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कविता

दरवाज़ा कोई घर से निकालने के लिए दे

शीन काफ़ निज़ाम


दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे
बेखौफ़ कोई रास्ता चलने के लिए दे

आँखों को अता ख्वाब किए शुक्रिया लेकिन
पैकर भी कोई ख्वाबों में ढलने के लिए दे

पानी का ही पैकर किसी परबत को अता कर
इक बूँद ही नदी को उछलने के लिए दे

सहमी हुई शाख़ों को ज़रा सी कोई मुहलत
सूरज को सवारी को निगलने के लिए दे

सब वक़्त की दीवार से सिर फोड़ रहे हैं
रोज़ाना ही कोई भाग निकलने के लिए दे

सैलाब में साअत के मुझे फेंकने वाले
टूटा हुआ इक पल ही सँभलने के लिए दे

महफूज़ जो तरतीबे अनसीर से है असरार
तो खोल को इक काँच पिघलने के लिए दे

तखईल को तखलीक की तौफ़ीक़ अता कर
फिर पहलू से इक चीज़ निकलने के लिए दे

 


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