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कहानी

चौपाल
गीताश्री


'बीजू साहब, अब क्लब नहीं आएंगे। वे दिल्ली से बाहर चले गए हैं। नौकरी वगैरह या परिवार... मालूम नहीं मैम...' वेटर ललित थोड़ा मायूस था। हाथ में अभी भी उसके बियर की एक बोतल थी और एक खाली ग्लास। शिवांगी सन्न रह गई थी उस खबर से।

'फिर ये क्यों लाए हो?' वेटर के हाथ में बियर की तरफ देखते हुए पूछा।

'ये परसों जाते हुए बीजू साब ने कहा था, आप जब आएं तो उनकी तरफ से बियर आपको पिलाई जाए।' उसने बियर की बोतल टेबल पर रख दी। शिवांगी चकरा गई। ये क्यों, जो कहीं चला गया, जो अजनबी था, वो जाते-जाते ऐसा क्यों कर गया? मन ही मन कुछ खालीपन सा लगा। कुछ पल के लिए सब क्लब और बियर का स्वाद गायब हो चुका था।

वह वहीं कुर्सी पर बैठ गई। वेटर ने पूछा, 'कुछ खाने को लाऊं क्या।'

ऊं...ऊं...हं...नहीं... शिवांगी वहां से दूर थी कहीं। शायद काउंटर के उस कोने में, जहां कुर्सी अब तक खाली थी, मगर हल्के-हल्के हिल रही थी। जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो कहीं, वापस आने के लिए। किसी के होने का अहसास बाकी था।

आज कई दिनों बाद वह क्लब आई थी। इस बीच क्लब में ऐसा क्या हुआ, उसे पता नहीं, लेकिन आज पहली बार उसे गेट पर टोका-रोका गया।

पहले वह बेधड़क घुस आया करती थी। कभी अकेली, तो कभी दोस्तों के साथ। क्लब का माहौल उसे रास आने लगा था। धीरे-धीरे वह यहां की मेंबरशिप लेने के बारे में गंभीरता से सोचने लगी थी।

आज गेट पर रोकते हुए संजू ने कहा, 'मैम, यहां गेस्ट के अकेले आने पर रोक लग गई है। यहां देखिए नोटिस लगा है। आपको किसी मेंबर के साथ आना पड़ेगा।'

'मैं यहां खाने-पीने नहीं, किसी से मिलने आई हूं, एक नजर मारकर आती हूं। मिल गया तो उसकी गेस्ट, नहीं तो वापस...।'

कहते-कहते सोमू को वहीं मनाही की मुद्रा में छोड़कर हॉल में प्रवेश कर गई।

मन ही मन बड़बड़ा भी रही थी, क्या बकवास नियम बना लिए हैं। अब कैसे आऊंगी। रजनी मेंबर है, पर उसको पकड़ पाना मुश्किल है।

पर अंदर पहुंचते ही दिल धक से रह गया। वह आज ठानकर आई थी कि चाहे जो हो, काउंटर के कोने पर बैठने वाले उस शख्स से मिलकर रहेगी। देखूं तो सही, कौन है, कैसा दिखता है, क्यों कर रहा है ऐसा, क्या इंटरेस्ट है, मगर सारे मंसूबों पर पानी फिर गया। कोना खाली, आसपास लोग थे। अपने में मशगूल। लोगों ने वह कुर्सी इसलिए छोड़ दी होगी कि 'बीजू साहब' आएंगे।

वेटर तो कह रहा है कि अब वह नहीं आएंगे। दिल्ली से बाहर चले गए। कोई अता-पता भी नहीं दे गए। वह कम से कम एक धन्यवाद का पत्र लिख देती।

उसने दूर खड़े ललित को इशारे से बुलाया, 'बीजू साहब का फोन नंबर तेरे पास है? दिल्ली वाले घर का पता तो होगा, ऑफिस में? ला देगा?'

ललित शिवांगी की बेचैनी समझ रहा था।

'मैम, वे मेरा फोन नंबर ले गए है। मुझे फोन करेंगे, ऐसा कह रहे थे। घर का पता आपको ऑफिस से मिलेगा, आपको देंगे नहीं। आप मेंबर नहीं हो न...।'

'अब क्या करें? बियर लौटा ले जाओ।'

'नहीं मैम... अब नहीं लौटेगी। बीजू साब पहले ही पे कर चुके हैं। मुझे कहा था, मैडम आएं तो उन्हें बियर पिलाना, जाने मत देना ऐसे...।'

शिवांगी फट पड़ना चाहती थी। न क्लब उसे आनंद दे रहा था, न बियर की बोतल खींच रही थी। उसका दिमाग पूरे माहौल से बेखबर कहीं और था।

वह महानगर का सबसे बदनाम क्लब था। जहां ठीक 11 बजे बार काउंटर खुल जाता था। कुछ खुर्राट लोग अपने दिन की शुरुआत शराब के कुल्ले से करते थे।

'दो पेग भीतर फिर देवता पित्तर' की तर्ज पर क्लब को ये लोग आबाद रखते थे। अनजाने में कोई गैर-शराबी पहुंच जाता तो उसकी आंखें भले फटी रह जाएं, पीने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हाथ में गिलास लिए टीवी पर खबर देखते हुए, शाम को अपने-अपने अखबारों को क्या खबर भेजेंगे, इसकी प्लानिंग करते थे। फील्ड में घुसने वालों को बेचारा और अनुभवहीन समझकर हिकारत भरी नजरों से देखते। कुछ को तो फटकार भी लगा देते। फटकार सुनने वाले ...हें...हें करते हुए दादा... दादा... करते और कृपापूर्वक एकाध पेग मुफ्त में गटक जाते। क्या फर्क पड़ता है, अगर डांट शराबी की हो। डांट की फितरत सर के ऊपर से गुजरने की होती है। और शराब रगों में दौड़ती है। यह क्लब नहीं खबरों का चंडूखाना है। शाम को तो यहां और भी उजबक किस्म का माहौल होता है। धुएं और शराब के साथ कानफाड़ू शोर।

शिवांगी को यह सब बड़ा अजीब लगता था। वह क्लब जाने को बेचैन थी। पर बात तो सही थी कि यहां क्या-क्या होता है। क्या सही में वे बातें होती हैं जो उसने सुनी हैं? शिवांगी के कानों में और भी भयानक बातें आई थीं। पर वह भयभीत नहीं हुई। उसे लगा कि खुद जाकर अनुभव करेगी कि माहौल कैसा है।

उसे एक गैर-शराबी मित्र ने समझाया - 'क्या करेगी जाकर, वहां दो गुटों में एक बार गोली तक चल गई थी। पुलिस आ गई थी।'

दूसरे ने समझाया, 'अरे यही नहीं, एक बार तो फलां अखबार के चीफ रिपोर्टर को हार्ट अटैक पड़ा, पीते-पीते क्लब में ढेर हो गए। किसी ने अस्पताल नहीं पहुंचाया।'

इतनी मार्मिक और दिल दहलाऊ खबर भी शिवांगी को नहीं डिगा पाई। भुतहा हवेली में जाने से पहले जैसे किसी को डराया जाता है, ठीक वैसे ही शिवांगी को डराया जा रहा था। तब से उसने अपने ऑफिस में ऐलान किया कि जो भी उस क्लब का मेंबर है कृपया उसे वहां ले जाए।

दुर्भाग्य से कोई नहीं था। सिवाय बॉस के। जो क्लब में लूटने पिटने की बजाय 'कार-ओ-बार' से ही काम चला लेते थे। शराब पीने की नई पद्धति 'कार-ओ-बार' धीरे-धीरे चलन में आ रही थी। मगर शिवांगी को तो जाना ही था। जिद जो ठहरी। नई जगह देखने और क्लब में पुरुषों के बीच बैठकर चुनौती देते हुए शराब पीने की जिद। देखेंगे, जो होगा, ऊंह... उसने गर्दन झटकी।

अगले दिन उसने सोचा, क्यों न अकेली चक्कर लगा आऊं। एक बार सुबह-सुबह और फिर शाम को। माहौल दिखेगा। खाने-पीने को भले कुछ न मिले। मेंबर भी नहीं, सो कोई अटेंड नहीं करेगा। ज्यादा लोगों को वह जानती नहीं थी। अभी-अभी तो रायपुर से दिल्ली आई थी। उसके लिए सबकुछ कौतूहल भरा था। कोई और होता तो उसे क्लब की खबरें सुनकर सांस्कृतिक धक्का लगता। शिवांगी जरा कठोर मिट्टी पानी की बनी हुई थी। जब तक पंगा न हो मन चंगा कैसे रहे। ना इमेज की परवाह ना अफवाहों का। जो होगा, सो देखा जाएगा। सो चल पड़ी अकेली। जैसा सुना था, वैसा ही पाया। वैसे ही काउंटर पर कुछ अघाए हुए लोग बतकहियां करते हुए। टेबलों पर जमे हुए अनजाने से लोग। शायद कुछ परिचित चेहरे थे जो यदा कदा मुफ्त खाने और गिफ्ट लेने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई दे जाते हैं।

गेट पर किसी ने टोका, 'आप नई लग रही हैं।'

'हां... मैं नहीं, मेरा दोस्त मेंबर है वो आ रहा है, उसने मुझे कहा है, मैं हॉल में उसका इंतजार करूं। वो आता ही होगा।'

गेट पर सोमू बैठा था। उसने अंदर जाने का इशारा किया।

एक कोने में टेबल चुनकर बैठ गई। वहां से वह सबको देख सकती थी। मगर वह कम दिखाई देती। थोड़ी सकुचाई सी थी। झूठ बोलकर अंदर आई थी। थोड़ी देर में वेटर आएगा, मेंबरशिप नंबर पूछेगा, फिर क्या करेगी?

'करना क्या है, चुपचाप उठकर चल देंगे, कहेंगे दोस्त नहीं आएगा, कहीं फंस गया।' - वह बुदबुदाई। आश्वस्त होकर चारों तरफ नजर दौड़ाना शुरू कर दिया। उसे ऐसा कोई नजर नहीं आया, जिसके साथ हेलो भी किया जा सके। वेटर आया।

'मैम, कुछ लेंगी? क्या लाऊं आपके लिए? अभी वोदका पर एक स्कीम चल रही है - एक पेग के साथ एक पेग फ्री...।'

शिवांगी ने बीच में ही रोक दिया। 'अभी रुक जाओ, मैं मेंबर नहीं हूं। मेरा दोस्त आने वाला है। वो आ जाए, फिर आर्डर करते है। ...मेनू रख जाओ।'

वेटर छोटी सी पर्ची वाला मेनू रख गया। यह दुनिया का सबसे छोटा मेनू होगा, उसने सोचा।

क्लब में चहल-पहल बढ़ने लगी थी। बुधवार का दिन था। सप्ताह का मध्यांत। शिवांगी को लगा वेटर दूर से उसे घूर रहा है। उसकी आंखों में शंका झांक रही थी। शिवांगी ने उससे नजर हटाकर दूसरे टेबल पर देखा। दावत का सा नजारा था। एक सदस्य के साथ-साथ चार-चार दावत उड़ाने वाले। इस टेबल का वेटर मेंबर से आर्डर लेने आता तो मेंबर हर बार पास बैठे एक मोटे से आदमी से कहता, आर्डर करो, वह बिल्डर या व्यापारी सा दिखने वाला कहीं वेटर को थोक में ऑर्डर लिखवाने लगा। मेंबर ऐसे बैठा था, जैसे उसने सब पर कोई गहरा उपकार किया हो, यहां लाकर। शिवांगी की समझ में आ गया, ओह तो ये माजरा है, ऑर्डर देने का मतलब, स्साले भुगतान भी करो।

लगता है मोटा आसामी फांस लाया है। बेटा आज...

'मैम, आपके लिए ड्रिंक...'

'क्या? कैसे? क्यों भई, किस खुशी में?'

'वो काउंटर पर बैठे, बीजू सर ने भेजा है आपके लिए।'

वेटर के हाथ में बियर की बोतल और ग्लास थी।

शिवांगी की हैरान नजरें उठीं... काउंटर के कोने पर अकेले, चुपचाप अधपके बालों वाले एक सज्जन बैठे थे। उनकी पीठ दिखाई दे रही थी।

'मेरे लिए... क्यों भेजा... क्या कहा उन्होंने?'

शिवांगी लगभग वापस करने की मुद्रा में थी।

'मैं वापस नहीं जा सकता, मैम... पर्ची कट चुकी है। साब के नंबर पर आया है। वो शायद जानते होंगे आपको इसलिए भेजा होगा - आप खुद पूछ लीजिए उनसे। हमें तो कहा है आपके टेबल पर रख दूं' - कहते-कहते बियर की बोतल और ग्लास टेबल पर भरकर चला गया।

शिवांगी ने प्रतिवाद नहीं किया। वह उस आदमी का चेहरा देखना चाहती थी। क्या करे। क्या काउंटर पर जाते देखना चाहती थी। क्या करें क्या काउंटर पर जाए देखने। वह पीठ किए बैठा है। अजीब आदमी है। किसी अजनबी को ऐसे ड्रिंक ऑफर करता है क्या?

क्या करना है, छोड़ों, हमें क्या? पी जाते हैं, पंगा होगा तो देखेंगे। और शिवांगी की क्लबबाजी का दौर बियर की पहली बोतल के साथ शुरू हो गया।

पीते हुए उसकी आंख उस आदमी की पीठ पर गड़ी रही। कुछ सवाल घुमड़ रहे थे जिन्हें वह बियर की ठंडी घूंट के साथ गटक रही थी।

वह आदमी भी शायद बियर पी रहा था। उसके बगल वाली ऊंची कुर्सी पर कई लोग जमे हुए, ठहाके लगा रहे थे, शोर उठ रहा था। मगर उस आदमी को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा था। चुपचाप पीने से व्यस्त था।

शिवांगी उसका चेहरा देखने की असफल कोशिश कर रही थी।

लगता है, पटाने की कोशिश है, उसने आम लड़कियों की तरह सोचा। बियर पीकर वह उस आदमी के पास जाएगी जरूर। सोचते ही... कुछ खाने की इच्छा जोर मार रही थी वेटर को खोजने के लिए इधर-उधर नजर घुमाई। दिखा नहीं। फिर काउंटर की तरफ देखा - अपनी सीट से वह आदमी गायब था। हें... कहां गया? एकदम से गायब बिना मिले, बताए... ये बीजू साब है क्या बला? किससे पूछे, अभी तक कोई उसका परिचित दिखा नहीं था।

इस आश्चर्यजनक घटना को अपने दफ्तर के साथियों के बीच बांटने को आतुर वह बियर खत्म करके उठी और चलती बनी।

दो दिन बाद वह रजनी के साथ क्लब में फिर हाजिर थी। उसने रजनी को सारा दिलचस्प हाल सुना दिया था। सुनाने में पता चला कि रजनी पुरानी मेंबर है पर कम आती है डेस्क जॉब में उसे फुर्सत ही कहां मिलती है? रजनी के पति अपने दोस्तों के साथ क्लब का ज्यादा लुत्फ उठाते है। रजनी, शिवांगी फिर उसी टेबल पर बैठे। आज शिवांगी आश्वस्त थी। एक मेंबर के साथ थी और अकेली नहीं थी। कुछ भी निर्भय होकर आर्डर कर सकती थी। 'क्लब का चस्का' ऐसा उसने अब तक सुना था, शिवांगी को लग रहा था कि कहीं भी ना यह रोग लग जाए। वह शराबी नहीं, मगर हवा में नशे के बाद जो धुन सुनाई देती है, उसे वह पसंद है। वह चाहे क्लब में हो या घर में या कार-ओ-बार में।

अभी तक अपने 'बियर प्रेम' को उसने जगजाहिर नहीं किया था। उसे पता था कि 'स्मॉल टाउन गर्ल' को लोगों ने शराब पीते देखा तो उनकी फट जाएगी।

पहले ही दिन देखा नहीं, एक बिल्डर टाइप आदमी कैसे कनखियों से घूरे जा रहा था जैसे शराब के साथ घोल कर पी जाएगा स्साला। नहीं, जरा भी हिचकेगी नहीं। घूर साले... घूर... कितना घूरेगा। एक झन्नाटेदार झापड़ लगा तो दिन में भी सितारे नजर आ जाएंगे। हर आने जाने वाला वैसे एक बार उस पर नजर डाल ही लेता था। कहीं-कहीं इस 'नई एंट्री' को देखकर लोग फुसफुसा भी रहे थे। इन सबसे बेखबर बेखौफ एक उन्मुक्त लड़की अन्य मर्द शराबियों की सत्ता को चुनौती देने में आह्लादित थी।

'कहां खो गई... कुछ आर्डर कर ना... वो वहां बैठा है तो आशिक... रजनी ने उसे टोका।

शिवांगी अपने ख्यालों में वापिस आई।

'अरे, मैं कैसे आर्डर करूं - तू मेंबर है, तुझे सब पता है। मेरी बात कौन सुनेगा। मेंबरशिप न. भी तो पूछेंगें...'

शिवांगी की आवाज में खिलंदड़ापन था।

वेटर ने आते ही मेंबरशिप न. पूछा। रजनी ने बताया, 133...।

जब तक रजनी आर्डर करती रही, शिवांगी की आंखें काउंटर की तरफ गई। वह सज्जन नदारद थे। शिवांगी को थोड़ी राहत महसूस हुई। पता नहीं क्यों? वह फिर किसी असहज स्थिति में नहीं पड़ना चाहती थी। पर उसे क्या पता था कि 'राहत' कई बार महसूस होकर भी रह जाती है, मिलती नहीं। सामने सीट पर ललित वेटर एक बोतल बियर लिए खड़ा था।

'मैम... बीजू साहब ने आपके लिए भेजा है।' वह मुस्करा रहा था।

'क्यों भाई, क्यों भेजा? कहां हैं, वे तो दिख नहीं रहे। मैं नहीं लेती, उन्हें बताओ। पहले आकर मिलें फिर उनकी बियर स्वीकार करूंगी।'

शिवांगी बियर लौटाने के मूड में थी। आज जो हो जाए। वह बिना मिले बिना जाने, बिल्कुल बियर को हाथ नहीं लगाना। वेटर ने बोतल टेबल पर रख दी।

'मैम, आप जानती हैं, वापस नहीं होगा बीजू साहब अभी-अभी गए है। आपको देखा था उन्होंने, मुझे बुलाकर आर्डर दिया कि मैडम को मेरी तरफ से बियर दे आओ और आपको 'हाय' कहने को भी कहा है।'

बोलते-बोलते वेटर वहां से निकल गया। दूसरे टेबल से किसी ने आवाज लगाई थी।

क्लबों में लड़कियों से ज्यादा बात करें तो पेशेवर शराबियों को बहुत चुभती है।

'पी ले, पी ले... तेरा 'बीजू' तो आज भी निकल लिया यार, कुछ भी कह, आदमी बेहद शरीफ, दिलचस्प और रहस्यमय लग रहा है।'

'क्या यार, तू भी न...।'

'सच, कुछ तो बात है उस आदमी में। तेरे से मिला नहीं, तुझे जानता नहीं, बस देखा भर होगा। इस फटीचर क्लब में, जहां एक पैग के लिए लोग शाम को मुर्गे तलाशते है या बाहर से किसी को फांस लाते है, तुझे वह आदमी बियर ऑफर कर रहा है, एक बार नहीं, दो बार...।'

रजनी को इस पूरे प्रकरण में रोमांच हो रहा था। शिवांगी थोड़े हैरान और चिंतित दिखाई देने लगी।

'क्या रे... यार अच्छा नहीं लगता।'

इस तरह किसी अजनबी की बियर...

रजनी थोड़ा उसके कान के पास झुक आई।

'मेरी सलाह मान, एडवेंचर करते हैं। तू हर दूसरे-तीसरे दिन आ, जब वक्त मिले। मजे ले, देख ये आदमी किस हद तक जाता है।

फिर ऑफर करता है या नहीं? चक्कर क्या है ये चुपचाप फॉलो कर। उसके बारे में वेटर या किसी और से ज्यादा बात मत कर, पूछताछ ना कर। बात फैलेगी तो, यह चंडूखाना है। तेरी खबर प्रेस रिलीज बनाकर बांचेंगे। ये लोग। कुछ लोगों को दफ्तर की कोई जिम्मेदारी है नहीं। बस लड़कियों पर गॉसिप करना इनका फेवरेट शगल है। मैं इसलिए यहां कम आती हूं। कभी रमेश (पति) साथ हुआ तो आ गई। इसलिए गॉसिप से बची हूं। देखती नहीं, औरतें, लड़कियां कितनी कम हैं यहां।'

क्यों आएं - लड़कियां यहां...? सारे शहर के शराबी यहां इकट्ठा हों, और लड़कियां रोज आएं तो उनसे बड़ी 'छिनाल' कोई नहीं। हिप्पोक्रेट स्साले...।'

रजनी धाराप्रवाह बोलती जा रही थी।

शिवांगी उसे सुनकर हैरान थी। इतना कुछ भरा है उसके भीतर। मवाद फूट गया है। यह कोई नई रजनी है।

उसने रजनी के हाथों पर हाथ रखा। बेहद गर्म हाथ थे। केदारनाथ सिंह ने शायद इन्हीं हाथों के लिए वो पंक्तियां लिखी होंगी... 'दुनिया को इन्हीं हाथों की तरफ गरम और सुंदर होना चाहिए...।'

'देख तू कुछ दिन यहां आ, वो बियर भेजे पी, खुद ना जा उसके पास और ना वेटर से कुछ इक्वायरी कर। तीन-चार और ऐसा हो तो फिर मिलकर कोई रणनीति बनाएंगे। मैं देखूंगी - इस मामले को। अभी जैसा कहती हूं, करती जा। इन मर्दों को एक्सपोज करने का एक मौका मिला है हमें - कैरी ऑन...।'

रजनी और शिवांगी की वह दोपहर इस रणनीति के तहत लिपटी रही।

जब बाहर निकली तो धूप शिवांगी के इरादों के तरह नरम पड़ चुकी थी। फिर तो शुरू हुआ शिवांगी की क्लबबाजी का दौर। हर दूसरे-तीसरे दिन जान-बूझकर आती। उसी कोने वाली टेबल पर बैठती। उसी तरह ललित बियर की बोतल लेकर आता। धर जाता। बिना किसी प्रतिवाद के वह चुपचाप पी जाती। उठती और बिना हाय-हैलो किए पीछे के दरवाजे से निकल जाती। इस दौरान कभी कॉर्नर सीट वाले की, ब्रांडेड शर्ट के रंग दिखते, कभी खाली हिलती हुई कुर्सी या कभी प्रतीक्षारत कुर्सी। शिवांगी ने गौर किया, उस कुर्सी पर कोई और न बैठता नहीं था। चाहे देर तक खाली रहे। एकाध बार कोई अनजान आदमी बैठना चाहे तो ललित तुरंत दौड़कर पहुंच जाता था। कुछ कहता था धीरे से, फिर वह कुर्सी खाली हो जाती थी। न बीजू साहब शिवांगी तक आए ना शिवांगी उठकर वहां तक गई। पर खामोश संवाद जारी था। एक मौन युद्ध जारी था। दो योद्धा भिड़ नहीं रहे थे बस। बीजू साब रहें ना रहें, शिवांगी पहुंची नहीं - कि ललित थोड़ी देर में बियर लेकर हाजिर। उसे मजा भी आ रहा था, रोमांच और एक सुरसुरी भी। सवाल तो अब भी कई थे। रजनी ने मना किया था कि जल्दी ही पर्दाफाश करेगी। वह आश्वस्त थी कि वह अकेली नहीं है इस मामले में। धीरे-धीरे क्लब में इस अकेली साहसी (दुस्साहसी) लड़की को पहचानने लगे थे। कोई हाय-हैलो भी कर जाता। एकाध बार 'विघ्नसंतोषी' टाइप लोग हाय करने के लिए कुर्सी पर बैठे भी। शिवांगी का अनमनापन देखकर लौट जाते। उन्हें क्या पता कि वह चिड़िया नहीं, जिसका शिकार करने के लिए वे सालों से जाल लिए पिर रहे हैं। यहां तो 'महाआनंद' का 'महायुद्ध' खेला जा रहा था। और फिर उसकी नौबत ही नहीं आई कि योद्धा अपने सामने हों।

ललित बियर की बोतल लिए जो खबर सुना रहा था - वह लगभग हिला गया उसे।

खुद को चट्टानी इरादों वाली लड़की समझने वाली शिवांगी भरभरा गई थी। कुछ अंदर से गीला सा अहसास हुआ। जो बियर की तरह कतई ठंडा नहीं था। डबडबाई आंखों से उसने कॉर्नर वाली अविचल कुर्सी को देखा। वह कुर्सी को एक बार छूना चाहती थी। आज कुर्सी हिल नहीं रही थी। वहां उसके होने का अहसास तो बचा होगा या वह भी ले गया। बियर की बोतल वैसे ही छोड़कर लडखड़ाती हुई बाहर निकली। रजनी को फोन मिलाया। पता नहीं, दोनों में क्या बात हुई, शिवांगी ने क्लब को भरपूर नजर से देखा और बस स्टॉप की उल्टी दिशा में चल पड़ी...।


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