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कविता

छत लिखते हैं दर दरवाज़े लिखते हैं

शीन काफ़ निज़ाम


छत लिखते हैं दर दरवाज़े लिखते हैं
हम भी किस्से कैसे-कैसे लिखते हैं

पेशानी पर, बैठे सजदे लिखते हैं
सारे रस्ते तेरे घर के लिखते हैं

जब से तुमको देखा हमने ख़्वाबों में
अक्षर तुमसे मिलते-जुलते लिखते हैं

कोई इनको समझे तो कैसे समझे
हम लफ्जों में तेरे लहजे लिखते हैं

छोटी-सी ख्वाहिश है पूरी कब होगी
वैसे लिक्खें जैसे बच्चे लिखते हैं

फुर्सत किसको है जों परखे इनको भी
मानी हम ज़ख़्मों से गहरे लिखते हैं

 


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