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कविता

छीन कर वो लज़्ज़्त-ए-सोतो सदा ले जाएगा

शीन काफ़ निज़ाम


छीन कर वो लज़्ज़त-ए-सोतो-सदा ले जाएगा
हाथ शल कर जाएगा हरफ़-ए-दुआ ले जाएगा

बीच का बढ़ता हुआ हर फ़ासला ले जाएगा
एक तूफ़ाँ आएगा सब कुछ बहा ले जाएगा

देखना बढ़ता हुआ ये ख़्वाहिशों का सिलसिला
मौज-ए-खूँ दिखलाएगा रंग-ए-हिना ले जाएगा

बेमुक़द्दर छोड़ जाएगा सभी परेशानियाँ
रोशनी आँखों की सीने की ज़िया ले जाएगा

घर से जाते वक़्त वो अब के बुजुर्गों की दुआ
ले तो जाएगा मगर डरता हुआ ले जाएगा

लम्स में मिल जाएगा आवाज़ का असरार भी
पानियों के पैकरों को भी उठा ले जाएगा

इक परिंदा रात की चौखट पे आएगा 'निज़ाम'
देखना है देगा क्या और हमसे क्या ले जाएगा

 


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