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नाटक

दुर्लभ बन्धु
भारतेंदु हरिश्चंद्र

अनुक्रम


पहिला दृश्य
स्थान-वंशपुर की सड़क
(अनन्त, सरल और सलोने आते हैं)

अनन्त : सचमुच न जाने मेरा जी इतना क्यों उदास रहता है, इससे मैं तो व्याकुल हो ही गया हूँ पर तुम कहते हो कि तुम लोग भी घबड़ा गए। हा, न जाने यह उदासी कैसी है, कहाँ से आई है और क्यों मेरे चित्त पर इसने ऐसा अधिकार कर लिया है? मेरी बुद्धि ऐसी अकुला रही है कि मैं अपने आपे से बाहर हुआ जाता हूँ।

सरल : आपका जी क्या यहाँ है, आपका चित्त तो वहाँ है जहाँ समुद्र में आप के सौदागरी के भारी जहाज बड़ी बड़ी पाल उड़ाए हुए धनमत्त लोगों की भाँति डगमगी चाल से चल रहे होंगे और वरुण देवता के विमान की भाँति झूमते और आस पास की छोटी छोटी नौकाओं की ओर दयादृष्टि से देखते आते होंगे और वे बेचारियाँ भी अपने छोटे-छोटे परों से उड़ती हुई और सिर झुका झुकाकर बारंबार उनको प्रणाम करती किसी तरह से लगी बुझी उनका अनुगम करती चली आती होंगी।

सलोने : महाराज! हम सच कहते हैं! जो हमारी इतनी जोखिम जहाज पर होती तो हमारा जी आठ पहर उसी में लगा रहता, प्रति क्षण तिनका उठाकर हम हवा का रुख देखा करते, रात दिन नकशा लिए सड़क, बन्दर और खाड़ियों को ताका करते और थोड़े से खटके में भी अपनी हानि के डर से घबड़ा जाते।

सरल : और मेरा कलेजा तो गरम दूध के फूँकने में भी तूफान की याद करके दहल जाता और सोचता कि हाय यदि कहीं समुद्र में आँधी चली तो जहाजों की क्या गति होगी। बालू की घड़ी देखने से मुझे यह ध्यान बँधता कि मेरा माल से लदा जहाज बालू की चर पर चढ़ गया है और उसके उलट जाने से उसका ऊँचा मस्तूल झुका हुआ ऐसा दिखाई देता है मानो वह अपने प्यारे जलयान की समाधि को गले लगा कर रो रहा है। देवालय के शिखर का ऊँचा पत्थर देखते ही मुझे पहाड़ों की चट्टानें याद आतीं और सोचता कि इन्हीं चट्टानों से ठोकर खाकर मेरा भरा पूरा जहाज टूट गया है, किराना पानी पर फैल गया है और रंग रंग के रेशमी कपड़े समुद्र की लहरों पर लहरा रहे हैं, यहाँ तक कि जो जहाज अभी लाखों रुपये का था छन भर में एक पैसे का भी न रहा। बतलाइए कि जब एक बार इस तरह का सोच जी में आवे तो संभव है कि मनुष्य हानि के डर से उदास न हो जाय?

सलोने : मैं जानता हूँ कि आपको अपनी जोखों ही का सोच है।

अनन्त : इसका नहीं। मैं धन्यवाद करता हूँ कि मेरा माल कुछ एक ही जहाज पर नहीं लदा है, और न सबके सब एक ही ओर भेजे गए हैं, और न एक साल के घाटे नफे से मेरे व्यापार की इतिश्री है, इससे सौदागरी की जोखों के सबब से मैं इतना उदास नहीं हूँ।

सरल : तो कहीं किसी से आँख तो नहीं लगी है?

अनन्त : छिः छिः!

सरल : वह भी नहीं यह भी नहीं तब तो आप का जी झूठ मूठ उदास है, अभी हँसो, बोलो, वू$दो, अभी प्रसन्न हो जाव। संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो बे समझे बूझे तुच्छ तुच्छ बात पर बड़े बडे़ दाँत निकाल कर खिलखिला उठते हैं और बाजे ऐसे (मुहर्रमी पैदाइश के) होते हैं कि ऐसा उत्तम परिहास जिस पर धर्मराज सा गंभीर मनुष्य हँस पड़े उसपर भी उनका फूला हुआ थूथन नहीं पिचकता।

(बसन्त, लवंग और गिरीश आते हैं)

सलोने : लो गिरीश और लवंग के साथ आपके प्रियबंधु बसन्त आते हैं। अब हमारा प्रणाम लो। हम लोग आपको अपने से अच्छी मण्डली में छोड़ कर जाते हैं।

सरल : भाई यदि ये उत्तम मित्रगण न आ जाते तो मैं आपको अच्छी तरह प्रसन्न किये बिना कभी न जाता।

अनन्त : मेरे हिसाब तो तुम भी बहुत उत्तम मित्र हो। परन्तु तुम्हें किसी आवश्यक काम से जाना है इसी हेतु अवसर पाकर यह बात बनाई है।

सरल : प्रणाम महाशयो।

बसन्त : दोनों मित्रों को प्रणाम। कहो अब हम लोग फिर कब हँसे बोलेंगे। तुम लोग तो अब निरे अपरिचित हो गए। सचमुच क्या चले ही जाओगे।

सरल : हम लोग अवसर के समय फिर मिलेंगे।

(सरल और सलोने जाते हैं)

लवंग : मेरे श्रीमन्त बसन्त लीजिए आपसे और अनन्त गुणकन्त अनन्त से भेंट हो गई अब हम लोग भी जाते हैं, परन्तु खाने के समय जहाँ मिलने का निश्चय किया उसे न भूलिएगा।

बसन्त : नहीं, न भूलूँगा।

गिरीश : भाई अनन्त। आप उदास मालूम पड़ते हो। हुआ ही चाहैं। संसार के कामों में जो जितना विशेष फँसा रहेगा उतना ही विशेष वह उदास रहेगा। मैं सच कहता हूँ कि आपकी सूरत बिलकुल बदल गई है।

अनन्त : मैं संसार को उसके वास्तविक रूप से बढ़कर कदापि नहीं समझता। गिरीश! संसार एक रंगशाला है, जहाँ सब मनुष्यों को एक न एक स्वाँग अवश्यक बनना पड़ता है उनमें से उदासी का नाट्य मेरे हिस्से है।

गिरीश : और मैं विदूषक की नकल करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे बाल भी हँसते खेलते पकें। नित्य मद्य-पीने से मेरे कलेजे में गर्मी पहुंचे न कि आहों के भरने से उसमें शीत आवे। शरीर में रक्त की गर्मी रहते भी लोग क्योंकर मूरत की तरह चुपचाप बैठे रह सकते हैं, जागते हुए लोग भी किस तरह सो जाते हैं, या रोगी की तरह कराह कराह कर दिन बिताते हैं। आप मेरी बात से अप्रसन्न न हूजिएगा, मैं आपको जी से चाहता हूँ तब इतनी धृष्टता की है। बहुतेरे मनुष्य ऐसे होते हैं कि बँधे पानी के तालाब की भाँति उनके मुख का रंग सदा गँदला बना रहता है और यह समझ कर कि लोग हमको बड़ा सोचने वाला, विचारवान, पंडित और गम्भीर कहेंगे व्यर्थ को भी मुंह फुलाए रहते हैं। उनका मुंह देखने से स्पष्ट प्रगट होता है कि वह लोग अपने को बढ़कर लगाते और अपनी बात को वेदव्यास से भी बढ़कर समझते हैं। मेरे प्यारे अनन्त। मैं ऐसे बहुतेरे लोगों को जानता हूँ जो केवल जीभ न हिलाने के कारण समझदार प्रसिद्ध हैं। मैं सच कहता हूँ कि ऐसे लोगों से बोलना ही पाप है क्योंकि इनकी बात के सुनते ही क्रोध आ जाता है और मनुष्य के मुंह से बुरा भला निकल ही आता है। मैं इस विषय में आप से फिर कभी बातचीत करूँगा। देखिए ऐसा न हो कि उसी झूठी बड़ाई की इच्छा आप पर भी प्रबल हो। भाई लवंग चलो अब इस समय बिदा। खाने के पीछे आकर मैं अपना व्याख्यान समाप्त करूंगा।

लवंग : तो खाने के समय तक के लिए जाता हूँ। परन्तु मैं तो उन्हीं गूंगे बुद्धिमानों में से एक हूँ, क्योंकि गिरीश अपनी बकवाद में मुझे तो कभी बोलने ही नहीं देता।

गिरीश : अभी दो बरस मेरी संगति में और रहो तो फिर तुम्हारी जिह्ना का शब्द तुम्हारे कान को भी न सुनाई पड़ेगा।

अनन्त : अच्छा जाओ, मैं भी तब तक बकवाद करना सीख रखता हूँ।

गिरीश : आप बड़ी कृपा कीजिएगा क्योंकि चुप रहने का स्वभाव यों तो पशुओं के लिये योग्य होता है या ऐसी स्त्रियों के लिये जिसे ब्याह करने वाला न मिलता हो।

(गिरीश और लवंग जाते हैं)

अनन्त : कहो भाई इनकी बात में कोई आनन्द था?

वसंत : गिरीश बहुत ही व्यर्थ बकता है। सारे वंशनगर में उससे बढ़कर कोई बक्की न निकलेगा। व्यर्थ की बकवाद की जाल में उसका वास्तविक आशय ऐसा छिपा रहता है जैसे गट्ठे भर भूसे में अनाज का एक दाना। जब दिन भर उसके लिए हैरान हो तब कहीं एक दाना हाथ लगे, वैसे ही जब बहुत सा समय इसकी बात के पीछे नाश करो तब उसका आशय समझ में आवै और इतने कष्ट के पीछे समझने पर भी कुछ उसका फल नहीं...

अनन्त : हुआ, यह रामकहानी दूर करो। अब यह बतलाओ कि वह कौन सी स्त्री है, जिसके लिये तुम गुप्त यात्रा करने वाले हो। देखो, आज मुझसे सब वृत्तान्त कहने का वादा है।

वसंत : भाई अनन्त! तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैंने अपनी सब जायदाद किस तरह गंवा दी। समझ कर व्यय न करके सर्वदा बड़ी चाल चला और यही चाल मेरे नाश की कारण हुई। पंरतु मुझे अपनी अवस्था के घट जाने का कुछ भी सोच नहीं है, सोच है तो केवल इस बात का है कि मुझे जो बहुत सा ऋण हो गया है उसे किसी तरह चुका दूँ। भाई अनन्त! तुम्हारा मैं सब प्रकार ऋणी हूँ। रुपये का कहो दया का कहो। इसलिये ऋण चुकाने का मैं जो जो उपाय सोचता हूँ वह तुम से सब स्वच्छ स्वच्छ वर्णन करके अपने चित्त के बोझ को हलका करूंगा।

अनन्त : प्यारे वसन्त! परमेश्वर के वास्ते मुझसे सब वृत्तान्त स्पष्ट वर्णन करो। यदि वह उपाय धर्म का है जैसा कि तुम सदा बरतते आए हो तो निश्चय रक्खो कि मेरा रुपया मेरा शरीर सब कुछ तुम्हारे लिए समर्पण है।

वसंत : छोटेपन में जब मैं पाठशाला में पढ़ता था तब यदि मेरा कोई तीर खो जाता था तो उसके ढूँढ़ने को मैं वैसा ही दूसरा तीर उसी ओर छोड़ता था और ध्यान रखता था कि यह तीर कहाँ गिरता है। इसी भाँति दुहरी जोखम उठाने से प्रायः दोनों मिल जाते थे। इस लड़कपन की बात के छेड़ने से मेरा आशय यह है कि अब मैं जो उपाय किया चाहता हूँ वह भी इसी लड़कपन के खेल की भाँति है। मैं तुम्हारा बड़ा ऋणी हूँ। जो कुछ मैंने तुमसे लिया वह सब एक हठी लड़के भाँति गँवा दिया परन्तु जहाँ तुमने पहिले एक तीर छोड़ा है उसी ओर यदि एक तीर और फेंको तो मैं तुम्हें निश्चय दिलाता हूँ कि अब की मैं उसके लक्ष्य की ओर अच्छी तरह दृष्टि रख कर जैसे होगा वैसे दोनों तीर खोज लाऊँगा। और यदि संयोग से पहिला न मिला तो दूसरा तो अवश्य ही फेर लाऊँगा और पहिले के लिये धन्यवाद के साथ तुम्हारा सदा ऋणी रहूँगा।

अनन्त : भाई तुम तो मुझे अच्छी तरह जानते हो। फिर मेरा जी टटोलने के लिये फेरवट के साथ बात करके व्यर्थ क्यों समय नष्ट करते हो। मुझे इसका दुःख है कि तुमने इस बात में सन्देह किया कि मैं तुम्हारे लिए प्राण दे सकता हूँ। यदि तुम मेरी सर्वस्व हानि किए होते तब भी मुझे इतना दुःख न होता जो इस बात से हुआ। व्यर्थ बात बढ़ाने से क्या लाभ? केवल इतना कहो कि मुझे तुम्हारे हेतु क्या करना होगा, मैं उसके लिये प्रस्तुत हूँ शीघ्र बतलाओ।

वसंत : विल्वमठ में एक प्यारी स्त्री रहती है जो अपने माँ बाप के मर जाने से एक बड़ी रियासत की स्वामिनी हुई है। उसका रूप ऐसा है कि केवल सौन्दर्य के शब्द से उसकी स्तुति हो ही नहीं सकती। उसमें अनगिनत गुण हैं। कुछ दिन हुए उसकी चितवन ने मुझको ऐसे प्रेम सन्तेश दिए थे कि मुझको उसकी ओर से पूरी आशा है। उसका नाम पुरश्री है, वह सचमुच पुुरश्री है, पुरश्री क्या सारे संसार की श्री है। रूप में श्री और गुण में सरस्वती है। संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ उसकी स्तुति की सुगंध न फैली हो। चारों ओर से बड़े बड़े राजकुमार और धनिक उसके ब्याह की आशा में आते हैं। भाई अनन्त! यदि मुझे इतना रुपया मिलता कि वहाँ जाकर इन लोगों के समक्ष मैं विवाह की प्रार्थना कर सकता तो मेरा जी कहता है कि मैं अपने मनोरथ में अवश्य विजयी होता।

अनन्त : भाई तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरी सब लक्ष्मी समुद्र में है, इस समय न मेरे पास मुद्रा है न माल जिसे बेच कर रुपया मिल सके, इससे जाओ देखो तो मेरी साक वंशनगर में क्या कर सकती है। तुम्हें पुरश्री के पास विल्वमठ जाने के लिए जो रुपया चाहिए उसके प्रबन्ध में मैं ऊँचा नीचा सब काम करने को प्रस्तुत हूँ। देखो अभी जाकर खोज करो कि रुपया कहाँ मिलता है और मैं भी जाता हूँ मेरे नाम या जमानत से जिस प्रकार रुपया मिले मुझे किसी बात में सोच विचार नहीं है।

(दोनों जाते हैं)

दूसरा दृश्य
स्थान-विल्वमठ में पुरश्री के घर का एक कमरा
(पुरश्री और नरश्री आती हैं)

पुरश्री : नरश्री मैं सच कहती हूँ कि मेरा नन्हा सा जी इतने बड़े संसार से बहुत ही दुःखी आ गया है।

नरश्री : मेरी प्यारी सखी यह बात तो आप तब कहतीं जब, भगवान न करे, जैसा आपका सुख है उसके बदले उतना ही दुख होता। परन्तु न जाने क्यों प्रायः ऐसा देखा है कि जो बहुत धनवान हैं वह भी संसार से वैसे ही घबड़ाए रहते हैं जैसे वह लोग जो भूखों मरते हैं। इसी से निश्चय होता है कि मध्यावस्था कुछ साधारण भाग्य की बात नहीं। लक्ष्मी बहुत शीघ्र श्वेत बाल करती है पर तृप्ति बहुत दिन तक जिलाती है।

पुरश्री : क्यों न हो तुमने कैसे मनोहर वाक्य कहे और कैसी अच्छी तरह।

नरश्री : यदि उनका बरताव किया जाय तो और उत्तम हो।

पुरश्री : यदि अच्छी बात का करना उतना ही सहज होता जितना कि उसका जानना तो सब मढ़ियाँ मंदिर और सब झोंपड़ियाँ महल हो जातीं। अच्छा गुरु वही है जो अपनी शिक्षा पर आप भी चलता है। बीस अच्छी बातें दूसरों को सिखलाना सहज हैं। किन्तु उनमें से अपनी शिक्षा के अनुसार एक पर भी चलना कठिन है। बुद्धि स्वभाव के ठण्डा करने के लिये बहुत से उपाय बतलाती है किन्तु समय पर क्रोध की गर्मी को कब रोक सकती है। यौवन का हिरन शिक्षा के फन्ते में से बहुत सहज से छूट जाता है। किन्तु इस बात से और पतिवरण करने से कोई सम्बन्ध नहीं। हाय! भला मेरे वरण करने का फल ही क्या? मैं तो न जिसे चाहूँ उसे स्वीकार कर सकती हूँ और न जिसे न चाहूँ, उसे अस्वीकार कर सकती हूँ। हाय! एक जीती लड़की को आशा एक मरे हुए बाप के मृतपत्र से कैसी रुक रही है। नरश्री क्या यह घोर दुःख की बात नहीं है कि न मैं किसी को स्वीकार कर सकती हूं और न अस्वीकार?

नरश्री : आपके बाप बड़े अच्छे और धर्मिष्ठ मनुष्य थे और ऐसे महात्माओं को मरने के समय अनुभव हुआ करते हैं। इससे सोने चाँदी और जस्ते के तीन सन्दूकों के निश्चय करने में जो बात उन्होंने सोची थी (जिसके अनुसार वह मनुष्य जो उनका बतलाया हुआ सन्दूक ग्रहण करेगा उसी का विवाह आपसे होगा) वह कभी बुराई न करेगी। मुझे निश्चय है कि चिंतित सन्दूक को वही मनुष्य चुनेगा जिसे आप जी से प्यार करती होंगी। परन्तु यह तो कहिए कि इतने राजकुमार और धनिक जो विवाह की आशा में आए हैं उनमें से किसी की ओर आपको कुछ भी स्नेह है या नहीं?

पुरश्री : तुम उनके नामों को मेरे सामने कहती जाओ तो मैं प्रत्येक के विषय में अपना विचार दर्शन करती जाऊंगी। इसी से तुम मेरे प्रेम का वृत्तान्त जान लोगी।

नरश्री : अच्छा तो नैपाल के राजकुमार से आरंभ कीजिए।

पुरश्री : छिः छिः! वह तो निरा बछेड़ा है, और कोई काम नहीं, बस रात दिन अपने घोड़ों ही का वर्णन। सारे अस्तबल की बला अपने सिर लिये रहता है और बड़ा भारी अभिमान इस बात पर करता है कि मैं अपने घोड़े की नाल आप ही बाँध लेता हूँ। वह तो बिल्कुल खोगीर की भरती है। निखट्टई नैपाली टट्टई।

नरश्री : और पाटन वाला?

पुरश्री : मरकहा बैल। रात दिन फूँ-फूँ किया करता है मानो उसको चितवन कहे देती है कि या तो ब्याह करो या साफ जवाब दो। सैकड़ों हँसी की बातें सुनाता है पर चाहे कि तनिक भी उसका थूथन पिचके। मुस्कुराना तो सपने में नहीं जानता। हँसी मानो जुए में हार आया है। अभी जब हट्टा कट्टा साँड बना है तब तो वह रोनी मूरत है तो बुढ़ापे में तो बात पूछते रो देगा। सिवाय हर हर भजने के और किसी काम का न रहेगा। मेरा ब्याह चाहे एक मुर्दे से हो पर इन भद्दे जानवरों से नहीं। भगवान इन दोनों से बचावे।

नरश्री : और भला फनेश देश के नरेश को आप कैसा समझती हैं?

पुरश्री : बेलगाम का ऊँट। मनुष्य के साँचे में ढल गया है बस इसी से मनुष्य कहा जाता है, नहीं तो निरा पशु। किसी की निन्दा करनी निस्सन्देह पाप है पर सच्ची बात यह है कि नैपाल के राजकुमार से जैसा एक चाशनी बढ़कर यह घुड़चढ़ा है वैसा ही पाटन वाले से बढ़कर नकचढ़ा। आप तो कुछ भी नहीं है पर छाया उसमें सब किसी की है। अभी गौरेया बोले तो आप उसकी तान पर नाचने लगें और अभी अपनी परछाइ देखें तो तलवार लेकर उससे लड़ने चलें। एक उससे न ब्याह किया मानो बीस मनुष्य से एक साथ ब्याह किया। यदि वह मुझसे घृणा करेगा तो मैं उससे कदापि अप्रसन्न न हूँगी वरंच अपना सौभाग्य समझूँगी क्योंकि यदि वह मेरे प्रेम में पागल भी हो जायगा तो मैं उसे प्यार न कर सकूंगी।

नरश्री : अच्छा, अंगदेश के नवयुवक धनी ब्रजपालक को आप क्या कहती हैं?

पुरश्री : तुम जानती हो कि मैं उसको कुछ नहीं कह सकती क्योंकि न वह मेरी बात समझता है न मैं उसकी। वह न हिन्ती जानता है न ब्रजभाषा न मारबारी और तुम शपथपूर्वक कह सकोगी कि मैथिल में मुझे कितना न्यून अभ्यास है। उसकी सूरत तो बहुत अच्छी है पर इससे क्या? खिलौने से कोई भी बातचीत कर सकता है? उसका पहिनावा कैसा बेजोड़ है। उसने अपना अंगा मारवाड़ में मोल लिया है, पाजामा मथुरा में बनवाया है, टोपी गुजरात से मँगनी लाया है, और चालढाल थोड़ी थोड़ी सब जगह से भीख मांग लाया है।

नरश्री : और उसका परोसी मालवा का अधिपति?

पुरश्री : परोस की सी क्षमा तो उसके स्वभाव में निस्सन्देह है क्योंकि उस दिन जब उस अंगवाले ने उसकी कनपटी पर एक घूसा मारा था तो उसने सौगन्ध खाई थी कि अवसर मिलेगा तो अवश्य बदला लूँगा। इस पर फनेश देशवाले के बीच में पड़ कर झगड़ा यों निबटा दिया कि रूसो मत दहिने के बदले बायाँ भी तुमको मिल जायगा।

नरश्री : और उस नवयुवक शम्र्मशय देश के मण्डलेश्वर के भतीजे को आप कैसा पसन्द करती हैं?

पुरश्री : राम राम! वह तो बड़ा भारी घनचक्कर है। सबेरे जब वह अपने आपे में रहता है तभी बहुत बुरा रहता है तो तीसरे पहर जब मद में चूर होता है तब तो और भी बुरा हो जाता है। अच्छी दशा में वह मनुष्य से कुछ न्यून रहता है और बुरी दशा में पशु से भी नीच हो ही जायगा। भगवान न करे यदि यह आपत्ति पड़े कि मुझको उससे विवाह करना हो तो जैसे हो सके वैसे मैं उससे दूर रहूँ।

नरश्री : भला यदि ऐसा हुआ कि उसने वही मंजूषा चुना जिसके चुनने से यह आपको पावे तब क्या कीजिएगा क्योंकि फिर तो विवाह न करना अपने बाप की इच्छा के विरुद्ध चलना है।

पुरश्री : इसीसे मैं तुम से कहती हूँ कि जिस मंजूषा में भूत की मूर्ति है उसके ऊपर एक उत्तम मद्य से भरा हुआ पाव रख दो क्योंकि भीतर भूत ऊपर मद्य बस यह उसी सन्दूक को चुनेगा। जैसे ही उस समुन्दर सोख अगस्त से बचाने का कोई उपाय करना ही पड़ेगा।

नरश्री : सखी आप इस बात का ताप मत कीजिए कि इन लोगों में से किसी से आप को विवाह करना पड़ेगा क्योंकि मैं सब के जी का हाल ले चुकी हूँ। यदि आप अपने बाप की आज्ञा के अनुसार मंजूषा के चुनने ही पर अपना निश्चय रक्खेंगी और कोई दूसरी प्रतिज्ञा न करेंगी तो यह सब के सब यहाँ से चले जायँगे और फिर विवाह की इच्छा प्रकट करके आपको कष्ट न देंगे।

पुरश्री : तुम निश्चय जानो कि यदि मुझे मारर्कंडेय की आयु मिले तो भी मैं अम्बालिका की तरह क्वारी मर जाऊँगी पर अपने पूज्य पिता की इच्छा के विरुद्ध कभी ब्याह न करूँगी। मुझको बड़ा आनन्द है कि इन सन्दूकों में ऐसी चातुरी है कि यह सब आपत्ति बिना मंत्र जंत्र के आप से आप दूर हो जाती है क्योंकि इनमें से ऐसा कोई नहीं जिसका मैं घड़ी भर रहना भी सह सकती हूँ।

नरश्री : क्यों सखी आपको स्मरण है कि नहीं कि आप के पिता के समय में फनित मठ के राजा के साथ वंशनगर का एक युवक बुद्धिमान और शूर मनुष्य आया था?

पुरश्री : हाँ वह बसन्त था-क्यों यहा न उसका नाम था?

नरश्री : हाँ सखी-जहाँ तक कि मुझ मूर्ख की समझ है सुन्दरी स्त्री के योग्य उससे उत्तम और कोई वर मुझे दृष्टि नहीं पड़ा।

पुरश्री : मुझको भलीभाँति स्मरण है और जो कुछ तुमने उसकी प्रशंसा की बहुत ठीक है।

(एक नौकर आता है)

क्यों क्यों! कोई नई बात है?

नौकर : बबुई साहिब ऊ चारों आदमी आप से बिदा होए कै ठाढ़ होएँ और एक पाँचवाँ का हरकारा आयल हौ सो कहत हौ की मोरकुटी कै राजकुमार ओकर मालिक आज राती के इहाँ पहुँचि हैं।

पुरश्री : यदि यह पाँचवाँ मनुष्य ऐसा होता है कि मैं उसके आने पर वैसी ही प्रसन्नता प्रकट कर सकती जैसी प्रसन्नता से इन चारों को विदा करती हूँ तो क्या बात थी। परन्तु यदि इसका रूप भूत का सा है और चित्त देवता का सा तो मैं उसका शाप देना इसकी अपेक्षा उत्तम समझूँगी कि वह मुझसे ब्याह करे। नरश्री चलो। नौकर तू आगे जा। एक गाहक जाने ही नहीं पाता कि दूसरा आ उपस्थित होता है। (सब जाते हैं)

 

तीसरा दृश्य
(बसन्त और शैलाक्ष आते हैं)

शैलाक्ष : छः सहस्र मुद्रा-हूँ।

बसन्त : हाँ साहिब-तीन महीने के वादे पर।

शैलाक्ष : तीन महीने का वादा-हूँ।

बसन्त : और इसके लिये, जैसा कि मैं आप से कह चुका हूँ, अनन्त जामिन होंगे।

शैलाक्ष : अनन्त जामिन होंगे-हूँ।

बसन्त : तो आप मुझे देंगे? आप से मेरा काम निकलेगा? मैं आप के उत्तर की राह देखता हूँ।

शैलाक्ष : छः सहस्र मुद्रा तीन महीने का वादा-और अंनत की जमानत।

बसन्त : जी हाँ। आप क्या उत्तर देते हैं?

शैलाक्ष : अनन्त है तो अच्छा मनुष्य।

बसन्त : क्यों क्या आपने इसके विरुद्ध कुछ सुना है?

शैलाक्ष : नहीं नहीं, मेरा अभिप्राय उनके अच्छे होने से यह है कि उनकी जमानत ही बहुत है-यद्यपि आजकल उनकी दशा हीन है क्योंकि उनका एक जहाज विपुल को गया है दूसरा हिन्दुस्तान। को सुना है कि बाजार में भी कुछ व्यवहार है, एक तीसरा जहाज मौक्षिक में तथा चैथा अंग देश में है। इसी भाँति इधर-उधर और बन्दरों में भी उनकी जोखों है। परन्तु जहाज फिर भी काठ ही है और मल्लाह भी मनुष्य ही है; चूहे थल में भी होते हैं और जल में भी, वैसे ही चोर पृथ्वी पर भी होते हैं और पानी में भी अर्थात् डाकुओं का भय सभी स्थल है और फिर आँधी, तूफान और चट्टान का भय अलग लगा हुआ है पर फिर भी वह बहुत हैं-छः सहस्र मुद्रा-मैं समझता हूँ कि उनकी जमानत स्वीकार कर लूँगा।

बसन्त : सन्तोष रखिए उनकी जमानत निस्सन्देह ग्रहण करने योग्य है।

शैलाक्ष : मैं अपना मन भर लूँगा और किस तरह मेरा तोष होगा इस पर विचार करूँगा-मैं अनन्त से इसकी बातचीत कर सकता हूँ?

बसन्त : यदि दोपहर को कृपा कर के हम लोगों के साथ खाना खाइए तो वहाँ सब बात निश्चय हो जाय।

शैलाक्ष : जी हाँ सूअर सूँघने को और उस घर में खाने को जहाँ आप के देवताओं ने सब पिशाची की बातें भर दी हैं। मैं आप लोगों से लेन देन करूँगा बोलूँगा, आप के साथ चलूँ फिरूँगा और ऐसे ही दूसरी बातें करूँगा, परन्तु यह नहीं हो सकता कि मैं आप लोगों के साथ खाना खाऊँ, पानी पीऊँ या पूजा करूँ। बाजार की क्या खबर है?-यह कौन आता है।

(अनन्त आता है)

बसन्त : अनन्त आप आ पहुँचे।

शैलाक्ष : (आप ही आप) देखो इसकी सूरत ही से यह बात झलकती है कि यह हिन्दुओं को प्रसन्न करने के लिये जैनियों से शत्रुता रखता है। मैं इससे घृणा करता हूँ क्योंकि यह ईसाई है परन्तु मुख्यतः इस कारण से यह ऐसा निरुत्साह और नीच है कि लोगों को रुपया बिना ब्याज के ऋण दे दे कर हम लोगों के ब्याज का भाव बिगाड़ देता है। यदि एक बार भी मेरे हाथ चढ़े तो मैं सब पुरानी कसर निकाल लूँ। यह मनुष्य हमारी पवित्र जाति को तुच्छ समझता है और मेरी और मेरे व्यवहारों की निन्दा वहाँ भी नहीं छोड़ता जहाँ बहुत से व्यापारी इकट्ठा होते हैं। धम्र्मोपार्जित द्रव्य का ब्याज नाम रखता है। धिक्कार है मेरी जाति को यदि मैं इस मनुष्य से बदला न लूँ।

बसन्त : शैलाक्ष आपने सुना?

शैलाक्ष : मैं अभी आपने जी में हिसाब कर रहा था कि मेरे पास कितना रुपया तैयार है और जहाँ तक मैंने सोचा इस समय मेरे पास छः सहस्र रुपया न निकलेगा-पर इससे क्या? मैं त्रयंबक से जो मेरी जाति का एक धनिक पुरुष है शेष मुद्रा से लूँगा। परन्तु नेक ठहरिए-कै महीने की मिती आप चाहते हैं? (अनन्त से) प्रणाम महाशय, आपकी बड़ी आयु है, अभी आप ही का हम लोग वर्णन कर रहे थे।

अनन्त : शैलाक्ष यद्यपि मैं ब्याज पर रुपये का कभी लेन देन नहीं करता तो भी अपने मित्र की अत्यन्त आवश्यकता को समझ कर अपने नियम के तोड़ने पर प्रस्तुत हूँ। बसन्त तुम इनसे कह चुके हो कि कितने रुपये की आवश्यकता है?

शैलाक्ष : हाँ हाँ-छः सहस्र मुद्रा।

अनन्त : और तीन महीने के लिये।

शैलाक्ष : हाँ मैं भूल गया था-तीन महीने के मिती पर-आप कह चुके हैं-तो किन प्रतिज्ञाओं पर, नेक ठहरिए-किन्तु सुनिए तो सही अभी आपने कहा था कि हम सूद पर लेन देन नहीं करते।

अनन्त : मैं इसका व्यापार कभी नहीं करता।

शैलाक्ष : जब कि यादव अपने मामा लवेन्द्र की भेड़ों को चराते थे-तो उनको उनकी माँ की चातुरी से बरकत मिली थी।

अनन्त : तो उनके नाम से यहाँ क्या तात्पर्य है? क्या वह सूद खाते थे?

शैलाक्ष : नहीं ब्याज नहीं खाते थे, जिसे आप सूद कहते हैं ठीक वैसा ब्याज नहीं लेेते थे-सुनिए वह क्या उपाय करते थे। जब कि लवेन्द्र और उनमें परस्पर यह बात निश्चय हुई कि जितने भेड़ों के बच्चे धारीदार और चितकबरे पैदा हों वह यादव को वेतन में मिलें तो यादव ने चतुराई से बहुत सी हरी छड़ियाँ काट कर और स्थान स्थान से छिलका उड़ा कर उन्हें गण्डेदार बनाया और उठी हुई भेड़ों के सामने गाड़ दिया और जब यह गाभिन हुईं तो इसके प्रयोग से चितकबरे बच्चे उत्पन्न हुए, जो यादव के भाग में आये। यह लाभ उठाने का एक उपाय था और यादव पर ईश्वर की कृपा थी क्योंकि लाभ भी होना ईश्वर की कृपा है, यदि मनुष्य उसको चोरी से न उपार्जन करे।

अनन्त : यह तो ईश्वर की दया थी जिससे यादव ने अपने परिश्रम का इस प्रकार से फल पाया। इसमें उनका कुछ वश न था वरंच केवल ईश्वर की माया से यह बात प्रकट हुई। पर क्या आपका यह तात्पर्य है कि इतिहास में इस कथा के लिखने से यह अभिप्राय था कि ब्याज लेना उचित समझा जाय, या आप अपने रुपये और अशरफी को भेड़ी समझते हैं।

शैलाक्ष : मैं यह नहीं कह सकता परन्तु मैं उनसे बच्चे वैसे ही शीघ्र उत्पन्न कर लेता हूँ। परन्तु नेक इस बात को सुनिए।

अनन्त : बसन्त इस पर विचार करो, राक्षस भी अपने स्वार्थ के लिये इतिहास और पुराण का प्रमाण दे सकता है। दुष्ट मनुष्य जो अपनी निष्कलंकता प्रकट करता है एक हँसमुख बात करनेवाला होता है। वह एक सेब की भाँति है जिसका छिलका बहुत स्वच्छ और उत्तम है परन्तु भीतर बिलकुल सड़ा हुआ है, देखो झूठ की सूरत देखने में कैसी चिकनी चुपड़ी होती है।

शैलाक्ष : छः हजार रुपया-यह तो एक पूरी जमा है-और महीने भी तीन-तो हमें भाव सोचने दीजिए।

अनन्त : स्पष्ट कहो रुपया देना है या नहीं।

शैलाक्ष : अनन्त महाशय आपने बाजार में सहस्रों ही बार मेरे धन और लाभ के लिये मेरी दुर्दशा की होगी पर मैंने क्षमा करने के सिवाय कभी कुछ उत्तर नहीं दिया क्योंकि क्षमा हमारी जाति का चिन्ह है। आप मुझे नास्तिक, गलकट्टा और कुत्ता कह कर मेरे जातीय परिधान पर थूकते थे और यह सब केवल इस अपराध के लिये कि मैं अपनी जमा को जिस भाँति चाहता हूँ काम में लाता हूँ। अस्तु तो अब जान पड़ता है कि आप मेरी सहायता के अपेक्षी हैं। आप मेरे पास आए हैं और कहते हैं कि शैलाक्ष हमें रुपया ऋण दो-ऐं आप ऐसा कहते हैं, आप जो मेरी डाढ़ी को अपना उगालदान समझते थे और मुझे ठीक इस तरह ठोकर मारते थे जैसे कोई अपनी देहली पर अनजान कुत्ते को मारता है। आपकी प्रार्थना रुपये की है-इसका मैं आपको क्या उत्तर दूँ? क्या मैं आपसे यह पूछूँ कि साहिब कही कुत्ते के पास भी रुपया सुना है? कभी संभव है कि अपवित्र कुत्ता भी छः सहस्र मुद्रा ऋण दे सके? या नम्रता से सिर झुका कर भृत्य की भाँति काँपता हुआ धीमे स्वर से निवेदन करूँ 'महाराज ने कृपापूर्वक मुझ पर गए बुध को थूका था और फलाने दिन ठोकर मारी थी और फलाने दिन कुत्ते की उपाधि दी थी, अतः इन कृपाओं के बदले मैं उतना रुपया देने को प्रस्तुत हूँ?'

अनन्त : मैं तुझे फिर भी ऐसा कहूँगा और तुझ पर थूकूंगा और लात मारूँगा। यदि तुझे रुपया उधार देना है तो मुझे अपना मित्र समझ कर मत दे (क्योंकि मित्रता रुपये से जो एक बाँझ की भाँति है बच्चे कब उत्पन्न कर सकती है?) वरंच अपना शत्रु समझ कर जिससे भंगप्रतिज्ञ होने पर तुझे सर्व प्रकार से प्रतिज्ञानुसार दण्ड ग्रहण करने का मुँह पड़े।

शैलाक्ष : वाह वाह देखिए तो आपे कैसा आपने से बाहर हो गये! मैं आपसे मित्रता का नाता रक्खा चाहता हूँ और पिछले बैरों को भुला कर आपके स्नेह की आशा रखता हूँ, मैं आपको रुपया उधार देने को प्रस्तुत हूँ और सूद एक पैसा नहीं चाहता तिस पर जो आप मेरी बात नहीं सुनते। क्या यह मेरा बर्ताव मित्रता का नहीं है?

अनन्त : यह आपकी दया है।

शैलाक्ष : मैं इस कृपा को दिखलाऊँगा। (अनन्त से) मेरे साथ किसी व्यवस्थापक के यहाँ चलिए और उसके सामने तमस्सुक पर अपनी मुहर कर दीजिए और हँसी की रीति पर वह शर्त लिख दीजिए कि यदि अमुक दिन और अमुक स्थान पर आप रुपया मेरा जिसका तमस्सुक में वर्णन है न चुका दें तो मुझे अधिकार होगा कि उसके बदले मैं आपके जिस शरीर के अंश से चाहूँ आध सेर माँस काट लूँ।

अनन्त : मैं चित्त से प्रसन्न हूँ और इन शर्तों पर मुहर कर दूँगा और यह भी कहूँगा कि इस जैन में बड़ी मनुष्यता है।

बसन्त : तुम मेरे लिये ऐसे तमस्सुक पर हस्ताक्षर न करने पाओगे इससे तो मैं अपनी दरिद्रावस्था में रहना ही श्रेय समझूँगा।

अनन्त : क्यों? डरो मत-प्रतिज्ञा भंग होने की घड़ी कदापि न आवेगी-दो महीने के भीतर अर्थात् तमस्सुक की मिती पूजने के एक महीना पहिले मुझे आशा है कि इसका तिगुना धन मेरे पास पहुँच जायगा।

शैलाक्ष : हे ईश्वर, ये आर्य भी कैसे मनुष्य होते हैं! जैसा इनका चित्त कठोर होता है वैसा ही औरों का भी समझ कर सन्देह करते हैं! भला यह तो बतलाइये कि यदि इन्होंने प्रतिज्ञा भंग की तो मुझे इस शर्त के पूरा कराने से क्या लाभ, होगा? मनुष्य के शरीर का आध सेर माँस किस रोग की औषधि है और वह किस गिनती में है? क्या वह उतना भी काम में आ सकता है जैसा भेड़ी बकरी का माँस? सुनिए केवल इनसे मैत्री करने के लिये मैं इनके साथ ऐसी कृपा करता हूँ, यदि यह इसे समझें तो अच्छी बात है नहीं तो प्रणाम, और मेरी प्रीति के बदले मेरे साथ बुराई न कीजिएगा।

अनन्त : हाँ शैलाक्ष मैं इस तमस्सुक पर मुहर कर दूँगा।

शैलाक्ष : तो अभी व्यवस्थापक के घर पर जाइए और इस हँसी की दस्तावेज के लिखने को कहिए। मैं भी शीघ्र ही जा कर थैली में छ हजार रुपये लिये हुए वहीं पहुँचता हूँ और अपना घर भी देखता आऊँगा जिसे एक बड़े बहुव्ययी और अविश्वासी भृत्य को सौंप आया हूँ-मैं सब काम करके बात की बात में आप से मिलता हूँ। (जाता है)

अनन्त : अच्छा झटपट जाओ। यह जैन ऐसा कृपालु होता जाता है कि आर्य बन जायगा।

बसन्त : मैं चिकनी चुपड़ी बातें और दुष्ट अन्तःकरण नहीं पसन्द करता।

अनन्त : आओ, इसमें कोई धोका नहीं हो सकता क्योंकि मेरे जहाज मिती पूजने के एक महीना पहिले अवश्य ही पहुँच जायँगे। (जाते हैं)


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