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कविता

अदृश्य होते हुए
दिविक रमेश


जानता मैं भी हूं कि
लगभग अदृश्य हो रहा हूं
अदृश्य यूं कौन नहीं हो रहा

न वह हवा है, न पानी ही
न पेड़ों में वह पेड़त्व ही

जगत चाचा की कौन कहे
अब तो वे भी जो कभी बेचते थे
बिक रहे हैं सौदों से

मैं तो फिर भी
लगता है महज अदृश्य हो रहा हूं
आज न तसल्ली में तसल्ली है
न दुख में दुख
यहां तक कि चालाकियां भी अब कहां रहीं ढंकी दबी
सरेआम नग्न हैं
घूम रही हैं बेईमानियां पेट फुलाए

चोर चौराहे पर कर रहा है घोषणा कि वह चोर है
हत्यारे को अब नहीं रही जरूरत छिपने की

ऐसे दृश्यबंधों में
सभ्यताओं से दूर
किसी कोने में रह रही अछूती जनजाति में बचे
बल्कि बचे खुचे
थोड़े लिहाज सा
गनीमत है
कि मैं महज अदृश्य हो रहा हूं
वह जो एक रिश्ता था
है तो अब भी

वह जो एक ताप था
है तो अब भी
वह जो एक नाप था
है तो अब भी
यानी और भी बहुत कुछ जो कि था
है तो अब भी
पर कहां…कहां

यक़ीन मुझे भी हो रहा है
कि हो रहा हूं अदृश्य
एक इबारत की तरह जो चमकती थी कभी
कि जो पढ़ी जा सकती थी कभी
और समझी भी

पर नही अफसोस मुझे तब भी
कि हूं तो
हो रहा हूं महज अदृश्य ही

वे रचनाएं भी तो हैं
बाकी है जिनका अभी पढ़ा जाना
चढ़ा जाना जबान और आंखों पर
श्रेष्ठ जनों की

जब समय में से समय ही किया जा रहा हो अदृश्य
तब क्या बिसात है उन पेड़ों की
जिन पर पत्ते भी हैं और रंग भी
पर वही नहीं है
जिसे होना चाहिए था

तब वज़ूद क्या उन नदियों का
जिनमें जल भी है और लहरें भी
बस वही नहीं है जिसे होना चाहिए था

गनीमत है कि अभी है बचा मुझमें
बस वही
भले ही हो रहा हूं मैं अदृश्य

एक हल्की सी चालाकी सिखा दी गई है मुझे भी
एक गलत क्रियापद को मैंने भी बना लिया है हथियार
रहने को सुरक्षित

गनीमत है कि मुझे याद है इबारत
कि मैं हो रहा हूं
न कि किया जा रहा हूं
अदृश्य

 


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