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कविता

असम्भव
रमानाथ अवस्थी


ऐसा कहीं होता नहीं
ऐसा कभी होगा नहीं

धरती जले बरसे न घन
सुलगे चिता झुलसे न तन
औ' ज़िंदगी में हों न ग़म

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

हर नींद हो सपनों भरी
डूबे न यौवन की तरी
हरदम जिए हर आदमी
उसमें न हो कोई कमी

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

सूरज सुबह आए नहीं
औ' शाम को जाए नहीं
तट को न दे चुम्बन लहर
औ' मृत्यु को मिल जाए स्वर

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

दुख के बिना जीवन कटे
सुख से किसी का मन हटे
पर्वत गिरे टूटे न कन
औ' प्यार बिन जी जाए मन

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

 


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