोगों के दिल में डर पैदा हुआ और वे सोचने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि मायारानी हम लोगों को इसी बाग में फंसाकर मार लाड़े, क्योंकि आखिर वह तिलिस्म की रानी है, मगर यह विचार उन लोगों के दिल में ज्यादा देर तक न रहा क्योंकि राजा गोपालसिंह के साथ दगा किये जाने का जो हाल नकाबपोशों की जुबानी सुना था उस पर उन लोगों को पूरा-पूरा विश्वास हो गया था और इसी सबब से गुस्से के मारे उन सब की अवस्था ही बदली हुई थी।

आखिर धनपत को साथ लिए हुए वे सिपाही यह सोचकर पीछे की तरफ लौटे कि उस चोरदरवाजे की राह से बाहर निकल जायंगे जिस राह से दोनों नकाबपोश बाग के अन्दर घुसे थे, मगर उस ठिकाने पर पहुंचकर भी वे लोग बहुत ही घबराये और ताज्जुब करने लगे क्योंकि उन्हें वह खिड़की कहीं नजर न आई। हां एक निशान दीवार में जरूर पाया जाता था, जिससे यह कहा जा सकता था कि शायद इसी जगह वह खिड़की रही होगी। यह निशान भी मामूली न था बल्कि ऐसा मालूम होता था कि दीवार वाले चोरदरवाजे पर फौलादी चादर जड़ दी गई है। अब उन सिपाहियों को पहले से भी ज्यादा तरद्दुद हुआ क्योंकि सिवाय उन दोनों रास्तों के बाहर निकलने का कोई और जरिया न था। एक बार उन सिपाहियों के दिल में यह भी आया कि मायारानी की तरफ चलना चाहिए, मगर खौफ से ऐसा करने की हिम्मत न पड़ी।

उस समय दिन घण्टे भर से कुछ ज्यादा चढ़ चुका था। सिपाही लोग क्रोध की अवस्था में भी तरद्दुद और घबड़ाहट से खाली न थे और खड़े-खड़े सोच ही रही थे कि किधर जाना और क्या करना चाहिए कि इतने ही में सामने से लीला आती हुई दिखाई पड़ी। जब वह पास पहुंची तो सिपाहियों की तरफ देखकर ऊंची आवाज में बोली, ''तुम लोग अपनी जान के दुश्मन क्यों हो रहे हो क्या तुम जमानिया राज्य के नौकर होकर भी इस बात को भूल गए कि मायारानी एक भारी तिलिस्म की रानी है और जो चाहे कर सकती है दो-चार सौ आदमियों को बरबाद कर डालना उसके लिए एक अदना काम है। अफसोस, ऐसे मालिक के खिलाफ होकर तुम अपनी जान बचाना चाहते हो याद रक्खो कि इस बाग में भूखे-प्यासे मर जाओगे, तुम्हारे किए कुछ भी न होगा। मैं तुम लोगों को समझाती हूं और कहती हूं कि अपने मालिक के पास चलो और उससे माफी मांगकर अपनी जान बचाओ।''

इसी तरह की ऊंच-नीच की बहुत-सी बातें लीला उन सिपाहियों से देर तक कहती रही और सिपाही लोग भी लीला की बात पर गौर कर ही रहे थे कि यकायक बाईं तरफ से एक शंख के बजने की आवाज आई, घूमकर देखा तो वे ही दोनों नकाबपोश दिखाई पड़े जो हाथ के इशारे से उन सिपाहियों को अपनी तरफ बुला रहे थे। उन्हें देखते ही सिपाहियों की अवस्था बदल गई और उनके दिल के अन्दर उम्मीद, रंज, डर और तरद्दुद का चर्खा तेजी के साथ घूमने लगा। लीला की बातों पर जो कुछ सोच कर रहे थे उसे छोड़ दिया और धनपत को साथ लिए हुए इस तरह दोनों नकाबपोशों की तरफ बढ़े जैसे प्यासे पंसाले (पौसारे) की तरफ लपकते हैं।

जब उन दोनों नकाबपोशों के पास पहुंचे तो एक नकाबपोश ने पुकारकर कहा, ''इस बात से मत घबराओ कि मायारानी ने तुम लोगों को मजबूर कर दिया और इस बाग से बाहर जाने लायक नहीं रक्खा। आओ हम तुम सभी को इस बाग से बाहर कर देते हैं मगर इसके पहले तुम्हें एक ऐसा तमाशा दिखाना चाहते हैं जिसे देखकर तुम बहुत ही खुश हो जाओगे और हद से ज्यादा बेफिक्री तुम लोगों के भाग में पड़ेगी, मगर वह तमाशा हम एकदम से सभी को नहीं दिखाना चाहते। मैं एक कोठरी में (हाथ का इशारा करके) जाता हूं, तुम लोग बारी-बारी से पांच-पांच आदमी आओ और अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा तथा आश्चर्यजनक तमाशा देखो।''

इस समय दोनों नकाबपोश जिस जगह खड़े थे उसके पीछे की तरफ एक दीवार थी जो बाग के दूसरे और तीसरे दर्जे की हद को अलग कर रही थी और उसी जगह पर एक मामूली कोठरी भी थी। बात पूरी होते ही दोनों नकाबपोश पांच सिपाहियों को अपने साथ आने के लिए कहकर उस कोठरी के अन्दर घुस गए। इस समय इन सिपाहियों की अवस्था कैसी थी, इसे दिखाना जरा कठिन है। न तो इन लोगों का दिन उन दोनों नकाबपोशों के साथ दुश्मनी करने की आज्ञा देता था और न यही कहता था कि उन दोनों को छोड़ दो और जिधर जाएं जाने दो।

जब दोनों नकाबपोश कोठरी के अन्दर घुस गए तो उसके बाद पांच सिपाही जो दिलावर और ताकतवर थे कोठरी में घुसे और चौथाई घड़ी तक उसके अन्दर रहे। इसके बाद जब वे उस कोठरी के बाहर निकले तो उनके साथियों ने देखा कि उन पांचों के चेहरे से उदासी झलक रही है, आंखों से आंसू की बूंदें टपक रही हैं और वे सिर झुकाए अपने साथियों की तरफ आ रहे हैं। जब पास आए तो उन पांचों की अवस्था एकदम बदल जाने का सबब सिपाहियों ने पूछा जिसके जवाब में उन पांचों ने कहा, ''पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम लोग पांच-पांच आदमी बारी-बारी से जाओ और जो कुछ है अपनी आंखों से देख लो, हम लोगों से पूछोगे तो कुछ भी न बतायेंगे, हां इतना अवश्य कहेंगे कि वहां जाने में किसी तरह का हर्ज नहीं है।''

आपस में ताज्जुब से भरी बातें करने के बाद और पांच सिपाही उस कोठरी के अन्दर घुसे जिसमें दोनों नकाबपोश थे और पहले पांचों की तरह ये पांचों भी चौथाई घड़ी तक उस कोठरी के अन्दर रहे। इसके बाद जब बाहर निकले तो इन पांचों की भी वही अवस्था थी जैसी उन पांचों की जो उनके पहले कोठरी के अन्दर से होकर आए थे। इसके बाद फिर पांच सिपाही कोठरी के अन्दर घुसे और इनकी भी वही अवस्था हुई, यहां तक कि जितने सिपाही वहां मौजूद थे पांच- पांच करके सभी कोठरी के अन्दर से हो आए और सब ही की वही अवस्था हुई जैसी पहले गये हुए पांचों सिपाहियों की हुई थी। धनपत ताज्जुब-भरी निगाहों से यह तमाशा देख और असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रहा था मगर इतनी हिम्मत न पड़ती थी कि किसी से कुछ पूछता, क्योंकि नकाबपोशों की आज्ञानुसार सिपाहियों की तरह वह उस कोठरी के अन्दर जाने नहीं पाया था जिसमें दोनों नकाबपोश थे। अन्त में सब सिपाहियों ने आपस में बातें करके इशारे में इस बात का निश्चय कर लिया कि कोठरी के अन्दर उन सभी ने एक ही रंग-ढंग का तमाशा देखा था।

थोड़ी देर बाद दोनों नकाबपोश उस कोठरी के बाहर निकल आए और उनमें से नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों की तरफ देखकर कहा, ''धनपत को मेरे हवाले करो!'' सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया बल्कि बहुत अदब के साथ आगे बढ़कर धनपत को नकाबपोश के हवाले कर दिया। दोनों नकाबपोश उसे साथ लिये हुए फिर उस कोठरी के अन्दर घुस गये और आधे घंटे तक वहां रहे, इसके बाद जब कोठरी के बाहर निकले तो नाटे नकाबपोश ने सिपाहियों से कहा, ''धनपत को हमने ठिकाने पहुंचा दिया है, अब आओ, तुम लोगों को भी इस बाग के बाहर कर दें।'' सिपाहियों ने कुछ भी उज्र न किया और दो-तीन झुण्डों में होकर नकाबपोश के साथ-साथ उस कोठरी के अन्दर गए और गायब हो गए। दोनों नकाबपोश भी उसी कोठरी के अन्दर जाकर गायब हो गये और उस कोठरी का दरवाजा भीतर से बन्द हो गया।

इस पचड़े में दो पहर दिन चढ़ आया, लीला दूर से खड़ी यह तमाशा देख रही थी, जब सन्नाटा हो गया तो वह भी लौटी और उसने इन बातों की खबर मायारानी तक पहुंचाई।

 

बयान - 6

लीला की जुबानी दोनों नकाबपोशों, सिपाहियों और धनपत का हाल सुनकर मायारानी बहुत ही उदास और परेशान हो गई। वह आशा जो तिलिस्मी दरवाजा बन्द करने और बेहोशी का अद्भुत धूरा छिड़कने पर उसे बंधी थी, बिल्कुल जाती रही। तिलिस्म में जाकर तिलिस्मी दरवाजे को बन्द करना, तिलिस्मी दवा पीना और लीला को पिलाना, बेहोशी की बुकनी फूलों के गमलों में डालना - सब बिल्कुल ही व्यर्थ हो गया। धनपत दोनों नकाबपोशों के कब्जे में पड़ गया और सब सिपाही भी सहज ही में बाग के बाहर हो गये। इस समय उन दोनों नकाबपोशों की कार्रवाइयों ने उसे इतना बदहवास कर दिया कि वह अपने बचाव की कोई अच्छी सूरत सोच नहीं सकती थी। आखिर वह हर तरह से दुःखी होकर फिर उसी तहखाने के अन्दर गई जिसमें पहली दफा जाकर बाग के दूसरे दर्जे का दरवाजा तिलिस्मी रीति से बन्द किया था। हम ऊपर लिख आये हैं कि वहां दीवार में बिना दरवाजे की पांच आलमारियां थीं और एक आलमारी में तांबे के बहुत से डिब्बे रक्खे थे। इस समय मायारानी ने उन्हीं डिब्बों को खोल-खोलकर देखना शुरू किया। ये डिब्बे छोटे और बड़े हर प्रकार के थे। कई डिब्बे खोल-खोलकर देखने के बाद मायारानी ने एक डिब्बा खोला जिसका पेटा एक हाथ से कम न होगा। उस डिब्बे में एक हाथीदांत का तमंचा बारह अंगुल का और छोटी-छोटी बहुत-सी गोलियां रक्खी हुई थीं। उन गोलियों का रंग लाल था, और उनके अलावा एक ताम्रपत्र भी उस डिब्बे के अन्दर था। मायारानी इस डिब्बे को लेकर वहां से रवाना हुई और तहखाने का दरवाजा बन्द करती हुई अपने स्थान पर उस जगह पहुंची जहां उसकी लौंडियां उसकी राह देख रही थीं। उसने सब लौंडियों के सामने ही उस डिब्बे को खोला और ताम्रपत्र हाथ में लेकर पढ़ने लगी, जब पूरी तरह पढ़ चुकी तो लीला की तरफ देखकर बोली, ''तू देखती है कि मैं किस बला में फंस गई हूं।'

लीला - जी हां, मैं बखूबी देख रही हूं। दोनों नकाबपोशों की तरफ जब ध्यान देती हूं तो कलेजा कांप जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अब कोई भारी उपद्रव उठने वाला है क्योंकि नकाबपोशों की बदौलत इस बाग के सिपाही भी बागी हो गए हैं।

मायारानी - बेशक ऐसा ही है और ताज्जुब नहीं कि वे सिपाही लोग जो इस समय मेरे पंजे से निकल गए हैं मेरे बाकी के फौजी सिपाहियों को भी भड़कावें।

लीला - इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, बल्कि इन सिपाहियों की बदौलत आपकी रिआया भी बागी हो जायगी और तब जान बचाना मुश्किल हो जायगा। अफसोस, आपने व्यर्थ ही अपने दोनों भेद मुझसे छिपा रक्खे, नहीं तो मैं इस विषय में कुछ राय देती!

मायारानी - (ताज्जुब से) दोनों भेद कौन से?

लीला - एक तो यही धनपत वाला।

मायारानी - हां, ठीक है, और दूसरा कौन?

लीला - (मायारानी के कान की तरफ झुककर धीरे से) राजा गोपालसिंह वाला, जिन्हें भूतनाथ की मदद से आपने मार डाला!

लीला की बात सुनकर मायारानी चौंक पड़ी, वह अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और लीला का हाथ पकड़ के किनारे ले जाकर धीरे-से बोली, ''देख लीला, तू केवल मेरी लौंडियों की सरदार ही नहीं बल्कि बचपन की साथी और मेरी सखी भी है। सच बता, गोपालसिंह वाला भेद तुझे कैसे मालूम हुआ?

लीला - आप जानती ही हैं कि मुझे कुछ ऐयारी का भी शौक है।

मायारानी - हां, मैं खूब जानती हूं कि तू ऐयारी भी कर सकती है लेकिन इस किस्म का काम मैंने तुझसे कभी लिया नहीं।

लीला - यह मेरी बदकिस्मती थी, नहीं तो मैं अब तक ऐयारा की पदवी पा चुकी होती।

मायारानी - ठीक है, खैर, तो इससे मालूम हुआ कि तूने ऐयारी से गोपालसिंह वाला भेद मालूम कर लिया?

लीला - जी हां, ऐसा ही है। मैंने ऐयारी से और भी बहुत से भेद मालूम कर लिये हैं जिनकी खबर आपको भी नहीं और जिनको इस समय कहना मैं उचित नहीं समझती, मगर शीघ्र ही उस विषय में मैं आपसे बातचीत करूंगी। इस समय तो मुझे केवल इतना ही कहना है कि किसी तरह अपनी जान बचाने की फिक्र कीजिये क्योंकि मुझे भूतनाथ की दोस्ती पर शक है।

मायारानी - क्या तू समझती है कि भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया?

लीला - जी हां, बल्कि मैं तो यही समझती हूं कि राजा गोपालसिंह मारे नहीं गये, बल्कि जीते हैं।

मायारानी - अगर ऐसा है तो बड़ा ही गजब हो जायगा। मगर इसका कोई सबूत भी है

लीला - आज तो नहीं, मगर कल तक मैं इसका सबूत आपको दे सकूंगी।

मायारानी - अफसोस, अफसोस! मैं इस समय किले में जाकर अपने दीवान से राय लेने वाली थी मगर अब तो कुछ और ही सोचना पड़ा।

लीला - (उस डिब्बे की तरफ इशारा करके जो अभी तिलिस्मी तहखाने में से मायारानी लाई थी) पहले यह बताइये कि इस डिब्बे को आप किस नीयत से लाई हैं यह हाथीदांत का तमंचा कैसा है और ये गोलियां क्या काम दे सकती हैं

मायारानी - ये गोलियां इसी तमंचे में रखकर चलाई जायंगी। इसके चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती और गोली भी आध कोस तक जा सकती है। जब यह गोली किसी के बदन पर लगेगी या जमीन पर गिरेगी तो एक आवाज देकर फट जायगी और इसके अन्दर से बहुत-सा जहरीला धुआं निकलेगा। वह धुआं जिसकी नाक में जायगा वह आदमी फौरन ही बेहोश हो जायगा। अगर हजार आदमियों की भीड़ आ रही हो तो उन सभी को बेहोश करने के लिए केवल दस-पांच गोलियां काफी हैं।

लीला - बेशक यह बहुत अच्छी चीज है और ऐसे समय में आपको बड़ा काम दे सकती है, मगर मैं समझती हूं कि उस डिब्बे में पांच सौ से ज्यादा गोलियां न होंगी, इसके बाद कदाचित् वह ताम्रपत्र कुछ काम दे सके जो उस डिब्बे में है और जिसे आपने लोगों के सामने पढ़ा था।

मायारानी - वाह तुम बहुत समझदार हो। बेशक ऐसा ही है। इस ताम्रपत्र में उन गोलियों के बनाने की तरकीब लिखी है। इस तिलिस्म में ऐसी हजारों चीजें हैं मगर लाचार हूं कि तिलिस्म का पूरा हाल मुझे मालूम नहीं है बल्कि चौथे दर्जे के विषय में तो मैं कुछ भी नहीं जानती। फिर भी जो कुछ मैं जानती हूं या जहां तक तिलिस्म में मैं जा सकती हूं वहां ऐसी और भी कितनी ही चीजें हैं जो समय पर मेरे काम आ सकती हैं।

लीला - अब यही समय है कि उन चीजों को लेकर आप यहां से चल दीजिये क्योंकि इस बाग तथा आपके राज्य पर अब आफत आना ही चाहती है। मैंने सुना है कि राजा वीरेन्द्रसिंह की बेशुमार फौज जमानिया की तरफ आ रही है, बल्कि यों कहना चाहिए कि आज-कल में पहुंचना ही चाहती है।

मायारानी - हां, यह खबर मैंने भी सुनी है। यदि गोपालसिंह का और धनपत का मामला न बिगड़ा होता तो मैं मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाती, परन्तु इस समय तो मुझे अपनी रिआया में से किसी का भी भरोसा नहीं।

लीला - भरोसे के साथ-ही-साथ आप समझ रखिए कि आप अपने किसी नौकर पर हकूमत की लाल आंख भी अब नहीं दिखा सकतीं। मगर इन बातों में वृथा देर हो रही है। इस विषय को बहुत जल्द तय कर लेना चाहिए कि अब क्या करना और कहां जाना मुनासिब होगा।

मायारानी - हां, ठीक है मगर इसके भी पहले मैं तुमसे यह पूछती हूं कि तुम इस मुसीबत में मेरा साथ देने के लिए कब तक तैयार रहोगी

लीला - जब तक मेरी जिन्दगी है या जब तक आप मुझ पर भरोसा करेंगी।

मायारानी - यह जवाब तो साफ नहीं है, बल्कि टेढ़ा है।

लीला - इस पर आप अच्छी तरह गौर कीजिएगा मगर यहां से निकल चलने के बाद।

मायारानी - अच्छा, यह तो बताओ कि मेरी और लौंडियों का क्या हाल है

लीला - आपकी लौंडियां केवल चार-पांच ऐसी हैं जिन पर मैं भरोसा कर सकती हूं, बाकी लौंडियों के विषय में मैं कुछ भी नहीं कह सकती और न उनके दिल का हाल ही जाना जा सकता है।

मायारानी - (ऊंची सांस लेकर) हाय, यहां तक नौबत पहुंच गई! यह सब मेरे पापों का फल है। अच्छा जो होगा देखा जायगा। इस अनूठे तमंचे और गोलियों को मैं सम्हालती हूं और थोड़ी देर के लिए पुनः तिलिस्मी तहखाने में जाकर देखती हूं कि मेरे काम की ऐसी कौन-सी चीज है जिसे सफर में अपने साथ ले जा सकूं। जो कुछ हाथ लगे सो ले आती हूं और बहुत जल्द तुमको और उन लौंडियों को साथ लेकर निकल भागती हूं जिन पर तुम भरोसा रखती हो। कोई हर्ज नहीं, इस गई-गुजरी हालत में भी मैं एक दफा लाखों दुश्मनों को जहन्नुम पहुंचाने की हिम्मत रखती हूं!

इसके जवाब में पीछे की तरफ से किसी गुप्त मनुष्य ने कहा - ''बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!''

 

बयान - 7

ऐयारी भाषा की चीठी को पढ़ने और कमलिनी के ढाढ़स दिलाने पर कुंअर इन्द्रजीतसिंह की दिलजमई तो हो गई परन्तु 'टेप' का परिचय पाने के लिए वे बेचैन हो रहे थे अस्तु उससे मिलने की आशा में दरवाजे की तरफ ध्यान लगाकर थोड़ी देर तक खड़े हो गए। यकायक उस मकान का दरवाजा खुला और धनपत की कलाई पकड़े 'टेप' महाशय अपने चेहरे पर नकाब डाले हुए आते दिखाई दिये। दरवाजे के बाहर निकलते ही 'टेप' ने अपने चेहरे पर से नकाब हटा दी, सूरत देखते ही कुंअर इन्द्रजीतसिंह हंस पड़े और लपक के उनकी कलाई पकड़कर बोले, ''अहा, यह किसे आशा थी कि यहां पर राजा गोपालसिंह से मुलाकात होगी (कमलिनी की तरफ देखकर) तो क्या इन्हीं ने अपना नाम 'टेप' रक्खा है?'

कमलिनी - जी हां।

इन्द्रजीतसिंह - (गोपालसिंह से) क्या आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर है?

गोपालसिंह - जी हां, आप मकान के अन्दर चलिये और उनसे मिलिये।

इन्द्रजीतसिंह - एक औरत के रोने की आवाज हम लोगों ने सुनी थी, शायद वह भी इसी मकान के अन्दर हो।

गोपालसिंह - जी नहीं, वह कम्बख्त औरत (धनपत की तरफ इशारा कर) यही है! न मालूम ईश्वर ने इस हरामजादे को कैसा मर्द बनाया है कि आवाज से भी कोई इसे मर्द नहीं समझ सकता!

कमलिनी - इसे आपने कब पकड़ा?

गोपालसिंह - यह कल से मेरे कब्जे में है और मैं कल ही इसे इस मकान में कैद कर गया था, बल्कि आज छुड़ाने के लिए आया था।

इन्द्रजीतसिंह - तो आप कल भी इस मकान में आ चुके हैं! मगर मुझसे मिलने के लिए शायद कसम खा चुके थे!

गोपालसिंह - (हंसकर) नहीं-नहीं, मेरा वह समय बड़ा ही अनमोल था, एक-एक पल की देर बुरी मालूम होती थी; इसी से आपसे मिलने के लिए मैं रुक न सका। इसका खुलासा हाल आप सुनेंगे तो बहुत ही हंसेंगे और खुश होंगे। मगर पहले मकान के अन्दर चलकर आनन्दसिंह से मिल लीजिए, तब यह अनूठा किस्सा आपसे कहूंगा।

इन्द्रजीतसिंह - क्या आनन्द यहां तक नहीं आ सकता?

गोपालसिंह - नहीं, वे यहां नहीं आ सकते। वे तिलिस्मी कारखाने में फंस चुके हैं, इसलिए छूटने का उद्योग नहीं कर सकते, बल्कि वे तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं और उसे तोड़कर निकल आ सकते हैं। मगर अब उनसे मिलने में देर न कीजिए।

इन्द्रजीतसिंह - आप जिस काम के लिए गये थे वह हुआ?

गोपालसिंह - वह काम भी बखूबी हो गया, उसका खुलासा हाल थोड़ी देर में आपसे कहूंगा।

कमलिनी - भूतनाथ को आपने कहां छोड़ा?

गोपालसिंह - वह भी आता ही होगा। वास्तव में वह बड़ा ही चालाक और धूर्त ऐयार है। उसने जो काम किए हैं तुम सुनोगी तो हंसते-हंसते लोटन कबूतर बन जाओगी। (इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर) आप आनन्दसिंह के फंसने से दुःखी न होइए क्योंकि आप दोनों भाइयों के लिए इस तिलिस्म का तोड़ना जरूरी हो चुका है।

इन्द्रजीतसिंह - ठीक है, मगर रिक्तग्रन्थ का पूरा-पूरा मतलब उसकी समझ में नहीं आया है और इससे तिलिस्म के काम में उसे तकलीफ होना सम्भव है। उसमें दस-बारह शब्द ऐसे हैं, जिनका अर्थ नहीं लगता और उन शब्दों का अर्थ जाने बिना बहुत-सी बातों का मतलब समझ में नहीं आता।

गोपालसिंह - (हंसकर) आपका यह कहना ठीक है, मगर मैं एक बात आपको ऐसी बताता हूं कि जिससे आप हर एक तिलिस्मी ग्रन्थ को अच्छी तरह पढ़ और समझ लेंगे और उनमें चाहे कैसे भी टेढ़े शब्द क्यों न हों, मगर मतलब समझने में कठिनता न होगी।

इन्द्रजीतसिंह - वह क्या?

गोपालसिंह - केवल एक छोटी-सी बात है।

इन्द्रजीतसिंह - मगर उसके बताने में आप हुज्जत बड़ी कर रहे हैं।

गोपालसिंह ने झुककर इन्द्रजीतसिंह के कान में कुछ कहा, जिसे सुनते ही कुमार हंस पड़े और बोले, ''बेशक, बड़ी चतुराई की गई है! जरा-से फेर में मतलब कैसा बिगड़ जाता है! आपका कहना बहुत ठीक है। अब कोई शब्द ऐसा नहीं निकलता जिसका अर्थ मैं न लगा सकूं! क्यों न हो, आखिर आप तिलिस्म के राजा जो ठहरे।''

कमलिनी से इस समय चुप न रहा गया, वह ताने के तौर पर सिर नीचा करके बोली, ''बेशक, राजा ही ठहरे, इसी से तो बेमुरौवती कूट-कूटकर भरी है!'' इसके जवाब में गोपालसिंह ने कहा, ''नहीं-नहीं, ऐसा मत खयाल करो! तुम्हारा उदास चेहरा कहे देता है कि तुम्हें इस बात का रंज है कि हमने जो कुछ कुमार के कान में कहा, उससे तुमको जानबूझ के वंचित रखा, मगर नहीं (धनपत की तरफ इशारा करके) इस कम्बख्त के खयाल से मैंने ऐसा किया। आखिर वह भेद तुमसे छिपा न रहेगा।''

इस पर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने एक विचित्र निगाह कमलिनी पर डाली, जिसे देखते ही वह हंस पड़ी और मकान के अन्दर जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी। कुंअर इन्द्रजीतसिंह, कमलिनी, लाडिली और उनके साथ ही धनपत का हाथ पकड़े हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के अन्दर चले।

इस मकान की हालत हम ऊपर लिख आये हैं इसलिए पुनः नहीं लिखते। गोपालसिंह सभी को साथ लिए हुए उस कोठरी में पहुंचे, जिसमें कुंअर आनन्दसिंह फंसे हुए थे, मगर इस समय वहां की अवस्था वैसी न थी जैसी कि हम ऊपर लिख आये हैं, अर्थात् वह तिलिस्मी सन्दूक, जिसमें आनन्दसिंह का हाथ फंस गया था, वहां न था और न आनन्दसिंह वहां थे। हां, उस कोठरी की जमीन का वह हिस्सा जिस पर सन्दूक था, जमीन के अन्दर धंस गया था और वहां एक कुएं की शक्ल दिखाई दे रही थी। यह देख राजा गोपालसिंह ताज्जुब में आ गये और उस कुएं की तरफ देखकर कुछ सोचने लगे, आखिर कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने उन्हें टोका और चुप रहने का सबब पूछा।

इन्द्रजीतसिंह - आप अब क्या सोच रहे हैं। शायद आनन्दसिंह को आपने इसी कोठरी में छोड़ा था

गोपालसिंह - जी हां, इस जगह जहां आप कुएं की तरह का गड्ढा देखते हैं, एक सन्दूक था और उसमें एक छेद था, उसी छेद के अन्दर हाथ डालकर कुमार ने अपने को फंसा लिया था। मालूम होता है कि अब वे तिलिस्म के अन्दर चले गये। इसी खयाल से मैंने आपसे कहा था कि कुंअर आनन्दसिंह अपने को छुड़ा नहीं सकते, बल्कि तिलिस्म के अन्दर जा सकते हैं।

इन्द्रजीतसिंह - अफसोस! खैर, मर्जी परमेश्वर की! इस समय मेरा दिमाग परेशान हो रहा है। धनपत को मैं इस अवस्था में क्यों देख रहा हूं यकायक आपका इस बाग में आना कैसे हुआ आप मुझसे मिले बिना सीधे इस मकान में क्यों आये आनन्द को इस मकान में आपने ठहरने क्यों दिया अथवा उसे बचाने का उद्योग क्यों न किया इत्यादि बहुत-सी बातें जानने के लिए मैं इस समय परेशान हो रहा हूं, मगर इसके पहले मैं इस कुएं की अवस्था जानने का उद्योग करूंगा। (कमलिनी की तरफ देखकर) जरा तिलिस्मी खंजर मुझे दो, उसके जरिये से इस कुएं में उजाला करके मैं देखूंगा कि इसके अन्दर क्या है!

कमलिनी - (तिलिस्मी खंजर और अंगूठी कुमार के सामने रखकर) लीजिए, शायद इससे कुछ काम चले!

कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने अंगूठी पहनकर खंजर हाथ में लिया और धीरे-धीरे उस गड्ढे के किनारे गये जो ठीक कुएं की तरह का हो रहा था। खंजर वाला हाथ कुमार ने कुएं के अन्दर डाला और उसका कब्जा दबाकर उजाला करने के बाद झांककर देखा कि उसके अन्दर क्या है।

न मालूम कुंअर इन्द्रजीतसिंह ने कुएं के अन्दर क्या देखा कि वे यकायक बिना किसी से कुछ कहे तिलिस्मी खंजर हाथ में लिए उस कुएं के अन्दर कूद पड़े। यह देखते ही कमलिनी और लाडिली परेशान हो गयीं और राजा गोपालसिंह को भी बहुत ताज्जुब हुआ। इन्द्रजीतसिंह की तरह राजा गोपालसिंह ने भी अपना तिलिस्मी खंजर हाथ में लेकर कुएं के अन्दर किया और उसका कब्जा दबा रोशनी करने के बाद झांककर देखा कि क्या बात है मगर कुछ दिखाई न पड़ा।

कमलिनी - कुछ मालूम हुआ कि इस गड्ढे में क्या है?

गोपालसिंह - कुछ भी मालूम नहीं होता, न जाने क्या देखकर कुमार इसमें कूद गये।

कमलिनी - खैर, आप यहां से हटिये और सोचिये कि अब क्या करना होगा?

गोपालसिंह - यद्यपि मैं जानता हूं कि यह तिलिस्म कुमार के ही हाथ से टूटेगा, परन्तु इस रीति से दोनों कुमारों का तिलिस्म के अन्दर जाना ठीक न हुआ। देखना चाहिए, ईश्वर क्या करता है चलो, अब यहां रहना उचित नहीं है और न कुमार से मुलाकात होने की ही कोई आशा है।

कमलिनी - (अफसोस से साथ) चलिये।

गोपालसिंह - (बाहर की तरफ चलते हुए) अफसोस! कुमार से कई बातें कहने की आवश्यकता थी, मगर लाचार!

कमलिनी - (धनपत की तरफ इशारा करके) इसे आप कहां-कहां लिए फिरेंगे और यहां क्यों लाए थे?

गोपालसिंह - इसे मैं कल गिरफ्तार करके इसी मकान के अन्दर छोड़ गया था। मुझे आशा थी कि यह स्वयं इस मकान से बाहर न निकल सकेगा, मगर आज इस मकान में आकर देखा तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ। इस मकान के तीन दरवाजे यह खोल चुका था और चौथा दरवाजा खोलना ही चाहता था। न मालूम इस मकान का भेद इसे क्योंकर मालूम हुआ।

कमलिनी - इसे आपने किस रीति से गिरफ्तार किया?

गोपालसिंह - पहले इस कम्बख्त का इन्तजाम कर लूं तो इसका अनूठा किस्सा कहूं।

कमलिनी और लाडिली के साथ धनपत को पकड़े हुए राजा गोपालसिंह उस मकान के बाहर आये और देवमन्दिर की तरफ रवाना होकर उसके पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास पहुंचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि देवमन्दिर के पश्चिम की तरफ वाले मकान के पास दरवाजे पर हड्डियों का एक ढेर था और उसके बीचोंबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी हुई थी, जिसका दूसरा सिरा उसके पास वाले कुएं के अन्दर गया हुआ था।

धनपत को घसीटते हुए राजा गोपालसिंह उसी कुएं पर गये और उस हरामजादे स्त्री-रूपधारी मर्द को जबर्दस्ती उसी कुएं के अन्दर धकेल दिया। इसके साथ ही उस कुएं के अन्दर से धनपत के चिल्लाने की आवाज आने लगी। परन्तु राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाडिली ने उस पर कुछ ध्यान न दिया। तीनों आदमी देवमन्दिर में आकर बैठ गये और बातचीत करने लगे।

कमलिनी - हां, अब आप पहले यह कहिये कि भूतनाथ ने क्या किया मैंने उसे आपके पास भेजा था। इसलिए पूछती हूं कि उसने अपना काम ईमानदारी से किया या नहीं?

गोपालसिंह - बेशक, भूतनाथ ने अपना काम हद से ज्यादा ईमानदारी के साथ किया। वह जाहिर में मायारानी के साथ ऐसा मिला कि उसे भूतनाथ पर विश्वास हो गया और वह यह समझने लगी कि भूतनाथ इनाम की लालच से मेरा काम उद्योग के साथ करेगा।

कमलिनी - हां, उसने मायारानी के साथ मेल पैदा करने का हाल मुझसे कहा था। (मुस्कराकर) अजीब ढंग से उसने मायारानी को धोखा दिया। हमारी तरफ की मामूली सच्ची बातें कहकर उसने अपना काम पूरा-पूरा निकाला, मगर मैं उसके बाद का हाल पूझती हूं, जब मैंने उसे आपके पास काशी में भेजा था, क्योंकि उसके बाद अभी तक वह मुझसे नहीं मिला।

गोपालसिंह - उसके बाद तो भूतनाथ ने दो-तीन काम बड़े अनूठे किये, जिनका खुलासा हाल मैं तुमसे कहूंगा। लेकिन उन कामों में एक काम सबसे बढ़-चढ़ के हुआ।

कमलिनी - वह क्या?

गोपालसिंह - उसने मायारानी से कहा कि मैं गोपालसिंह को गिरफ्तार करके दारोगा वाले मकान में कैद कर देता हूं, तुम उसे अपने हाथ से मारकर निश्चिन्त हो जाओ। यह सुनकर मायारानी बहुत ही खुश हुई और भूतनाथ ने भी वह काम बड़ी खुशी के साथ किया। बल्कि इसके इनाम में अजायबघर की ताली मायारानी से ले ली!

कमलिनी - क्या अजायबघर की ताली भूतनाथ ने ले ली?

गोपालसिंह - हां।

कमलिनी - यह बड़ा काम हुआ और इस काम के लिए मैंने उसे सख्त ताकीद की थी। अब वह ताली किसके पास है?

गोपालसिंह - ताली मेरे पास है, मुझे आशा न थी कि भूतनाथ मुझे देगा, मगर उसने कोई उज्र न किया।

कमलिनी - वह आपसे किसी तरह उज्र नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने उसे कसम देकर कह दिया था कि जितना मुझे मानते हो, उतना ही राजा गोपालसिंह को मानना। असल बात तो यह है कि भूतनाथ बड़े काम का आदमी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह राजा वीरेन्द्रसिंह का गुनहगार है और उसने सजा पाने लायक काम किया है, मगर वह कसूर उससे धोखे में हुआ। इश्क का भूत उसके ऊपर सवार था और उसी ने उससे वह काम कराया, पर वास्तव में उसकी नीयत साफ है और उस कसूर का उसे सख्त रंज है, ऐसी अवस्था में जिस तरह हो, उसका कसूर माफ होना ही चाहिए।

गोपालसिंह - बेशक-बेशक, और उसके बाद तुम्हारी बदौलत उसके हाथ से कई ऐसे काम निकले हैं, जिनके आगे वह कसूर कुछ भी नहीं है।

कमलिनी - अच्छा अब खुलासा कहिए कि भूतनाथ ने आपके मारने के विषय में किस तरह मायारानी को धोखा दिया और अजायबघर की ताली क्योंकर ली?

राजा गोपालसिंह के विषय में भूतनाथ ने जिस तरह मायारानी को धोखा दिया था, उसका हाल हम ऊपर के बयानों में लिख आये हैं। इस समय वही हाल राजा गोपालसिंह ने अपने तौर पर कमलिनी से बयान किया। ताज्जुब नहीं कि भूतनाथ के विषय में हमारे पाठकों को धोखा हुआ हो और वे समझ बैठे हों कि भूतनाथ वास्तव में मायारानी से मिल गया, मगर नहीं। उन्हें अब मालूम हुआ होगा कि भूतनाथ ने मायारानी से मिलकर केवल अपना काम साधा और मायारानी को हर तरह से नीचा दिखाया।

 

बयान - 8

अहा, ईश्वर की महिमा भी कैसी विचित्र है! बुरे कर्मों का बुरा फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। जो मायारानी अपने सामने किसी को कुछ समझती ही न थी, वही आज किसी के सामने जाने या किसी को मुंह दिखाने का साहस नहीं कर सकती। जो मायारानी कभी किसी से डरती ही न थी, वही आज एक पत्ते के खड़खड़ाने से भी डरकर बदहवास हो जाती है। जो मायारानी दिन-रात हंसी-खुशी में बिताया करती थी, वह आज रो-रोकर अपनी आंखें सुजा रही है। संध्या के समय भयानक जंगल में उदास और दुःखी मायारानी केवल पांच लौंडियों के साथ सिर झुकाये अपने किये हुए बुरे कर्मों की याद कर-करके पछता रही है। रात की अवाई के कारण जैसे-जैसे अंधेरा होता जाता है, तैसे-तैसे उसकी घबड़ाहट भी बढ़ती जाती है। इस समय मायारानी और उसकी लौंडियां मर्दाने भेष में हैं। लौंडियों के पास नीमचा तथा तीर-कमान मौजूद हैं। मगर मायारानी केवल तिलिस्मी तमंचा कमर में छिपाये हुए है। वह घबड़ा-घबड़ाकर बार-बार पूरब की तरफ देख रही है, जिससे मालूम होता है कि इस समय उधर से कोई उसके पास आने वाला है। थोड़ी ही देर बाद अच्छी तरह अंधेरा हो गया और इसी बीच में पूरब की तरफ से किसी के आने की आहट मालूम हुई। यह लीला थी जो मर्दाने भेष में पीतल की जालदार लालटेन लिए हुए कहीं दूर से चली आ रही थी। जब वह पास आयी, मायारानी ने घबड़ाहट के साथ पूछा, ''कहो, क्या हाल है।'

लीला - हाल बहुत ही खराब है, अब तुम्हें जमानिया की गद्दी कदापि नहीं मिल सकती।

मायारानी - यह तो मैं पहले से समझे बैठी हूं। तू दीवान साहब के पास गई था।

लीला - हां, गई थी, उस समय उन सिपाहियों में से कई सिपाही वहां मौजूद थे जो आपके तिलिस्मी बाग में रहते हैं और जिन्होंने दोनों नकाबपोशों का साथ दिया था। उस समय वे सिपाही दीवान साहब से दोनों नकाबपोशों का हाल बयान कर रहे थे, मगर मुझे देखते ही चुप हो गये।

मायारानी - तब क्या हुआ।

लीला - दीवान साहब ने मुझे एक तरफ बैठने का इशारा किया और पूछा कि 'तू यहां क्यों आई है इसके जवाब मैं मैंने कहा कि 'मायारानी हम लोगों को छोड़कर न मालूम कहां चली गई। जब चारों तरफ ढूंढने पर भी पता न लगा तो इत्तिला के लिए आपके पास आई हूं।' यह सुनकर दीवान साहब ने कहा कि 'अच्छा ठहर, मैं इन सिपाहियों से बातें कर लूं, तब तुझसे करूं।'

मायारानी - अच्छा, तब तूने उन सिपाहियों की बातें सुनीं।

लीला - जी नहीं, सिपाहियों ने मेरे सामने बात करने से इनकार किया और कहा कि 'हम लोगों को लीला पर विश्वास नहीं है!' आखिद दीवान साहब ने मुझे बाहर जाने का हुक्म दिया। उस समय मुझे अंदाज से मालूम हुआ कि मामला बेढब हो गया और ताज्जुब नहीं कि मैं गिरफ्तार कर ली जाऊं, इसलिए पहरे वालों से बात बनाकर मैंने अपना पीछा छुड़ाया और भागकर मैदान का रास्ता लिया।

मायारानी - संक्षेप में कह कि उन दोनों नकाबपोशों का कुछ भेद मालूम हुआ कि नहीं?

लीला - दोनों नकाबपोशों का असल भेद कुछ भी मालूम न हुआ, हां उस आदमी का पता लग गया, जिसने बाग से निकल भागने का विचार करते समय गुप्त रीति से कहा था कि 'बेशक-बेशक, तुम मरते-मरते भी हजारों घर चौपट करोगी!'

मायारानी - हां, कैसे पता लगा वह कौन था।

लीला - वह भूतनाथ था। जब मैं दीवान साहब के यहां से भागकर शहर के बाहर हो रही थी, यकायक उससे मुलाकात हुई। उसने स्वयं मुझसे कहा कि 'फलां बात का कहने वाला मैं हूं, तू मायारानी से कह दीजियो कि अब तेरे दिन खोटे आए हैं, अपने किए का फल भोगने के लिए तैयार हो रहे, हां, यदि मुझे कुछ देने की सामर्थ्य हो तो मैं उसका साथ दे सकता हूं।'

मायारानी - (ऊंची सांस लेकर) हाय! अच्छा और क्या-क्या मालूम हुआ?

लीला - और क्या कहूं राजा वीरेन्द्रसिंह की बीस हजार फौज आ गई है, जिसकी सरदारी नाहरसिंह कर रहा है। दीवान साहब ने एक सरदार को पत्र देकर नाहरसिंह के पास भेजा था, मालूम नहीं उस पत्र में क्या लिखा था, मगर नाहरसिंह ने उसका यह जवाब जबानी कहला भेजा कि केवल मायारानी को गिरफ्तार करने के लिए आए हैं। इसके बाद पता चला कि दीवान साहब ने आपकी खोज में कई जासूस रवाना किए हैं।

मायारानी - तो इससे निश्चित होता है कि कम्बख्त दीवान भी मेरा दुश्मन हो गया!

लीला - क्या इस बात में अब भी शक है?

मायारानी - (लम्बी सांस लेकर) अच्छा और क्या मालूम हुआ?

लीला - एक बात सबसे ज्यादा ताज्जुब की मालूम हुई।

मायारानी - वह क्या?

लीला - रात के समय भेष बदलकर मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में गई थी। घूमते-फिरते ऐसी जगह पहुंची, जहां से नाहरसिंह का खेमा सामने दिखाई दे रहा था और उस खेमे के दरवाजे पर मशाल हाथ में लिए हुए पहरा देने वाले सिपाहियों की चाल साफ-साफ दिखाई दे रही थी। मैंने देखा कि खेमे के अन्दर से दो नकाबपोश निकले और जहां मैं खड़ी थी उसी तरफ आने लगे।

मैं किनारे हट गयी। जब वे मेरे पास से होकर निकले तो उनकी चाल और उनके कद से मुझे निश्चय हो गया कि वे दोनों नकाबपोश वही हैं जो हमारे बाग में आये थे और जिन्होंने धनपत को पकड़ा था।

मायारानी - हां!

लीला - जी हां!

मायारानी - अफसोस, इसका पता कुछ भी न लगा कि वे दोनों आखिर हैं कौन मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे खास बाग के तिलिस्मी भेदों को जानते हैं और इस समय तेरी जबानी सुनने से यह जाना जाता है कि वे दोनों राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती भी हैं।

लीला - इसका निश्चय नहीं हो सकता कि वे दोनों नकाबपोश राजा वीरेन्द्रसिंह के पक्षपाती हैं, शायद वे नाहरसिंह से मदद लेने गये हों।

मायारानी - ठीक है, यह भी हो सकता है। लेकिन बात तो यह है कि मैं सिवाय गोपालसिंह के और किसी से नहीं डरती, न मुझे रिआया के बिगड़ने का कोई डर है न सिपाहियों या फौज के बागी होने का खौफ, न दीवान-मुत्सद्दियों के बिगड़ने का अन्देशा और न कमलिनी और लाडिली की बेबफाई का रंज - क्योंकि मैं इन सभी को अपनी करामात से नीचा दिखा सकती हूं, हां, यदि गोपालसिंह के बारे में कम्बख्त भूतनाथ ने मुझे धोखा दिया है जैसा कि तू कह चुकी है तो बेशक खौफ की बात है। अगर वह जीता है तो मुझे बुरी तरह हलाल करेगा। वह इस बात से कदापि नहीं डरेगा कि मेरा भेद खुलने से उसकी बदनामी होगी, क्योंकि मैंने उसके साथ बहुत बुरा सलूक किया है। जिस समय कम्बख्त कमलिनी और वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों ने गोपालसिंह को कैद से छुड़ाया था, यदि गोपालसिंह चाहता तो उसी समय मुझे जहन्नुम को भेज सकता था। मगर उसका ऐसा न करना मेरा कलेजा और भी दहला रहा है, शायद मौत से भी बढ़कर कोई सजा उसने मेरे लिए सोच ली है, हाय अफसोस! मैंने तिलिस्मी भेद जानने के लिए उसे क्यों इतने दिनों तक कैद में रख छोड़ा! उसी समय उसे मार डाला होता तो यह बुरा दिन क्यों देखना पड़ता हाय, अब तो मौत से भी कोई भारी सजा मुझे मिलने वाली है। (रोती है)

लीला - अब रोने का समय नहीं है, किसी तरह जान बचाने की फिक्र करनी चाहिए।

मायारानी - (हिचकी लेकर) क्या करूं कहां जाऊं किससे मदद मांगूं ऐसी अवस्था में कौन मेरी सहायता करेगा हाय, आज तक मैंने किसी के साथ किसी तरह की नेकी नही की, किसी को अपना दोस्त न बनाया और किसी पर अहसान का बोझ न डाला। फिर किसी को क्या गरज पड़ी है, जो ऐसी अवस्था में मेरी मदद करे। वीरेन्द्रसिंह के लड़कों से दुश्मनी करना मेरे लिए और भी जहर हो गया।

लीला - खैर, जो हो गया सो हो गया, अब इस समय इन सब बातों का सोच-विचार करना और भी बुरा है। मैं इस मुसीबत में हर तरह तुम्हारा साथ देने के लिए तैयार हूं और अब भी तुम्हारे पास ऐसी-ऐसी चीजें है कि उनसे कठिन-से-कठिन काम निकल सकता है, रुपये-पैसे की तरफ से भी कुछ तकलीफ नहीं हो सकती, क्योंकि सेरों जवाहिरात पास में मौजूद हैं फिर इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो?

मायारानी - चिन्ता क्यों न की जाये एक मनोरमा का मकान छिपकर रहने योग्य था सो वहां भी वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों के चरण जा पहुंचे। तू ही कह चुकी है कि किशोरी और कामिनी को ऐयार लोग छुड़ाकर ले गये। नागर को भी उन लोगों ने फंसा लिया होगा। अब सबसे पहला काम तो यह है कि छिपकर रहने के लिए कोई जगह खोजी जाये इसके बाद जो कुछ करना होगा किया जायेगा। हाय, अगर गोपालसिंह की मौत हो गई होती तो न मुझे रिआया के बागी होने का डर था और न राजा वीरेन्द्रसिंह की दुश्मनी का।

लीला - छिपकर रहने के लिए मैं जगह का बन्दोबस्त कर चुकी हूं। यहां से थोड़ी ही दूर पर...।

लीला इससे ज्यादा कुछ कहने न पाई थी कि पीछे की तरफ से कई आदमियों के दौड़ते हुए आने की आहट हुई। बात-की-बात में वे लोग, जो वास्तव में चोर थे, चोरी का माल लिए हुए उस जगह आ पहुंचे जहां मायारानी और उसकी लौंडियां बैठी बातें कर रही थीं। ये चोर गिनती में पांच थे और उनके पीछे-पीछे कई सवार भी उनकी गिरफ्तारी के लिए चले आ रहे थे, जिनके घोड़ों की टापों की आवाज बखूबी आ रही थी। जब वे चोर मायारानी के पास पहुंचे, तो यह सोचकर कि पीछा करने वाले सवारों के हाथ से बचना मुश्किल है, वे चोरी का माल उसी जगह पटककर आगे की तरफ भाग गये और इसके थोड़ी ही देर बाद वे कई सवार भी उसी जगह पर, जहां मायारानी थी, आ पहुंचे। उन्होंने देखा कि कई आदमी बैठे हुए हैं, बीच में एक लालटेन जल रही है, और चोरी का माल भी उसी जगह पड़ा हुआ है। उन्हें निश्चय हो गया कि ये चोर हैं अतः उन्होंने मायारानी तथा उसकी लौंडियों को चारों तरफ से घेर लिया।

 

बयान - 9

आधी रात का समय है, चांदनी खिली हुई है। मौसम में पूरा-पूरा फर्क पड़ गया है। रात की ठंडी-ठंडी हवा अब प्यारी मालूम होती है। ऐसे समय में उस सड़क पर जो काशी से जमानिया की तरफ गई है दो मुसाफिर धीरे-धीरे काशी की तरफ जा रहे हैं। ये दोनों मुसाफिर साधारण नहीं हैं, बल्कि अमीर बहादुर और दिलावर मालूम पड़ते हैं। दोनों की पोशाक बेशकीमत और सिपाहियाना ठाठ की है, तथा दोनों ही की चाल में दिलेरी और लापरवाही मालूम होती है। खंजर, कटार, तलवार, तीर-कमान और कमन्द से दोनों ही सजे हुए हैं और इस समय मस्तानी चाल से धीरे-धीरे टहलते हुए जा रहे हैं। इनके पीछे-पीछे दो आदमी दो घोड़ों की बागडोर थामे हुए जा रहे हैं, मगर ये दोनों साईस नहीं हैं बल्कि सिपाही और सवार मालूम होते हैं।

दोनों मुसाफिर जाते-जाते ऐसी जगह पहुंचे, जहां सड़क से कुछ हटकर पांच-सात पेड़ों का एक झुण्ड था। दोनों वहां खड़े हो गए और उनमें से एक ने जोर से सीटी बजाई जिसकी आवाज सुनते ही पेड़ों की आड़ में से दस आदमी निकल आए और दूसरी सीटी की आवाज के साथ ही वे उन दोनों आदमियों के पास पहुंच हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन सभी की पोशाक उस समय के डाकुओं की-सी थी। जांघिया पहने हुए, बदन में केवल एक मोटे कपड़े की नीमास्तीन, ढाल-तलवार लगाए और हाथों में एक-एक गंड़ासा लिए हुए थे, और सभी की बगल में एक-एक छोटा बटुआ भी लटक रहा था। इन दसों के आ जाने पर उन दो बहादुरों में से एक ने उनकी तरफ देखा और पूछा, ''उसका कुछ पता लगा?'

एक डाकू - (हाथ जोड़कर) जी हां, बल्कि वह काम भी बखूबी कर आये हैं, जो हम लोगों के सुपुर्द किया गया था और जिसका होना कठिन था।

जवान - उसके साथ और कौन-कौन है?

डाकू - लीला के अतिरिक्त केवल पांच लौंडियां और थीं।

जवान - उसे तुमने किस इलाके में पाया और क्या किया, सो खुलासा कहो।

डाकू - उसने जमानिया की सरहद को छोड़ दिया और काशी रहने का विचार करके उसी तरफ का रास्ता लिया। जब काशीजी की सरहद में पहुंची, तो गंगापुर नामक एक स्थान के पास वाले जंगल में एक दिन तक उसे अटकना पड़ा क्योंकि वह लीला को हालचाल लेने और कई भेदों का पता लगाने के लिए पीछे छोड़ आई थी। हम लोगों को उसी समय अपना काम करने का मौका मिला। मैं कई आदमियों को साथ लेकर काशीराज की तहसील में जो गंगापुर में है घुस गया और कुछ असबाब चुराकर इस तरह भागा कि पहरे वालों को पता लग गया और कई सवारों ने हम लोगों का पीछा किया। आखिर हम लोग उन सवारों को धोखा देकर घुमाते हुए उसी जंगल में ले गए, जिसमें मायारानी थी। जब हम लोग मायारानी के पास पहुंचे, तो चोरी का माल उसी के पास पटककर भाग गये और सवारों ने वहां पहुंच और चोरी का माल मायारानी के पास देखकर उन्हीं लोगों को चोर या चोरों का साथी समझा और उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।

जवान - बहुत अच्छा हुआ! शाबाश, तुम लोगों ने अपना काम खूबी के साथ पूरा किया। अच्छा इसके बाद क्या हुआ?

डाकू - इसके बाद की हम लोगों को कुछ भी खबर नहीं है क्योंकि आज्ञानुसार आपके पास हाजिर होने का समय बहुत कम बच गया था इसीलिए फिर उन लोगों का पीछा न किया।

जवान - कोई हर्ज नहीं, हमें इतने ही से मतलब था। अच्छा, अब तुम जाओ जमानिया के पास गंगा के किनारे जो झाड़ी है उसी में परसों रात को किसी समय हम तुम लोगों से मिलेंगे, कदाचित् कोई काम पड़े। (अपने साथी की तरफ देखकर) कहिए देवीसिंहजी, अब इन दोनों सवारों के लिए क्या आज्ञा होती है जो हम लोगों के साथ आये हैं?

देवीसिंह - अगर ये लोग जासूसी का काम अंजाम दे सकें, तो इन्हें काशी भेजना चाहिए।

जवान - ठीक है, और इसके बाद जहां तक जल्द हो, सके, कमलिनीजी से मिलना चाहिए, ताज्जुब नहीं वे कहती हों कि भूतनाथ बड़ा ही बेफिकरा है।

पाठक तो समझ ही गये होंगे कि ये दोनों देवीसिंह और भूतनाथ हैं। डाकुओं और दोनों सवारों को बिदा करने के बाद दोनों ऐयार लौटे और तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुए। इस जगह से जमानिया केवल चार कोस की दूरी पर था इसलिए ये दोनों ऐयार सबेरा होने के पहले ही उस टीले पर जा पहुंचे, जो दारोगा वाले बंगले के पीछे की तरफ था और जहां से दोनों ऐयारों और कुमारों को साथ लिए हुए कमलिनी मायारानी के तिलिस्मी बाग वाले देवमंदिर में गई थी। हम पहले लिख आये हैं कि इस टीले पर एक कोठरी थी जिसमें पत्थर के चबूतरे पर पत्थर ही का एक शेर बैठा हुआ था। वह चबूतरा और शेर देखने में तो पत्थर का मालूम होता था, मगर वास्तव में किसी मसाले का बना हुआ था। दोनों ऐयार उस शेर के पास जाकर खड़े हो गये और बातचीत करने लगे। भूतनाथ और देवीसिंह को इस समय इस बात का गुमान भी न था कि उनके पीछे-पीछे दो औरतें कुछ दूर से आ रही हैं और इस समय भी कोठरी के बाहर छिपकर खड़ी उन दोनों की बातें सुनने के लिए तैयार हैं। इन दोनों औरतों में से एक तो मायारानी और दूसरी नागर है। पाठकों को शायद ताज्जुब हो कि मायारानी को तो चोरी के इल्जाम में काशीराज के सवारों ने गिरफ्तार कर लिया था, फिर वह यहां क्योंकर आई इसलिए थोड़ा हाल मायारानी का इस जगह लिख देना उचित जान पड़ता है।

जब उन सवारों ने चारों तरफ से मायारानी को घेर लिया तब एक दफे तो वह बहुत ही परेशान हुई मगर तुरत ही सम्हल बैठी और फुर्ती के साथ उसने अपने तिलिस्मी तमंचे से काम लिया। उसने तमंचे में तिलिस्मी गोली भरकर उसी जगह जमीन पर मारी जहां आप बैठी हुई थी। एक आवाज हुई और गोली में से बहुत-सा धुआं निकलकर धीरे-धीरे फैलने लगा मगर सवारों ने इस बात पर कुछ ध्यान न दिया और मायारानी तथा उसकी लौंडियों को गिरफ्तार कर लिया। मायारानी के तमंचा चलाने पर सवारों को क्रोध आ गया था इसलिए कई सवारों ने मायारानी की जूतों और लातों से खातिरदारी भी की, यहां तक कि वह बेहाल होकर जमीन पर गिर पड़ी, उसके साथ-ही-साथ लीला तथा और लौंडियों ने भी खूब मार खाई, मगर इस बीच में तिलिस्मी गोली का धुआं हल्का होकर चारों तरफ फैल गया और सभी के आंख-नाक में घुसकर अपना काम कर गया। मायारानी और लीला को छोड़ बाकी जितने वहां थे सबके सब बेहोश हो गये थे। न सवारों को दीन-दुनिया की खबर रही और न मायारानी की लौंडियों को तन-बदन की सुध रही। पाठकों को याद होगा कि बेहोशी का असर न होने के लिए मायारानी ने तिलिस्मी अर्क पी लिया था और वही अर्क लीला को पिलाया था। अभी तक इस अर्क का असर बाकी था जिसने मायारानी और लीला को बेहोश होने से बचाया।

मार के सदमे से आधी घड़ी तक तो मायारानी में उठने की सामर्थ्य न रही, इसके बाद जान के खौफ से वह किसी तरह उठी और लीला को साथ लेकर वहां से भागी। बेचारी लौंडियों को, जिन्होंने ऐसे दुःख के समय में भी मायारानी का साथ दिया था, मायारानी ने कुछ भी न पूछा, हां लीला का ध्यान उस तरफ जा पड़ा। उसने अपने ऐयारी के बटुए में से लखलखा निकाला और लौंडियों को सुंखाकर होश में लाने के बाद सभी को भाग चलने के लिए कहा।

लौंडियों को साथ लिए हुए लीला और मायारानी वहां से भागीं मगर घबड़ाहट के मारे इस बात को न सोच सकीं कि कहां छिपकर अपनी जान बचानी चाहिए, अस्तु वे सब सीधे दारोगा वाले बंगले की तरफ रवाना हुईं। उस समय सबेरा होने में कुछ विलम्ब था, वे खौफ के मारे छिपाती-छिपती दिन-भर बराबर चलती गईं और रात को भी कहीं ठहरने की नौबत न आई। आधी रात से कुछ ज्यादा जा चुकी थी जब वे सब दारोगा वाले बंगले पर जा पहुंचीं। इत्तिफाक से नागर भी रास्ते ही में इन लोगों से मिली जो मायारानी से मिलने के लिए मुश्की घोड़ी पर सवार खास बाग की तरफ जा रही थी। इस नागर ने मायारानी को न पहचाना, मगर लीला ने नागर को पहचानकर आवाज दी। नागर जब मायारानी के पास आई तो उसे ऐसी अवस्था में देखकर ताज्जुब करने लगी। मायारानी ने संक्षेप में अपना हाल नागर से कहा जिसे सुन वह अफसोस करने लगी और बोली, ''मुझको भी भूतनाथ पर कुछ-कुछ शक होता है, ताज्जुब नहीं कि उसने धोखा दिया हो, खैर, कोई हर्ज नहीं है मैं बहुत जल्द इस बात का पता लगा लूंगी। आप काशीजी चलकर मेरे मकान में रहिये और देखिये कि मैं भूतनाथ को क्योंकर फंसाती हूं।''

मायारानी और नागर की बातें पूरी न होने पाई थीं कि सामने से दो आदमियों के आने की आहट मालूम हुई। वे दोनों देवीसिंह और भूतनाथ थे। यद्यपि अंधेरे के कारण मायारानी ने उन दोनों को न पहचाना और पहचानने की उसे कोई आवश्यकता भी न थी, मगर जब वे दोनों टीले की तरफ मुड़े, तब मायारानी को शक पैदा हुआ और उसने धीरे से नागर के कान में कहा - ''दोनों टीले पर जा रहे हैं इससे मालूम होता है कि कमलिनी के साथी हैं, क्योंकि उस टीले पर बिना जानकार आदमी के और कोई इस समय कदापि न जायगा।

नागर - हां, मुझे भी यही शक होता है कि ये दोनों कमलिनी के साथी या वीरेन्द्रसिंह के ऐयार हैं और ताज्जुब नहीं कि आपके तिलिस्मी बाग में जाने की नीयत से उस टीले पर जा रहे हों, क्योंकि बाबाजी की जुबानी मैं कई दफे सुन चुकी हूं कि तिलिस्मी बाग में जाने के लिए इस टीले पर से भी एक रास्ता है।

मायारानी - हां, यह तो मैं भी जानती हूं कि इस टीले पर से मेरे तिलिस्मी बाग में जाने का रास्त है मगर इस राह से क्योंकर जाया जा सकता है, इसकी मुझे खबर नहीं है। ताज्जुब नहीं कि खून से लिखी किताब की बदौलत कमलिनी को इन सब रास्तों का हाल मालूम हो गया हो, क्योंकि वह किताब नानक और भूतनाथ की बदौलत कमलिनी के हाथ पहुंची ही होगी।

नागर - बेशक ऐसा ही है। खैर, चलिए इन दोनों के पीछे-पीछे चलें। ताज्जुब नहीं कि बहुत-सी बातों का पता लग जाय।

इसके बाद मायारानी केवल नागर को साथ लिए भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे छिपकर टीले पर गई और जब वे दोनों ऐयार कोठरी के अन्दर घुसे तो बाहर छिपकर भूतनाथ तथा देवीसिंह आपस में जो बातें करने लगे, उन्हें सुनने लगीं जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं।

उस चबूतरे पर बैठे हुए शेर के पास खड़े होकर भूतनाथ और देवीसिंह नीचे लिखी बातें करने लगे।

भूतनाथ - (शेर के सिर पर हाथ रखकर) तिलिस्म के चौथे दर्जे में जो देवमन्दिर है उसमें जाने का यही रास्ता है।

देवीसिंह - क्या राजा गोपालसिंह से वहां मुलाकात होगी?

भूतनाथ - अवश्य, बल्कि कमलिनी, लाडिली और दोनों कुमार भी वहां मौजूद होंगे।

देवीसिंह - इस दरवाजे के खोलने की तरकीब राजा गोपालसिंह ने आपको बता दी?

भूतनाथ - हां, राजा गोपालसिंह और कमलिनी ने भी दरवाजे के खोलने की तरकीब बताई थी, मगर यह रास्ता बड़ा ही खतरनाक है। अच्छा, अब मैं दरवाजा खोलता हूं।

इतना कहकर भूतनाथ ने शेर की बाईं आंख में उंगली डाली। आंख अन्दर की तरफ घुस गई और इसके साथ ही शेर ने मुंह खोल दिया। भूतनाथ ने दूसरा हाथ शेर के मुंह में डाला और कोई पेंच घुमाया जिससे उस चबूतरे के आगे वाला पत्थर हटकर जमीन के साथ सट गया जिस पर शेर बैठा हुआ था और नीचे उतरने के लिए रास्ता मालूम पड़ने लगा। देवीसिंह ने बत्ती जलाने का इरादा किया मगर भूतनाथ ने मना किया और कहा कि नहीं, तुम चुपचाप मेरे पीछे-पीछे चले आओ, नीचे उतर जाने के बाद बत्ती जलावेंगे। आगे-आगे भूतनाथ और पीछे-पीछे देवीसिंह, दोनों ऐयार नीचे उतरे और वहां बटुए में से सामान निकालकर भूतनाथ ने मोमबत्ती जलाई। वह एक कोठरी थी जिसमें तीन तरफ तो दीवार थी और एक तरफ की दीवार सुरंग के रास्ते के तौर पर थी अर्थात् उधर से किसी सुरंग में जाने का रास्ता था। कोठरी के बीचोंबीच में लोहे का एक-एक खम्भा था और खम्भे के ऊपर एक गरारीदार पहिया था जिसे भूतनाथ ने घुमाया और देवीसिंह से कहा, ''जिस राह से हम आये हैं उसे यहां से बन्द करने की यही तरकीब है और (हाथ का इशारा करके) यही सुरंग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में गई है!'' इसके बाद भूतनाथ और देवीसिंह सुरंग में घुसकर आगे की तरफ बढ़े।

इस सुरंग की चौड़ाई चार हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हुई थी अर्थात् एक पत्थर सफेद तो दूसरा स्याह, इसके बाद सफेद और फिर स्याह, इसी तरह दोनों रंग के पत्थर सिलसिलेवार लगे हुए थे। सुरंग के दोनों तरफ की दीवारें लोहे की थीं और थोड़ी-थोड़ी दूर पर लोहे के बनावटी आदमी दीवार के साथ खड़े थे जो अपने लम्बे हाथ फैलाए हुए थे। भूतनाथ ने देवीसिंह की तरफ देखकर कहा, ''इस राह से जाना और अपनी जान पर खेलना एक बराबर है। देखिए बहुत सम्हलकर मेरे पीछे चले आइए और इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखिए कि स्याह पत्थर पर पैर न पड़ने पावे नहीं तो जान न बचेगी। कमलिनी ने मुझे अच्छी तरह समझाकर कहा था कि सुरंग की दीवार के साथ जो लोहे के आदमी हाथ फैलाये खड़े हैं वे उस समय काम करते हैं जब कोई स्याह पत्थर पर पैर रखता है। स्याह पत्थर पर पैर रखते ही वे उसको अपने दोनों हाथों से ऐसा पकड़ लेते हैं कि फिर किसी तरह उनके कब्जे से निकल नहीं सकता। मैं समझता हूं कि इस सुरंग में कई आदमी धोखे में पड़कर मारे गये होंगे, इसलिए उचित है कि मेरे और तुम्हारे दोनों के हाथ में एक-एक मोमबत्ती रहे।

भूतनाथ की बातें सुनकर देवीसिंह ताज्जुब करने लगे, आखिर लाचार होकर एक मोमबत्ती और जलाई और तब बड़ी होशियारी से सफेद पत्थरों पर पैर रखते हुए आगे बढ़े। यह सुरंग एकदम सीधी बनी हुई थी और इसकी जमीन हर तरह से साफ थी, जिसका सबब शायद यह हो कि यहां कहीं से गर्द-गुबार के आने की जगह नहीं थी। फिर इस सुरंग में ऐसी कारीगरी भी की गई थी कि किसी-किसी जगह दीवार में से साफ छनी हुई हवा आती और दूसरी राह से निकल जाती थी जिससे सुरंग की हवा हरदम साफ बनी रहती थी और उसमें जहर का असर पैदा नहीं होने पाता था।

लगभग दो सौ कदम जाने के बाद देखा कि दाहिनी तरफ दीवार के साथ वाले लोहे के एक आदमी के दोनों हाथ सिमटे हुए हैं और उनके बीच में हड्डी का एक ढांचा फंसा हुआ है। वह ढांचा मनुष्य के शरीर का था जिसे देखते ही भूतनाथ ने देवीसिंह से कहा, ''देखिये यह धोखा का नमूना है। कोई अनजान आदमी सुरंग में आकर जान दे बैठा है, अनजान कैसे कहें क्योंकि यहां तक तो आ ही चुका था शायद धोखा खा गया हो।'' दोनों ऐयार ताज्जुब से उस पंजर को देखने लगे, पर इसी समय यकायक देवीसिंह की निगाह पीछे की तरफ (जिधर से ये दोनों आये थे) जा पड़ी और एक रोशनी देख देवीसिंह ने ताज्जुब के साथ भूतनाथ से कहा, ''देखिये तो वह रोशनी कैसी है'

भूतनाथ - (बत्ती के आगे हाथ रखकर और गौर से रोशनी की तरफ देखकर) कोई आ रहा है!

देवीसिंह - दो औरतें मालूम पड़ती हैं।

भूतनाथ - ठीक है, शायद लाडिली और कमलिनी हों, क्योंकि सिवाय जानकार के और कोई तो इस सुरंग में आ नहीं सकता।

देवीसिंह - मुझे तो विश्वास नहीं होता कि वे कमलिनी और लाडिली होंगी।

भूतनाथ - शक तो मुझे भी होता है, खैर, चलकर देख ही क्यों न लें।

भूतनाथ और देवीसिंह दोनों फिर पीछे की तरफ लौटे, अर्थात् उस रोशनी की तरफ बढ़े जो यकायक दिखाई दी थी। दो ही कदम बढ़े होंगे कि कोई चीज उनके सामने जमीन पर आकर गिरी और पटाके की-सी आवाज हुई, इसके साथ ही उसमें से बेहोशी पैदा करने वाला जहरीला धुआं निकला। वह तिलिस्मी गोली थी जो मायारानी ने तिलिस्मी तमंचे में भरकर भूतनाथ और देवीसिंह की तरफ चलाई थी। भूतनाथ और देवीसिंह इस गुमान में पीछे की तरफ हटे थे कि शायद वह रोशनी कमलिनी और लाडिली के साथ हो, मगर वास्तव में ये दोनों मायारानी और नागर थीं जिन्होंने छिपकर भूतनाथ और देवीसिंह की बातें सुनी थीं। जब दोनों ऐयार शेर वाला दरवाजा खोलकर तहखाने में उतर गए थे तो चर्खा चलाकर दरवाजा बन्द करने के पहले ही ये दोनों भी दरवाजे के अन्दर घुसकर दो-चार सीढ़ी नीचे उतर आई थीं और इन्होंने वे बातें भी सुन ली थीं जो नीचे उतर जाने के बाद देवीसिंह और भूतनाथ में हुईं।

 

बयान - 10

राजा गोपालसिंह तथा कमलिनी और लाडिली को हम देवमन्दिर में छोड़ आये हैं। वे तीनों भूतनाथ के आने की उम्मीद में देर तक देवमन्दिर में रहे, मगर जब भूतनाथ न आया तो लाचार होकर कमलिनी ने गोपालसिंह से कहा -

कमलिनी - मालूम होता है कि भूतनाथ किसी काम में फंस गया। खैर, अब हम लोगों को यहां व्यर्थ रुकना उचित नहीं क्योंकि अभी बहुत-कुछ काम करना बाकी है।

गोपालसिंह - ठीक है, मगर जहां तक मैं समझता हूं, तुम्हारे करने योग्य इस समय कोई काम नहीं है क्योंकि दोनों कुमार तिलिस्म के अन्दर जा ही चुके हैं, और बिना तिलिस्म तोड़े अब उनका बाहर निकलना कठिन है, हां, कम्बख्त मायारानी के विषय में बहुत कुछ करना है सो उसके लिए मैं अकेला काफी हूं, इसके अतिरिक्त और जो कुछ काम है उसे ऐयार लोग बखूबी कर सकते हैं।

कमलिनी - आपकी बातों से पाया जाता है कि मेरे यहां रहने की अब कोई आवश्यकता नहीं।

गोपालसिंह - बेशक मेरे कहने का यही मतलब है।

कमलिनी - अच्छा तो मैं लाडिली को साथ लेकर अपने घर जाती हूं, उधर ही से रोहतासगढ़ पर ध्यान रक्खूंगी।

गोपालसिंह - हां तुम्हें वहां अवश्य जाना चाहिए क्योंकि किशोरी और कामिनी भी उसी मकान में पहुंचा दी गई हैं, उनसे जब तक न मिलोगी तब तक वे बेचैन रहेंगी, इसके अतिरिक्त कई कैदियों को भी तुमने वहां भिजवाया है, उनकी भी खबर लेनी चाहिए।

कमलिनी - अच्छा, थोड़ी देर तक भूतनाथ की राह और देख लीजिए।

आधी रात बीत जाने के बाद तीनों आदमी वहां से रवाना हुए। वे पहले उस गोल खम्भे के पास आये जो कमरे के बीचोंबीच में था और जिस पर तरह-तरह की मूरतें बनी हुई थीं। राजा गोपालसिंह ने एक मूरत पर हाथ रखकर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखाई दी। दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उस खिड़की के अन्दर घुस गये; जहां नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। यद्यपि उसके अन्दर एकदम अंधेरा था, मगर तीनों आदमी अन्दाज से उतरते चले गए, जब नीचे एक कोठरी में पहुंचे तो गोपालसिंह ने मोमबत्ती जलाई। मोमबत्ती जलाने का सामान उसी कोठरी में एक आले पर रक्खा हुआ था जिसे अंधेरे में ही गोपालसिंह ने खोज लिया था। वह कोठरी लगभग दस हाथ के चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी। चारों तरफ दीवार में चार दरवाजे बने हुए थे और छत में जंजीरें लटक रही थीं। गोपालसिंह ने एक जंजीर हाथ से पकड़कर खींची जिससे गोल खम्भे वाला वह दरवाजा बन्द हो गया जिस राह से तीनों नीचे उतरे थे। इसके बाद गोपालसिंह उत्तर तरफ वाली दीवार के पास गये और दरवाजा खोलने का उद्योग करने लगे। उस दरवाजे में तांबे की सैकड़ों कीलें गड़ी हुई थीं। और हर कील के मुंह पर उभड़ा हुआ एक-एक अक्षर बना हुआ था। यह दरवाजा उसी सुरंग में जाने के लिए था जो दारोगा वाले बंगले के पीछे वाले टीले तक पहुंची हुई थी या जिस सुरंग के अन्दर भूतनाथ और देवीसिंह का जाना ऊपर के बयान में हम लिख आये हैं। गोपालसिंह ने दरवाजे में लगी हुई कीलों को दबाना शुरू किया। पहले उस कील को दबाया जिसके सिरे पर 'हे' अक्षर बना हुआ था, इसके बाद 'र' अक्षर की कील को दबाया, फिर 'म' और 'ब' अक्षर की कील को दबाया ही था कि दरवाजा खुल गया और दोनों सालियों को साथ लिए हुए गोपालसिंह उसके अन्दर चले गये तथा भीतर जाकर हाथ के जोर से दरवाजा बन्द कर दिया। इस दरवाजे के पिछली तरफ भी वे ही बातें थीं जो बाहर थीं। अर्थात् भीतर से भी उसमें वैसी ही कीलें जड़ी हुई थीं। भीतर चार-पांच कदम जाने के बाद सुरंग की जमीन स्याह और सफेद पत्थरों से बनी हुई मिली और उसी जगह पहुंचे जहां भूतनाथ और देवीसिंह खड़े थे। ये लोग भी ठीक उसी समय वहां पहुंचे जब मायारानी की चलाई हुई गोली में से जहरीला धुआं निकलकर सुरंग में फैल चुका था और दोनों ऐयार बेहोशी के असर में झूम रहे थे। कमलिनी, लाडिली तथा राजा गोपालसिंह इस धुएं से बिल्कुल बेखबर थे और उन्हें इस बात का गुमान भी न था कि मायारानी ने इस सुरंग में पहुंचकर तिलिस्मी गोली चलाई है क्योंकि गोली चलाने के बाद तुरन्त ही मायारानी ने अपने हाथ की मोमबत्ती बुझा दी थी।

राजा गोपालसिंह ने वहां पहुंचकर भूतनाथ और देवीसिंह को देखा। कमलिनी ने भूतनाथ को पुकारा, मगर बेहोशी का असर हो जाने के कारण उसने कमलिनी की बात का जवाब न दिया बल्कि देखते-देखते भूतनाथ और देवीसिंह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। कमलिनी, लाडिली और गोपालसिंह के भी नाक और मुंह में वह धुआं गया मगर ये उसे पहचान न सके और भूतनाथ तथा देवीसिंह वे बेहोश हो जाने के बाद ही ये तीनों भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।

आधी घड़ी तक राह देखने के बाद मायारानी और नागर ने मोमबत्ती जलाई। खुशी-खुशी उन दोनों औरतों ने बेहोशी से बचाने वाली दवा अपने मुंह में रक्खी और स्याह पत्थरों से अपने को बचाती हुई वहां पहुंचीं जहां कमलिनी, लाडिली, गोपालसिंह, भूतनाथ और देवीसिंह बेहोश पड़े हुए थे।

अहा, इस समय मायारानी की खुशी का कोई ठिकाना है! इस समय उसकी किस्मत का सितारा फिर से चमक उठा। उसने हंसकर नागर की तरफ देखा और कहा -

माया - क्या अब भी मुझे किसी का डर है

नागर - आज मालूम हुआ कि आपकी किस्मत बड़ी जबरदस्त है। अब दुनिया में कोई भी आपका मुकाबला नहीं कर सकता। (भूतनाथ की तरफ देखकर) देखिए, इस बेईमान की कमर में वही तिलिस्मी खंजर है जो कमलिनी ने उसे दिया था। अहा, इससे बढ़कर दुनिया में और क्या अनूठी चीज होगी!

मायारानी - इस कम्बख्त ने मुझसे कहा था कि कमलिनी ने गोपालसिंह को भी एक तिलिस्मी खंजर दिया है। (गोपालसिंह को अच्छी तरह देखकर) हां, हां, इसकी कमर में भी वही खंजर है! ताज्जुब नहीं कि कमलिनी और लाडिली की कमर में भी इसका जोड़ा हो। (कमलिनी, लाडिली और देवसिंह की तरफ ध्यान देकर) नहीं-नहीं, और किसी के पास नहीं है। खैर दो खंजर तो मिले, एक मैं रक्खूंगी और एक तुझे दूंगी। इसमें जो-जो गुण हैं भूतनाथ की जुबानी सुन ही चुकी हूं, अच्छा भूतनाथ का खंजर तू ले-ले और इसका मैं लेती हूं।

खुशी - खुशी मायारानी ने पहले गोपालसिंह की उंगली से वह अंगूठी उतारी जो तिलिस्मी खंजर के जोड़ की थी और इसके बाद कमर से खंजर निकालकर अपने कब्जे में किया। नागर ने भी पहले भूतनाथ के हाथ से अंगूठी उतारकर पहन ली और तब खंजर पर कब्जा किया। मायारानी ने हंसकर नागर की तरफ देखा और कहा, ''अब इसी खंजर से इन पांचों दुष्टों को इस दुनिया से उठाकर हमेशा के लिए निश्चिन्त होती हूं!''

 

बयान - 11

मायारानी ने गोपालसिंह को मारने के लिए जैसे ही खंजर उठाया, वैसे ही नागर ने फुर्ती से उसकी कलाई पकड़ ली और कहा -

नागर - ठहरो - ठहरो! जल्दी न करो, आखिर ये लोग तुम्हारे कब्जे में तो आ ही चुके हैं और अब किसी तरह छूटकर जा नहीं सकते। फिर बिना अच्छी तरह विचार किए जल्दी करने की क्या आवश्यकता है। क्या जाने, सोचने-विचारने से कुछ विशेष लाभ की सूरत ध्यान में आवे।

मायारानी - (रुककर) तुम्हारा कहना ठीक है, परन्तु यदि दुश्मन कब्जे में आ जाय तो उसके मारने में विलम्ब करना उचित नहीं है। इसी (गोपालसिंह) को जब मैंने कैद किया था तो इसके मारने के विषय में सोच-विचार करते-करते वर्षों बिताए और अन्त में इस विलम्ब का क्या नतीजा निकला सो देख ही रही हो, उस विलम्ब ही के कारण आज मैं फकीरिन होकर भी... (गला भर आने के कारण रुककर) आज ईश्वर ने मुझ पर कृपा की है और दुश्मनों को मेरे कब्जे में कर दिया है। ताज्जुब नहीं कि इनके मारने में देर तथा सोच-विचार करने का वही नतीजा हो जो पहले हो चुका है।

नागर - ठीक है और मैं भी इसी में प्रसन्न हूं कि जहां तक हो सके ये लोग शीघ्र मार डाले जायं। अहा, कमलिनी के सहित गोपालसिंह का फंस जाना क्या कम खुशी की बात है, और फिर इन दोनों के साथ ही बेईमान भूतनाथ का भी...!

मायारानी - (बात काटकर) आ फंसना, जिसने मेरे साथ सख्त दगा की थी, कम खुशी की बात नहीं है।

नागर - बेशक, परन्तु मैं इन कम्बख्तों की जान ले लेने में विशेष विलम्ब करने के लिए नहीं कहती, हां इतनी देर तक रुक जाने के लिए अवश्य कहती हूं जितनी देर में हम लोग इस बात को बखूबी सोच लें कि इन दुष्टों को मारने के बाद इस सुरंग का भेद मालूम न होने पर भी हम लोग यहां से निकल जा सकेंगे या नहीं?

मायारानी - क्यों, क्या हम लोगों को यहां से निकल जाने में किसी तरह की रुकावट हो सकती है क्या हम लोगों ने भूतनाथ और देवीसिंह की बातें उस समय अच्छी तरह नहीं सुनीं जिस समय दोनों सुरंग में उतर चुके थे क्या उसी रीति से सुरंग का दरवाजा न खुल सकेगा जिस रीति से बन्द किया गया है?

नागर - इन बातों का ठीक-ठीक जवाब मैं नहीं दे सकती, बल्कि इन्हीं बातों पर विचार करने के लिए कुछ देर तक ठहरने को कहती हूं।

मायारानी - (खंजर म्यान में रखकर और कुछ सोचकर) अच्छा-अच्छा, कुछ देर ठहर जाने में कोई हर्ज नहीं है, इन सभी की बेहोशी यकायक दूर नहीं हो सकती, चलो, पहले उस दरवाजे को खोलकर देखें कि वह खुलता है या नहीं।

इतना कहकर नागर को साथ लिए हुए मायारानी सुरंग के दरवाजे की तरफ बढ़ी। जब उस लोहे के खम्भे के पास पहुंची जिस पर वह गरारीदार पहिया था जिसे घुमाकर भूतनाथ ने सुरंग का दरवाजा बन्द किया था तो रुकी और नागर की तरफ देखकर बोली, ''इसी पहिए को घुमाकर भूतनाथ ने दरवाजा बन्द किया था।''

नागर - जी हां, अब इसी पहिये को उल्टा घुमाकर देखना चाहिए कि दरवाजा खुलता है या नहीं।

मायारानी - अच्छा, तुम्हीं इस पहिये को घुमाओ।

नागर ने उस पहिये को कई दफे उल्टा घुमाया और वह बखूबी घूम गया, इसके बाद दोनों औरतें यह देखने के लिए सीढ़ी पर चढ़ीं कि दरवाजा खुला या नहीं, मगर दरवाजा ज्यों-का-त्यों बन्द था। मायारानी को बहुत ताज्जुब हुआ और वह घबड़ायी-सी होकर नीचे उतर आई और नागर की तरफ देखकर बोली, ''तुम्हारा सोचना ठीक निकला।''

नागर - इसी से मैंने आपको रोका था, यदि आप जोश में आकर इन सभी को मार डालतीं तो फिर हम लोग भी इसी सुरंग में मर मिटते।

मायारानी - बेशक-बेशक। (कुछ सोचकर) अच्छा, एक बार उधर चलकर देखना चाहिए जिधर से यह (गोपालसिंह) आया है, शायद उधर का दरवाजा खुला हो।

नागर - चलिए देखिए, शायद कुछ काम निकले। मगर ताज्जुब नहीं कि लौटने तक इन लोगों की बेहोशी जाती रहे।

मायारानी - हां, ऐसा हो सकता है। अच्छा, तो इन लोगों के हाथ-पैर कसकर बांध देने चाहिए जिससे यदि बेहोशी जाती भी रहे तो कुछ न कर सकें।

नागर ने उन सभी को अच्छी तरह गौर से देखा जो उस जगह बेहोश पड़े थे। भूतनाथ और देवीसिंह की कमर में कमन्द मौजूद थे, उन्हें खोल लिया और दोनों ने मिलकर उन्हीं कमन्दों से भूतनाथ, देवीसिंह, कमलिनी, लाडिली और गोपालसिंह के हाथ-पैर बेरहमी के साथ खूब कसकर बांध दिए और इसके बाद दोनों औरतें उसी तरफ चलीं जिधर से कमलिनी और लाडिली को साथ लिए हुए राजा गोपालसिंह आये थे।

मायारानी और नागर मोमबत्ती की रोशनी में स्याह पत्थरों को बचाती हुई उस दरवाजे के पास पहुंचीं जिसे खोलकर राजा गोपालसिंह आए थे। यह वही दरवाजा था जिसमें अक्षरों वाले कील जड़े हुए थे और किसी अनजान आदमी से इसका खुलना बिल्कुल ही असम्भव था। मायारानी ने इसको खोलने का बहुत-कुछ उद्योग किया, मगर कुछ काम न चला। लाचार होकर उसने तरद्दुद और घबड़ाहट की निगाह नागर पर डाली।

नागर - मेरा सोचना बहुत ठीक निकला। यदि वे लोग मार डाले जाते तो निःसन्देह हम दोनों की मौत भी इसी सुरंग में हो जाती।

मायारानी - सच है, मगर अब क्या करना चाहिए जहां तक मैं सोचती हूं, इसके जवाब में तुम यही कहोगी कि इनमें से किसी को होश में लाकर जिस तरह बन पड़े, दरवाजा खोलने की तरकीब मालूम करनी चाहिए।

नागर - जी हां, क्योंकि सिवाय इसके कोई दूसरी बात ध्यान में नहीं आती।

मायारानी - खैर, यदि ऐसा हो भी जाय अर्थात् इन पांचों में से किसी को होश में लाने और डराने-धमकाने से दरवाजा खुलने का भेद मालूम हो जाय तो फिर क्या किया जायगा मैं समझती हूं कि तुम यही कहोगी कि दरवाजे का भेद मालूम होने के बाद इन पांचों को कत्ल कर देना चाहिए।

नागर - नहीं, मेरी यह राय नहीं है, बल्कि मैं इन लोगों को उस समय तक कैद में रखना मुनासिब समझती हूं जब तक कि रिक्तग्रन्थ और अजायबघर की ताली, जो तुमने भूतनाथ को दे दी है, अपने कब्जे में न आ जाय।

मायारानी - ओफ! मैं वास्तव में सैकड़ों आफतों में घिरी हुई हूं। (कुछ सोचकर) खैर, कोई चिन्ता नहीं है। देखो तो, क्या होता है। मैं इन लोगों को जीता कदापि न छोड़ूंगी। (रुककर) हां, जरा ठहरो, इन पांचों में से किसी को होश में लाने के पहले सभी की तलाशी अच्छी तरह ले लेनी चाहिए। ताज्जुब नहीं कि रिक्तग्रन्थ और अजायबघर की ताली भी इन लोगों में से किसी के पास हो।

नागर - हां, मुमकिन है कि वे दोनों चीजें इन लोगों के पास हों। अच्छा, चलो, सबसे पहले यही काम किया जाय।

नागर को साथ लिए हुए मायारानी फिर उस जगह पहुंची जहां गोपालसिंह और भूतनाथ वगैरह बेहोश पड़े थे। हम ऊपर लिख आये हैं कि राजा गोपालसिंह और भूतनाथ के पास जो तिलिस्मी खंजर था, वह मायारानी ले चुकी है। एक खंजर उसने अपने पास रखा और दूसरा नागर को दे दिया। फिर उसने सबसे पहले भूतनाथ के बटुए की तलाशी ली, मगर उसमें कोई ऐसी चीज न निकली जो मायारानी के काम की होती। यद्यपि तरह-तरह की दवाओं और मसालों से भरी हुई कई खूबसूरत डिबियाएं नजर आर्ईं, मगर उनका गुण न मालूम होने के कारण मायारानी के लिए वे बिलकुल ही बेकार थीं। जब बटुए में से अपने मतलब की कोई चीज न पाई तो कमर और कपड़ों की जेबें आदि भी अच्छी तरह टटोलीं, मगर उससे भी कुछ काम न चला। अन्त में उदास होकर वह राजा गोपालसिंह की तरफ लौटी और उनकी तलाशी लेने लगी।

ऊपर का बयान पढ़ने से पाठकों को मालूम ही हो चुका होगा कि अजायबघर की ताली, जो मायारानी ने भूतनाथ को दी थी, वह राजा गोपालसिंह ने भूतनाथ से ले ली थी। इस समय वही अजायबघर की ताली राजा गोपालसिंह के पास थी जो तलाशी लेने के समय मायारानी के हाथ लगी। ताली पाकर वह बहुत खुश हुई और नगार की तरफ देखकर बोली -

मायारानी - लीजिए, अजायबघर की ताली तो मिल गई। अब कोई परवाह नहीं। यद्यपि मुझे मालूम हो चुका है कि मेरी फौज मुझसे बिगड़ गई, मेरा दीवान मुझसे दुश्मनी करने को तैयार है, तुम्हारे मकान का भेद वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों को मालूम हो चुका है और इस सबब से मुझे रहने के कोई ठिकाना नहीं है, मगर अब अजायबघर की ताली मिल जाने से मुझे बहुत-कुछ भरोसा हो गया। मैं अब खुशी से दारोगा वाले बंगले में रहकर अपने दुश्मनों से बदला ले सकती हूं, फौजी सिपाहियों के दिल से शक दूर करके अपना रुआब जमा सकती हूं और उन्हें ठीक करके अपने ढर्रे पर ला सकती हूं। कम्बख्त दीवान को भी सजा देना कोई बड़ी बात नहीं है। इसके सिवाय तिलिस्मी खंजर की बदौलत मुश्किल से मुश्किल काम सहज ही कर सकूंगी!

नागर - ठीक है, अच्छा देखिये, शायद रिक्तग्रंथ भी इन लोगों में से किसी के पास हो।

मायारानी ने फिर तलाशी लेना शुरू किया। गोपालसिंह के बाद कमलिनी, लाडिली और देवीसिंह की भी तलाशी ली, मगर रिक्तग्रंथ (खून से लिखी किताब) का पता न लगा और न कोई ऐसी चीज ही मिली जो मायारानी के मतलब की होती। आखिर लाचार होकर यह निश्चय किया कि भूतनाथ को होश में लाकर और डरा-धमकाकर दरवाजा खोलने की तरकीब जाननी चाहिए। मायारानी की आज्ञानुसार नागर ने अपने बटुए में से लखलखा निकाला और भूतनाथ को सुंघाने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि सुरंग के सिरे पर (जिधर से भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे मायारानी और नागर आई थीं) रोशनी दिखाई दी। नागर ने भूतनाथ को लखलखा सुंघाने के लिए जो हाथ बढ़ाया था रोक लिया, लखलखे की डिबिया जमीन पर रखकर तिलिस्मी खंजर म्यान से निकाल लिया, और अपने हाथ की मोमबत्ती बुझाकर मायारानी से बोली, ''देखिये मैंने मोमबत्ती बुझाकर अंधेरा कर दिया, अब आप इधर-उधर मत हटिये, कहीं ऐसा न हो कि स्याह पत्थर पर पैर पड़ जाय और आप भी तिलिस्मी खंजर अपने हाथ में ले लीजिए, ताज्जुब नहीं कि यह आने वाला हम लोगों का दुश्मन और वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार हो।''

मायारानी - (तिलिस्मी खंजर के कब्जे पर हाथ रखके) यद्यपि तुमने मोमबत्ती बुझा दी है, मगर उस आने वाले की नजर पहले ही इस रोशनी पर पड़ चुकी होगी। (गौर से देखकर) मगर मुझे तो मालूम होता है कि यह हमारे दारोगा साहब हैं, जिन्हें हम लोग बाबाजी भी कहते हैं।

नागर - शक तो मुझे भी होता है। (रुककर), हां, अब वे कई कदम आगे बढ़ आये हैं। इससे उनकी दाढ़ी और जटा साफ दिखाई दे रही है। ठीक है निःसन्देह यह दारोगा साहब ही हैं! न मालूम राजा वीरेन्द्रसिंह की कैद से ये क्योंकर निकल आये! इनका छूट आना हम लोगों के लिए बहुत अच्छा हुआ!

मायारानी - बेशक, इनके छूटकर चले आने से मुझे खुशी होती, अगर वे इस समय यहां न आते, क्योंकि गोपालसिंह के बारे में मैंने लोगों को जो कुछ धोखा दिया है, इसकी खबर इन्हें भी नहीं है, इसलिए ताज्जुब नहीं कि गोपालसिंह को यहां देखकर दारोगा साहब जोश में आ जायें और मुझसे थुक्काफजीती करने के लिए तैयार हो जायें, क्योंकि इनके दिल में राजा की बहुत मुहब्बत थी। ओह, इस समय इनका यहां आना बहुत ही बुरा हुआ। खैर, तू होशियार रहना। इस तिलिस्मी खंजर का गुण इन्हें मालूम न होने पाये और न गोपालसिंह के बारे में कुछ -।

नागर - बहुत अच्छा, मैं कुछ भी नहीं बोलूंगी। लीजिये, अब वे बहुत पास आ गए। बेशक, दारोगा साहब ही हैं। अब अगर हम भी मोमबत्ती जला लें तो कोई हर्ज नहीं।

मायारानी - कोई हर्ज नहीं।

ऊपर लिखी बातें मायारानी और नागर में बहुत चुपके और जल्दी के साथ हुईं। नागर ने मोमबत्ती जलाई और इसके बाद दोनों औरतें आगे अर्थात् दारोगा की तरफ बढ़ीं। दारोगा ने भी इन दोनों को पहचाना और जब वह मायारानी के पास पहुंचा तो हंसकर बोला, ''ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि मैं राजा वीरेन्द्रसिंह के कब्जे से निकलकर चला आया और तुमको राजी-खुशी अपने सामने देख रहा हूं।''

मायारानी - (बनावटी हंसी के साथ) आपके छूट आने की मुझे हद से ज्यादा खुशी हुई। इधर थोड़े दिनों से मैं तरह-तरह की मुसीबतों में पड़ी हूं, जिसकी कुछ भी आशा न थी और यह सब आपके न रहने से ही हुआ।

दारोगा - हां, मुझे भी बहुत-सी बातों का पता लगा है। इस समय जब मैं अपने बंगले में पहुंचा तो वहां लीला और कई लौडियों को पाया। बहुत-सा हाल तो वहां लीला की जुबानी मालूम हुआ, यह भी उसी से सुना कि टीले पर दो आदमियों को आते देखकर मायारानी और नागर भी उसी तरफ गई हैं। यही सुनकर मैं भी इस सुरंग में आया हूं, नहीं तो मुझे यहां आने की कोई जरूरत न थी।

मायारानी - जी हां, मैं वीरेन्द्रसिंह के ऐयार भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे यहां आई। इस सुरंग का भेद मुझे कुछ भी मालूम न था। और आपने भी इस विषय में आज तक कुछ नहीं कहा था, भूतनाथ ने सुरंग का दरवाजा खोला और उसके पीछे-पीछे छिपकर मैं यहां तक चली तो आई, मगर यहां से किसी तरह निकल नहीं सकती हूं। क्योंकि भूतनाथ ने सुरंग के अन्दर आकर दरवाजा बन्द कर दिया था और अब मुझसे वह दरवाजा किसी तरह नहीं खुल रहा है। ईश्वर ने बड़ी कृपा की जो इस समय आपको यहां भेज दिया, चलिए पीछे हटिये, पहले मुझे दरवाजा खोलने की तरकीब बता दीजिए, और कुछ बातचीत पीछे होगी।

दारोगा - (हंसकर) अब तो मैं आ ही चुका हूं, तुम क्यों घबड़ाती हो पहले यह तो बताओ कि वे दोनों ऐयार कहां हैं, जिनके पीछे-पीछे तुम यहां आई थीं?

इस समय मायारानी की विचित्र अवस्था थी। वह मुंह से बातें तो कर रही थी मगर दिल में यही सोच रही थी कि किसी तरह राजा गोपालसिंह का भेद छिपाना चाहिए, जिसमें बाबाजी (दारोगा) को यह न मालूम हो कि मैंने वर्षों से गोपालसिंह को कैद कर रखा था, मगर इसके बचाव की कोई सूरत ध्यान में नहीं आती थी। वह अपने उछलते हुए कलेजे को दबाने की कोशिश कर रही थी, मगर वह किसी तरह दम नहीं लेता था। उसके चेहरे पर भी खौफ और तरद्दुद की निशानी पाई जाती थी। जो उस समय और भी ज्यादा हो गयी, जब बाबाजी ने यह कहा - ''वे दोनों ऐयार कहां हैं जिनके पीछे-पीछे तुम यहां आई थीं' आखिर लाचार होकर मायारानी ने बातें बनाकर अपना काम निकालना चाहा और अपने को अच्छी तरह संभालकर बातचीत करने लगी।

मायारानी - (पीछे की तरफ इशारा करके) वे दोनों ऐयार उधर पड़े हुए हैं। मैंने अपनी हिकमत से उन्हें बेहोश करके छोड़ दिया है। केवल वे दोनों ही नहीं, बल्कि कमलिनी और लाडिली भी मय एक ऐयार के मेरे फन्दे में आ पड़ी हैं जिनसे यकायक इसी सुरंग में मुलाकात हो गई थी।

बाबाजी - (चौंककर) कमलिनी और लाडिली!

मायारानी - जी हां, शायद आपने अभी तक सुना नहीं कि लाडिली भी कमलिनी से मिल गई।

बाबाजी - ओफ! यह खबर मुझे वहां क्योंकर मिल सकती थी, क्योंकि मैं ऐसे तहखाने में कैद था, जहां हवा का भी जाना मुश्किल से हो सकता था। खैर चलो, मैं जरा उन ऐयारों की सूरत तो देखूं।

अब बाबाजी उधर बढ़े जहां राजा गोपालसिंह, कमलिनी, लाडिली और दोनों ऐयार बेहोश पड़े थे। बाबाजी के पीछे-पीछे मायारानी और नागर भी स्याह पत्थरों को बचाती हुई उसी तरफ बढ़ीं। वहां की जमीन में बनिस्बत सफेद पत्थरों के स्याह पत्थर की पटरियां (सिल्ली) बहुत कम चौड़ी थीं। यद्यपि बाबाजी से मायारानी डरती-दबती और साथ ही इसके उनकी इज्जत और कदर भी करती, परन्तु इस समय उसकी अवस्था में फर्क पड़ गया था। वह धड़कते हुए कलेजे के साथ चुपचाप बाबाजी के पीछे जा रही थी। मगर अपना दाहिना हाथ तिलिस्मी खंजर के कब्जे पर, जो अब उसकी कमर में था, इस तरह रखे हुए थी, जैसे उसे म्यान से निकालकर काम में लाने के लिए तैयार है। शायद इसका सबब यह हो कि वह बाबाजी पर वार करने का इरादा रखती थी। क्योंकि उसे निश्चय था कि राजा गोपालसिंह को देखते ही बाबाजी बिगड़ खड़े होंगे और एक गुप्त भेद का, जिसकी उन्हें खबर तक न थी, पता लग जाने के कारण उसकी लानत और मलामत करेंगे। साथ ही इसके बाबाजी की चाल भी बेफिक्री की न थी, वह भी कनखियों से पीछे अगल-बगल देखते जाते थे और हर तरह से चौकन्ने मालूम पड़ते थे।

जब बाबाजी उन लोगों के पास आ पहुंचे, तो मोमबत्ती की रोशनी में एक-एक को अच्छी तरह देखने लगे। जब उनकी निगाह राजा गोपालसिंह पर पड़ी तो वे चौंके और मायारानी की तरफ देखकर बोले, ''हैं, यह क्या मामला है! मैं अपनी आंखों के सामने किसे बेहोश पड़ा देख रहा हूं!''

मायारानी - (लड़खड़ाई आवाज से) इसी के बारे में तो मैंने कहा था कि एक ऐयार भी आ फंसा है।

बाबाजी - ओफ, ये तो राजा गोपालसिंह हैं, जिन्हें मरे कई वर्ष हो गये, नहीं-नहीं, मरा हुआ आदमी कभी लौटकर नहीं आता! (कुछ रुककर) यद्यपि दुःख या रंज के सबब से इनकी सूरत में फर्क पड़ गया है, परन्तु मेरे पहचानने में फर्क नहीं है। बेशक यह हमारे मालिक राजा गोपालसिंह ही हैं जिनकी नेकियों ने लोगों को अपना ताबेदार बना लिया था; जिनकी बुद्धिमानी और मिलनसारी प्रसिद्ध थीं, और जिसके सबब से इनकी ताबेदारी में रहना लोग अपनी इज्जत समझते थे। ओफ, तुमने इनके बारे में हम लोगों को धोखा दिया! यद्यपि तुम्हारी बुरी चाल-चलन को मैं खूब जानता था और जानबूझकर कई कारणों से तरह दिये जाता था, मगर मुझे यह खबर न थी कि उस चाल-चलन की हद यहां तक पहुंच चुकी है! (गोपालसिंह की नब्ज देखकर) शुक्र है कि मैं अपने मालिक को जीता पाता हूं।

मायारानी - बाबाजी, आप जल्दी न कीजिए और बिना समझे-बूझे अपनी बातों से मुझे दुःख न दीजिए। जो मैं कहती हूं, उसे मानिये और विश्वास कीजिए कि यह वीरेन्द्रसिंह का ऐयार है और राजा की सूरत बनाकर कई दिनों से रिआया को भड़का रहा है। इसकी खबर मुझको बहुत पहले लग चुकी थी और मैंने मुनादी भी करा दी थी कि एक ऐयार राजा की सूरत बनाकर लोगों को भड़काने के लिए आया है, जो कोई उसका सिर काटकर मेरे पास लावेगा, उसे एक लाख रुपया इनाम दूंगी। आज इत्तिफाक ही से यह कम्बख्त मेरे पास हाथ आ फंसा है।

बाबाजी - (कुछ सोचकर) शायद ऐसा ही हो, मगर तुमने तो कहा था कि मैं भूतनाथ और देवीसिंह के पीछे-पीछे इस सुरंग में आई हूं, फिर ये लोग तुम्हें कैसे मिले क्या ये लोग पहले से ही सुरंग में मौजूद थे?

मायारानी - हां, जब मैं सुरंग में आ चुकी और भूतनाथ तथा देवीसिंह को बेहोश कर चुकी, उसके बाद शायद ये लोग (हाथ का इशारा करके) इस तरफ से यहां आ पहुंचे। उस समय बेहोशी वाली बारूद से निकला धुआं भरा हुआ था, जिसके सबब से ये लोग भी बेहोश होकर लेट गये।

बाबाजी - बेहोशी वाली बारूद से निकला हुआ धुआं! क्या तुमने इन लोगों को किसी नई रीति से बेहोश किया है?

मायारानी - जब मैं दुःखी होकर अपने घर से भागी तो (तिलिस्मी तमंचा और गोली दिखाकर) यह तिलिस्मी तमंचा और गोली निकालकर लेती आई थी। इसी के जरिए से चलाई हुई तिलिस्मी गोली ने अपना काम किया। आप तो इसका हाल जानते ही हैं।

बाबाजी - ठीक है, (राजा गोपालसिंह की तरफ देखकर) मगर मैं कैसे कहूं कि यह वीरेन्द्रसिंह का ऐयार है! अच्छा, देखो मैं अभी इसका पता लगाये लेता हूं।

बाबाजी ने अपने झोले में से एक शीशी निकाली, जिसमें किसी तरह का अर्क था, उस अर्क से अपनी उंगली तर करके राजा गोपालसिंह के गाल में जहां एक तिल का दाग था लगाया और कुछ ठहरकर कपड़े से पोंछ डाला तथा फिर गौर करने के बाद बोले -

बाबाजी - नहीं-नहीं, यह वीरेन्द्रसिंह के ऐयार नहीं हैं, इन्होंने अपने चेहरे को रंगा नहीं है और न नकली तिल का दाग ही बनाया है! अगर ऐसा होता तो इस दवा के लगाने से छूट जाता। ये बेशक राजा गोपालसिंह हैं और तुमने इनके बारे में निःसंदेह हम लोगों को धोखा दिया।

मायारानी - ऐसा न समझिए, वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग अपने चेहरे पर कच्चा रंग नहीं लगाते। अभी हाल ही में तेजसिंह ने मेरे ऐयार बिहारीसिंह को धोखा दिया, उसने उसका चेहरा ऐसा रंग दिया था कि हजार उद्योग करने पर भी बिहारीसिंह उसे साफ न कर सका। इसका खुलासा हाल आप सुनेंगे तो ताज्जुब करेंगे। वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग बड़े धूर्त और चालाक हैं।

बाबाजी - मगर नहीं, मेरी दवा बेकार जाने वाली नहीं है। हां, एक बात हो सकती है।

मायारानी - वह क्या?

बाबाजी - शायद तुमने राजा गोपालसिंह के बारे में हम लोगों को धोखा न दिया हो और खुद ये ही हम लोगों को धोखा देकर कहीं चले गये हों।

मायारानी - नहीं, यह भी नहीं हो सकता।

बाबाजी - बेशक नहीं हो सकता। अच्छा, मैं इन्हें होश में लाता हूं, जो कुछ है इनकी बातचीत से आप ही मालूम हो जायगा।

मायारानी - नहीं-नहीं, ऐसा न कीजिए, पहले इन सबों को इसी तरह बेहोश ले जाकर अपने बंगले में कैद कीजिए, फिर जो होगा, देखा जायगा।

बाबाजी - मैं यह बात नहीं मान सकता!

मायारानी - (जोर देकर) जो मैं कहती हूं वही करना होगा!

बाबाजी - कदापि नहीं, मुझे इस विषय में बहुत-कुछ शक है और राजा साहब के साथ ही साथ मैं कमलिनी और लाडिली को भी होश में लाऊंगा।

इसे सुनते ही मायारानी की हालत बदल गयी, क्रोध के मारे उसके होंठ कांपने लगे, उसकी आंखें लाल हो गयीं और वह तिलिस्मी खंजर म्यान से निकालकर क्रोध-भरी आवाज में बाबाजी से बोली, ''क्या तुम्हें किसी तरह की शेखी हो गई है क्या तुम मेरा हुक्म काट सकते हो क्या तुम अपने को मुझसे बढ़कर समझते हो क्या तुम नहीं जानते कि मैं तिलिस्म की रानी हूं, जो चाहूं सो कर सकती हूं और तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते लो, मैं साफ-साफ कहे देती हूं कि बेशक यह गोपालसिंह हैं। धनपत के साथ सुख भोगने और इनको सताकर तिलिस्म का भेद जानने के लिए मैंने इन्हें कैद कर रखा था, मगर कम्बख्त कमलिनी ने इन्हें कैद से छुड़ा दिया। अब मैं तुम्हारे सामने इन सभी का सिर काटकर अपना गुस्सा मिटाऊंगी और तुम मेरा कुछ भी नहीं कर सकते, अगर ज्यादा सिर उठाओगे तो (खंजर दिखाकर) इसी खंजर से पहले तुम्हारा काम तमाम करूंगी!''

बाबाजी - (हंसकर) बस-बस, बहुत उछल-कूद न करो। यद्यपि मैं बुड्ढा हूं। तथापि तुम दो औरतों से किसी तरह हार नहीं सकता। मैं वही करूंगा, जो मेरे जी में आवेगा। यदि तुम इस तिलिस्म की रानी हो तो मैं भी तिलिस्म का दारोगा हूं, मेरे पास भी अनूठी चीजें हैं, इसके अतिरिक्त तुम मुझसे बिगाड़ करके कुछ फायदा भी नहीं उठा सकतीं और अब तो तुमने साफ कबूल ही लिया कि...

मायारानी - (बात काटकर) हां-हां, कबूल लिया और फिर भी कहती हूं कि तुम्हारे बिना मेरा कुछ हर्ज नहीं हो सकता। तुम्हें अपने दारोगापन की शेखी है तो देखो, मैं अपनी ताकत तुमको दिखाती हूं।

इतना कहकर मायारानी ने तिलिस्मी खंजर का कब्जा दबाया। उसमें से बिजली की तरह चमक पैदा हुई और जब कब्जा ढीला किया तो चमक बन्द हो गई, मगर बाबाजी पर इसका कुछ असर न हुआ जिससे मायारानी को बड़ा ताज्जुब हुआ। आखिर उसने बेहोश करने की नीयत से तिलिस्मी खंजर बाबाजी के बदन से लगाया मगर इससे भी कुछ नतीजा न निकला, बाबाजी ज्यों के त्यों खड़े रह गए। अब तो मायारानी के ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा और वह घबड़ाकर बाबाजी का मुंह देखने लगी। अगर तिलिस्मी खंजर में से चमक न पैदा होती तो उसे शक होता कि यह तिलिस्मी खंजर शायद वह नहीं है जिसकी तारीफ भूतनाथ ने की थी मगर अब वह इस खंजर पर किसी तरह का शक भी नहीं कर सकती थी।

बाबाजी - (हंसकर) कहो मेरा घमण्ड वाजिब है या नहीं?

मायारानी - (तिलिस्मी खंजर की तरफ देखकर) शायद इसमें कुछ...।

बाबाजी - (बात काटकर) नहीं-नहीं, इस खंजर के गुण में किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा। मैं इस खंजर को खूब जानता हूं। यद्यपि तुम्हारे लिए यह एक नई चीज है परन्तु मैं अपने (राजा गोपालसिंह की तरफ इशारा करके) इस मालिक की बदौलत इसी प्रकार और गुण के कई खंजर, कटार, तलवार और नेजे देखे चुका हूं और उनसे काम भी ले चुका हूं, मगर जब मैं तिलिस्मी कामों में सिद्ध के बराबर हो गया तब मेरे दिल से ऐसी तुच्छ चीजों की कदर और इज्जत जाती रही। तुम देखती हो कि इस खंजर का मुझ पर कुछ भी असर नहीं होता। असल तो यह है कि तुम मेरी ताकत को नहीं जानती हो, तुम्हें नहीं मालूम है कि खाली हाथ रहने पर भी मैं क्या-क्या कर सकता हूं! बस मैं अपनी ताकत का हाल खोलना उचित नहीं समझता, परन्तु अफसोस, तुम मुझी को मारने के लिए तैयार हो गईं खैर, कोई चिन्ता नहीं, आज तक मैं तुम्हारी इज्जत करता रहा, और तुमने जो कुछ भला-बुरा किया उसे देखकर भी तरह देता गया, मगर अब देखता हूं तो तुम...।

मायारानी - (बात काटकर) सुनिए-सुनिए, आप जो कुछ कहेंगे मैं समझ गई। मेरी यह नीयत न थी और न है कि आपकी जान लूं क्योंकि केवल आप ही के भरोसे पर मैं कूद रही हूं, और आप ही की मदद से बड़े-बड़े बहादुरों को मैं कुछ नहीं समझती। यह तो साफ जाहिर है कि थोड़े ही दिन आप मुझसे अलग रहे और इसी बीच में मेरी सब दुर्दशा हो गयी। मैं आपको पिता के समान मानती हूं इसलिए आशा है कि (हाथ जोड़कर) इस समय जो कुछ मुझसे भूल हो गई उसे आप बाल-बच्चों की भूल के समान मानकर क्षमा करेंगे, मगर इस कसूर से मेरा असल मतलब सिर्फ इतना ही था कि किसी तरह राजा गोपालसिंह के मारने पर आपको राजी करूं।

बाबाजी पर तिलिस्मी खंजर का कुछ भी असर न होते देख मायारानी का कलेजा धड़कने लगा, वह बहुत डरी और उसे विश्वास हो गया कि तिलिस्मी कारखाने में जितना बाबाजी का दखल और जानकारी है उसका सोलहवां हिस्सा भी उसको नहीं है और उसी के साथ तिलिस्मी चीजों से बाबाजी ने बहुत कुछ फायदा भी उठाया है। यह भी उसी फायदा का असर है कि राजा वीरेन्द्रसिंह की कैद से सहज ही में छूट आए और ऐसे अद्भुत तिलिस्मी खंजर को तुच्छ समझते हैं तथा इसका असर इन पर कुछ भी नहीं हेाता। अब वह इस बात को सोचने लगी कि ऐसे बाबाजी से बिगाड़ करना उचित नहीं बल्कि जिस तरह हो सके उन्हें राजी करना चाहिए, फिर मौका मिलने पर जैसा होगा देखा जाएगा।

ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें मायारानी तेजी के साथ सोच गई और उसी सबब से वह अधीनता के साथ बाबाजी से बात करने लगी। जब वह अपनी बात खत्म करके चुप हो गई तो बाबाजी ने मुस्कुरा दिया और कुछ सोचकर कहा, ''खैर मैं तुम्हारे इस कसूर को माफ करता हूं मगर यह नहीं चाहता कि राजा गोपालसिंह को किसी तरह की तकलीफ हो जिन्हें मुद्दत के बाद आज मैं इस अवस्था में देख रहा हूं।''

मायारानी - तब आपने माफ ही क्या किया यद्यपि आपको इस बात का रंज है कि मैंने गोपालसिंह के साथ दगा की और यह भेद आपसे छिपा रक्खा मगर आप भी तो जरा पुरानी बातों को याद कीजिए! खास करके उस अंधेरी रात की बात जिसमें मेरी शादी और पुतले की बदलौअल हुई थी! वह सब कर्म तो आप ही का है! आप ही ने मुझे यहां पहुंचाया। अब अगर मेरी दुर्दशा होगी तो क्या आप बच पाएंगे फिर मान लिया जाय कि आप गोपालसिंह को बचा भी लें तो क्या 'लक्ष्मीदेवी' का बच के निकल जाना आपके लिए दुःखदायी न होगा और जब इस बात की खबर गोपालसिंह को होगी तो क्या वे आपको छोड़ देंगे बेशक जो कुछ आज तक मैंने किया है सब आप ही का कसूर समझा जायगा। मैंने, इस बात का पता न लग जाय कि दारोगा की करतूत ने लक्ष्मीदेवी की जगह...।

इतना कहकर मायारानी चुप हो गई और बड़े गौर से बाबाजी की सूरत देखने लगी, मानो इस बात का पता लगाना चाहती है कि बाबाजी के दिल पर उसकी बातों का क्या असर हुआ। दारोगा साहब भी मायारानी की बातें सुनकर तरद्दुद में पड़ गए और न मालूम क्या सोचने लगे। थोड़ी देर बाद दारोगा ने सिर उठाया और मायारानी की तरफ देखकर कहा, ''अच्छा, अब विशेष बातों की कोई जरूरत नहीं है। मैं वादा करता हूं कि गोपालसिंह के बारे में तुम पर किसी तरह का दबाव न डालूंगा और इससे ज्यादा कुछ न कहूंगा कि इनके मारने का विचार न करके थोड़े दिन तक इन्हें कैद ही में रखना आवश्यक है, बल्कि कमलिनी, लाडिली, भूतनाथ और देवीसिंह को भी कैद ही में रखना चाहिए। हां जब मैं उन आफतों को दूर कर लूं जिनके कारण तुम्हें अपना राज्य छोड़ना पड़ा और तुम्हें फिर उसी दर्जे पर पहुंचा दूं तब जो तुम्हारे जी में आवे करना। बस-बस, इसमें दखल मत दो और जो मैंने कहा है उसे करो नहीं तो तुम्हें पूरा सुख कदापि न मिलेगा!''

मायारानी - खैर ऐसा ही सही, मगर यह तो कहिए कि इन लोगों को कैद कहां कीजिएगा?

बाबाजी - इसके लिए मेरा बंगला बहुत मुनासिब है।

मायारानी - और मेरे रहने के लिए कौन-सा ठिकाना सोच रक्खा है?

बाबाजी - वाह, क्या तुम समझती हो कि तुम्हें बहुत दिनों तक अपने राज्य से अलग रहना पड़ेगा नहीं, दो ही तीन दिन में मैं उन सभी का मुंह काला करूंगा जो तुम्हारे नौकर होकर तुमसे खिलाफ हो रहे हैं और तुम्हें फिर उसी दर्जे पर बिठाऊंगा जिस पर मेरे सामने तुम थीं, हां, एक चीज के बिना हर्ज जरूर होगा।

मायारानी - वह क्या शायद आपका मतलब अजायबघर की ताली से है।

बाबाजी - हां, मेरा मतलब अजायबघर की ताली से ही है, क्या तुम उसे अपने महल ही में छोड़ आई हो?

मायारानी - जी नहीं, यह मेरे पास है, जब मैं लाचार होकर अपने घर से भागी तो एक यही चीज थी जिसे मैं अपने साथ ला सकी।

बाबाजी - वाह-वाह, यह बड़ी खुशी की बात तुमने कही। अच्छा वह ताली मेरे हवाले करो तो और कुछ बातें होंगी।

मायारानी - (अजायबघर की ताली बाबाजी को देकर) लीजिए तैयार है, अब जहां तक जल्द हो सके यहां से निकल चलना चाहिए।

बाबाजी - हां, हां, मैं भी यही चाहता हूं, भला यह तो कहो कि यह तिलिस्मी खंजर तुमने कहां से पाया?

मायारानी - यह तिलिस्मी खंजर कमलिनी ने भूतनाथ और गोपालसिंह को दिया था जो इस समय इन सभी के बेहोश हो जाने पर मुझे मिला। एक तो मैंने ले लिया और दूसरा नागर को दे दिया है। मैंने सुना है कि इसी तरह के और भी कई खंजर कमलिनी ने अपने साथियों को बांटे हैं मगर मालूम नहीं इस समय वे कहां हैं।

बाबाजी - ठीक है, खैर यह काम तुमने बहुत ही अच्छा किया कि अजायबघर की ताली अपने साथ लेती आईं, नहीं तो बड़ा हर्ज होता।

मायारानी - जी हां।

मायारानी अजायबघर की ताली के बारे में भी दारोगा से झूठ बोली। यद्यपि उसने यह ताली भूतनाथ को दे दी और इस समय गोपालसिंह के पास से पाई थी परन्तु भूतनाथ का नाम लेना उसने उचित न जाना क्योंकि उसने यह ताली भूतनाथ को राजा गोपालसिंह की जान लेने के बदले में दी थी और यह बात बाबाजी से कहना उसे मंजूर न था इसी से वह इस समय बहाना कर गई।

मायारानी और नागर को साथ लिए हुए बाबाजी वहां से रवाना हुए और उस खम्भे के पास पहुंचे जिस पर गरारीदार पहिया लगा हुआ था। अब मायारानी बड़ी उत्कण्ठा से देखने लगी कि बाबाजी किस तरह से दरवाजा खोलते हैं और इसलिए जब बाबाजी ने गरारीदार पहिये को घुमाकर सुरंग का दरवाजा खोला तो मायारानी को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि इसी पहिये को वह कई दफे उलट-फेरकर घुमा चुकी थी मगर दरवाजा नहीं खुला था। मायारानी ने अब बड़े आग्रह से इसका सबब बाबाजी से पूछा और कहा कि ''इसी पहिये को मैं पहले कई दफे घुमा चुकी थी मगर दरवाजा न खुला, इस समय क्योंकर खुल गया' इसके जवाब में बाबाजी हंसकर बोले, ''इसका सबब किसी दूसरे वक्त तुमसे कहूंगा क्योंकि समझाने में बहुत देर लगेगी और पहले उन कामों को बहुत जल्द कर लेना चाहिए जिनका करना आवश्यक है!''

यह जवाब सुनकर मायारानी चुप हो गई और यह सोच लिया कि खैर किसी दूसरे समय इसका पता लग जाएगा क्योंकि इस समय वह बाबाजी से बहुत ही दबी हुई थी और किसी बात में जिद करना उचित नहीं समझती थी। उधर बाबाजी ने दरवाजा खोलने का भेद जान-बूझकर मायारानी से छिपा रखा था, क्योंकि उसका भेद खोलना उन्हें मंजूर न था। यद्यपि मायारानी को उसका भेद मालूम न हुआ मगर हम अपने पाठकों को दरवाजा खोलने का भेद बताए देते हैं। लोहे के खम्भे पर जो गरारीदार पहिया था उसके घूमने से दरवाजा बन्द हो जाता था। परन्तु खोलने के समय उसे एक बंधे हुए अन्दाज से घुमाना पड़ता था। उस पहिये को इक्कीस दफे बाईं तरफ, इसके बाद बारह दफे दाहिनी तरफ और नौ दफे बाईं तरफ घुमाने से दरवाजा खुलता था। अगर इससे कुछ भी कम या ज्यादा पहिया घूम जाय तो दरवाजा नहीं खुलता था। दरवाजा खोलते समय बाबाजी ने बड़ी तेजी के साथ गिनकर पहिया घुमाया किन्तु मायारानी का उसकी गिनती की तरफ कुछ भी ध्यान न था, इसीलिए वह इस बात को समझ न सकी।

मायारानी और नागर को साथ लिए हुए जब बाबाजी सुरंग से बाहर निकले तो सबेरा हो चुका था, मगर सूर्य अभी नहीं निकला था। टीले पर से देखा तो चारों तरफ मैदान में सन्नाटा था इसलिए राय हुई कि इसी समय गोपालसिंह, भूतनाथ, देवीसिंह, कमलिनी और लाडिली को निकालकर बंगले में पहुंचा देना चाहिए। नागर दौड़ी हुई चली गई और लीला तथा लौंडियों को बुला लाई और इसके बाद सभी ने मिलकर पांचों कैदियों को सुरंग से निकालकर दारोगा वाले बंगले में पहुंचाया।

अब यह विचार होने लगा कि पांचों कैदियों को किस जगह कैद करना चाहिए, बाबाजी की राय हुर्ह कि पांचों कैदियों को अजायबघर की ड्यौढ़ी में बन्द करना चाहिए मगर मायारानी ने कुछ सोच-विचारकर कहा कि इन सब लोगों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में कैद करना चाहिए। मायारानी की बात सुनकर बाबाजी के होंठ फड़कने लगे और माथे पर दो एक बल पड़ गये, जिससे मालूम होता था कि उनको क्रोध चढ़ आया है मगर उन्होंने बहाने के साथ दूसरी तरफ देखकर बहुत जल्द अपने को सम्हाला जिससे सूरत देखकर मायारानी को उनके दिल का हाल कुछ मालूम न हो। बाबाजी को चुप देखकर मायारानी ने फिर टोका और कहा कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में बन्द करना उचित होगा, जिस पर बाबाजी ने हंसकर जवाब दिया, ''बहुत अच्छा, जो तुम कहती हो वही होगा।''

हम ऊपर लिख आये हैं कि इस मकान के चारों कोनों में चार कोठरियां और चारों तरफ दालाना हैं। बंगले में जाने के लिए जो सदर दरवाजा है, उसके बाईं तरफ वाली कोठरी के नीचे दो तहखाने हैं। एक तो मैगजीन के नाम से पुकारा जाता है और उसमें बारूद तथा छोटी-छोटी कई तोपें रखी हुई हैं, और उसी के साथ सटा हुआ जो दूसरा तहखाना है उसमें बाबाजी का खजाना रहता है। उसी खजाने वाले तहखाने में कैदियों को कैद करने की राय मायारानी ने दे दी थी और बाबाजी ने भी यह बात मंजूर कर ली।

बाबाजी उस कोठरी के अन्दर गये। वहां दोनों तरफ की दीवारों में लोहे के दो दरवाजे थे जिन्हें दोनों तहखानों का दरवाजा कहना चाहिए। दाहिनी तरफ के दरवाजे को किसी गुप्त रीति से बाबाजी ने खोला और नागर, लीला तथा लौंडियों की मदद से पांचों कैदियों को उनके ऐयारी के बटुए सहित तहखाने में पहुंचाकर बाहर निकल आये और दरवाजा बन्द कर दिया। बाहर निकलते समय तहखाने से तांबे का एक घड़ा भी लेते आये और मायारानी की तरफ देखकर बोले, ''अब कैदियों के लिए कुछ खाने-पीने का सामान भी कर देना चाहिए, इसी घड़े में भरकर जल और थोड़े से जंगली फल वहां रखवा देता हूं, जो तीन दिन के लिए काफी होगा, फिर देखा जायेगा।'' (लौंडियों की तरफ देखकर), ''जाओे तुम लोग थोड़े से फल बहुत जल्द तोड़ लाओ।'' आज्ञानुसार लौडियां चारों तरफ चली गईं और बात-की-बात में बहुत से फल तोड़कर ले आईं। एक कपड़े में बांधकर वही फल और जल से भरा हुआ घड़ा हाथ में लिए हुए बाबाजी फिर उसी तहखाने में उतरे मगर अबकी दफे किसी को साथ न ले गये, बल्कि अन्दर जाती दफे दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया और आधी घड़ी से जयादा देर के बाद तहखाने से बाहर निकले। मायारानी ने ताज्जुब में आकर पूछा कि ''आपको तहखाने में इतनी देर क्यों लगी' इसके जवाब में बाबाजी ने कहा - ''कैदियों के बटुओं की तलाशी ले रहा था मगर कोई चीज मेरे मतलब की न निकली।''

इस समय मायारानी का चेहरा फतहमन्दी की खुशी से दमक रहा था। उसे केवल इसी बात की खुशी न थी कि राजा गोपालसिंह और अपनी दोनों बहिनों तथा ऐयारों को कैद कर लिया था बल्कि उसकी खुशी का सबब कुछ और भी था। थोड़ी ही देर पहले उसे इस बात का रंज था कि कम्बख्त दारोगा ने यकायक पहुंचकर हमारे काम में विघ्न डाल दिया नहीं तो गोपालसिंह तथा कमलिनी और लाडिली को मारकर मैं हमेशा के लिए निश्चिन्त हो जाती मगर अब उसे इन बातों का रंज नहीं है और यह उसकी मुस्कुराहट से साफ जाहिर हो रहा है।

 

बयान - 12

शाम होने में कुछ भी विलम्ब नहीं है। सूर्य भगवान अस्त हो गये केवल उनकी लालिमा आसमान के पश्चिम तरफ दिखाई दे रही है। दारोगा वाले बंगले में रहने वालों के लिए यह अच्छा समय है परन्तु आज उस बंगले में जितने आदमी दिखाई दे रहे हैं वे सब इस योग्य नहीं हैं कि बेफिक्री के साथ इधर-उधर घूमें और इस अनूठे समय का आनन्द लें। यद्यपि राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाडिली की तरफ से मायारानी निश्चिन्त हो गई बल्कि उनके साथ ही साथ दो ऐयारों को भी उसने गिरफ्तार कर लिया है मगर अभी तक उसका जी ठिकाने नहीं हुआ। वह नहर के किनारे बैठी हुई बाबाजी से बातें कर रही है और इस फिक्र में है कि कोई ऐसी तरकीब निकल आवे कि जमानिया की गद्दी पर बैठकर उसी शान के साथ हुकूमत करे, जैसा कि आज के कुछ दिन पहले कर रही थी। उसके पास केवल नागर बैठी हुई दोनों की बातें सुन रही है।

मायारानी - जिस दिन से आपको वीरेन्द्रसिंह ने गिरफ्तार कर लिया उसी दिन से मेरी किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि जिसका कोई हदहिसाब नहीं, मानो मेरे लिए जमाना ही और हो गया। एक दिन भी सुख के साथ सोना नसीब न हुआ। मुझ पर मुसीबतें आईं और तिलिस्मी बाग के अन्दर जो-जो अनहोनी बातें हुईं उनका खुलासा हाल आज मैं आपसे कह चुकी हूं। इस समय यद्यपि राजा गोपालसिंह, कमलिनी और लाडिली की तरफ से निश्चिन्त हूं मगर फिर भी अपनी अमलदारी में या तिलिस्मी बाग के अन्दर जाकर रहने का हौसला नहीं पड़ता, क्योंकि तिलिस्मी बाग के अन्दर दोनों नकाबपोशों के आने और धनपत का भेद खुल जाने से हमारे सिपाहियों की हालत बिल्कुल ही बदल गई है और मुझे उनके हाथों से दुःख भोगने के सिवाय और किसी तरह की उम्मीद नहीं है। यही भी सुनने में आया है कि दीवान साहब मुझे गिरफ्तर करने की फिक्र में पड़े हुए हैं।

बाबा - दीवान जो कुछ कह रहा है उससे मालूम होता है कि या तो उसे राजा गोपालसिंह का असल-असल हाल मालूम हो गया है और वह उन्हें फिर जमानिया की गद्दी पर बैठाना चाहता है, या वह स्वयं राजा साहब के बारे में धोखा खा रहा है और चाहता है कि तुम्हें गिरफ्तार कर राजा वीरेन्द्रसिंह के हवाले करे और उनकी मेहरबानी के भरोसे पर स्वयं जमानिया का राजा बन बैठे। तुम कह चुकी हो कि राजा वीरेन्द्रसिंह की बीस हजार फौज मुकाबले में आ चुकी है जिसका अफसर नाहरसिंह है। अब सोचना चाहिए कि नाहरसिंह के मुकाबले में आ जाने पर भी चुपचाप बैठे रहना बेसबब नहीं है और...।

मायारानी - शायद इसका सबब यह हो कि दीवान ने मुझको गिरफ्तार करके वीरेन्द्रसिंह के हवाले कर देने की शर्त पर उनसे सुलह कर ली हो!

बाबा - ताज्जुब नहीं, ऐसा ही हो, मगर घबराओ नहीं मैं दीवान के पास जाऊंगा और देखूंगा कि वह किस ढंग पर चलने का इरादा करता है। अगर बदमाशी करने पर उतारू है तो मैं उसे ठीक करूंगा। हां यह तो बताओ कि दीवान को तुम्हारी तिलिस्मी बातों या तिलिस्मी कारखाने का भेद तो किसी ने नहीं दिया।

मायारानी - जहां तक मैं समझती हूं उसे तिलिस्मी कारखाने में कुछ दखल नहीं है, मगर इस बात को मैं जोर देकर नहीं कह सकती क्योंकि वे दोनों नकाबपोश हमारे तिलिस्मी बाग के भेदों से बखूबी वाफिक हैं जिनका हाल मैं आपसे कह चुकी हूं, बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि बनिस्बत मेरे वे ज्यादा जानकार हैं क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वे मेरी उन तरकीबों को रद्द न कर सकते, जो उनके फंसाने के लिए की गई थीं। ताज्जुब नहीं कि उन दोनों ने दीवान से मिलकर तिलिस्म का कुछ हाल भी उससे कहा हो।

बाबा - खैर कोई हर्ज नहीं, देखा जायेगा। मैं कल जरूर वहां जाऊंगा और दीवान से मिलूंगा।

मायारानी - नहीं, बल्कि आप आज ही जाइये और जहां तक जल्दी हो सके, कुछ बन्दोबस्त कीजिये, अगर दीवान के भेजे हुए सौ-पचास आदमी मुझे ढूंढते हुए यहां आ जायेंगे, तो सख्त मुश्किल होगी। यद्यपि यह तिलिस्मी खंजर मुझे मिल गया है और तिलिस्मी गोली से भी मैं सैकड़ों की जान ले सकती हूं मगर उस समय मेरे किए कुछ भी न होगा जब किसी ऐसे से मुकाबला हो जाये जिसके पास कमलिनी का दिया हुआ इसी प्रकार का खंजर मौजूद होगा।

बाबा - तथापि इस बंगले में आकर तुम्हें कोई सता नहीं सकता।

मायारानी - ठीक है मगर मैं कब तक इसके अन्दर छिपकर बैठी रहूंगी आखिर भूख-प्यास भी तो कोई चीज है!

बाबा - मगर ऐसा होना बहुत मुश्किल है!

मायारानी - तो हर्ज ही क्या है अगर आप इसी समय दीवान के पास जायें मैं खूब जानती हूं कि वह आपकी सूरत देखते ही डर जायेगा।

बाबा - क्या तुम्हारी यही मर्जी है कि मैं इसी समय जाऊं?

मायारानी - हां, जाइए और अवश्य जाइए।

बाबा - अच्छा यही सही, मैं जाता हूं।

बाबाजी उसी समय उठ खड़े हुए और जमानिया की तरफ रवाना हो गए। मायारानी तब तक बराबर देखती रही जब तक कि वे पेड़ों की आड़ में होकर नजरों से गायब न हो गये। इसके बाद हंसकर नागर की तरफ देखा और कहा -

मायारानी - तुम समझती हो कि बाबाजी को मैंने जिद करके इसी समय यहां से क्यों धता बतायी?

नागर - जाहिर में जो कुछ तुमने बाबाजी से कहा है और जिस काम के लिए उन्हें भेजा है यदि उसके सिवाय और कोई मतलब है तो मैं कह सकती हूं कि मेरी समझ में कुछ न आया।

मायारानी - (हंसकर) अच्छा तो अब मैं समझा देती हूं बाबाजी के सामने मैंने अपने को जितना बताया वास्तव में मेरे दिल में उतना दुःख और रंज नहीं है, क्योंकि जिसका डर था, जिसके निकल जाने से मैं परेशान थी, जिसका प्रकट होना मेरे लिए मौत का सबब था और जो मुझसे बदला लिए बिना मानने वाला न था, अर्थात् गोपालसिंह, वह मेरे कब्जे में आ चुका। अब अगर दुःख है तो इतना ही कि कम्बख्त दारोगा ने उसे मारने न दिया। मगर मैं बिना उसकी जान लिए कब मानने वाली हूं, इसलिए मैंने किसी तरह बाबाजी को यहां से धता बतायी।

नागर - तो क्या तुम्हारा मतलब यह था कि बाबाजी यहां से बिदा हो जायें तो अपने कैदियों को मार डालो?

मायारानी - बेशक इसी मतलब से मैंने बाबाजी को यहां से निकाल बाहर किया क्योंकि अगर वह रहता तो कैदियों को मारने न देता और उसमें जो कुछ करामात है सो तुम देख ही चुकी हो। अगर ऐसा न होता तो मैं सुरंग ही में उन सभी को मारकर निश्चिंत हो जाती।

नागर - मगर बाबाजी ने उस कोठरी की ताली तो तुम्हें दी नहीं जिसमें कैदियों को रखा है?

मायारानी - ठीक है बाबाजी इस एक बात में चालाकी कर गए। कैदखाने की कोठरी क्योंकर खुलती है सो मुझे नहीं बताया और न कोई ताली वहां की मुझे दी, मगर यह मैं पहले ही समझे हुई थी कि बाबाजी कैदियों को जरूर किसी ऐसी जगह रखेंगे, जहां मैं जा नहीं सकती, इसलिए तो बाबाजी से मैंने कहा कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाली कोठरी में कैद करो। बाबाजी मेरा मतलब नहीं समझ सके और धोखे में आ गये।

नागर - इससे तो यही जाहिर होता है कि उस कोठरी में तुम जा सकती हो।

मायारानी - नहीं, उस कोठरी में मैं नहीं जा सकती, मगर मैगजीन की कोठरी तक जा सकती हूं।

नागर - (जोर से हंसकर) अहा हा, अब मैं समझी! तुम्हारा मतलब यह कि मैगजीन में जहां बारूद रखा है वहां जाओ और उसमें आग लगाकर इस...।

मायारानी - बस-बस यही है, कैदी और कैदखाने की क्या बात इस बंगले का ही सत्यानाश कर दूंगी। कैदियों की हड्डी तक का तो पता लगेगा ही नहीं! अच्छा अब इस काम में विलम्ब न करना चाहिए, उठो और मेरे साथ चलकर उस कोठरी में अर्थात् मैगजीन में कोई ऐसी चीज रखो जो उस वक्त बारूद में आग लगावे, जब हम लोग यहां से निकलकर कुछ दूर चली जायें।

नागर - ऐसा ही होगा, यह कोई मुश्किल बात नहीं है।

 

बयान - 13

कल शाम को बाबाजी जमानिया गए थे और आज शाम होने के दो घंटे पहले ही लौट आये। दूर ही से अपने बंगले की हालत देख सिर हिलाकर बोले, ''मैं उसी समय समझ गया था जब मायारानी ने कहा था कि कैदियों को मैगजीन के बगल वाले तहखाने में कैद करना चाहिए।''

बाबाजी का बंगला जो बहुत ही खूबसूरत और शौकीनों के रहने के लायक था, बिल्कुल बर्बाद हो गया था, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी एक-एक ईंट अलग हो गई थी। बाबाजी धीरे-धीरे उसके पास पहुंचे और कुछ देर तक गौर से देखने के बाद यह कहते हुए घूम पड़े कि 'जो हो मगर अजायबघर किसी तरह बर्बाद नहीं हो सकता।'

बाबाजी के बंगले के बर्बाद होने का सबब पाठक समझ ही गये होंगे, क्योंकि ऊपर के बयान में मायारानी और नागर की बातचीत से वह भेद साफ-साफ खुल चुका है। अब बाबाजी इस विचार में पड़े कि मायारानी को ढूंढकर उससे दो-दो बातें करनी चाहिए।

ऐसा करने में बाबाजी को विशेष तकलीफ नहीं उठानी पड़ी, क्योंकि थोड़ी ही दूर पर उन्हें उन लौंडियों में से एक लौंडी मिली जो उस समय मायारानी के साथ थी, जब बाबाजी कैदियों को तहखाने में बन्द करके दीवान से मिलने के लिए जमानिया की तरफ रवाना हुए थे। बाबाजी ने उस लौंडी से केवल इतना ही पूछा, ''मायारानी कहां हैं?'

लौंडी - जब आप जमानिया की तरफ चले गये तो मायारानी हम लोगों को साथ लेकर दिल बहलाने के लिए इस जंगल में टहलने लगीं और धीरे-धीरे यहां से कुछ दूर चली गईं। ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि रानी साहिबा के दिल में यह बात पैदा हुई नहीं तो हम लोग भी टुकड़े-टुकड़े होकर उड़ गए होते, क्योंकि थोड़ी ही देर बाद भयानक आवाज सुनने में आई, और जब हम लोग इस बंगले के पास आये तो मिट्टी और गर्द के सबब अन्धकार हो रहा था। हम लोग डरकर पीछे की तरफ हट गये और अन्त में इस बंगले की ऐसी अवस्था देखने में आई जो आप देख रहे हैं। लाचार मायारानी ने यहां ठहरना उचित न समझा और नागर के साथ काशीजी की तरफ रवाना हो गईं।

बाबा - और तुझे इसलिए यहां छोड़ गई कि जब मैं आऊं तो बातें बनाकर मेरे क्रोध को बढ़ावे!

लौंडी - जी ई ई ई...।

बाबा - जी ई ई ई क्या बेशक यही बात है! खैर, अब तू भी यहां से वहीं चली जा और कम्बख्त मायारानी से जाकर कह दे कि जो कुछ तूने किया, बहुत अच्छा किया, मगर इस बात को खूब याद रखना कि नेकी का नतीजा नेक है औद बद को कभी सुख की नींद सोना नसीब नहीं होता। अच्छा ठहर, मैं एक चीठी लिख देता हूं सो लेती जा और जहां तक जल्द हो सके, मिलकर मायारानी के हाथ दे दे।

इतना कहकर बाबाजी बैठ गए और अपने बटुए से सामान निकालकर चीठी लिखने लगे, जब चीठी लिख चुके तो उसे लौंडी के हाथ में दे दिया और आप उत्तर तरफ रवाना हो गये।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह लौंडी बाबाजी की चीठी लिए हुए काशीजी जायेगी और मायारानी से मिलकर चीठी उसके हाथ में देगी, मगर हम आपको अपने साथ लिए हुए पहले ही काशीजी पहुंचते हैं और देखते हैं कि मायारानी किस धुन में कहां बैठी है या क्या कर रही है।

रात पहर से ज्यादा जा चुकी है। काशी में मनोरमा वाले मकान के अन्दर एक सजे हुए कमरे में मायारानी नागर के साथ बैठी हुई कुछ बात कर रही है। इस समय कमरे में सिवाय नागर और मायारानी के और कोई नहीं है। कमरे में यद्यपि बहुत से बेशकीमती शीशे करीने के साथ लगे हुए हैं, मगर रोशनी दो दीवारगीरों में और एक सब्ज कंवल वाले शमादान में, जो मायारानी के सामने गद्दी के नीचे रखा हुआ है, हो रही है। मायारानी सब्ज मखमल की गद्दी पर गाव-तकिये के सहारे बैठी है। इस समय उसका खूबसूरत चेहरा, जो आज से तीन-चार दिन पहले उदासी और बदहवासी के कारण बेरौनक हो रहा था, खुशी और फतहमन्दी की निशानियों के साथ दमक रहा है और वह किसी सवाल का इच्छानुसार जवाब पाने की आशा में मुस्कुराती हुई नागर की तरफ देख रही है।

नागर - इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि एक भारी बला आपके सिर से टली है, परन्तु यह न समझना चाहिए कि अब आपको किसी आफत का सामना न करना पड़ेगा।

मायारानी - इस बात को मैं जानती हूं कि जमानिया की गद्दी पर बैठने के लिए अब भी बहुत - कुछ उद्योग करना पड़ेगा, मगर मैं यह कह रही हूं कि सबसे भारी बला जो थी, वह टल गई। कम्बख्त कमलिनी ने भी बड़ा ही ऊधम मचा रहा था, अगर वह वीरेन्द्रसिंह की पक्षपाती न होती, तो मैं कभी का दोनों कुमारों को मौत की नींद सुला चुकी होती।

नागर - बेशक! बेशक!

मायारानी - और भूतनाथ का मारा जाना भी बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि उसे इस मकान का बहुत-कुछ भेद मालूम हो चुका था और इस सबब से इस मकान के रहने वाले भी बेफिक्र नहीं रह सकते थे। मगर देखो तो सही, हरामजादे दीवान को क्या हो गया जो मुझसे एकदम ही फिर गया, बल्कि मुझको गिरफ्तार करने का उद्योग भी करने लगा।

नागर - जरूर यह बात भी उन्हीं नकाबपोशों की बदौलत हुई है।

मायारानी - ठीक है, पहले तो मैं बेशक ताज्जुब में थी कि न मालूम वे दोनों नकाबपोश कौन थे और कहां से आये थे और आज दीवान तथा सिपाहियों के बिगड़ने का सबब केवल यही ध्यान में आता है कि धनपत का भेद खुल जाने से उन लोगों ने मुझे बदकार समझ लिया, मगर अब मुझे निश्चय हो गया कि उन दोनों नकाबपोशों में से एक तो गोपालसिंह था।

नागर - मेरा भी यही निश्चय है, बल्कि मैं अभी यही बात अपने मुंह से निकालने वाली थी। उसके सिवाय और कोई ऐेसा नहीं हो सकता कि केवल सूरत दिखाकर लोगों को अपने वश में कर ले। सिपाहियों और दीवान को जरूर इस बात का निश्चय हो गया कि गोपालसिंह को तुमने कैद कर रखा था। खैर, जो होना था सो हो गया। अब तो राजा गोपालसिंह का नाम-निशान ही न रहा, जो फिर जाकर अपना मुंह उन लोगों को दिखावेंगे, अब थोड़े ही दिनों में उन लोगों को निश्चय करा दिया जायेगा कि वह राजा वीरेन्द्रसिंह का कोई ऐयार था।

मायारानी - तुम्हारा कहना बहुत ठीक है और मेरे नजदीक अब यह कोई बड़ी बात नहीं है कि बेईमान दीवान को गिरफ्तार कर लूं या मार डालूं, मगर एक बात का खुटका जरूर है।

नागर - वह क्या?

मायारानी - केवल इतना ही कि दीवान को मारने या गिरफ्तार करने के साथ ही साथ राजा वीरेन्द्रसिंह की उस फौज का भी मुकाबला करना पड़ेगा जो सरहद पर आ चुकी है।

नागर - इसमें तो कुछ भी सन्देह नहीं है और इस बात का भी विश्वास नहीं हो सकता कि तुम्हारी फौज तुम्हारा पक्ष लेकर लड़ने के लिए तैयार हो जायगी। फौजी सिपाहियों के दिल से गोपालसिंह का ध्यान दूर होना दो-एक दिन का काम नहीं है!

मायारानी - (कुछ सोचकर) तो क्या मैं अकेली राजा वीरेन्द्रसिंह की फौज को नहीं हटा सकती?

नागर - सो तो तुम्हीं जानो।

मायारानी - बेशक मैं ऐसा बड़ा काम कर सकती हूं मगर अफसोस, मेरा प्यारा धनपत...।

धनपत का नाम लेते ही मायारानी की आंखें डबडबा आईं। नागर ने अपने आंचल से उसकी आंखें पोंछीं और बहुत - कुछ धीरज दिया। इसी समय दरवाजे के बाहर से चुटकी बजाने की आवाज आई, जिसे सुनकर नागर समझ गई कि कोई लौंडी यहां आना चाहती है। नागर ने पुकारकर कहा, ''कौन है, चले आओ!''

वही लौंडी भीतर आती हुई दिखाई पड़ी जो बर्बाद हुए बंगले के पास बाबाजी से मिली थी और जिसके हाथ बाबाजी ने मायारानी के पास चीठी भेजी थी। उसको देखते ही मायारानी चैतन्य हो बैठी और बोली, ''कहो, दारोगा से मुलाकात हुई थी?'

लौंडी - जी हां।

मायारानी - (मुस्कुराकर) वह तो बहुत ही बिगड़ा होगा।

लौंडी - हां, बहुत झुंझलाये और उछले-कूदे, आपकी शान में कड़ी-कड़ी बातें कहने लगे, मगर मैं चुपचाप खड़ी सुनती रही। अन्त में बोले, ''अच्छा, मैं एक चीठी लिखकर देता हूं, इसे ले जाकर अपनी मायारानी को दे देना।''

मायारानी - तो क्या उसने चीठी लिखकर दी है?

लौंडी - जी हां, यह मौजूद है, लीजिए।

लौंडी ने चीठी मायारानी के हाथ में दे दी और मायारानी ने यह कहकर चीठी ले ली कि 'देखना चाहिए इसमें दारोगा साहब क्या रंग लाये हैं!' इसके बाद वह चीठी नागर के हाथ में देकर बोली, ''लो, इसे तुम ही पढ़ो!''

नागर चीठी खोलकर पढ़ने लगी। उस समय मायारानी की निगाह नागर के चेहरे पर थी। आधी चीठी पढ़ने के बाद नागर के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं और डर के मारे उसका हाथ कांपने लगा। मायारानी ने घबड़ाकर पूछा, ''क्यों क्या हाल है कुछ कहो तो!''

इसके जवाब में नागर ने लम्बी सांस लेकर चीठी मायारानी के सामने रख दी और बोली, ''ओह, मेरी सामर्थ्य नहीं कि इस चीठी को आखीर तक पढ़ सकूं। हाय, निःसन्देह वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करना पूरा-पूरा पागलपन है।''

मायारानी ने घबराकर चीठी उठा ली और स्वयं पढ़ने लगी, पर वह भी उस चीठी को आधे से ज्यादा न पढ़ सकी। पसीना छूटने लगा, शरीर कांपने लगा, दिमाग में चक्कर आने लगे, यहां तक कि अपने को किसी तरह संभाल न सकी और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी।

(नौवां भाग समाप्त)


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