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उपन्यास

अपराध और दंड
फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की

अनुवाद - नरेश नदीम


1

वह बहुत देर तक उसी तरह लेटा रहा। बीच-बीच में लगता कि उसकी नींद टूट गई है, और ऐसे पलों में उसे लगता जैसे रात बहुत बीत चुकी है, लेकिन उसे उठ बैठने की बात नहीं सूझती थी। आखिर उसने देखा कि दिन निकल आया है। अपनी कुछ देर पहले की तंद्रा से अभी तक मूढ़ बना वह पीठ के बल लेटा हुआ था। सड़क से भयभीत, निराशा में डूबी कर्कश चीखें ऊपर आ रही थीं, वैसे ही आवाजें जिन्हें अपनी खिड़की के नीचे वह रोज रात को दो बजे के बाद सुनता रहता था। अब इन आवाजों को सुन कर उसकी नींद खुल गई। 'ओह! नशे में धुत शराबी अब शराबखानों से बाहर आ रहे हैं,' उसने सोचा, 'दो बज चुके हैं,' और यह सोच कर वह फौरन उछल पड़ा, जैसे किसी ने उसे झिंझोड़ कर सोफे पर से घसीट लिया हो। 'अरे दो बज गए क्या?' वह उठ कर सोफे पर बैठ गया और अचानक हर बात उसे याद आती चली गई! एक क्षण में, बिजली के कौंधे की तरह हर बात उसे याद आ गई!

पहले पल में उसे लगा, गोया वह पागल होता जा रहा है। भयानक सिहरन से उसका बदन काँप उठा, लेकिन यह सिहरन उस बुखार की वजह से थी, जो उसे बहुत पहले, नींद के ही दौरान चढ़ आया था। अब अचानक उसके बदन में इतने जोर की कँपकँपी पैदा हुई कि उसके दाँत बजने लगे, हाथ-पाँव काँपने लगे। उसने दरवाजा खोला और कान लगा कर सुनने लगा। पूरा घर नींद में डूबा हुआ था। हैरान हो कर वह अपने आपको और कमरे की हर चीज को घूरने लगा। उसे इस बात पर ताज्जुब हो रहा था कि पिछली रात अंदर आ कर वह दरवाजे की कुंडी चढ़ाना कैसे भूल गया था और कपड़े उतारे बिना, हैट तक उतारे बिना, सोफे पर कैसे ढेर हो गया था। हैट सोफे से लुढ़क कर नीचे फर्श पर तकिए के पास पड़ा था। 'अगर कोई अंदर आ जाता तो क्या सोचता कि मैं पिए हुए हूँ, लेकिन... वह लपक कर खिड़की के पास गया। रोशनी काफी थी। वह जल्दी-जल्दी सर से पाँव तक अपने आपको, अपने सारे कपड़ों को देखने लगा : कहीं कोई निशान तो नहीं रह गया है! लेकिन इस तरह यह काम तो नहीं किया जा सकता था। काँपते-ठिठुरते हुए उसने हर चीज को उतारना और एक बार फिर से देखना शुरू किया। उसने हर चीज के एक-एक रेशे को, एक-एक धागे को ध्यान से देखा। पर भरोसा न रह जाने के कारण उसने हर चीज की अच्छी तरह, तीन बार छानबीन की। कहीं कुछ भी नहीं था, कोई भी निशान नहीं था। बस एक जगह पतलून की मोरी के निचले सिरे पर, जो घिस कर फट चला था, खून की कुछ जमी हुई बूँदें चिपकी थीं। उसने एक बड़ा-सा कमानीदार चाकू उठा कर लटकते हुए चीथड़े को काट डाला। अब कहीं कुछ भी नहीं रहा। अचानक याद आया उसे कि बुढ़िया के बटुए और संदूक में से उसने जो चीजें निकाली थीं, वे अभी तक उसकी जेबों में ही हैं। अब तक उसने उनको निकाल कर कहीं छिपाने की बात सोची भी नहीं थी! अपने कपड़ों की जाँच करते समय भी उसने इसके बारे में नहीं सोचा था! हो क्या गया था उसे उसने फौरन झपट कर वे सारी चीजें निकालीं और मेज पर डाल दीं। जब उसने जेबों का अस्तर तक बाहर निकाल कर पूरा-पूरा भरोसा कर लिया कि उनमें कुछ भी नहीं रहा, तब वह उस पूरे ढेर को समेट कर एक कोने में ले गया। दीवार के निचले सिरे पर कागज उखड़ा हुआ था और चीथड़ों की तरह लटक रहा था। उसने कागज के नीचे की खोखली जगह में सारी चीजें ठूँसनी शुरू कर दीं। 'सब चली गईं! अब कुछ भी नहीं दिखाई देता, बटुआ भी!' उसने बेहद खुश हो कर सोचा, उठ कर खड़ा हो गया और सूनी-सूनी आँखों से उस कोने और खोखल को घूरने लगा, जहाँ हमेशा से ज्यादा उभार दिखाई दे रहा था। अचानक खौफजदा हो कर वह सर से पाँव तक काँप गया। 'हे भगवान!' उसने निराशा में डूबी हुई कमजोर आवाज में कहा, 'मुझे हो क्या गया है? क्या सब कुछ छिप गया? क्या चीजें छिपाने का तरीका यही है?'

उसने नहीं सोचा था कि उसे छोटे-छोटे माल-जेवर भी छिपाने पड़ेंगे। उसने तो बस पैसों की बात सोची थी, और इसलिए छिपाने की कोई जगह भी तैयार नहीं की थी। 'लेकिन अब... अब मैं इतना खुश किस बात पर हो रहा हूँ?' उसने सोचा। 'क्या इसे ही चीजें छिपाना कहते हैं मेरी समझ जवाब देती जा रही है, और कुछ नहीं!' वह निढाल हो कर सोफे पर धम से बैठ गया और अचानक नाकाबिले-बर्दाश्त कँपकँपी के एक और दौरे ने उसे आन दबोचा। मशीनी ढंग से उसने बगल में पड़ी कुर्सी पर से अपना पुराना, छात्रोंवाला, जाड़े का लंबा गर्म कोट खींचा जो अब तार-तार हो चुका था, उसे सर तक ओढ़ा और एक बार फिर बेहोशी और बेहवासी में डूब गया। अब गहरी नींद सो रहा था।

पाँच मिनट भी नहीं बीते थे कि वह एक बार फिर उछल कर खड़ा हो गया, और उन्मादियों की तरह एक बार फिर अपने कपड़ों पर झपटा। 'कुछ किए बिना ही मैं दोबारा कैसे सो गया अरे हाँ, कोट की बगल में से मैंने वह फंदा तो निकाला ही नहीं है! एकदम भूल गया था, वह भी ऐसी बात! एकदम पक्का सबूत!' उसने खींच कर फंदा उखाड़ा, जल्दी-जल्दी काट कर उसके टुकड़े किए और उन टुकड़ों को तकिए के नीचे रखे कपड़ों के ढेर के बीच डाल दिया। 'कुछ भी हो, फटे कपड़ों की चिंदियों से कोई शक पैदा नहीं हो सकता। हाँ, यही ठीक है!' कमरे के बीचोंबीच खड़े हो कर उसने कई बार दोहराया और तकलीफदेह हद तक अपना ध्यान केंद्रित करके एक बार फिर अपने चारों ओर घूरने लगा। फर्श पर और हर जगह। कहीं कोई बात भूल तो नहीं रहा है! उसे पक्का विश्वास हो चला था कि उसकी सारी चेतनाएँ, उसकी यादें और सोचने की मामूली-सी शक्ति भी जवाब देती जा रही थी और यह बात उसके लिए असहनीय यातना का सबब बन गई थी। 'कहीं ऐसा तो नहीं कि इसका सिलसिला शुरू हो चुका हो! कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे मेरा दंड मिलने लगा हो! यही बात है!' उसने अपनी पतलून से जो घिसी हुई चिंदियाँ काटी थीं वे कमरे के बीचोंबीच फर्श पर ही पड़ी हुई थीं, जहाँ अंदर आनेवाला कोई भी आदमी उन्हें देख सकता था! 'मुझे हो क्या गया है?' वह एक बार फिर चिल्लाया, जैसे बदहवास हो गया हो।

फिर एक अजीब-सा विचार उसके दिमाग में आया : शायद उसके सारे कपड़े खून में सने हुए हैं, शायद उन पर बहुत सारे धब्बे हैं लेकिन उसे दिखाई नहीं दे रहे हैं, वह उन्हें इसलिए नहीं देख पा रहा कि उसके हवास जवाब देते जा रहे हैं, वे बिखरते जा रहे हैं... उसकी सोचने की शक्ति धुँधलाती जा रही है... अचानक उसे याद आया कि खून बटुए पर भी तो लगा था... 'अरे! तब तो जेब में भी लगा होगा, क्योंकि मैंने गीला बटुआ अपनी जेब में ही रख लिया था!' पलक झपकते उसने जेब का अस्तर बाहर निकाला। हाँ, उस पर निशान थे, जेब के अस्तर पर धब्बे थे! 'तो मेरी अक्ल ने पूरी तरह मेरा साथ नहीं छोड़ा है। अभी तक कुछ अक्ल और याद बाकी है, क्योंकि यह बात मुझे खुद सूझी थी,' उसने राहत की गहरी साँस ले कर विजयी भावना के साथ सोचा, 'बस बुखार की कमजोरी है, एक पल की बेहोशी।' यह सोचते ही उसने अपने पतलून की बाईं जेब का सारा अस्तर नोच डाला। उसी पल धूप की किरण उसके बाएँ जूते पर पड़ी। उसे अब शक हुआ कि उसके मोजे पर, जो बूट के बाहर झाँक रहा था, कुछ निशान थे। उसने झटके से अपना बूट उतार फेंका, 'सचमुच निशान थे! मोजे का सिरा खून में लथपथ था,' उसका पाँव अनजाने ही फर्श पर जमे खून में पड़ गया होगा, 'लेकिन अब मैं इसका क्या करूँ अब मैं यह मोजा, ये फटी हुई चिंदियाँ और जेब का अस्तर कहाँ रखूँ'

वे सब चीजें अपने हाथों में बटोरे हुए वह कमरे के बीचोबीच खड़ा था। 'आतिशदान में! लेकिन आतिशदान की तलाशी तो वे सबसे पहले लेंगे। जला दूँ लेकिन इन चीजों को जलाऊँ किस तरह माचिस भी तो नहीं है। नहीं, बेहतर तो यह होगा कि बाहर जा कर यह सब कहीं फेंक आऊँ। हाँ, इन्हें कहीं फेंक आना ही बेहतर होगा,' उसने सोफे पर फिर बैठते हुए दोहराया, 'और फौरन, इसी दम बिना कोई देर किए...' लेकिन इसकी बजाय उसका सर तकिए पर जा टिका। एक बार फिर बर्फ जैसी ठंडी असहनीय कँपकँपी ने उसे दबोचा लिया और अपना कोट एक बार फिर ओढ़ लिया। बड़ी देर तक, कई घंटों तक, यह बेचैनी भूत की तरह उस पर सवार रही कि वह 'फौरन, इसी वक्त, कहीं चला जाए और ये सारी चीजें फेंक आए, ताकि वे हमेशा के लिए उसकी आँखों से ओझल हो जाएँ और उनका नाम-निशान भी बाकी न रहे। फौरन!' कई बार उसने सोफे से उठने की कोशिश की लेकिन उठ नहीं पाया। आखिरकार किसी के जोरों से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर वह पूरी तरह जाग गया।

'दरवाजा तो खोल, जिंदा है कि नहीं पड़ा-पड़ा सोता रहता है!' नस्तास्या मुक्के से दरवाजा पीटते हुए चिल्लाई। 'दिन-दिन भर पड़ा कुत्ते की तरह खर्राटे लेता रहता है! है भी बिलकुल कुत्ता! मैं कहती हूँ, दरवाजा खोल! दस बज चुके!'

'हो सकता है घर से बाहर हो,' किसी मर्द की आवाज सुनाई दी।

'अरे, यह तो दरबान की आवाज है... उसे क्या चाहिए?'

वह उछल पड़ा और सोफे पर बैठ गया। अपने दिल की धड़कन उसके लिए तकलीफ का सबब बन गई थी।

'फिर अंदर से कुंडी किसने लगाई, यह तो बताओ,' नस्तास्या ने पलट कर पूछा। 'अच्छा सिलसिला शुरू किया है! अंदर से कुंडी चढ़ाने का! डरता है कोई उसे उठा ले जाएगा! दरवाजा खोल नासमझ, उठ भी जा!'

'इन्हें क्या चाहिए? दरबान क्यों आया है? मेरी हर बात का पता लग गया! टक्कर लूँ या दरवाजा खोल दूँ खोल देना ही ठीक रहेगा! जो होना है, हो...'

वह आधा उठ कर आगे की ओर झुका और दरवाजे की कुंडी खोल दी।

उसका कमरा इतना छोटा था कि बिस्तर से उठे बिना ही वह कुंडी खोल सकता था।

उसका खयाल सही था : दरबान और नस्तास्या वहाँ खड़े थे।

नस्तास्या अजीब ढंग से उसे घूर रही थी। दरबान को उसने बड़ी ढिठाई और बेबसी से, कनखियों से देखा। उसने बिना कुछ कहे, एक तह किया हुआ बादामी कागज उसकी तरफ बढ़ा दिया जिसे लाख से मुहरबंद कर दिया गया था।

'दफ्तर से सम्मन आया है,' दरबान ने कागज आगे बढ़ाते हुए कहा।

'किस दफ्तर से?'

'पुलिस थाने से। वहीं से बुलावा आया है। ये तो तुम्हें पता होगा कि वह किस तरह का दफ्तर है।'

'पुलिस से... किसलिए भला...'

'कौन जाने तुम्हें तलब किया है तो जाना तो पड़ेगा।' उस आदमी ने उसे बड़े ध्यान से देखा, कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाई और मुड़ कर जाने लगा।

'बहुत बीमार जान पड़ता है!' नस्तास्या ने उस पर नजरें जमाए रह कर अपना मत व्यक्त किया। दरबान ने एक पल के लिए सर घुमा कर देखा। 'कल से बुखार है,' नस्तास्या ने आगे कहा।

रस्कोलनिकोव ने कोई जवाब नहीं दिया। कागज को खोले बिना हाथ में लिए बैठा रहा।

'उठने की जरूरत नहीं,' नस्तास्या ने उसे सोफे पर से पाँव नीचे उतारते देख कर दया-भाव से कहा। 'तुम बीमार हो, सो जाने की कोई जरूरत नहीं। कोई ऐसी जल्दी नहीं मची है। वह तुम्हारे हाथ में क्या है?'

रस्कोलनिकोव ने देखा : अपने दाहिने हाथ में उसने पतलून से काटी हुई लटकनें, मोजा और जेब का फटा हुआ अस्तर पकड़ रखा था। तो वह उन्हें हाथ में लिए-लिए सो गया था! बाद में इसके बारे में सोचते हुए उसे याद आया कि बुखार में जब उसकी नींद उचटती थी तो वह इन चीजों को मजबूती से हाथ में जकड़ लेता था और फिर उसी तरह सो जाता था।

'देखो तो, जाने कहाँ-कहाँ के चीथड़े उठा लाता है और उन्हें ले कर सो जाता है, जैसे कोई बहुत बड़ी दौलत मिल गई हो...' नस्तास्या दीवानों की तरह खिलखिला कर हँसी। फौरन उसने वे सारी चीजें अपने लंबे कोट के नीचे घुसेड़ लीं और नजरें गड़ा कर बड़े गौर से नस्तास्या को देखता रहा। उस दम उसमें समझ-बूझ के साथ सोचने की ताकत तो कम ही रह गई थी, लेकिन उसने महसूस किया कि एक ऐसे आदमी के साथ, जो किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता हो, कोई इस तरह पेश नहीं आ सकता। 'लेकिन... पुलिस?'

'चाय पिओगे? एक प्याली जी चाहे तो मैं अभी लिए आती हूँ। थोड़ी-सी बची हुई है।'

'नहीं... मैं जा रहा हूँ; मैं अभी जाऊँगा,' उसने खड़े होते हुए बुदबुदा कर कहा।

'अरे, तुम तो सीढ़ियों के नीचे तक भी नहीं पहुँच पाओगे!'

'मैं तो जाऊँगा...'

'जैसी तुम्हारी मर्जी।'

दरबान के पीछे-पीछे वह भी बाहर चली गई। वह मोजे और उन चीथड़ों की पड़ताल करने के लिए झपट कर रोशनी में पहुँच गया... 'धब्बे हैं तो लेकिन आसानी से दिखाई नहीं देते। सब पर मिट्टी जमी है, और रगड़ खा कर वे बदरंग हो चुके हैं। जिस आदमी को पहले से कोई शक न हो, वह कुछ पहचान नहीं सकता। खैरियत है कि नस्तास्या ने दूर से कुछ नहीं देखा होगा!' फिर काँपते हाथों से उसने नोटिस पर लगी हुई मुहर तोड़ी और पढ़ने लगा। वह बड़ी देर तक पढ़ता रहा, तब जा कर कुछ समझ में आया। कोतवाली से मामूली सम्मन था कि उसी दिन साढ़े नौ बजे उसे थानेदार के दफ्तर में हाजिर होना था।

'मेरे साथ ऐसा तो कभी नहीं हुआ; पुलिस से मेरा कभी कोई वास्ता नहीं रहा! तो फिर आज क्यों?' उसने दुखी हो कर आश्चर्य से सोचा। 'हे भगवान, बस सब कुछ जल्दी निबट जाए!' वह प्रार्थना के लिए घुटने टेक कर बैठने जा रहा था कि अचानक ठहाका मार कर हँस पड़ा - प्रार्थना करने के विचार पर नहीं, बल्कि अपने आप पर। उसने जल्दी-जल्दी कपड़े पहनते हुए सोचना शुरू किया; 'मिटना है तो मिट ही जाऊँ, कोई चिंता मुझे नहीं। मोजा पहन लूँ!' वह अचानक सोच में पड़ गया। 'उस पर और धूल जम जाएगी और सारे निशान मिट जाएँगे।' लेकिन मोजा पहनते ही उसने घृणा और आतंक से घबरा कर उसे फिर उतार दिया लेकिन यह सोच कर कि उसके पास कोई दूसरा मोजा नहीं था, उसे फिर उठाया और पहन लिया। वह एक बार फिर हँस पड़ा।

'ये सब तो रस्मी बातें हैं, दिखावे की, और कुछ नहीं,' उसके दिमाग में यह विचार बिजली की तरह कौंध गया, लेकिन केवल ऊपरी सतह पर। सारा शरीर थर-थर काँप रहा था, 'यह लो, झगड़ा ही खत्म हो गया! मैंने उसे पहन कर झगड़ा ही सारा निबटा दिया!' लेकन इस हँसी के फौरन बाद उस पर घोर निराशा छा गई। 'नहीं, यह मेरे बूते के बाहर है...' उसने सोचा। उसके पाँव काँप रहे थे। 'डर के मारे,' वह बुदबुदाया। सर चकराने लगा और बुखार की वजह से उसमें दर्द होने लगा। 'यह चाल है! वे लोग मुझे तिकड़म से वहाँ बुलाना चाहते हैं,' बाहर सीढ़ियों से उतरते हुए उसने सोचा, 'सबसे बुरी बात यह है कि मुझे खुद अपने दिमाग पर लगभग काबू नहीं रहा... शायद खुद मेरे मुँह से कोई बेवकूफी की बात निकल जाए...'

सीढ़ियों पर उसे याद आया कि वह सारी चीजें दीवार के खोखल में ज्यों की त्यों छोड़े जा रहा था। 'बहुत मुमकिन है कि उनकी चाल यही हो कि तब तलाशी लें जब मैं बाहर निकल जाऊँ,' उसने सोचा और ठिठक गया। लेकिन उसे ऐसी घोर निराशा ने, और आनेवाली तबाही से मुतल्लिक ऐसी बेफिक्री ने आ दबोचा कि हवा में हाथ झटक कर वह आगे बढ़ता रहा।

'किसी तरह यह झंझट तो मिटे!'

सड़क पर वही असहनीय गर्मी थी; इतने दिनों से एक बूँद पानी भी नहीं बरसा था। फिर वही धूल, ईंटें, गारा, फिर वही दुकानों और शराबखानों की बदबू, फिर वही शराबी, वही फेरीवाले और टूटी-फूटी घोड़ागाड़ियाँ। सूरज की तेज चमक सीधी उसकी आँखों में इस तरह पड़ रही थी कि उसे किसी भी चीज को देखने में तकलीफ हो रही थी। उसका सर घूम रहा था - उसी तरह जैसे उस आदमी का घूमता है जो बुखार में पड़ा रहा हो और अचानक तेज धूप में बाहर सड़क पर निकल आए।

जब वह उस सड़क के मोड़ पर पहुँचा तो खौफजदा हो कर उसने उस पर नजर डाली... उस घर पर नजर डाली... और फौरन ही अपनी आँखें फेर लीं।

'अगर मुझसे पूछेंगे तो शायद मैं सब कुछ साफ-साफ बता दूँ,' थाने के पास पहुँचते-पहुँचते उसने सोचा।

थाना वहाँ से कोई चौथाई वेर्स्त दूर रहा होगा। अभी हाल ही में हटा कर एक नई इमारत की चौथी मंजिल पर लाया गया था। एक बार थोड़ी देर के लिए वह पुराने पुलिस स्टेशन में तो गया था, लेकिन वह बहुत पहले की बात थी। फाटक में मुड़ने पर उसे दाहिनी तरफ सीढ़ियाँ नजर आईं जिन पर एक आदमी हाथ में किताब लिए नीचे उतर रहा था। 'जरूर दरबान होगा; तो थाना यहीं है,' और वह इसी अटकल के आधार पर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। वह किसी से कोई बात नहीं पूछना चाहता था।

'मैं अंदर जाऊँगा, घुटने टेक दूँगा और सारी बातें मान लूँगा...' उसने चौथी मंजिल पर पहुँचते हुए सोचा।

सीढ़ियाँ बहुत खड़ी और तंग थीं और उन पर गंदा पानी बहने की वजह से फिसलन थी। चारों मंजिलों के फ्लैटों के रसोईघरों के दरवाजे सीढ़ियों की तरफ खुलते थे और लगभग दिन भर खुले ही रहते थे। इसलिए वहाँ बुरी तरह गंध थी और गर्मी छाई रहती थी। सीढ़ियों पर बगल में किताबें दबाए चढ़ते-उतरते दरबानों, चपरासियों और तरह-तरह के मर्दों-औरतों की रेल-पेल रहती थी। थाने का दरवाजा पूरा खुला हुआ था। अंदर आ कर वह ड्योढ़ी में रुक गया। अंदर कई किसान खड़े राह देख रहे थे। गर्मी की वजह से यहाँ बेहद घुटन थी और नए पुते कमरों से ताजे रंग-रोगन और सड़े हुए तेल की बू आ रही थी, जिससे मतली होने लगती थी। कुछ देर इंतजार करने के बाद उसने अगले कमरे में जाने का फैसला किया। सभी कमरे छोटे-छोटे थे और उनकी छतें नीची थीं। एक अंदर से जलानेवाली बेचैनी के साथ वह आगे बढ़ता रहा। किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। दूसरे कमरे में कुछ लोग बैठे हुए कुछ लिख रहे थे। उनके कपड़े उससे कुछ खास अच्छे नहीं थे, और देखने में वे बहुत विचित्र किस्म के लोग लगते थे। वह उनमें से एक के पास गया।

'क्या है?'

उसने सम्मन दिखाया, जो उसे मिला था।

'तुम छात्र हो!' उस आदमी ने नोटिस पर नजर दौड़ाते हुए पूछा।

'पहले था।'

क्लर्क ने उसकी ओर देखा जरूर लेकिन उसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। वह बहुत ही मैला-कुचैला आदमी था और उसकी आँखों से लगता था कि उसके दिमाग में कोई एक ही बात बैठी हुई है।

'इससे कोई काम नहीं बनने का; क्योंकि इसे किसी चीज में कोई दिलचस्पी ही नहीं,' रस्कोलनिकोव ने सोचा।

'अंदर बड़े बाबू के पास जाओ,' क्लर्क ने सबसे दूरवाले कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा।

वह उस कमरे में गया - लाइन से बने हुए कमरों से चौथा कमरा। छोटा-सा कमरा था और लोग ठसाठस भरे हुए थे। ये बाहरवाले कमरों के लोगों से कुछ बेहतर पोशाक पहने हुए थे। उनमें दो औरतें भी थीं। एक तो किसी का सोग मना रही थी और बहुत मामूली कपड़े पहने हुए थी, बड़े बाबू की मेज पर उसके ठीक सामने बैठी थी, और वह जो कुछ बताता जा रहा था, उसे लिखती जा रही थी। दूसरी बहुत हट्टी-कट्टी, गदराई हुई, ऊदी-ऊदी चित्तियोंवाले चेहरे की औरत थी। वह बहुत बढ़िया कपड़े पहने थी और उसने अपने सीने पर तश्तरी जितनी बड़ी एक जड़ाऊ पिन लगा रखी थी। जाहिर है एक ओर खड़ी वह किसी चीज का इंतजार कर रही थी। रस्कोलनिकोव ने अपना सम्मन बड़े बाबू के सामने सरका दिया। बड़े बाबू ने उस पर एक नजर डाली और बोला, 'एक मिनट ठहरो,' और फिर उस शोकग्रस्त महिला के काम की ओर ध्यान देने लगा।

रस्कोलनिकोव की जान में जान आई। 'वह बात नहीं हो सकती!' धीरे-धीरे उसमें फिर से भरोसा आता गया। वह अपने आपको हौसला और सुकून रखने के लिए प्रेरित करता रहा।

'किसी भी बेवकूफी से एक जरा-सी लापरवाही से मेरा सारा भाँडा फूट जाएगा! हुँह... कितनी बुरी बात है कि यहाँ एकदम हवा नहीं है,' वह अपने मन में कहता रहा, 'बड़ी घुटन है... सर पहले से भी ज्यादा... चकराने लगता है... और आदमी का दिमाग भी...'

उसे इस बात का एहसास था कि उसके अंदर एक भयानक तूफान मचा हुआ था। वह डर रहा था; ऐसा न हो कि उसे अपने आप पर काबू न रहे। उसने कोई चीज ढूँढ़ कर उस पर अपना ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की, कोई ऐसी चीज जिसका इन बातों से कोई संबंध न हो, लेकिन इसमें वह असफल रहा। फिर भी बड़े बाबू में उसे बड़ी दिलचस्पी पैदा हुई : वह उम्मीद करता रहा कि किसी तरह वह उसके अंदर की थाह पा ले और उनके चेहरे से कुछ अनुमान लगा ले। वह एक नौजवान शख्स था, लगभग बाईस साल का होगा, साँवला, चंचल चेहरा जिससे वह अपनी उम्र से बड़ा लगता था। वह बहुत फैशनेबुल कपड़े पहने था और बहुत बना-ठना हुआ था। बालों में अच्छी तरह कंघी करके बीच में से माँग निकाल रखी थी और क्रीम लगा कर उन्हें चिपका भी रखा था। उसने बहुत रगड़-रगड़ कर साफ की हुई उँगलियों पर कई अँगूठियाँ पहन रखी थीं और वास्कट में सोने की जंजीरें लगा रखी थीं। उसने एक विदेशी से, जो उस कमरे में था, फ्रांसीसी में कुछ शब्द कहे और उनका उच्चारण काफी सही ढंग से किया।

'आप बैठ जाइए लुईजा इवानोव्ना,' उसने लगे हाथ बढ़िया पोशाक पहने ऊदी-ऊदी चित्तियोंदार चेहरेवाली महिला से कहा, जो अभी तक खड़ी हुई थीं, गोया उनकी बैठने की हिम्मत न हो रही हो, हालाँकि उनकी बगल में ही एक कुर्सी पड़ी हुई थी।

'प्बी कंदाम1,' उन महिला ने कहा और बहुत आहिस्ता से, रेशम की सरसराहट के साथ उस कुर्सी पर बैठ गईं। उसकी सफेद लैस लगी आसमानी रंग की पोशाक मेज के पास से हवा भरे गुब्बारे की तरह लहराती हुई कुर्सी के चारों और फैल गई और उसने लगभग आधा कमरा घेर लिया। वह इत्र से महक रही थीं। लेकिन साफ मालूम हो रहा था कि आधा कमरा घेर लेने और इस तरह इत्र की खुशबू बिखेरने पर वह कुछ अटपटा महसूस कर रही थीं। हालाँकि उनकी मुस्कराहट में ढिठाई भी थी और गिड़गिड़ाहट भी, लेकिन साफ जाहिर हो रहा था कि वह कुछ बेचैन-सी हैं।

शोकग्रस्त महिला का काम आखिर खत्म हो गया और वह उठ खड़ी हुईं। अचानक कुछ शोर-गुल के साथ एक अफसर बहुत अकड़ता हुआ, हर कदम पर अपने कंधों को एक खास तरीके से झटकता हुआ अंदर आया। उसने अपनी बिल्ला लगी टोपी मेज पर फेंकी और एक आरामकुर्सी पर बैठ गया। उसे देखते ही वह बनी-सँवरी महिला फुदक कर उठ खड़ी हुईं और गद्गद हो कर, झुक-झुक कर उसे सलाम करने लगीं; लेकिन अफसर ने उनकी ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया, और उसके सामने उसकी भी दोबारा बैठने की हिम्मत नहीं पड़ी। वह असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट था। उसकी मूँछें मेहँदी के रंग की थीं और चेहरे पर दोनों ओर आड़ी-आड़ी निकली हुई थीं। उसके नाक-नक्शे में हर चीज बेहद छोटी थी और उससे थोड़े-से अक्खड़पन के अलावा और किसी बात का पता नहीं चलता था। उसने तिरछी नजर से और कुछ गुस्से से रस्कोलनिकोव को देखा : रस्कोलनिकोव बहुत गंदे कपड़े पहने हुए था और अपनी अपमानजनक स्थिति के बावजूद उसके तेवर उसकी पोशाक से कोई मेल नहीं खा रहे थे। रस्कोलनिकोव अनजाने ही बड़ी देर तक और नजरें जमा कर उसे घूरता रहा, जिसकी वजह से वह निश्चित ही नाराज हो गया।

'क्या चाहिए तुम्हें?' वह चिल्लाया। साफ मालूम हो रहा था : उसे इस बात पर बड़ी हैरत थी कि ऐसे फटे-पुराने कपड़े पहननेवाला आदमी उसकी नजरों के रोब में नहीं आया था।

'मुझे यहाँ बुलाया गया था... सम्मन भेज कर...' रस्कोलनिकोव ने झिझकते हुए कहा।

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1. धन्यवाद (जर्मन)

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'बकाया रकम की वसूली के लिए इस छात्र से,' बड़ा बाबू जल्दी से अपने कागजात की ओर से ध्यान हटा कर बीच में बोला। 'यह लो!' उसने एक दस्तावेज रस्कोलनिकोव की ओर बढ़ा दिया और उसके एक हिस्से की तरफ इशारा किया। 'पढ़ो! इसे।'

'रकम, कैसी रकम,' रस्कोलनिकोव ने सोच, 'लेकिन... इसका मतलब है... यह यकीनन वह वाला मामला नहीं है।' वह खुशी के मारे काँप उठा। अचानक उसने ऐसी गहरी राहत महसूस की कि बयान नहीं कर सकता था। सर से एक बोझ हट गया था।

'तो जनाब, आपसे आने को किस वक्त कहा गया था?' असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट दहाड़ा। न जाने क्यों उसकी नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही थी। 'कहा गया था नौ बजे आने को, और अब बारह बज रहे हैं!'

'सम्मन अभी पंद्रह मिनट पहले मिला है,' रस्कोलनिकोव ने अफसर से ऊँचे स्वर में कहा, जो उसकी ओर पीठ किए हुए था। उसे खुद भी इस बात पर ताज्जुब हो रहा था कि अचानक उसे गुस्सा आ गया था और इसमें उसे कुछ आनंद भी मिल रहा था। 'यह क्या कम है कि तेज बुखार में भी मैं यहाँ चला आया।'

'मेहरबानी करके चीखिए मत!'

'मैं चीख नहीं रहा, मैं तो शांत भाव से बोल रहा हूँ; चीख आप रहे हैं मुझ पर। मैं कॉलेज में पढ़ता हूँ और किसी को इस बात की इजाजत नहीं देता कि वह मुझ पर चीखे।'

असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट को इतना ताव आया कि एक मिनट तक वह अटक-अटक कर बोलता रहा, इस तरह कि कुछ समझ ही में नहीं आता था कि क्या कह रहा है। वह अपनी कुर्सी से उछल कर खड़ा हो गया।

'खामोश रहिए जनाब! आप एक सरकारी दफ्तर में हैं,' बदतमीजी मत कीजिए, जनाब!'

'आप भी सरकारी दफ्तर में हैं,' रस्कोलनिकोव भी चिल्लाया, 'और आप चीखने के अलावा सिगरेट भी पी रहे हैं और इस तरह हम सब लोगों की तौहीन कर रहे हैं।' यह कह कर उसने अद्भुत आनंद महसूस किया।

बड़े बाबू ने मुस्करा कर उनकी ओर देखा। जाहिर था कि बिफरा हुआ असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट सिटपिटा गया।

'इससे आपको कोई मतलब नहीं!' आखिर वह अस्वाभाविक रूप से ऊँचे स्वर में चिल्लाया। 'लेकिन आपसे जो कहा जा रहा है। उसे लिख कर दीजिए। दिखा दो इन्हें, अलेक्सांद्र ग्रिगोरियेविच। आपके खिलाफ शिकायत है! आप अपना कर्जा नहीं चुकाते! खूब आदमी हैं आप भी!'

लेकिन रस्कोलनिकोव उसकी बात नहीं सुन रहा था। उसने बड़ी उत्सुकता से वह कागज ले लिया। उसे यह पता लगाने की जल्दी थी कि बात क्या है। उसने उस कागज को एक बार पढ़ा, दूसरी बार पढ़ा, लेकिन उसकी समझ में कुछ न आया।

'यह है क्या?' उसने बड़े बाबू से पूछा।

'प्रोनोट पर दिए गए पैसे की वसूली का सम्मन है। या तो सारे खर्चे, जुर्माने वगैरह के साथ भुगतान करो या लिख कर दे दो कि रकम कब तक अदा कर सकते हो, और साथ ही यह भी लिख कर दो कि पैसा चुकाए बिना राजधानी छोड़ कर कहीं जाओगे नहीं, और अपनी जायदाद न किसी को बेचोगे न छिपाओगे। लेनदार को तुम्हारी जायदाद बिकवा देने और तुम्हारे खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की छूट होगी।'

'लेकिन मैं... मैं तो किसी का कर्जदार नहीं!'

'इससे हमें कोई मतलब नहीं। यह हमारे सामने है एक सौ पंद्रह रूबल का प्रोनोट, पक्का कानूनी दस्तावेज, जिसकी मियाद पूरी हो चुकी है। यह हमारे पास वसूली के लिए लाया गया है। यह प्रोनोट तुमने नौ महीने पहले असेसर जारनीत्सिन की विधवा को दिया था, और विधवा जारनीत्सिन ने यह प्रोनोट चेबारोव नामक कोर्ट कौंसिलर को दे दिया था। इसलिए तुम्हारे नाम सम्मन जारी किया जाता है।'

'लेकिन वह तो मेरी मकान-मालकिन है!'

'तुम्हारी मकान-मालकिन है तो क्या हुआ?'

बड़े बाबू ने दया के भाव से मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा, गोया उस पर कुछ उपकार कर रहा हो। लेकिन उस मुस्कराहट में कुछ विजय का भाव भी था, गोया वह किसी ऐसे नौसिखिए पर मुस्करा रहा हो, जो पहली बार जाल में फँसा हो - गोया उससे कहना चाहता हो : 'कहो, अब कैसा लग रहा है?' लेकिन अब रस्कोलनिकोव को प्रोनोट की, वसूली के सम्मन की, क्या परवाह थी क्या यह सब कुछ अब इस लायक रह गया था कि उसकी चिंता की जाए, उसकी ओर ध्यान दिया जाए वह वहाँ खड़ा रहा, उसने पढ़ा, उसने सुना, उसने जवाब दिया, उसने खुद सवाल भी पूछे, लेकिन सब कुछ मशीनी ढंग से सुरक्षा की, एक बहुत बड़े खतरे से छुटकारा पाने की, विजय भरी भावना उस पल उसकी सारी आत्मा में व्याप्त थी। उसमें भविष्य का कोई अनुमान नहीं था, कोई विश्लेषण नहीं था, कोई अटकल, कोई शंका न थी, कोई सवाल नहीं था। वह संपूर्ण, प्रत्यक्ष, शुद्ध रूप से सहज उल्लास का पल था। लेकिन उस पल थाने में ऐसी घटना हुई जैसे बिजली टूटी हो। रस्कोलनिकोव की बदतमीजी पर असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट अभी तक तिलमिला रहा था, अभी तक गुस्से से खौल रहा था और स्पष्ट था कि अपनी आहत प्रतिष्ठा को फिर से कायम करने के लिए बेचैन था। वह उस बेचारी बनी-सँवरी महिला पर झपट पड़ा, जो दफ्तर में उसके घुसने के समय से ही बेहद बेवकूफी भरी मुस्कराहट के साथ उसे घूरे जा रही थीं।

'सुनो फलाँ-फलाँ-फलाँ,' वह अचानक अपनी पूरी आवाज से चिल्लाया (शोकग्रस्त महिला दफ्तर से जा चुकी थीं), 'तुम्हारे घर पर कल रात हो क्या रहा था? क्यों, फिर वही बेहूदगी तुम्हारी वजह से पूरे मोहल्ले की नाक में दम है। फिर वही लड़ाई-झगड़ा, पीना-पिलाना। जेल जाना चाहती हो क्या मैं दस बार तुम्हें चेतावनी दे चुका हूँ कि ग्यारहवीं बार नहीं छोड़ूँगा। और तुम... फिर... फिर वही हरकत करने लगीं... बदचलन कहीं की!'

ताज्जुब के मारे रस्कोलनिकोव के हाथों से कागज गिर पड़ा। उसने बौखला कर उस बनी-सँवरी महिला को देखा, जिसके साथ ऐसा अभद्रता का व्यवहार किया जा रहा था। लेकिन जल्दी ही उसकी समझ में आ गया कि यह सारा किस्सा क्या था, और उसे वाकई इस पूरे कांड में मजा आने लगा। वह मजे ले कर सुनने लगा। उसका जी चाहा कि जी खोल कर खूब हँसे... वह बेहद तनाव से भरा हुआ था।

'इल्या पेत्रोविच!' बड़े बाबू ने चिंतित हो कर कुछ कहना शुरू किया था लेकिन बीच में ही रुक गया, क्योंकि वह अपने अनुभव से जानता था कि भड़के हुए असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट को जोर-जबर्दस्ती से काबू में नहीं किया जा सकता।

जहाँ तक उस बनी-ठनी महिला का सवाल था, शुरू में वह इस तूफान के आगे जरूर काँपी। लेकिन अजीब बात थी कि गालियों की विविधता और उनकी सख्ती जितनी बढ़ती जाती थी, वह उतनी ही विनम्र होती जाती थीं और उस रोबदार असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट पर जो मुस्कराहटें वह बिखेर रही थीं, उनमें रिझाने का गुण और बढ़ता जाता था। वह बड़ी बेचैनी से कसमसा रही थीं, लगातार झुक-झुक कर सलाम कर रही थीं, बड़ी बेताबी से अपनी बात कहने के मौके की ताक में थीं, और आखिरकार वह मौका उसे मिल भी गया।

'अपुन का घर में किसी माफिक शोर-फोर या दंगा-पंगा नईं होएला, कप्तान साब,' उसने एक साँस में अपनी सारी बात पटर-पटर कही। लगता था जैसे मटर के दाने टपक रहे हों। वह बड़े भरोसे के साथ रूसी बोल रही थी, हालाँकि उसके उच्चारण में गहरा जर्मन पुट था, 'होर हंगामे भी कोई नहीं होएला, और साब बहादुर नशे में टाइट आएला होता। हम सब बात सच्ची-सच्ची बोलता, कप्तान साब। अपुन का राई-रत्ती भी मिश्टेक नईं होएला उसमें... अपुन का घर सरीफ लोगों का घर होता और सारा बात पूरा जैसा सरीफ लोग का होता कप्तान साहब। अपुन तो खुद नईं माँगता कबी कोई दंगा-पंगा, शोर-फोर होने का। पन वह आया होता एकदम नसे में टाइट और बोलने को लगा तीन बोतल और चाहिए; वह एक टाँग उठाया ऊपर और पाँव से पियानो को बजाने लगा। सरीफ का घर में कोई ऐसा करने सकता! अपुन का फस्ट क्लास पियानो खलास कर डाला। ऐसा बदतमीजी नईं करना माँगता सो, अपुन उसको साफ-साफ बोला यह बात। पन वह एक बोतल उठाता, इसको मारता, उसको मारता। अपुन क्या करने सकता... दरबान को ताबड़तोड़ बुलाया, और कार्ल बरोबर आया। पन, साब, कार्ल को वह पकड़ा और उसका आँख को चोट करने होता और हेनरिएट का भी आँख को चोट करने मारता होता और अपुन का गाल ऊपर पाँच तमाचा... तड़-तड़ मारने होता। कप्तान साब, किसी सरीफ का घर में कोई ऐसा करने को बोलता कबी। अपुन तो रोने को लगा, पन वह नहर साइड का खिड़की खोलने को होता और खिड़की के पास में जाने होता और सुअर की माफिक घुर्र-घुर्र करने होता; कैसा बड़ा सरम का बात होता। खिड़की के सामने में खड़ा होने का... फेर सड़क की साइड मुँह उठाने का और सुअर की माफिक घुर्र-घुर्र बोलने का। ऐसे भी करने सकता कोई जंटलमैन आदमी! छिः-छिः! कार्ल उनका कोट पकड़ लेने होता और खिड़की का साइड से इधर को घसीटने होता... अपुन सच्ची-सच्ची बोलता, कप्तान साब, इसमें कोट उसका पीछू से छोटा-सा फट जाता होता। बस वह क्या बमकने को होएला। बोलने को लगा कोट फाड़ा तो पंद्रह रूबल जुर्माना देने को होता। और कप्तान साब, उसको पाँच रूबल भी दिएला, कोट फाटने का। बिलकुल जंटलमैन सरीफ आदमी नहीं होता वह और सारा खिट-पिट जो होएला उसी का कारन से। अपुन को बोलता होता कि अपुन का बारे में सारा बुरा-बुरा बात पेपर में लिखने का, काहे से कि वह सारा पेपर को अपुन का बारे में कुछ भी लिखने को सकता।'

'तो वह कलमची था?'

'हाँ, कप्तान साब, बरोबर जंटलमैन आदमी नहीं वो... किसी सरीफ आदमी का घर में।'

'बस-बस! बहुत हो गया! मैं तुझे पहले भी बता चुका हूँ...'

'इल्या पेत्रोविच!' बड़े बाबू ने एक बार फिर अर्थपूर्ण ढंग से कहा। असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ने तेजी से उसे एक नजर देखा; बड़े बाबू ने अपना सर थोड़ा-सा हिला दिया।

'...तो शरीफों की शरीफ लुईजा इवानोव्ना, मैं यह बात तुम्हें बताए देता हूँ और आखिरी बार बता रहा हूँ,' असिस्टेंट का चरखा चलता रहा। 'अगर फिर कभी तुम्हारे शरीफोंवाले घर में कोई हंगामा हुआ तो मैं तुम्हीं को, वो जिसे शरीफों की जबान में कहते हैं न, हवालात में डलवा दूँगा। सुन लिया तो एक आलिम-फाजिल आदमी ने, कलमची लेखक ने, 'शरीफोंवाले घर' में अपना कोट फटने पर पाँच रूबल वसूल कर लिए... कमाल के होते हैं ये कलमची लोग भी!' और उसने रस्कोलनिकोव पर फिर तिरस्कारभरी नजर डाली। 'अभी उस दिन एक रेस्तराँ में हंगामा हुआ। एक लेखक साहब ने खाना खा लिया और पैसे नहीं निकाले थे; बोले : 'मैं एक व्यंग्य तुम्हारे बारे में लिखूँगा।' इसी तरह एक स्टीमर पर पिछले हफ्ते ऐसे ही एक साहब ने एक सिविल कौंसिलर साहब के खानदान, उनकी बीवी-बेटी के बारे में निहायत बेहूदा बातें कीं। और इसी बिरादरी के एक सज्जन को अभी उस दिन मिठाई की एक दुकान से निकाला गया था। ये लोग होते ही ऐसे हैं, लेखक हुए, साहित्यकार हुए, छात्र हुए, ढिंढोरची हुए... छिः! तुम फूटो अब यहाँ से! मैं खुद तुम्हारे यहाँ एक दिन मुआइना करने आऊँगा। सो इसका खयाल रखना! सुन लिया?'

बड़े अदब से जल्दी-जल्दी हर तरफ झुक कर सलाम करती हुई लुईजा इवानोव्ना पीछे हटते-हटते दरवाजे तक पहुँच गई। लेकिन दरवाजे पर वह खिले हुए किताबी चेहरे और घने सुनहरे गलमुच्छोंवाले एक खूबसूरत अफसर से टकरा गई। यह उसी मोहल्ले के सुपरिंटेंडेंट थे, निकोदिम फोमीच। लुईजा इवानोव्ना ने जल्दी से लगभग जमीन तक झुक कर सलाम किया और छोटे-छोटे कदमों से तितली की तरह पर फड़फड़ाती, दफ्तर के बाहर निकल गई।

'फिर वही गरज, वही कड़क, वही तूफान!' निकोदिम फोमीच ने इल्या पेत्रोविच से शरीफाना और दोस्ताना अंदाज में कहा। 'फिर तुम भड़क उठे, फिर तुम्हारा ज्वालामुखी फूट पड़ा! मैंने सीढ़ियों पर से सुना!'

'किसे परवाह है!' इल्या पेत्रोविच ने शब्दों को खींच कर शरीफाना लापरवाही से कहा और कुछ कागज ले कर, हर कदम पर अकड़ से कंधों को झटका देता हुआ दूसरी मेज पर चला गया। 'जरा तुम्हीं इस मामले को देखो : एक लेखक या छात्र या जो कभी छात्र रह चुका है, अपना कर्ज अदा नहीं करता, प्रोनोट लिख कर दे रखे हैं, कमरा खाली नहीं करता, और उसके खिलाफ लगातार शिकायतें आती रहती हैं, और ऊपर से उसे अपने सामने मेरे सिगरेट पीने पर भी एतराज है! खुद कमीनों जैसी हरकतें करते हैं हजरत, जरा इनकी सूरत तो देखो। ये हैं वह साहब, कैसी खूबसूरत शक्ल पाई है!'

'गरीबी कोई ऐब नहीं है दोस्त, लेकिन यह बड़ी आसानी से भड़क उठता है, बारूद की तरह, और मैं समझता हूँ कि किसी बात पर चिढ़ गया होगा। और शायद आप,' सुपरिंटेंडेंट रस्कोलनिकोव से बड़ी शिष्टता से बात कर रहा था, 'आपने भी बुरा माना होगा और अपने आपको काबू में न रख सके होंगे। लेकिन मैं आपको यकीन दिलाता हूँ साहब, बुरा मानने की कोई तुक नहीं थी, यह असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट आदमी बड़ा लाजवाब है। बस मिजाज का गर्म है, बहुत जल्दी भड़क उठता है! जल्दी भड़क उठता है, गुस्सा फूट पड़ता है और फिर तो जल कर राख हो जाता है! फिर थोड़ी ही देर में सब मामला ठंडा भी हो जाता है! बुनियादी तौर पर, दिल का हीरा आदमी है। रेजिमेंट में इसका नाम लोगों ने रख छोड़ा था : बारूदी लेफ्टिनेंट1...'

'और रेजिमेंट थी भी कैसी!' इल्या पेत्रोविच अपने मतलब की इस दोस्ताना छेड़छाड़ पर खुश हो कर चिल्लाया, हालाँकि उसका मुँह अब भी कुछ फूला हुआ था।

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1. उसका असली नाम पोरोख था, जिसका अर्थ 'बारूद' होता है।

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अचानक रस्कोलनिकोव का जी चाहा कि उन सबसे कोई खास तौर पर खुशगवार बात कहे।

'माफ कीजिएगा, कप्तान साहब,' उसने एकाएक निकोदिम फोमीच को संबोधित करके कहना शुरू किया, 'आप अपने आपको मेरी जगह पर रख कर देखिए, मैंने अगर कोई बदतमीजी की हो, तो मैं माफी माँगने को तैयार हूँ। मैं एक गरीब छात्र हूँ, बीमार और गरीबी से चकनाचूर।' (उसने 'चकनाचूर' शब्द का ही इस्तेमाल किया था।) 'अभी पढ़ाई भी नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि आजकल मैं अपना खर्च तक नहीं चला सकता। लेकिन मुझे पैसा मिलनेवाला है... मेरी माँ और बहन रियाजान प्रांत में रहती हैं... वे मुझे पैसा भेजेंगी, तब मैं... भुगतान कर दूँगा। मेरी मकान-मालकिन दिल की बड़ी नेक औरत है, लेकिन मेरे ट्यूशन छूट जाने की वजह से और पिछले चार महीने से मुझसे कुछ न मिलने की वजह से इतनी तंग आ चुकी है कि मेरे लिए ऊपर खाना भेजना भी बंद कर दिया है ...और यह प्रोनोट तो एकदम मेरी समझ में नहीं आता। वह मुझसे इस प्रोनोट का भुगतान करने को कहती है। मैं कहाँ से अदा करूँ आप खुद ही फैसला कीजिए...'

'लेकिन हमें इससे कोई मतलब नहीं, समझे न,' बड़े बाबू ने अपनी राय दी।

'हाँ, आपकी यह बात मैं मानता हूँ। लेकिन मुझे पूरी बात समझाने का मौका दीजिए...' रस्कोलनिकोव ने फिर कहा। वह अभी तक निकोदिम फोमीच को संबोधित कर रहा था, लेकिन अपनी बात इल्या पेत्रोविच के कानों तक भी पहुँचा देने की कोशिश कर रहा था, हालाँकि वह लगातार अपने कागजात को उलटने-पुलटने में व्यस्त मालूम होता था और तिरस्कार के साथ उसकी ओर जरा-सा भी ध्यान नहीं दे रहा था। 'मैं आपको इतना बता दूँ कि मैं उसके यहाँ लगभग तीन साल से रह रहा हूँ, जब मैं एक कस्बे से आया तभी से, और शुरू में... शुरू-शुरू में... मेरे लिए यह बात मान लेने में बुराई ही क्या है, शुरू में मैंने उसकी बेटी से शादी करने का वादा भी किया था। मैंने जबानी वादा किया था, और अपनी मर्जी से किया था... अच्छी लड़की थी... सचमुच मुझे अच्छी लगती थी, हालाँकि मुझे उससे कोई प्यार नहीं था... सच पूछिए तो जवानी के जोश का मामला था... मेरे कहने का मतलब यह कि मेरी मकान-मालकिन उन दिनों मुझे बेझिझक कर्ज दिया करती थी, और मेरे दिन भी... मैं बहुत लापरवाही बरतता था...'

'आपकी निजी जिंदगी की ये बातें आपसे किसने पूछीं साहब, हमारे पास बेकार की बातों में खोटा करने के लिए वक्त नहीं है।' इल्या पेत्रोविच बड़ी रुखाई से और कुछ जोर दे कर बात काट कर बोला। रस्कोलनिकोव ने उसे गर्मजोशी से बीच में ही रोक दिया, हालाँकि अचानक उसे ऐसा लगा कि उसे बोलने में कठिनाई हो रही थी।

'लेकिन मुझे यह तो कहने दीजिए... कि यह सब कुछ कैसे हुआ... हालाँकि अपनी हद तक... आपकी यह बात मैं मानने को तैयार हूँ कि... यह गैर-जरूरी है। लेकिन एक साल हुआ वह लड़की टाइफस से मर गई। मैं पहले की तरह वहीं रहता रहा, और जब मेरी मकान-मालकिन घर बदल कर इस नई जगह में आई तो मुझसे कहा... और बड़े दोस्ताना ढंग से कहा... कि उसे तो मुझ पर पूरा भरोसा है पर फिर भी मैं एक सौ पंद्रह रूबल का प्रोनोट लिख कर दे दूँ, उस पूरी रकम का जो मेरी तरफ निकलती थी। उसने कहा कि अगर मैं यह प्रोनोट लिख कर दे दूँ, तो वह मुझ पर फिर जितना भी मैं चाहूँगा, कर्ज दे देगी, और यह कि वह तब तक उस प्रोनोट को हरगिज-हरगिज - ये खुद उसके शब्द थे - इस्तेमाल नहीं करेगी, जब तक कि मैं पैसा चुकाने की हालत में न हो जाऊँ... और अब, जबकि मेरे ट्यूशन छूट गए हैं और मेरे पास खाने तक को नहीं है, उसने मेरे ऊपर यह नालिश कर दी है। मैं इसे क्या कहूँ?'

'इस दर्दभरी दास्तान से हमें कोई सरोकार नहीं है,' इल्या पेत्रोविच बड़े रूखेपन से बीच में बोल पड़ा। 'आपको लिख कर पक्का वादा करना होगा; जहाँ तक आपके इश्क-मुहब्बत के किस्सों और इन दुख भरी दास्तानों का सवाल है, हमें उनसे कोई मतलब नहीं है।'

'जाने दो... तुम जरूरत से ज्यादा सख्ती कर रहे हो,' निकोदिम फोमीच ने मेज पर बैठते हुए बुदबुदा कर कहा और वह भी कुछ लिखने लगा। वह कुछ शर्मिंदा-सा लग रहा था।

'लिखो,' बड़े बाबू ने रस्कोलनिकोव से कहा।

'क्या लिखूँ?' उसने झल्ला कर पूछा।

'मैं बताता हूँ।'

रस्कोलनिकोव को लगा कि उसके भाषण के बाद बड़े बाबू उसके साथ ज्यादा बेरुखी और हिकारत के साथ पेश आ रहा था। लेकिन अजीब बात यह थी कि अचानक उसे लगा उसे किसी की राय की रत्ती भर भी परवाह नहीं रह गई थी। यह विरक्ति उसमें पलक झपकते, एक पल में, पैदा हो गई थी। अगर उसने जरा भी सोचने की कोशिश की होती तो उसे इस बात पर सचमुच ताज्जुब होता कि अभी एक ही मिनट पहले उन लोगों से वह उस तरह की बातें कर ही कैसे सका, उन पर ही भावनाएँ थोप कैसे सका फिर ये भावनाएँ भी पैदा कहाँ से हुई थीं अगर उस वक्त उस कमरे में पुलिस अफसरों की बजाय उसके अपने करीबी दोस्त-रिश्तेदार भी होते, तो उसके पास उनसे कहने के लिए इनसानोंवाली एक भी बात न होती। उसका दिल किस कदर खाली हो चुका था। उसकी आत्मा में चिरस्थायी अकेलापन और दुराव की संवेदना चेतन रूप धारण करती जा रही थी। उसके मन में यह विरक्ति पैदा होने की वजह न तो इल्या पेत्रोविच के सामने व्यक्त किए गए भावों की तुच्छता थी, और न ही उस पर एक पुलिस अफसर की विजय की तुच्छता। आह, लेकिन अब उसे स्वयं अपनी तुच्छता से, अहंकार की इन छोटी-मोटी बातों से, अफसरों से, जर्मन औरतों से, कर्जों से, पुलिस थानों से क्या लेना-देना था उस पल अगर उसे जिंदा जलाए जाने की सजा भी सुना दी जाती, तब भी वह विचलित न होता, वह सजा आखिर तक सुनता भी नहीं। उसे कुछ ऐसा हो रहा था, जो पहले कभी नहीं हुआ था, जो अचानक हो रहा था और जिससे वह एकदम परिचित नहीं था। ऐसा नहीं था कि वह इस बात को समझ रहा था, लेकिन संवेदना की भरपूर तीव्रता के साथ वह इस बात को साफ महसूस कर रहा था कि जिस तरह के उद्गार अभी कुछ देर पहले फूट पड़े थे, वह थाने के लोगों के आगे अब कभी उस तरह के भावुक उद्गारों का या किसी चीज का भी सहारा ले कर गिड़गिड़ा नहीं सकता था, और यह कि अगर वे पुलिस के अफसर न हो कर उसके अपने भाई-बहन होते तो भी किसी भी परिस्थिति में उनके सामने गिड़गिड़ाने का कोई सवाल नहीं उठता था। उसने पहले कभी ऐसी अजीब और भयानक संवेदना अनुभव नहीं की थी। पर सबसे अधिक दुखदायी बात यह थी कि यह एक संकल्पना या विचार की अपेक्षा एक संवेदना अधिक थी। एक प्रत्यक्ष संवेदना, अपने जीवन में उसने जितनी संवेदनाएँ झेली थीं उन सबसे अधिक दुखदायी!

बड़ा बाबू उसे बँधा-टँका बयान लिखाने लगा : कि वह अभी रकम अदा नहीं कर सकता, कि आगे चल कर यह रकम चुका देने का वादा करता है, कि वह शहर छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा, न अपनी जायदाद बेचेगा, न किसी के नाम करेगा, वगैरह-वगैरह।

'लेकिन तुमसे तो लिखा भी नहीं जा रहा है, कलम भी ठीक से नहीं पकड़ पा रहे हो,' बड़े बाबू ने बड़े कौतूहल से रस्कोलनिकोव को देखते हुए कहा। 'तबीयत ठीक नहीं है?'

'हाँ... और चक्कर भी आ रहा है... आप बोलते जाइए!'

'बस इतना ही। इस पर दस्तखत कर दो।'

बड़े बाबू ने कागज ले लिया, और किसी दूसरे काम की ओर ध्यान देने लगा।

रस्कोलनिकोव ने कलम लौटाया, लेकिन उठ कर चले जाने की बजाय अपनी कुहनियाँ मेज पर टिका दीं और हाथों से सर को कस कर थाम लिया। लग रहा था जैसे उसकी खोपड़ी में कोई कील ठोंक रहा है। अचानक एक अजीब विचार उसके मन में उठा, कि उठ कर फौरन निकोदिम फोमीच के पास जाए, कल जो कुछ हुआ था, सब साफ-साफ बता दे, फिर उसके साथ अपने कमरे पर जाए और उसे कोनेवाले खोखल में रखी हुई सारी चीजें दिखा दे। यह भाव इतना प्रबल था कि वह उसे पूरा करने के लिए अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। 'क्या यह न होगा कि एक पल इसके बारे में सोच लूँ' उसके दिमाग में बिजली की तरह यह विचार कौंधा। 'नहीं, बिना सोचे ही सारा बोझ उतार फेंकना अच्छा रहेगा!' लेकिन वह पत्थर की तरह उसी जगह गड़ा रह गया। निकोदिम फोमीच बड़ी तल्लीनता से इल्या पेत्रोविच से कुछ बातें कर रहे थे, और उनके शब्द उसके कानों तक पहुँचे :

'हो ही नहीं सकता ऐसा, दोनों छोड़ दिए जाएँगे। पहली बात यह कि सारी दलील अपनी काट खुद करती है। अगर यह काम उन्होंने किया होता तो दरबान को बुला कर क्यों लाते अपने खिलाफ मुखबिरी करने के लिए या आँख में धूल झोकने के लिए लेकिन यह तो हद से ज्यादा धूर्तता की बात होती! और फिर उस पेस्त्र्याकोव को दोनों दरबानों ने और एक औरत ने फाटक से अंदर आते हुए देखा था। वह तीन दोस्तों के साथ आया था, जिन्होंने उसे फाटक पर ही छोड़ा था, और उसने अपने दोस्तों के सामने दरबानों से किराए के किसी कमरे के बारे में पूछा था। सो तुम्हीं बताओ : अगर वह इस इरादे से जा रहा होता तो दरबानों से कमरे की बात पूछता जहाँ तक कोख का सवाल है, ऊपर बुढ़िया के यहाँ जाने से पहले वह नीचे आधे घंटे तक सुनार के यहाँ बैठा रहा और उसके यहाँ से वह ठीक पौने आठ बजे उठा। जरा सोचो...'

'लेकिन माफ कीजिएगा, अपने बयान में ये दोनों जो एक-दूसरे से उलटी बातें हैं, उनका क्या जवाब आपके पास है वे खुद कहते हैं कि उन्होंने दरवाजा खटखटाया और दरवाजा बंद था, लेकिन तीन मिनट बाद ही जब दरबान को ले कर ऊपर गए तो कुंडी खुली हुई थी।'

'असल बात यही तो है। हत्यारा वहीं होगा और दरवाजा अंदर से बंद कर रखा होगा। सो कोख अगर इतना बड़ा गधा न होता कि दरबान को खोजने खुद भी चला जाता तो वे लोग हत्यारे को पकड़ भी लेते। उसने जो वक्त बीच में मिला, उसका फायदा उठाया और नीचे उतर कर, किसी तरह उन्हें चकमा दे कर खिसक गया। कोख कसमें खा-खा कर कहता है : अगर मैं वहाँ मौजूद होता तो वह झपट कर बाहर निकलता और उसी कुल्हाड़ी से मुझे भी मार डालता। अब वह जान बचने पर चर्च में प्रसाद बँटवाएगा - ही-ही-ही!'

'और किसी ने हत्यारे को देखा तक नहीं?'

'उनका उसे न देखना कोई बड़ी बात नहीं है। वह जगह तो एकदम भानुमती का पिटारा है,' बड़े बाबू ने कहा। वह सारी बातें सुन रहा था।

'बात साफ है, एकदम साफ,' निकोदिम फोमीच ने जोश से अपनी बात दोहराई।

'नहीं बिलकुल साफ नहीं है,' गोया इल्या पेत्रोविच ने बात का निचोड़ पेश किया।

रस्कोलनिकोव अपना हैट उठा कर दरवाजे की ओर चला लेकिन वहाँ तक पहुँच नहीं पाया...

होश आया तो उसने देखा कि वह एक कुर्सी पर बैठा हुआ है, किसी ने दाहिनी ओर से उसे सहारा दे रखा है, एक दूसरा आदमी बाईं ओर पीले रंग के गिलास में पीले रंग का पानी लिए खड़ा है, और निकोदिम फोमीच सामने खड़ा उसे गौर से देख रहा है। वह कुर्सी से उठा।

'क्या बात है तबीयत खराब है क्या?' निकोदिम फोमीच ने कुछ तीखेपन से पूछा।

'दस्तखत करते वक्त कलम भी ठीक से पकड़ नहीं पा रहा था,' बड़े बाबू ने अपनी जगह बैठते हुए और अपना काम फिर से सँभालते हुए कहा।

'बहुत दिन से बीमार हो क्या?' इल्या पेत्रोविच जहाँ कुछ कागज उलट-पुलट कर देख रहा था, वहीं से ऊँची आवाज में बोल उठा। जब रस्कोलनिकोव बेहोश हुआ था, तब वह उसे देखने जरूर उठा था, लेकिन उसके होश आते ही वह फिर अपनी जगह वापस चला गया था।

'कल से,' रस्कोलनिकोव ने बुदबुदा कर जवाब दिया।

'कल तुम कहीं बाहर गए थे?'

'हाँ।'

'इस बीमारी की हालत में?'

'हाँ।'

'किस वक्त?'

'कोई सात बजे।'

'मैं क्या पूछ सकता हूँ कि कहाँ गए थे?'

'सड़क पर।'

'दो-टूक और साफ-साफ।'

रस्कोलनिकोव ने, जिसका रंग एकदम सफेद पड़ गया था, तीखे स्वर में, कुछ झटके के साथ जवाब दिए थे। इल्या पेत्रोविच के घूरने के बावजूद उसने अपनी जलती हुई काली-काली आँखें नहीं झुकाई थीं।

'उससे सीधे तो खड़ा हुआ नहीं जा रहा, और तुम...' निकोदिम फोमीच ने कुछ कहना शुरू किया।

'कोई बात नहीं,' इल्या पेत्रोविच ने कुछ अजीब ढंग से फैसला सुनाया। निकोदिम फोमीच कुछ और भी जोड़नेवाला था लेकिन बड़े बाबू पर एक नजर डालने के बाद, जो उसे नजरें जमाए घूर रहा था, वह कुछ नहीं बोला। कमरे में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई थी।

'अच्छी बात है फिर,' इल्या पेत्रोविच ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, 'हम तुम्हें अब और ज्यादा नहीं रोकेंगे।'

रस्कोलनिकोव बाहर चला आया। वहाँ से जाते हुए उसने उन लोगों को बड़ी उत्सुकता से आपस में बातें करते हुए सुना; निकोदिम फोमीच की सवाल करती हुई आवाज सबकी आवाजों के ऊपर सुनाई दे रही थी। सड़क पर पहुँच कर उसकी बेहवासी एकदम दूर हो चुकी थी।

'तलाशी होगी, यकीनन तलाशी होगी,' उसने जल्दी-जल्दी घर की ओर कदम बढ़ाते हुए मन में दोहराया 'बदमाश कहीं के! उन्हें मुझ पर शक हो गया है!' एक बार फिर पहलेवाली दहशत ने आन दबोचा।

 

2

'और अगर उस जगह की तलाशी हो भी चुकी हो तो मैं अपने कमरे पर पहुँचूँ और वे लोग वहाँ मौजूद हों तो?'

उसका कमरा आ गया था। उसमें कुछ भी नहीं था, कोई भी नहीं था। किसी ने उसमें झाँका तक नहीं था। नस्तास्या तक ने किसी चीज को हाथ नहीं लगाया था। लेकिन, हे भगवान, वह खोखल में उन सब चीजों को छोड़ कर चला कैसे गया था!

वह लपक कर कोने में पहुँचा, कागज के नीचे अपना हाथ डाला, सब चीजें बाहर निकालीं, और उन्हें अपनी जेबों में भर लिया। कुल मिला कर आठ नग थे : कान की बालियों या इसी तरह की किसी और चीज की दो छोटी-छोटी डिबियाँ - उसने ठीक से देखा भी नहीं; फिर चमड़े के चार छोटे-छोटे केस थे। एक जंजीर भी थी, जिसे अखबार के एक टुकड़े में यूँ ही लपेटा हुआ था। अखबार में ही लिपटी हुई एक और चीज थी, जो कोई तमगा मालूम होती थी...

उसने उन सब चीजों को अपने ओवरकोट की अलग-अलग जेबों में और अपने पतलून की बच रही दाहिनी जेब में रख लिया और इस बात की पूरी कोशिश की कि उन पर किसी की नजर न पड़े। बटुआ भी ले लिया। फिर दरवाजा खुला छोड़ कर वह कमरे से बाहर निकल गया।

वह जल्दी-जल्दी सधे कदमों के साथ चल रहा था। हालाँकि वह पूरी तरह टूटा हुआ महसूस कर रहा था पर उसकी सारी चेतनाएँ सजग थीं। पीछा किए जाने का डर लगा हुआ था; वह डर रहा था कि अभी आधे घंटे या पंद्रह मिनट में ही उसका पीछा करने का हुक्म जारी हो जाएगा, इसलिए उसे सारे सबूत उससे पहले ही, हर कीमत पर छिपा देने चाहिए। जब तक उसके शरीर में थोड़ी-बहुत ताकत बाकी थी, जब तक उसकी अक्ल थोड़ा-बहुत काम कर रही थी, उसे सब कुछ ठीक कर देना चाहिए... लेकिन वह जाए तो कहाँ

उसका इरादा बहुत पहले ही पक्का हो चुका था, 'उन्हें नहर में फेंक दूँगा, सारे सबूत पानी में छिप जाएँगे और किस्सा ही खत्म हो जाएगा।' यह फैसला उसने रात को सरसाम की हालत में ही कर लिया था, जब कई बार उसके दिल में यह जोश पैदा हुआ था कि उठे, चल दे और जल्दी-से-जल्दी उन सब चीजों से छुटकारा पा ले। लेकिन उनसे छुटकारा पाना टेढ़ी खीर निकला।

वह आधे घंटे तक या उससे भी ज्यादा समय तक एकतेरीनिंस्की नहर के किनारे टहलता रहा। उसने कई बार उन सीढ़ियों को देखा जो पानी की सतह तक चली गई थीं, लेकिन अपनी योजना पूरी करने की बात वह सोच भी नहीं सका। या तो सीढ़ियों के छोर पर कोई-न-कोई बेड़ा खड़ा होता था या औरतें वहाँ बैठी कपड़े धो रही होती थीं, या कोई न कोई नाव वहाँ लगी होती थीं, और हर जगह लोगों के झुंड मँडराते होते थे। इसके अलावा किनारे पर हर तरफ से उसे देखा जा सकता था और उसको पकड़ा जा सकता था। किसी का इरादा करके नीचे उतरना, वहाँ रुकना और पानी में कोई चीजें फेंकना शक पैदा कर सकता था। और अगर डब्बे डूबने की बजाय तैरते रहे तो वे तैरेंगे तो जरूर। हर कोई देखेगा। यूँ भी, जो उसे रास्ते में मिलता था वह उसे घूरता हुआ और गौर से उसे देखता हुआ ही मालूम होता था, गोया उसे उस पर नजर रखने के अलावा कोई काम न हो। 'ऐसा क्यों है या यह सिर्फ मेरा वहम है' उसने सोचा।

उसे आखिरकार यह बात सूझी कि नेवा नदी पर जाना ही सबसे सही होगा; वहाँ इतने सारे लोग नहीं होते, उस पर लोगों की नजर भी कम पड़ेगी, और वहाँ हर तरह से ज्यादा सुविधा रहेगी। सबसे बड़ी बात यह कि वह जगह और भी दूर थी। उसे ताज्जुब हो रहा था कि वह पूरे आधे घंटे तक इस खतरनाक जगह में परेशानी और चिंता में डूबा फिरता रहा और उसे यह बात नहीं सूझी! यह आधा घंटा उसने एक बेतुकी योजना में खो दिया था, महज इसलिए कि वह उसे सरसाम की हालत में सूझ गई थी! वह बदहवास होता जा रहा था और हर बात जल्दी ही भूल जाता था; उसे इस बात का एहसास हुआ। उसे अब जल्दी करनी ही होगी।

वह व. प्रॉस्पेक्ट से होता हुआ नेवा की ओर चला, लेकिन रास्ते में उसे एक और बात सूझ गई : 'नेवा की ओर क्यों? पानी में क्यों? क्या ज्यादा बेहतर यह न होगा कि कहीं और दूर निकल चलें, शायद द्वीपों की ओर, और वहाँ किसी सुनसान जगह पर, जंगल में या किसी झाड़ी में, इन चीजों को छिपा दें और पहचान के लिए उस जगह पर कोई निशान लगा दें' यूँ तो वह महसूस कर रहा था कि उसमें साफ-साफ कोई बात तय करने की क्षमता नहीं है, फिर भी उसे यह विचार बहुत जँचा।

लेकिन संयोग ने उसे वहाँ तक पहुँचने नहीं दिया। व. प्रॉस्पेक्ट से निकल कर चौक की तरफ आते वक्त उसे बाईं ओर एक गलियारा दिखाई दिया, जो दो सपाट दीवारों के बीच से हो कर एक दालान की ओर जाता था। दाहिनी ओर एक चौमंजिले मकान की सपाट, बिना पुती दीवार दालान में दूर तक चली गई थी। बाईं ओर उसके समानांतर लकड़ी का बड़ा-सा बाड़ा दालान में कोई बीस कदम की दूरी तक जा कर अचानक बाईं ओर को घूम गया था। यह जगह चारों ओर से घेर कर अलग कर दी गई थी और वहाँ हर तरह की फालतू चीज इधर-उधर पड़ी थी। दालान के सिरे पर, लकड़ी की बाड़ के पीछे से नीची छतवाली एक कालिख लगी पत्थर की इमारत झाँक रही थी। जो देखने से किसी कारखाने का हिस्सा मालूम होती थी। वह शायद किसी गाड़ी बनानेवाले या किसी बढ़ई का शेड था। फाटक से ले कर वहाँ तक हर जगह कोयले की गर्द बिछी थी। 'यहाँ फेंकने लायक कोई जगह होगी,' उसने सोचा। दालान में किसी को न देख कर वह चुपके से अंदर गया। फाटक के पास ही उसे लोहे की एक खुली नाली नजर आई, जैसी कि अकसर उन जगहों में होती है, जहाँ बहुत से मजदूर या कोचवान रहते हैं। उसके ऊपर लकड़ी के तख्ते पर खड़िया से वही युगों पुराना नारा लिखा हुआ था : 'यहाँ पेशाब करना मना है!' यह तो अच्छी बात थी, क्योंकि यहाँ अंदर जाने पर किसी को शक नहीं होगा। 'मैं सब कुछ यहीं कहीं इस ढेर में फेंक कर चुपचाप निकल जाऊँगा।'

जेब में अपना हाथ डाले हुए उसने एक बार फिर चारों ओर नजर दौड़ाई। दालान की दीवार के पास, फाटक और नाली के बीच की लगभग एक गज सँकरी जगह में एक बड़ा-सा अनगढ़ पत्थर पड़ा नजर आया, जिसका वजन शायद साठ पौंड रहा हो। दीवार की दूसरी ओर एक सड़क थी। उसे राहगीरों की आवाजें सुनाई दे रही थीं, जिनकी वहाँ कभी कोई कमी नहीं रहती थी, लेकिन जब तक वह सड़क से अंदर न आ रहा हो, जैसा कि किसी वक्त भी हो सकता था, उसे फाटक के पीछे कोई देख नहीं सकता था। इसलिए जल्दी जरूरी थी।

वह पत्थर पर झुका, उसका ऊपरी सिरा कस कर दोनों हाथों से पकड़ा और पूरी ताकत लगा कर उसे पलट दिया। पत्थर के नीचे, जमीन में एक छोटा-सा गड्ढा था और उसने अपनी जेबें फौरन उसमें खाली कर दीं। बटुआ सबसे ऊपर था। फिर भी गड्ढा पूरी तरह भरा नहीं। उसने एक बार फिर पत्थर को पकड़ कर हिलाया-डुलाया और उसे एक ही झटके में फिर सीधा कर दिया। पत्थर अब अपनी पहलेवाली हालत में आ गया, बस बहुत थोड़ा-सा ऊँचा हो गया था। लेकिन उसने उसके चारों ओर की मिट्टी खुरची और अपने पाँव से पत्थर के चारों ओर दबा दी। अब किसी को हरकत का कुछ भी सुराग नजर नहीं आ सकता था।

इसके बाद बाहर जा कर वह चौक की ओर मुड़ा। एक बार फिर पल भर के लिए उस पर बहुत गहरा, लगभग असहनीय आनंद छा गया, जैसा कि थाने में हुआ था। 'मैंने सारे सुराग दफन कर दिए हैं! पत्थर के नीचे देखने की बात भला किसके दिमाग में आएगी शायद जबसे यह घर बना है, यहीं पड़ा है और इतने ही बरसों तक अभी और पड़ा रहेगा। अगर पता लग भी गया तो मुझ पर किसे शक होगा सारा किस्सा खलास रहा! कोई सुराग बाकी नहीं!' वह हँसा। आगे भी उसे याद रहा कि उसने एक महीन-सी, घबराई हुई, बिना आवाज की हँसी हँसना शुरू किया था और चौक पार करते हुए पूरे वक्त इस तरह हँसता रहा था। लेकिन क. बुलेवार पर पहुँच कर, जहाँ दो दिन पहले वह लड़की उसे मिली थी, उसकी हँसी अचानक रुक गई। दिमाग में धीरे-धीरे दूसरे विचार आने लगे। उसे लगा उस बेंच के सामने से गुजरते उसे घिन आएगी, जिस पर लड़की के चले जाने के बाद वह बड़ी देर तक बैठा सोचता रहा था, और उस गलमुच्छोंवाले सिपाही से मिल कर भी बड़ी नफरत होगी, जिसे उसने बीस कोपेक दिए थे : 'भाड़ में जाए!'

वह विक्षिप्त हो कर खाली दिमाग अपने चारों ओर देखता हुआ चलता रहा। लग रहा था उसके सारे विचार किसी एक ही बिंदु के चारों ओर चक्कर काट रहे हैं। उसे महसूस हुआ कि सचमुच एक ऐसा बिंदु है और यह कि अब, इस समय वह उसी बिंदु के सामने खड़ा है। पिछले दो महीनों में ऐसा पहली बार हुआ था।

'भाड़ में जाए सब कुछ!' एकाएक अदम्य क्रोध में भर कर उसने सोचा। 'जो कुछ अब शुरू हो चुका है, शुरू हो चुका है। उस पर भी भेजो लानत और एक नई जिंदगी पर भी। हे भगवान, कैसी नादानी है! ...मैं भी आज कैसे-कैसे झूठ बोल गया! कैसे घिनौने ढंग से मैंने उस कमबख्त इल्या पेत्रोविच की खुशामद की! यह सब कुछ बेवकूफी ही तो थी। मुझे उन सब लोगों की, उनकी खुशामद करने की अब क्या परवाह! नहीं-नहीं, बात यह है ही नहीं!'

अचानक वह रुक गया। एक नया, बिलकुल अप्रत्याशित और बेहद सीधा-सादा सवाल उसे परेशान करने लगा और उसे बुरी तरह उलझन में डाल दिया :

'यह सब कुछ अगर बूझ-समझ कर किया गया था, न कि मूर्खों की तरह, अगर सचमुच मेरा कोई निश्चित और पक्का मकसद था, तो फिर क्या वजह भी इसकी कि मैंने बटुए में भी झाँक कर नहीं देखा और मुझे यह भी नहीं मालूम कि उसके अंदर था क्या, जिसके लिए मैंने ये सारी तकलीफें सहीं और जान-बूझ कर इस नीच, गंदे और घिनौने काम का बीड़ा उठाया मैं उस बटुए को और उसके साथ ही उन सारी चीजों को फौरन पानी में फेंक भी देना चाहता था, जिन्हें मैंने ठीक से देखा तक नहीं था... क्या वजह थी इसकी?'

फिर भी मामला ऐसा ही था। वैसे ये सारी बातें उसे पहले से मालूम थीं; उसके लिए यह कोई नया सवाल नहीं था, उस वक्त भी नहीं, जब रात को किसी झिझक या किसी दुविधा के बिना उसे पानी में फेंकने का फैसला किया गया था, गोया ऐसा ही होना चाहिए, गोया इसके अलावा कुछ और हो ही न सकता हो। हाँ, उसे यह सब कुछ मालूम था, और उसने यह सब कुछ अच्छी तरह समझ लिया था। यह सब कुछ तो पक्के तौर पर कल उसी वक्त तय हो गया था, जब वह बक्स पर झुका हुआ उसमें से गहनों की डिब्बियाँ निकाल रहा था... बिलकुल यही बात थी...

'इस सबकी वजह यह है कि मैं बहुत बीमार हूँ,' आखिरकार उसने उदास मन से फैसला किया। 'मैं चिंता करता रहा हूँ, अंदर-ही-अंदर कुढ़ता रहा हूँ और यह भी नहीं जानता कि कर क्या रहा हूँ... कल और परसों और इस पूरे दौरान मैं अपने आपको चिंता की आग में जलाता रहा हूँ... मैं ठीक हो जाऊँगा और मैं चिंता नहीं करूँगा... लेकिन अगर मैं बिलकुल ही ठीक न हुआ तो हे भगवान, मैं इस सबसे कितना तंग आ चुका हूँ!'

यह बिना रुके चलता रहा। उसका जी बेहद चाह रहा था कि ध्यान बँटाने के लिए कोई चीज मिल जाए, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, किस बात की कोशिश करे। हर पल एक नई, बहुत ही शक्तिशाली संवेदना उसे अधिकाधिक अपने शिकंजे में कस रही थी। यह थी अपने चारों ओर की हर चीज से अथाह, और लगभग शारीरिक विरक्ति नफरत की एक जड़ और घिनौनी भावना। जो भी उसे दिखाई देता था, वही उसे घिनौना मालूम होता था-उसे उसकी सूरत से, उसकी चाल-ढाल से, उसके हाव-भाव से घिन आती थी। लग रहा था कि उनमें से कोई अगर उसे संबोधित करता, तो वह उसके मुँह पर थूक देता, या उसे काट भी खाता...

वसील्येव्स्की ओस्त्रोव में छोटी नेवा के किनारे पहुँच कर पुल के पास वह अचानक रुक गया। 'वह तो यहीं रहता है, इसी घर में,' उसने सोचा, 'हे भगवान, मैं रजुमीखिन के यहाँ तो नहीं पहुँच गया लो, फिर वह सिलसिला शुरू... काश मुझे मालूम होता कि मैं यहाँ जान-बूझ कर आया हूँ खैर, कोई बात नहीं। मैंने अभी परसों ही तो कहा था कि उससे मिलने मैं उसके बादवाले दिन जाऊँगा; तो अब जा कर उससे मिल ही क्यों न आऊँ'

वह चौथी मंजिल पर रजुमीखिन के कमरे तक गया और रजुमीखिन को उसके दड़बे में ही देखा। वह उस समय बड़ी एकाग्रता से कुछ लिख रहा था। दरवाजा उसने खुद खोला। वे दोनों चार महीने से एक-दूसरे से नहीं मिले थे। रजुमीखिन एक झीना, फटीचर ड्रेसिंग गाउन और अपने नंगे पाँवों में चप्पलें पहने बैठा था। बिखरे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, लगता था उसने मुँह-हाथ भी नहीं धोया है; उसके चेहरे से हैरत टपक रही थी।

'तुम हो!' वह चिल्लाया। उसने अपने साथी को सर से पाँव तक देखा, फिर कुछ देर रुक कर सीटी बजाई।

'ऐसी कंगाली आ गई! यार, तुमने तो हम सबको मात कर दिया!' उसने रस्कोलनिकोव के तार-तार कपड़ों को देखते हुए आगे कहा। 'आओ बैठो, एकदम थके हुए लगते हो।' फिर जब वह मोमजामा मढ़े हुए सोफे में धँस कर बैठ गया, जिसकी हालत उसके अपने सोफे से भी बदतर थी, तब रजुमीखिन ने अचानक देखा कि उसका मेहमान बीमार है।

'कुछ खबर भी है कि तुम बहुत बीमार हो' उसने उसकी नब्ज देखते हुए कहना शुरू किया। रस्कोलनिकोव ने अपना हाथ खींच लिया।

'कोई बात नहीं,' वह बोला, 'मैं यहाँ आया था; बात यह है कि मेरे पास कोई ट्यूशन नहीं है... मैं चाहता था... नहीं, दरअसल मुझे पढ़ाने का काम नहीं चाहिए...'

'लेकिन, तुम्हें सरसाम हो गया है, कुछ पता भी है!' रजुमीखिन ने उसे गौर से देखते हुए अपना विचार व्यक्त किया।

'नहीं, सरसाम नहीं है।' रस्कोलनिकोव उठ खड़ा हुआ। रजुमीखिन के कमरे की सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसने यह तो नहीं सोचा था कि अपने दोस्त से उसका आमना-सामना होगा। अब पलक झपकते वह समझ गया था कि उस पल जो चीज वह सबसे कम चाहता था, वह यह थी कि दुनिया में किसी से भी उसका सामना न हो। उसका पित्त खौलने लगा। रजुमीखिन के कमरे की चौखट पार करते ही उसे अपने आप पर इतना गुस्सा आया कि दम घुटने लगा।

'तो मैं चला, फिर मिलेंगे,' उसने एकाएक कहा और दरवाजे की ओर चल दिया।

'ठहरो! तुम भी अजीब आदमी हो!'

'मेरा जी नहीं चाहता,' रस्कोलनिकोव ने फिर अपना हाथ खींचते हुए कहा।

'तो फिर कमबख्त यहाँ आए क्यों थे? पागल हुए हो क्या? अरे, यह तो... सरासर मेरे मुँह पर तमाचा है! मैं तुम्हें इस तरह नहीं जाने दूँगा।'

'खैर, बात यह है कि मैं तुम्हारे पास इसलिए आया था कि तुम्हारे अलावा मैं ऐसे किसी दूसरे को नहीं जानता जो मेरी मदद कर सके... शुरुआत के लिए चूँकि तुम औरों से ज्यादा नेक हो, मेरा मतलब है समझदार हो, और भले-बुरे की परख कर सकते हो... और अब मैं समझता हूँ कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। सुन रहे हो न कुछ भी नहीं... न किसी की मदद... न किसी की हमदर्दी। मैं खुद... बस खुद... अकेला। खैर, बहुत हो चुका! मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।'

'पल-भर तो ठहर, बाँगड़ू! तू तो बिलकुल पागल है। वैसे तुम्हारी मर्जी, मेरा क्या। बात यह है कि मेरे पास भी कोई ट्यूशन नहीं है, और मुझे इसकी परवाह भी नहीं है, लेकिन किताबें बेचनेवाला एक आदमी है, खेरुवीमोव... उसने ट्यूशनों की कमी पूरी कर दी है। उसे छोड़ कर तो मैं सेठों के घर पाँच-पाँच बच्चों के ट्यूशन भी न लूँ।' वह प्रकाशन का थोड़ा-बहुत काम करता है। प्रकृति विज्ञान की छोटी-छोटी किताबें भी छापता है, और क्या बिक्री होती है उनकी! उनके नाम पढ़ कर ही पैसे वसूल हो जाते हैं! तुम हमेशा कहा करते थे कि मैं बेवकूफ हूँ, लेकिन भगवान जानता है मेरे यार कि इस दुनिया में मुझसे भी बड़े बेवकूफ पड़े हैं! अब वह भी प्रगतिशील बनने की सोच रहा है, इसलिए नहीं कि उसे किसी रुझान का पता है, बल्कि, दरअसल मैं ही उसे उकसाता रहता हूँ। ये रहे मूल जर्मन पुस्तक के दो फरमे - मेरी राय में इससे भोंडी धूर्तता नहीं हो सकती : इसमें इस सवाल पर बहस की गई है कि क्या औरत इनसान है और बड़े कायदे के साथ साबित किया गया है कि वह है। खेरुवीमोव नारी-समस्या के समाधान में अपने योगदान के रूप में इसे प्रकाशित करनेवाला है। मैं इसका अनुवाद कर रहा हूँ; वह इन ढाई फरमों को फैला कर छह देगा; हम लोग इसका कोई भारी-भरकम नाम, कोई आधे पन्ने का रख देंगे और आधे रूबल में किताब हाथों-हाथ बिक जाएगी। वह मुझे एक फरमे के छह रूबल देता है, इस तरह पूरे काम के पंद्रह रूबल बनते हैं, और छह रूबल मुझे पेशगी मिल चुके हैं। इस काम के खत्म होने के बाद हम लोग ह्वेल मछलियों के बारे में एक किताब का अनुवाद शुरू करनेवाले हैं, और फिर स्वीकारोक्तियाँ1, भाग दो में से कुछ बेहद नीरस किस्से, जो हमने अनुवाद करने के लिए छाँट लिए हैं। किसी ने खेरुवीमोव को बता दिया है कि रूसो बहुत कुछ रदीश्चेव2 जैसा आदमी था। और जाहिर है मैं उसकी किसी बात का खंडन नहीं करता। मेरी बला से! तुम 'क्या औरत इनसान है' का दूसरा फरमा करना चाहोगे अगर चाहो तो मूल जर्मन, कलम और कागज लेते जाओ... यह सब कुछ वहीं से मिलता है, और तीन रूबल भी लेते जाओ क्योंकि मुझे शुरू में पूरे काम के पेशगी छह रूबल मिले थे - तुम्हारे हिस्से के तीन रूबल बनते हैं। तुम जब यह फरमा पूरा कर लोगे तो तुम्हें तीन रूबल और मिलेंगे। अब मेहरबानी करके यह न समझना कि मैं तुम्हारे ऊपर कोई एहसान कर रहा हूँ। बात बल्कि उलटी है। जैसे ही तुमने अंदर कदम रखा था, मैंने सोच लिया था, मुझे तुमसे क्या मदद लेनी है। पहली बात तो यह है कि मेरे स्पेलिंग कमजोर है, और दूसरे, जर्मन भाषा में भी बिलकुल भटक जाता हूँ, इसलिए अनुवाद करते-करते बीच-बीच में ज्यादातर अपनी तरफ से ही घुसेड़ता जाता हूँ। तसल्ली की बात बस यह है कि वह मूल से सब यकीनन अच्छा ही होता होगा। लेकिन कौन जाने, शायद वह बेहतर नहीं बल्कि बदतर ही हो... ले जाओगे... या नहीं?'

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1. ज्यॉ जाक रूसो की आत्मकथा।

2. अलेक्सांद्र रदीश्चेव (1749-1820) : रूसी लेखक, भूदास प्रथा का आलोचक।

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रस्कोलनिकोव ने चुपचाप जर्मन रचना के पन्ने ले लिए, तीन रूबल भी ले लिए, और कुछ कहे बिना बाहर निकल गया। रजुमीखिन अचरज से उसे जाते हुए, एकटक देखता रहा। लेकिन रस्कोलनिकोव अगली सड़क पर पहुँच कर वापस लौटा, रजुमीखिन के कमरे की सीढ़ियाँ फिर चढ़ा, और जर्मन लेख और तीन रूबल मेज पर रख कर फिर बाहर चला आया। इस बार भी उसने कोई शब्द नहीं कहा।

'कुछ दीवाने तो नहीं हो गए?' रजुमीखिन आखिरकार गुस्से में आ कर जोर से चिल्लाया। 'यह क्या नाटक है! तुम मुझे भी पागल बना दोगे... कमबख्त, मेरे पास फिर आए ही क्यों थे?'

'मुझे नहीं चाहिए... कोई अनुवाद का काम,' रस्कोलनिकोव ने सीढ़ियों पर से बुदबुदा कर कहा।

'तो फिर कमबख्त, क्या चाहिए तुम्हें?' रजुमीखिन ने ऊपर से चिल्ला कर कहा। रस्कोलनिकोव चुपचाप सीढ़ियाँ उतरता रहा।

'अरे, सुनो! कहाँ रहते हो तुम?'

कोई जवाब नहीं मिला।

'जाओ, फिर भाड़ में जाओ!'

लेकिन अब तक रस्कोलनिकोव सड़क पर पहुँच चुका था। निकोलाएव्स्की पुल पर पहुँच कर उसे एक अप्रिय घटना की वजह से फिर जा कर पूरी तरह होश आया। एक कोचवान ने उस पर तीन-चार बार चीखने के बाद उसकी पीठ पर एक चाबुक जोर से जड़ दी, क्योंकि वह उसके घोड़े की टापों के नीचे कुचलते-कुचलते बचा था। चाबुक पड़ते ही वह गुस्से से ऐसा तिलमिला उठा कि झपट कर सीधे पुल के कगार की तरफ जा पहुँचा। वह न जाने क्यों गाड़ियों की उस आवाजाही में पुल के बीचोंबीच चल रहा था। गुस्से से वह दाँत पीसने लगा। जाहिर है उसने लोगों को हँसने का सामान थमा दिया था।

'अच्छा हुआ!'

'बदमाश!'

'पुरानी तिकड़म है, नशे में होने का बहाना करो और जान-बूझ कर पहियों के नीचे आ जाओ ताकि हर्जाने का दावा कर सको।'

'धंधा बना लिया है, यही काम है इसका।'

वह कगार के पास खड़ा गुस्से से, भौंचक्का हो कर दूर जाती हुई गाड़ी को देख रहा था, और अपनी पीठ सहला रहा था कि इतने में उसने किसी को अपने हाथ में कुछ पैसे रखते महसूस किया। उसने देखा सर पर रूमाल बाँधे और पाँवों में बकरी की खाल के जूते पहने एक अधेड़ उम्र की औरत थी; उसके साथ एक लड़की थी, शायद उसकी बेटी होगी, जो हैट लगाए हुए थी और हरे रंग की छतरी लिए थी। 'ले, भले आदमी, मसीह के नाम पर ये ले!' उसने पैसे ले लिए और वे दोनों आगे बढ़ गईं। बीस कोपेक का सिक्का था। उसके कपड़ों और सूरत-शक्ल से लोगों ने उसे सड़क का भिखारी समझा होगा। तो बीस कोपेक का यह दान उसे चाबुक खा कर मिला था, जिसकी वजह से उन्हें उस पर दया आ गई थी।

सिक्के को अपनी मुट्ठी में बंद करके वह दस कदम चला, और फिर मुड़ कर नेवा नदी की ओर मुँह करके खड़ा हो गया और शरद महल की ओर देखने लगा। आसमान पर एक भी बादल नहीं था और नदी का पानी गहरा नीला लग रहा था, जो कि नेवा नदी में कभी-कभार होता है। गिरजाघर का गुंबद, जिसका सबसे अच्छा दृश्य छोटे गिरजाघर से कोई बीस कदम दूरी पर पुल से दिखाई देता है, धूप में चमक रहा था और साफ हवा में उसकी सजावट की एक-एक तफसील अलग-अलग पहचानी जाती थी। चाबुक की मार का दर्द दूर हो गया और रस्कोलनिकोव उसके बारे में भूल भी गया। इस समय उसके दिमाग पर एक बेचैन करनेवाला विचार पूरी तरह छाया हुआ था। जो पूरी तरह स्पष्ट भी नहीं था। वह शांत खड़ा, देर तक टकटकी बाँधे क्षितिज को घूरता रहा। इस जगह से वह बखूबी परिचित था। जब वह यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, तब सैकड़ों बार आम तौर पर अपने घर जाते हुए - इस जगह शांत खड़ा रह कर इस भव्य दृश्य को टकटकी बाँधे देखता रहता था। यह दृश्य उसके अंदर एक अस्पष्ट-सी, रहस्यमयी भावना पैदा करता था, जिस पर वह हमेशा ही आश्चर्य करता रहता था। उसे देख कर उस पर एक विचित्र उदासीनता छा जाती थी; यह शानदार रंगारंग चित्र उसे गूँगा और बेजान लगता था। हर बार उसे अपने मन पर पड़नेवाली इस धुँधली, रहस्यमयी छाप पर हैरत होती थी, और अपने आप पर विश्वास न करके वह इसका कारण जानने का काम फिर कभी के लिए टाल देता था। अब उसे अपनी पुरानी शंकाएँ और उलझनें साफ-साफ याद आ रही थीं और उसे लग रहा था कि इस समय उनका याद आना केवल संयोग नहीं था। यह बात उसे कुछ अजीब और बेतुकी लग रही थी कि वह पहले की ही तरह ठीक उसी जगह आ कर रुका था, गोया उसने यह कल्पना की हो कि वह उन्हीं विचारों को सोच सकेगा, उन्हीं मान्यताओं और चित्रों में दिलचस्पी ले सकेगा जिनमें... थोड़े समय पहले ही... उसे दिलचस्पी थी। यह बात उसे कुछ हास्यास्पद लगी पर फिर भी उसका दिल तड़प उठा। तब उसे यह सब कुछ बहुत दूर गहराई में, कहीं उसके पाँवों के नीचे ही, आँखों से ओझल मालूम हो रहा था। उसका सारा अतीत, पुराने विचार, पुरानी समस्याएँ और मान्यताएँ, पुरानी स्मृतियाँ और यह चित्र, और वह स्वयं-सब कुछ। ...उसे लगा वह ऊपर की ओर उड़ा चला जा रहा है और आँखों से हर चीज ओझल होती जा रही है... अनजाने ही हाथ को हवा में घुमाते हुए, उसे अचानक मुट्ठी में बंद उस सिक्के की याद आई। उसने मुट्ठी खोल दी, कुछ देर सिक्के को घूरता रहा, और फिर जोर-से बाँह घुमा कर उसे पानी में फेंक दिया। फिर वह मुड़ा और घर की ओर चल पड़ा। उसे लग रहा था उस पल उसने अपने आपको हर आदमी से और हर चीज से चाकू से काट कर अलग कर लिया है।

जब वह घर पहुँचा तो दिन ढल रहा था। इसका मतलब है कि वह छह घंटे तक चला होगा। कैसे और कहाँ-कहाँ हो कर वह वापस आया, यह सब उसे याद नहीं था। कपड़े उतार कर बुरी तरह काँपता हुआ, वह सोफे पर लेट गया। हालत दौड़ा-दौड़ा कर निढाल कर दिए गए घोड़े जैसी हो रही थी। उसने अपना ओवरकोट ओढ़ लिया और फौरन फरामोशी के गर्त में डूब गया...

शाम ढल रही थी, जब वह एक भयानक चीख सुन कर जाग उठा। हे भगवान, कैसी भयानक चीख थी! ऐसी अजीब आवाजें, ऐसी चीख-पुकार, ऐसा रोना-पीटना, ऐसी मार-पीट, ऐसे आँसू, ऐसे लात-घूँसे और ऐसी गालियाँ उसने पहले कभी नहीं सुनी थीं। ऐेसे जंगलीपन, ऐसे जुनून की वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। दहशत के मारे वह उठ कर पलँग पर बैठ गया, और तीखे दर्द के मारे उस पर बेहोशी-सी छाने लगी। लेकिन लड़ने, रोने और गाली-गलौज की आवाज तेज होती जा रही थी। फिर वह अपनी मकान-मालकिन की आवाज पहचान कर हक्का-बक्का रह गया। वह दहाड़ें मार कर चिल्ला रही थी, चीख रही थी और रो-रो कर तेजी से जल्दी-जल्दी उखड़े-उखड़े शब्दों में कुछ कह रही थी। इसलिए वह क्या कह रही है, उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। यह तो जाहिर था कि वह गिड़गिड़ा रही थी कि उसे पीटा न जाए, क्योंकि उसे सीढ़ियों पर बड़ी बेरहमी से पीटा जा रहा था। जो आदमी उसे मार रहा था उसकी आवाज चिढ़ और क्रोध के कारण इतनी भयानक हो गई थी कि मेंढक की टर्र-टर्र जैसी लग रही थी। लेकिन वह भी उतनी ही तेजी से, उतने ही अस्पष्ट ढंग से, जल्दी-जल्दी और हकला-हकला कर कुछ कह रही थी। एकाएक रस्कोलनिकोव सिहर उठा। इल्या पेत्रोविच यहाँ! और वह मकान-मालकिन को मार रहा था! वह उसे ठोकरों से मार रहा था और उसका सर सीढ़ियों पर पटक रहा था, रोने की और धड़-धड़ की आवाजों से इतना तो पता चल ही रहा था। बात क्या है, सारी दुनिया यूँ उलट-पुलट क्यों होती जा रही है सभी मंजिलों और सभी सीढ़ियों पर उसे झुंड के झुंड लोगों के भागने की आवाज सुनाई दे रही थी। उसे लोगों के बोलने की, भय और आश्चर्य से चिल्लाने की, टकराने की और दरवाजे भड़भड़ाने की आवाजें आ रही थीं। 'लेकिन क्यों, आखिर क्यों और यह सब हुआ कैसे?' उसने कई बार दोहराया और सचमुच सोचने लगा कि वह पागल हो गया है। लेकिन नहीं, उसने एकदम साफ सुना था! और फिर इसके बाद वे लोग उसके पास आएँगे, 'क्योंकि इसमें कोई शक ही नहीं है... कि यह सब कुछ उसी सिलसिले में है... कल के बारे में... हे भगवान!' उसने अपने दरवाजे की कुंडी चढ़ा ली होती, लेकिन वह तो अपना हाथ भी नहीं उठा पा रहा था... और इससे फिर फायदा ही क्या था! दहशत ने उसके दिल को अपने शिकंजे में जकड़ लिया, जैसे बर्फ की सिल के अंदर कोई चीज जम गई हो। खौफ उसे दहलाता रहा और वह चेतनाशून्य हो गया। आखिर कोई दस मिनट के बाद धीरे-धीरे यह सारा शोर-गुल ठंडा पड़ने लगा। मकान-मालकिन सिसक-सिसक कर रो रही और कराह रही थी; इल्या पेत्रोविच अब भी उसे धमका रहा था और गालियाँ दे रहा था। लेकिन, आखिरकार लगा कि वह भी शांत हो गया। अब उसकी आवाज नहीं सुनाई पड़ रही थी। 'चला गया क्या चलो, जान छूटी!' हाँ, और मकान-मालकिन भी अब जा रही है। वह अभी भी रो रही है, बिलख रही है... फिर उसका दरवाजा भी धड़ से बंद हो गया। ...अब भीड़ सीढ़ियों से अपने-अपने कमरों की ओर जा रही थी; लोग जोर-जोर से बोल रहे थे, आपस से बहसें कर रहे थे, एक-दूसरे को पुकार रहे थे। कभी उनकी आवाज ऊँची हो कर चीख की शक्ल ले लेती थी, और कभी इतनी धीमी हो जाती थी कि लगता था वे कानाफूसी कर रहे हैं। बहुत से लोग रहे होंगे - उस मकान में रहनेवाले लगभग सभी लोग। 'लेकिन, हे भगवान, यह हो कैसे सकता है और वह यहाँ आया क्यों था, किसलिए?'

कमजोरी के मारे रस्कोलनिकोव सोफे पर दराज हो गया, लेकिन अपनी आँखें नहीं बंद कर सका। ऐसी वेदना से, अपार भय की ऐसी असहनीय अनुभूति से तड़पता हुआ, जैसी उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी, वह आधे घंटे तक सोफे पर पड़ा रहा। अचानक उसकी कोठरी में एक तेज रोशनी चमकी। नस्तास्या एक हाथ में मोमबत्ती और दूसरे में सूप की प्लेट ले कर आई थी। उसे ध्यान से देख कर और इस बात का भरोसा करके कि वह सो नहीं रहा है, उसने मोमबत्ती मेज पर रख दी और जो कुछ लाई थी, उसे मेज पर सजाने लगी-रोटी, नमक, प्लेट और चम्मच।

'मैं महसूस करती हूँ कि तुमने कल से कुछ खाया नहीं। दिन-भर इधर-उधर मारे फिरे हो, और बुखार से सारा बदन कैसा बुरी तरह काँप रिया है।'

'नस्तास्या... वे लोग मकान-मालकिन को पीट क्यों रहे थे?'

नस्तास्या ने उसे घूर कर देखा।

'उसको पीटा कौन?'

'अभी... असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट इल्या पेत्रोविच ने, कोई आधा घंटा हुआ, सीढ़ियों पर... उसके साथ वह क्यों इतनी बुरी तरह पेश आ रहा था, और... यहाँ क्यों आया था'

नस्तास्या ने कुछ कहे बिना आँखें, सिकोड़ कर उसे ऊपर से नीचे तक देखा, और देर तक देखती रही। उसकी तीखी नजरों के आगे वह बेचैनी-सी महसूस करने लगा, बल्कि उसे उससे कुछ हौल-सा लगने लगा।

'नस्तास्या, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं' उसने आखिरकार कमजोर आवाज में, डरते-डरते पूछा।

'खून का मामला होता है,' आखिर उसने बहुत धीमे से जवाब दिया, गोया अपने आपसे कुछ कह रही हो।

'खून कैसा खून?' दीवार की ओर सरकते हुए वह बुदबुदाया। रंग बिलकुल सफेद पड़ गया था। नस्तास्या अब भी कुछ बोले बिना एकटक उसे देखे जा रही थी।

'मकान-मालकिन को कोई भी पीट नहीं रहा था,' आखिरकार उसने सधी हुई, भरपूर आवाज में कहा।

रस्कोलनिकोव नजरें जमाए उसे घूरता रहा। उसे साँस लेने में कठिनाई हो रही थी।

'खुद सुना था मैंने... सो नहीं रहा था मैं... उठ कर बैठा हुआ था,' उसने और भी दबी जबान में डरते-डरते कहा। 'बड़ी देर तक मैंने सुना... असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट आया था... सभी घरों से लोग भाग कर सीढ़ियों पर आ गए थे...'

'यहाँ तो कोई भी नहीं आएला, बस तुम्हारा खून बोलने रहा है। उसे जब निकासी का कोई रास्ता नहीं मिलेंगा और वह जम जाएला है तब ऐसा ही होएला है। तुम यह सब अपना मन में सोचेला है... कुछ खाएगा?'

उसने कोई जवाब नहीं दिया। नस्तास्या अब भी उसके ऊपर झुकी खड़ी थी और उसे गौर से देख रही थी।

'मुझे पीने को कुछ दे दो... नस्तास्या।'

वह नीचे गई और चीनी के सफेद मग में पानी ले आई। लेकिन इसके बाद क्या हुआ, उसे कुछ भी याद नहीं रहा। रस्कोलनिकोव को बस इतना याद था कि उसने एक घूँट पानी पिया था और कुछ पानी अपने सीने पर छलका दिया था। इसके बाद वह फिर फरामोशी की गोद में चला गया।

3

लेकिन बीमारी के पूरे दौर में वह चेतनाशून्य रहा हो, ऐसी बात नहीं थी। उसे तेज बुखार था, कभी सरसाम की हालत भी हो जाती थी, कभी नीम-बेहोशीवाली हालत रहती थी। बाद में उसे उस समय की बहुत-सी बातें याद रह गईं। कभी लगता उसके चारों ओर बहुत-से लोग थे; उसे कहीं ले जाना चाहते थे, उसके बारे में काफी बहस हुई और काफी झगड़ा हुआ। फिर वह कमरे में अकेला रह जाता था; सब लोग उससे डर कर चले जाते थे और बीच-बीच में दरवाजे को थोड़ा-सा खोल कर उसे देख लेते थे। वे उसे धमकाते थे, मिल कर कोई साजिश करते थे, हँसते और उसे मुँह चिढ़ाते थे। उसे याद आता कि नस्तास्या अकसर इसके बिस्तर के पास होती थी। वह एक और शख्स को भी पहचानता था, जिसके बारे में उसे लगता था कि वह उसे बहुत अच्छी तरह जानता था, पर उसे यह याद नहीं आता था कि वह कौन था। इस बात पर वह बहुत झुँझलाता था और रो भी पड़ता था। कभी लगता कि वह महीने भर से वहाँ पड़ा था; और फिर लगने लगता कि वही दिन है। उसकी उस बात की उसे कोई याद नहीं थी; फिर भी वह हर पल महसूस करता था कि वह कोई ऐसी बात भूल गया है, जो उसे याद रहनी चाहिए थी। याद करने की कोशिश में वह परेशान हो जाता था, अपने आपको यातना देता था, कराहता था, गुस्से में भड़क उठता था या भयानक असहनीय आतंक से दब जाता था। तब वह उठने के लिए पूरा जोर लगाता था, भाग जाना चाहता था, लेकिन हर बार कोई उसे जबरन रोक लेता था, और वह फिर बेहद कमजोरी और बेहोशी का शिकार हो जाता था। आखिरकार उसे काफी हद तक होश आ गया।

यह सुबह दस बजे की बात थी। आसमान जब खुला होता था, तब उस कमरे में धूप आती थी और दाहिनी ओर की दीवार पर और दरवाजे के पास वाले कोने में रोशनी की एक पट्टी दिखाई देती थी। नस्तास्या किसी और आदमी के साथ उसकी बगल में खड़ी थी। वह शख्स एकदम अजनबी था और बड़ी जिज्ञासा से उसे देख रहा था। यह एक दाढ़ीवाला नौजवान था, पिंडलियों तक का लंबा कोट पहने था और देखने से कारीगर लगता था। मकान-मालकिन अधखुले दरवाजे से झाँक रही थी। रस्कोलनिकोव उठ कर बैठ गया।

'यह कौन है, नस्तास्या?' उसने नौजवान की तरफ इशारा करके पूछा।

'इसे सचमुच होश आने गया है!' वह बोली।

'हाँ, आ गया है,' उस आदमी ने बात दोहराई। इस नतीजे पर पहुँच कर कि उसे होश आ गया है, मकान-मालकिन दरवाजा बंद करके खिसक गई। वह हमेशा से बहुत शर्मीली थी और बातचीत या बहस से बहुत घबराती थी। वह कोई चालीस साल की थी; सूरत-शक्ल की बुरी भी नहीं थी। मोटा, गदराया हुआ शरीर, काली आँखें और भवें, मोटापे और काहिली की वजह से स्वभाव की अच्छी, और बेतुकेपन की हद तक लजीली।

'कौन...हो तुम?' उस आदमी को संबोधित करके वह कहता रहा। लेकिन उसी समय दरवाजा धड़ से खुला और रजुमीखिन अंदर आया। लंबा होने की वजह से उसे कुछ झुकना पड़ा।

'खूब कबूतरखाना है यह भी!' वह जोर से चीखा। 'हर बार मेरा सर टकरा जाता है। यह भी कोई रहने की जगह है! तो तुम्हें होश आ गया, जिगर! मुझे पाशेंका ने अभी-अभी बताया।'

'हाँ, अभी-अभी आएला है,' नस्तास्या बोली।

'हाँ, एकदम अभी होश आया है,' उस आदमी ने मुस्कराते हुए फिर उसकी बात दोहराई।

'पर आप कौन हैं, जनाब?' रजुमीखिन ने अचानक उसकी ओर मुड़ते हुए कहा। 'मेरा नाम व्रजुमीखिन है, आपका सेवक। रजुमीखिन नहीं, जैसा कि लोग मुझे हमेशा कहते हैं, बल्कि व्रजुमीखिन, छात्र और शरीफजादा, और ये हैं मेरे दोस्त पर आप कौन हैं?'

'मुझे अपने दफ्तर की तरफ से भेजा गया है। सेठ शेलोपाएव के दफ्तर से। और मैं एक काम से आया हूँ।'

'यहाँ तशरीफ रखिए।' रजुमीखिन मेज की दूसरी तरफ बैठ गया। 'जिगर, अच्छा हुआ कि तुम्हें होश आ गया,' वह रस्कोलनिकोव से कहता रहा। 'चार दिन से तुमने न कुछ खाया है न पिया है। हम लोगों को तुम्हें चम्मच से चाय पिलानी पड़ी। मैं दो बार जोसिमोव को तुम्हें देखने के लिए लाया। जोसिमोव की याद है तुम्हें उसने तुम्हें अच्छी तरह देख कर फौरन बता दिया कि घबराने की कोई बात नहीं - कोई बात तुम्हारे दिमाग को लग गई है। उसका कहना है कि कोई नसों की गड़बड़ी है, ठीक से खाना न खाने की वजह से, तुम्हें पर्याप्त बियर और मूली नहीं मिली है। लेकिन कोई खास बीमारी नहीं है। कुछ दिनों में दूर हो जाएगी और तुम एकदम ठीक हो जाओगे। जोसिमोव बहुत बढ़िया आदमी है, काफी नाम कमा रहा है। अच्छा यह बताओ, मैं तुम्हें बहुत ज्यादा देर नहीं रोकना चाहता,' उसने फिर उस आदमी की ओर मुड़ते हुए कहा। 'बताओ, क्या काम है तुम्हें मालूम हो रोद्या कि उस दफ्तर से दूसरी बार कोई आया है। पिछली बार कोई और आदमी आया था, मैंने उससे बात भी की थी। पहले कौन आया था?'

'जनाब, मैं यह बता दूँ कि वह परसों की बात है। वह अलेक्सेई सेम्योनोविच था, हमारे ही दफ्तर में काम करता है।'

'तुमसे ज्यादा समझदार था वह, मानते हो न?'

'हाँ, जनाब, यह तो है, उसका रुत्बा भी तो मुझसे ऊपर है।'

'एकदम ठीक कहते हो; खैर, बताते जाओ।'

'आपकी माँ की हिदायत पर, अफनासी इवानोविच बाखरूशिन के जरिए, मेरा खयाल है, उनकी चर्चा आपने पहले भी कई बार सुना होगा, हमारे दफ्तर से आपके लिए कुछ रकम भेजी गई है,' उस आदमी ने रस्कोलनिकोव को संबोधित करते हुए कहना शुरू किया। 'अगर आप बातें समझने की हालत में हैं, तो मुझे आपको पैंतीस रूबल देने हैं क्योंकि, पहले कई बार की तरह, आपकी माँ की खास हिदायत पर सेम्योन सेम्योनोविच को अफनासी इवानोविच से यह रकम मिल चुकी है। आप उन्हें जानते हैं जनाब?'

'हाँ, मुझे... वाखरूशिन की याद है...', रस्कोलनिकोव ने सोच में डूबे हुए कहा।

'सुना तुमने व्यापारी वाखरूशिन को पहचानता है यह।' रजुमीखिन खुशी से उछल पड़ा। 'कौन कहता है कि यह फिर अपने आपे में नहीं आएगा? मैं देखता हूँ कि तुम भी समझदार आदमी हो। बहरहाल, अक्लमंदी की बात सुन कर मुझे हमेशा बड़ी खुशी होती है।'

'हाँ, वही बाखरूशिन, अफनासी इवानोविच। और आपकी माँ के कहने पर, जिन्होंने पहले भी एक बार उनके जरिए आपके लिए इसी तरह रकम भेजी थी, इस बार भी उन्होंने इनकार नहीं किया। उन्होंने सेम्योन सेम्योनोविच को अब से कुछ दिन पहले हिदायत भेजी थी कि आपको पैंतीस रूबल अदा कर दिए जाएँ। आप आगे चल कर इससे भी ज्यादा की उम्मीद रख सकते हैं।'

'तुम्हारी 'आगे चल कर इससे भी ज्यादा की उम्मीद' वाली बात आज की बढ़िया बात है, हालाँकि 'आपकी माँ' वाली बात भी कुछ बुरी नहीं रही। तो बोलो, क्या कहते हो यह पूरी तरह होश में है कि नहीं?'

'सो तो ठीक है। आप बस इस कागज पर दस्तखत कर दें।'

'हाँ, अपना नाम तो लिख ही लेंगे। तुम्हारे पास किताब है?'

'हाँ, यह रही।'

'लाओ, मुझे दो। यह लो रोद्या, जरा उठ कर बैठो। मैं तुम्हें पकड़े रहूँगा। कलम ले कर 'रस्कोलनिकोव' घसीट तो दो। इस वक्त तो जिगर, पैसा मिल जाए तो क्या कहने!'

'मुझे नहीं चाहिए,' रस्कोलनिकोव ने कलम दूर हटाते हुए कहा।

'क्या नहीं चाहिए?'

'मैं इस पर दस्तखत नहीं करूँगा।'

'अरे ओ कमबख्त, दस्तखत किए बिना कैसे काम चलेगा?'

'मुझे नहीं चाहिए... यह पैसा।'

'पैसा नहीं चाहिए! अरे भाई यह सब झूठ है - मैं गवाह हूँ! तुम परेशान न हो। बात बस यह है कि यह जरा फिर बहकने लगा है। लेकिन इसके लिए यह कोई नई बात नहीं, हमेशा ही होता रहता है। तुम समझदार आदमी हो; हम लोग अभी इसे काबू में किए लेते हैं। मेरा सीधा-सा मतलब यह है कि हम इसका हाथ पकड़ कर दस्तखत करवा देंगे। काम बस झटपट निबटा दो।'

'अरे, मैं कभी फिर आ जाऊँगा।'

'नहीं, नहीं। तुम परीशानी क्यों उठाओ तुम तो समझदार आदमी हो। ...चलो रोद्या, इन्हें बेकार क्यों रोक रखा है। देखो तो कब से बेचारे इंतजार कर रहे हैं,' और यह कह कर वह सचमुच रस्कोलनिकोव का हाथ पकड़ने के लिए बढ़ा।

'तुम रहने दो, मैं खुद...' रस्कोलनिकोव ने कलम ले कर दस्तखत करते हुए कहा। गुमाश्ते ने पैसे निकाल कर मेज पर रखे और चला गया।

'शाबाश! अच्छा जिगर, तुम्हें कुछ भूख तो लगी होगी?'

'हाँ,' रस्कोलनिकोव ने जवाब दिया।

'कोई सूप है?'

'कल का थोड़ा-सा बचेला है,' नस्तास्या ने जवाब दिया; वह सारे वक्त वहीं खड़ी थी।

'आलू और चावल उसमें पड़ा है न?'

'हाँ, आलू और चावल है।'

'मुझे तो रत्ती-रत्ती सब पता है। ठीक है, सूप ले आओ और हम लोगों को थोड़ी-सी चाय पिला दो।'

'अच्छी बात बोलता है।'

'रस्कोलनिकोव बड़ी हैरत से और एक दबी-दबी, बेबुनियाद दहशत के साथ सब कुछ देखता रहा। उसने फैसला कर लिया था कि एकदम चुप रह कर देखता रहेगा कि होता क्या है। 'मेरा खयाल है कि मैं बहक नहीं रहा। मैं समझता हूँ यह सब कुछ सचमुच हो रहा है,' उसने सोचा।

कुछ ही मिनटों में नस्तास्या सूप ले कर लौटी और ऐलान किया कि चाय अभी तैयार हुई जाती है। सूप के साथ वह दो चम्मच, दो प्लेटें, नमक, मिर्च, गोश्त के लिए पिसी हुई राई वगैरह भी लाई थी। खाने की मेज कुछ इस तरह सजाई गई थी कि वैसे बहुत दिन से सजाई नहीं गई थी। मेजपोश भी साफ था।

'मेरी प्यारी नस्तास्या, अगर प्रस्कोव्या पाव्लोव्ना हमें दो-तीन बोतल बियर भिजवा दें तो कुछ बेजा बात तो नहीं होगी। हम उन्हें खाली कर देंगे।'

'तुम बी कोई मौका चूकेला नईं,' नस्तास्या ने मुँह-ही-मुँह में कहा, और हुक्म बजा लाने को चली।

रस्कोलनिकोव फटी-फटी आँखों से घूरे चला जा रहा था; ध्यान कहीं केंद्रित रखने के लिए उसे जोर लगाना पड़ रहा था। इसी बीच रजुमीखिन सोफे पर बगल में आ कर बैठ गया और अपने बाएँ हाथ से बड़े भोंडे तरीके से, जैसे किसी को भालू ने दबोचा हो, रस्कोलनिकोव के सर को सहारा दे कर दाहिने हाथ से चम्मच से सूप ले कर पिलाने लगा हालाँकि वह अपने आप बैठ सकता था। सूप को वह फूँक मार कर ठंडा करता जाता था कि कहीं मुँह न जल जाए। लेकिन सूप गर्म नहीं था। रस्कोलनिकोव तरसे हुए आदमी की तरह एक चम्मच सूप निगल गया, फिर दूसरा, फिर तीसरा। लेकिन उसे कुछ और चम्मच सूप पिलाने के बाद रजुमीखिन अचानक रुक गया और बोला उसे जोसिमोव से पूछना होगा कि तुम्हें और सूप दिया जाए या नहीं।

नस्तास्या बियर की दो बोतलें ले आई।

'चाय तो पियोगे?'

'हाँ।'

'नस्तास्या, भाग कर जा और थोड़ी चाय ले आ, क्योंकि चाय तो हम बिना किसी से पूछे भी पी सकते हैं। मगर बियर आ गई है!' वह वापस अपनी कुर्सी पर जा कर बैठ गया। सूप और गोश्त सामने खींच कर वह इस तरह खाने लगा गोया तीन दिन से खाना छुआ तक न हो।

'मैं तुम्हें बता दूँ, रोद्या, कि अब मैं रोज यहाँ इसी तरह खाता हूँ।' वह मुँह में गोश्त भरे कुछ इस तरह बोल रहा था कि आधी बात समझ में ही नहीं आती थी। 'और यह सब मेहरबानी तुम्हारी प्यारी मकान-मालकिन पाशेंका की है, जो इसका पूरा बंदोबस्त कर देती है। वह मेरे लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। मैं उससे यह सब करने को तो कहता नहीं, लेकिन जाहिर है कि मैं उसे रोकता भी नहीं। लो, नस्तास्या चाय भी ले आई। बड़ी चुस्त लड़की है! नस्तास्या, मेरी प्यारी नस्तास्या, थोड़ी-सी बियर तो पिओगी?'

'बस, रहने दो अपना बकवास!'

'एक प्याली चाय ही पी लो।'

'चाय मैं पिएँगी।'

'तो बनाओ! खैर, रहने दो, मैं खुद बनाता हूँ। तुम बैठ जाओ।'

उसने दो प्याली चाय बनाई, और खाना छोड़ कर फिर सोफे पर आन बैठा। पहले की ही तरह उसने अपने बीमार दोस्त के सर को बाएँ हाथ से सहारा दे कर उठाया और चम्मच से उसे चाय पिलाने लगा। इस बार भी वह बहुत सँभाल कर, बड़ी लगन के साथ, हर चम्मच को इस तरह फूँक मार-मार कर पिला रहा था जैसे उसके दोस्त को चंगा करने का खास और सबसे कारगर तरीका यही हो। रस्कोलनिकोव कुछ नहीं बोला और जो कुछ वह कर रहा था, उसे करने दिया। यूँ वह अपने बदन में इतनी ताकत महसूस कर रहा था कि सोफे पर बिना सहारे के बैठ सकता था, और न सिर्फ चम्मच या प्याला पकड़ सकता था, बल्कि उठ कर शायद चल-फिर भी सकता था। लेकिन किसी अजीब, जानवरों जैसी चालाकी की वजह से उसने तय किया कि किसी को अपनी ताकत का पता न लगने दे, कुछ समय के लिए ऐसे ही चुपका पड़ा रहे, जरूरत हो तो यह ढोंग भी करे कि अभी उसके हवास पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं, और उस बीच कान लगा कर सुनता रहे और मालूम करता रहे कि हो क्या रहा है। फिर भी वह अपनी तीखी नफरत की भावना पर काबू न पा सका। चाय के लगभग एक दर्जन चम्मच धीरे-धीरे पीने के बाद उसने अपना सर छुड़ा लिया और अचानक न जाने क्या उसके जी में आया कि चम्मच दूर हटा कर फिर तकिए पर लुढ़क गया। अब उसके सर के नीचे सचमुच के तकिए थे, साफ गिलाफ चढ़े हुए, चिड़ियों के पंख भरे हुए तकिए। उसने यह बात देखी और उसे अच्छी तरह अपने मन में बिठा लिया।

'आज पाशेंका को चाहिए थोड़ा-सा रसभरी का मुरब्बा भेज दे, फिर हम इसे रसभरी की चाय पिलाएँ,' रजुमीखिन ने अपनी कुर्सी पर वापस जाते हुए और सूप और बियर पर फिर धावा बोलते हुए कहा।

'तुम्हारा लिए उसे रसभरियाँ कहाँ से मिलेंगा?' नस्तास्या ने अपनी पाँचों फैली हुई उँगलियों पर तश्तरी टिका कर, शकर की डली मुँह में रख कर चाय पीते हुए पूछा।

'दुकान से मिलेंगी भलीमानस, और कहाँ से। बात यह है रोद्या कि जब से तुम बीमार पड़े हो, तब से बहुत कुछ होता ही रहा है, जिनके बारे में तुम नहीं जानते। जब तुम बदमाशी दिखा कर, अपना पता छोड़े बिना, मेरे यहाँ से भाग आए तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मैंने तुम्हें खोज निकालने और सजा देने का फैसला किया। मैं उसी दिन इस काम से जुट गया। तुम्हारा पता लगाने के लिए कहाँ-कहाँ मैं नहीं गया। मैं तुम्हारी यह रहने की जगह भूल गया था, सच तो यह है कि मुझे यह कभी याद ही नहीं थी, क्योंकि मैं इसे जानता ही नहीं था। रहा तुम्हारी पुरानी जगह का सवाल, तो मुझे बस इतना याद है कि वह पंचकोण में थी, खर्लामोव के मकान में। मैं खर्लामोव का यह घर खोजते-खोजते हार गया और बाद में पता चला कि वह खर्लामोव का नहीं बल्कि बुख का घर था। कभी-कभी सुनने में कैसी गड़बड़ी हो जाती है! मैं गुस्से के मारे आपे से बाहर हो गया और अगले ही दिन यूँ ही किस्मत आजमाने पतोंवाले दफ्तर चला गया। फिर कमाल यह हुआ कि दो मिनट में उन्होंने तुम्हारा पता ढूँढ़ निकाला! तुम्हारा नाम वहाँ चढ़ा हुआ है।'

'मेरा नाम चढ़ा हुआ है?'

'सौ फीसदी लेकिन यह भी तो देखो कि जब मैं वहाँ था, तो वे लोग किसी जनरल कोबेलेव का पता नहीं ढूँढ़ पाए। खैर छोड़ो, यह बहुत लंबा किस्सा है। लेकिन इस जगह कदम रखते ही, थोड़े ही देर में मुझे तुम्हारा सारा कच्चा चिट्ठा मालूम हो गया - सब कुछ, एक-एक बात। मुझे सब मालूम है, जिगर, यह नस्तास्या तुम्हें बताएगी। मैंने निकोदिम फोमीच से और इल्या पेत्रोविच से और दरबान से और मिस्टर जमेतोव से, वही अलेक्सांद्र ग्रिगोरियेविच, जो पुलिस के दफ्तर में बड़ा बाबू है, और सबसे बढ़ कर, पाशेंका से जान-पहचान पैदा की। नस्तास्या को सब मालूम है...'

'इनने उनका ऊपर कोई मंतर फूँकेला है,' नस्तास्या ने शरारत से मुस्करा कर दबी जबान से कहा।

'तुम शकर अपनी चाय में क्यों डाल नहीं लेती, नस्तास्या निकीफोराव्ना?'

'तुम बी एक ही आदमी होएला है!' नस्तास्या अचानक हँसी से दोहरी हो कर बोली। 'निकीफोरोव्ना नहीं, मैं पेत्रोव्ना होएला,' अपनी हँसी रोक कर वह तपाक से बोली।

'सो मैं याद रखूँगा। खैर अच्छा जिगर, लंबा किस्सा छोड़ो, असल बात यह है कि मैं तो यहाँ के सारे मकड़जाल पैदा करनेवाले हालात उखाड़ फेंकने के लिए बम का धमाका करनेवाला था, लेकिन पाशेंका के आगे मेरी एक न चली। मैंने कभी सोचा भी नहीं था जिगर कि वह ऐसी... लाजवाब औरत होगी। क्यों, तुम्हारा क्या खयाल है?'

रस्कोलनिकोव कुछ नहीं बोला। उसकी दहशत भरी आँखें उस पर जमी रहीं।

'सच तो यह है कि हर बात में उसने किसी तरह की कोई कमी रहने नहीं दी, 'रस्कोलनिकोव की खामोशी से जरा भी परेशान हुए बिना रजुमीखिन अपनी बात कहता रहा।

'ये बड़ा चलता पुर्जा आदमी होएला!' नस्तास्या एक बार फिर खुशी से चिल्लाई। उसे इस बातचीत में बेहद मजा आ रहा था।

'बड़े अफसोस की बात है, जिगर कि शुरू से तुमने कुछ सही ढंग से इस सिलसिले को नहीं सँभाला। तुम्हें उनके साथ कुछ अलग ढंग का रवैया अपनाना चाहिए था। उसका स्वभाव, बस यूँ समझ लो कि आसानी से समझ में नहीं आता। खैर, उसके स्वभाव के बारे में हम फिर कभी बातें करेंगे। ...तुमने नौबत यहाँ तक पहुँचने ही कैसे दी कि उसने तुम्हारा खाना तक भेजना बंद कर दिया और वह प्रोनोट! तुम्हारा दिमाग एकदम ही खराब रहा होगा कि तुमने उस प्रोनोट पर दस्तखत कर दिए! और जब उसकी वह बेटी, नताल्या येगोरोव्ना, जिंदा थी, तब उससे शादी करने का वादा ...सब कुछ मालूम है मुझे! पर मैं देखता हूँ कि यह एक नाजुक मामला है और मैं भी बहुत बड़ा गधा हूँ; मुझे माफ करना। लेकिन अब बेवकूफी की चर्चा चली है तो मैं इतना बता दूँ कि प्रस्कोव्या पाव्लोव्ना उतनी बेवकूफ नहीं है जितना कि पहली बार देखने में लगती है। यह बात क्या मालूम है तुम्हें?'

'मालूम है,' रस्कोलनिकोव मुँह फेर कर बुदबुदाया। लेकिन वह महसूस कर रहा था कि बातचीत का सिलसिला जारी रखना ही अच्छा है।

'सही है, है न?' उसके मुँह से जवाब में कुछ अलफाज सुन कर रजुमीखिन खुशी के मारे उछल पड़ा। 'लेकिन वह बहुत चालाक भी नहीं है, है न? बुनियादी तौर पर वह एक पहेली है! मैं तुमसे सच कहता हूँ, कभी-कभी तो मैं दंग रह जाता हूँ... चालीस की तो होगी पर कहती है कि छत्तीस की है, और उसे ऐसा कहने का पूरा अधिकार है। लेकिन मैं कसम खा कर कहता हूँ कि मैं उसे बौद्धिकता की कसौटी पर परखता हूँ, केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से। देखो जिगर बात यह है कि हम दोनों के बीच जो संबंध है, उसकी बुनियाद प्रतीकों पर है। एकदम तुम्हारी बीजगणित की तरह! मैं इस बात को पूरी तरह नहीं समझ पाता! खैर छोड़ो, यह सब तो बकवास है। बात बस इतनी है कि उसने जब देखा कि तुम अब पढ़ते भी नहीं हो, तुम्हारे ट्यूशन भी छूट गए हैं और तुम्हारे पास ढंग के कपड़े तक नहीं रहे, और उस लड़की के मर जाने की वजह से अब उसे तुम्हारे साथ रिश्तेदारों जैसा बर्ताव रखने की भी जरूरत नहीं रही, तो यकायक उसे डर लगने लगा। सो जब तुम भी मुँह छिपा कर अपनी माँद में दुबक कर बैठ रहे और उसके साथ अपने सारे संबंध तुमने तोड़ लिए तो उसने भी तुमसे छुटकारा पाने की ठान ली। उसने यह बात ठानी तो बहुत पहले ही थी, लेकिन उसे अफसोस इस बात का था कि उसकी रकम मारी जाएगी। इसके अलावा, तुम खुद उसे यकीन दिला चुके थे कि तुम्हारी माँ कर्ज चुका देंगी।'

'हाँ, यह बात कहना सरासर मेरा कमीनापन था। ...मेरी माँ खुद ही लगभग कंगाल हैं... मैंने तो वह झूठ इसलिए बोला था कि रहने की जगह बनी रहे और... खाना मिलता रहे,' रस्कोलनिकोव ने ऊँचे स्वर में साफ-साफ कहा।

'हाँ, सो तो तुमने समझदारी की। लेकिन सबसे बुरी बात यह हुई कि उसी वक्त मिस्टर चेबारोव आ पहुँचे। कोई व्यापारी हैं और कोर्ट कौंसिलर भी। पाशेंका तो अपनी तरफ से कार्रवाई करने की बात सोचती भी नहीं, हद से ज्यादा संकोची है बेचारी; लेकिन व्यापारी तो संकोची नहीं होता। इसलिए उन्होंने पहला काम यह किया कि एक सवाल पूछा : 'क्या प्रोनोट की वसूली की उम्मीद है?' जवाब मिला, 'है तो, क्योंकि उसकी माँ है, जो अपनी सवा सौ रूबल की पेंशन के सहारे अपने रोद्या को जरूर बचाने की कोशिश करेगी, चाहे इसके लिए उसे भूखा ही क्यों न रहना पड़े, और फिर उसकी एक बहन भी है जो उसकी खातिर अपने आपको भी गिरवी रख देगी।' वह इसी की आस लगाए थे। ...तुम चौंके क्यों अब मुझे तुम्हारा सारा कच्चा चिट्ठा पता चल चुका है, जिगर। जब तुम पाशेंका के होनेवाले दामाद थे, तब तुम खुल कर उससे सारी बातें कह देते थे; मैं यह सब कुछ एक दोस्त की हैसियत से तुम्हें बता रहा हूँ। लेकिन मैं तुम्हें बताऊँ कि बात क्या है : ईमानदार और दर्दमंद आदमी खुले दिल से बात करता है, और व्यापारी तुम्हारी बात सुनता रहता है और अंदर-ही-अंदर जुगाली करता रहता है ताकि उस ईमानदार बंदे को चबा सके। खैर हुआ यह कि उसने वह प्रोनोट किसी भुगतान के बदले इसी चेबारोव को दे दिया, और उन्होंने आव देखा न ताव, बाकायदा वसूली के लिए उसे दाखिल कर दिया। जब मुझे यह सब कुछ मालूम हुआ तो मेरा तो जी चाहा कि अपना जमीर पाक रखने के लिए मैं उसकी भी धज्जियाँ उड़ा दूँ, लेकिन तब तक मेरे और पाशेंका के बीच गहरा दोस्ताना हो गया था। मैंने इस पूरे सिलसिले को खत्म करने पर जोर दिया, और यह जिम्मा लिया कि तुम रकम चुका दोंगे। मैंने तुम्हारी जमानत ली, जिगर। समझ रहे हो न हमने चेबारोव को बुलवाया, दस रूबल उसके मुँह पर फेंक मारे और प्रोनोट उससे वापस ले लिया, और मैं वही प्रोनोट अब आपकी खिदमत में पेश कर रहा हूँ। पाशेंका को तुम्हारे ऊपर पूरा भरोसा है। लो, यह लो, मैंने इसे फाड़ दिया।' रजुमीखिन ने प्रोनोट मेज पर रख दिया। रस्कोलनिकोव ने उसकी ओर देखा और कुछ भी कहे बिना दीवार की तरफ मुँह फेर कर लेट गया। रजुमीखिन तक को भी थोड़ा बुरा लगा।

'मेरी समझ में तो यही आ रहा है जिगर,' एक पल बाद वह बोला, 'कि मैं फिर बेवकूफी कर रहा हूँ। मैंने सोचा था कि अपनी बकबक से तुम्हारा कुछ दिल बहलाऊँ, पर लग रहा है कि तुम्हें मेरी बातों से कोफ्त हो रही है।'

'जब मैं सरसाम की हालत में था, तब तुम ही आए थे क्या, जिसे मैंने पहचाना नहीं था?' रस्कोलनिकोव ने अपना सर घुमाये बिना ही एक पल ठहर कर पूछा।

'हाँ, मैं ही था। और तुम तब तो भड़क ही उठे थे, जब मैं खास तौर पर एक दिन जमेतोव को लाया था।'

'जमेतोव वह बड़ा बाबू किसलिए?' रस्कोलनिकोव ने जल्दी से करवट बदली और रजुमीखिन को नजरें गड़ा कर घूरने लगा।

'तुम्हें हो क्या गया है आखिर ...आखिर इतना परेशान क्यों हो वह तुमसे तो यूँ ही मिलना चाहता था क्योंकि मैंने उससे तुम्हारे बारे में बहुत-सी बातें की थीं... वरना मुझे इतनी सारी बातें मालूम कैसे होतीं बड़ा लाजवाब आदमी है, जिगर एकदम पक्का... जाहिर है, अपने ढंग से। अब हमारी दोस्ती हो गई है... लगभग रोज मुलाकात होती है। जानते हो, मैं इसी इलाके में आ गया हूँ हाल ही में अभी मैं उसके साथ एक-दो बार लुईजा इवानोव्ना के यहाँ भी गया था... लुईजा की याद है, लुईजा इवानोव्ना की?'

'सरसाम में मैंने कुछ कहा था क्या?'

'बहुत कुछ कहा था! अपने होश में नहीं थे तुम।'

'किस चीज के बारे में बड़बड़ा रहा था?'

'अब क्या पूछते हो, किस चीज के बारे में बड़बड़ा रहे थे लोग काहे के बारे में बड़बड़ाते हैं... अच्छा जिगर, अब मैं चलता हूँ। अब गँवाने को मेरे पास और वक्त नहीं है।'

वह उठा और अपनी टोपी उठा ली।

'मैं किस चीज के बारे में बड़बड़ा रहा था?'

'क्या रट लगा रखी है भला! तुम्हें डर है क्या कि कहीं तुमने कोई भेद तो नहीं खोला? परेशान न हो, तुमने किसी शहजादी के बारे में कुछ नहीं कहा। लेकिन तुम कुछ बक रहे थे; किसी बुलडाग के बारे में, कानों की बालियों और जंजीरों के बारे में, क्रेस्तोव्स्की द्वीप के बारे में, किसी दरबान के बारे में, निकोदिम फोमीच और असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट इल्या पेत्रोविच के बारे में न जाने क्या-क्या बक रहे थे। और एक चीज थी जिसमें तुम्हें खास दिलचस्पी थी, अपने मोजे के बारे में! तुम कराह-कराह कर कह रहे थे; 'मुझे मेरे मोजे दो दो!' जमेतोव ने पूरे कमरे में तुम्हारे मोजे ढूँढ़े और खुद अपने इत्र से महकते हुए और अँगूठियों से सजे हुए हाथों से कहीं से खोज कर वह चीथड़ा तुम्हें दिया था। तब जा कर तुम्हें तसल्ली हुई और अगले चौबीस घंटे तुमने उन मनहूस मोजों को अपनी मुट्ठी में दबोचे रखा; लाख कोशिश करने पर भी हम उन्हें नहीं ले सके। इस वक्त भी वे तुम्हारी रजाई के अंदर ही कहीं होंगे। फिर तुम दर्द भरी आवाज में अपने पतलून की मोरी माँगने लगे, जो हमारी समझ में कुछ भी नहीं आया। खैर, अब कुछ काम की बातें करें! ये पैंतीस रूबल हैं। इनमें से दस मैं लिए लेता हूँ, और घंटे दो घंटे में तुम्हें इसका हिसाब दे दूँगा। साथ ही मैं जोसिमोव को भी बता दूँगा, हालाँकि उसे यहाँ बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था, क्योंकि अब तो बारह बज रहे हैं। और तुम, नस्तास्या, मेरे जाने के बाद जितनी बार भी हो सके, बीच-बीच में आ कर झाँक लेना कि इसे कुछ पीने के लिए या कोई और चीज तो नहीं चाहिए। और जिन चीजों की जरूरत है। वह मैं पाशेंका से अभी कहे जाता हूँ। तो मैं चला!'

'उनका पाशेंका कहेला है! अरे, बहुत पहुँचा होएला है!' उसके बाहर निकलते-निकलते नस्तास्या ने कहा। फिर उसने दरवाजा खोला और कान लगा कर खड़ी सुनती रही, लेकिन भाग कर सीढ़ियाँ उतरते हुए उसके पीछे-पीछे गए बिना रह न सकी। उसे यह सुनने की उत्सुकता थी कि वह मकान-मालकिन से क्या कह रहा है। साफ जाहिर था कि वह रजुमीखिन पर काफी रीझ गई थी।

नस्तास्या के जाते ही मरीज ने रजाई वगैरह किनारे फेंकी और पागलों की तरह बिस्तर से उछला। बेचैनी के मारे वह अंदर-ही-अंदर फुँका जा रहा था, उसका अंग-अंग फड़क रहा था। कब से वह इंतजार में था कि ये लोग टलें तो वह अपना काम शुरू करे। लेकिन कौन-सा काम, अब गोया उसे चिढ़ाने के लिए यही बात उसके दिमाग से निकल गई थी। 'हे भगवान, मुझे बस एक बात बता दो : उन लोगों को पता चल चुका है या नहीं अगर उन्हें मालूम हो गया है और वे सब दिखावा कर रहे हैं, मुझे मेरी बीमारी में चिढ़ा रहे हैं, और फिर वे अचानक आ धमकेंगे और मुझसे कहेंगे कि पता तो बहुत पहले चल गया था और यह कि वे लोग तो बस... मैं अब करूँ तो क्या यही तो मैं भूल गया हूँ, गोया जान-बूझ कर; और वह भी एकदम से; अभी पल भर पहले तक तो याद था...'

वह कमरे के बीच में खड़ा दुखी मन भौंचक्का, इधर-उधर देखता रहा। चल कर वह दरवाजे तक गया, उसे खोला और कान लगा कर सुनने लगा, लेकिन यह तो वह काम नहीं था जो वह करना चाहता था। अचानक, उसे जैसे किसी चीज की याद आ गई हो, वह भाग कर उस कोने में गया जहाँ कागज के नीचे खोखल था और उसकी छानबीन करने लगा। उसने खोखल में हाथ डाला, यह टटोला, वह टटोला, लेकिन वह काम तो यह भी नहीं था। आतिशदान के पास गया, उसे खोला और राख कुरेद कर देखने लगा : उसके पतलून के लत्ते और जेब में से निकाले गए चीथड़े अभी तक वहाँ उसी तरह पड़े थे, जिस तरह उन्हें उसने फेंका था। तो फिर... किसी ने वहाँ तलाशी नहीं ली है! फिर उसे उस मोजे की याद आई, जिसके बारे में रजुमीखिन उसे बता रहा था। हाँ, वह वहीं सोफे पर, रजाई के नीचे पड़ा था, लेकिन उस पर इतनी गर्द जम गई थी कि जमेतोव को उस पर कुछ दिखाई नहीं पड़ा होगा।

'ओह हाँ, जमेतोव! ...थाना! ...मुझे थाने क्यों बुलाया गया है? सम्मन कहाँ है? लानत है! मैं सब बातों को एक में मिलाए दे रहा हूँ : वह तो तब की बात है! मैंने तब भी अपने मोजे को देखा था, लेकिन अब... अभी तो मैं बीमारी से उठा हूँ। लेकिन जमेतोव क्यों आया था? रजुमीखिन क्यों उसे लाया था...' वह लाचार हो कर फिर सोफे पर बैठते हुए बुदबुदाया। 'मतलब क्या है इसका? अभी तक मैं अपने होश में नहीं हूँ?, या यह सब सच है मैं समझता हूँ यह सब कुछ सच है... ओह, अब याद आया : मुझे भाग जाना चाहिए! हाँ, मुझे यही करना चाहिए, भाग जाना चाहिए! हाँ... लेकिन कहाँ मेरे कपड़े कहाँ गए? मेरे पास जूते भी नहीं हैं! वे लोग ले गए उन्होंने छिपा दिए सब समझता हूँ मैं! ओह, यह रहा मेरा कोट - यह उनकी नजर से चूक गया! और ये मेज पर पैसे भी रखे हैं, भगवान उनका भला करे! प्रोनोट भी यह रहा। ...मैं पैसे ले कर चला जाता हूँ और रहने की कोई दूसरी जगह किराए पर लिए लेता हूँ। मुझे वे लोग ढूँढ़ नहीं सकेंगे! ...हाँ, लेकिन पतोंवाला दफ्तर वे लोग यकीनन मुझे खोज निकालेंगे, रजुमीखिन मुझे ढूँढ़ लेगा। बेहतर यही होगा कि एकदम भाग लूँ... कहीं बहुत दूर... अमेरिका। फिर चाहे वे अपना सर फोड़ते रहें! और प्रोनोट भी लेता जाऊँ... वहाँ काम आएगा। और क्या-क्या ले जाना है मुझे ये लोग समझते हैं कि बीमार हूँ मैं! उन्हें यह भी नहीं मालूम कि मैं चल-फिर सकता हूँ, ही-ही-ही! उनकी आँखों से तो मुझे लगा गोया उन्हें सब कुछ मालूम है! बस नीचे किसी तरह उतर पाऊँ! और अगर उन्होंने पहरा बिठा रखा हो, पुलिसवाले हों तो! यह क्या है, चाय आह, और यह कुछ बियर भी बची है। आधी बोतल... ठंडी!'

लपक कर उसने बोतल उठा ली, जिसमें अब भी एक गिलास बियर बची हुई थी और उसे गट-गट पी गया जैसे सीने के अंदर कोई आग बुझा रहा हो। लेकिन अगले ही पल बियर उसके सर चढ़ गई, और एक हलकी-सी, बल्कि यूँ कहिए कि सुखद, सिहरन उसकी रीढ़ में दौड़ गई। वह लेट गया और रजाई अपने ऊपर खींच ली। उसके बीमार और बिखरे विचार और भी तितर-बितर थे। जल्दी ही हलकी, सुखद तंद्रा ने उसे आ घेरा। आराम महसूस करते हुए उसने अपना सर तकिए में धँसा लिया। उस नर्म, गुलगुली रजाई को, जिसने उसके फटे-पुराने ओवरकोट का स्थान ले लिया था, उसने अपने शरीर पर और कस कर लपेटा, हलकी-सी आह भरी और गहरी, ताजगी लानेवाली नींद सो गया।

किसी के अंदर आने की आहट सुन कर वह जागा। आँख खोली तो देखा कि रजुमीखिन चौखट पर संकोच में खड़ा है : कि अंदर आए या न आए। रस्कोलनिकोव जल्दी से उठ कर सोफे पर बैठ गया और उसे घूरने लगा, गोया कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।

'आह तो तुम सो नहीं रहे! मैं आ गया! नस्तास्या, बंडल यहाँ अंदर लाओ!' रजुमीखिन ने सीढ़ियों से नीचे पुकार कर कहा। 'हिसाब मैं तुम्हें अभी दिए देता हूँ।'

'क्या बजा है?' रस्कोलनिकोव ने बेचैनी से चारों ओर देखते हुए पूछा।

'तुम तो अच्छी नींद सोए, जिगर अब तो शाम होने को आई। थोड़ी देर में छह बजनेवाले हैं। तुम छह घंटे से ज्यादा सोए।'

'कमाल हो गया! सचमुच मैं इतना सोया!'

'इसमें गलत ही क्या है अच्छा ही है तुम्हारे लिए। जल्दी भी क्या है किसी से मिलने जाना है या कोई और बात हमारे पास वक्त-ही-वक्त है। मैं पिछले तीन घंटे से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। ऊपर दो बार आया और देखा, तुम सो रहे हो। दो बार जोसिमोव के यहाँ हो आया, पर वह घर पर नहीं था कोई बात नहीं, आ जाएगा! ...खैर फिर थोड़ी देर के लिए अपने काम से भी गया था। आज मैं घर बदल रहा हूँ, अपने चचा के साथ रहने आ रहा हूँ। अब मेरे साथ मेरे एक चचा रहते हैं। लेकिन छोड़ो यह बात, काम की बात करें! नस्तास्या, मुझे बंडल तो देना। अब तुम्हारा जी कैसा है, जिगर?'

'मैं तो एकदम ठीक हूँ, अब बीमार थोड़े ही हूँ... रजुमीखिन, तुम्हें यहाँ आए क्या बहुत वक्त हो गया?'

'मैंने कहा न, पिछले तीन घंटे से इंतजार कर रहा हूँ।'

'नहीं, अभी नहीं। पहले?'

'मतलब क्या है तुम्हारा?'

'यहाँ तुम कब से आ-जा रहे हो?'

'अरे, सबेरे ही तो तुम्हें सब कुछ बताया। याद भी नहीं?'

रस्कोलनिकोव कुछ सोचने लगा। सुबहवाली बात उसे सपना लग रही थी। कोई याद न दिलाए तो उसे कुछ नहीं याद आ रहा था। रजुमीखिन की तरफ उसने सवालिया नजरों से देखा।

'हूँ!' रजुमीखिन बोला, 'तो भूल गए! मैंने उसी वक्त समझ लिया था कि तुम पूरी तरह होश में नहीं हो। अब थोड़ा सोने के बाद तुम्हारी हालत पहले से बहुत अच्छी है... सचमुच पहले से बहुत अच्छे नजर आ रहे हो। बहुत बढ़िया! खैर, अब कुछ तो काम की बात! अभी सब कुछ याद आ जाएगा। यह देखो, जिगर।'

उसने बंडल खोलना शुरू किया। साफ लग रहा था कि इस काम में वह भारी दिलचस्पी ले रहा था।

'यकीन जानो, यार, यह एक ऐसी बात है, जो खास मेरे अपने दिल की बात है, क्योंकि तुमको इनसान बनाना हमारा काम है। तो आओ, ऊपर से शुरू करते हैं। यह टोपी देखी?' उसने बंडल से सस्ती और मामूली-सी पर काफी अच्छी टोपी निकाली। 'आओ, आजमा कर तो देखूँ।'

'थोड़ी देर बाद,' रस्कोलनिकोव ने चिड़चिड़ा कर उसे दूर हटाते हुए कहा।

'आओ भी यार, जिद न करो। बाद में बहुत देर हो जाएगी और मुझे सारी रात नींद नहीं आएगी, क्योंकि इसे मैंने अंदाजे से बिना नाप के खरीदा है। एकदम ठीक!' उसे टोपी पहनाते हुए वह जोर से चिल्लाया जैसे कोई मैदान मार लिया हो, 'ठीक तुम्हारे नाप की है! लिबास में पहली बात देखने की यह होती है कि सर पर पहनने की चीज ठीक हो। एक तरह से आदमी की पहचान उसी से होती है। मेरा एक दोस्त है, तोल्स्त्याकोव। जब भी किसी ऐसी जगह जाता है, जहाँ सभी लोग हैट या टोपियाँ पहने रहते हैं, तो उसे हमेशा अपना तसला उतार लेना पड़ता है। लोग समझते हैं कि वह दासों जैसी विनम्रता के कारण ऐसा करता है, लेकिन इसकी सीधी-सी वजह यह है कि उसे अपने उस चिड़िया के घोंसले पर शर्म आती है। ऐसा झेंपू आदमी है कि बस! देखो, नस्तास्या, ये रहे टोपियों के दो नमूने : यह पामर्स्टन हैट,' यह कह कर उसने कोने में से रस्कोलनिकोव की पुरानी टूटी हुई हैट उठाई, जिसे वह न जाने क्यों पामर्स्टन कहता था, 'और यह नगीना! कीमत का अंदाजा लगाओ, रोद्या... तुम्हारा क्या खयाल है नस्तास्या, मैंने इसके क्या दाम दिए होंगे' यह देख कर कि रस्कोलनिकोव कुछ नहीं बोला, उसने नस्तास्या की ओर मुड़ कर पूछा।

'ज्यास्ती से ज्यास्ती बीस कोपेक, मैं दावों के साथ कह सके हूँ,' नस्तास्या ने जवाब दिया।

'बीस कोपेक... बेवकूफ कहीं की!' वह झुँझला कर जोर से चिल्लाया। 'अरे, आजकल तो तेरा ही मोल इससे ज्यादा होगा। ...अस्सी कोपेक! और वो भी इसलिए कि सेकेंड-हैंड है। यह इस जमानत पर खरीदी गई है कि फट जाएगी तो अगले साल वे लोग दूसरी टोपी मुफ्त में देंगे। हाँ, मेरी बात मानो! खैर, अब आओ अमेरिका के नक्शे पर, जैसा कि हम लोग स्कूल में कहा करते थे। मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि मुझे इस पर बहुत नाज है,' यह कह कर उसने रस्कोलनिकोव को ऊनी कपड़े की स्लेटी हलकी, गर्मी में पहनने की एक पतलून दिखाई। 'न कोई सूराख, न कहीं धब्बा और देखने में बहुत शरीफाना लगती है, हालाँकि थोड़ी पहनी हुई है। और यह रही इसी के जोड़ की वास्कट, एकदम आजकल के फैशन के मुताबिक से। यह थोड़ी-सी पहनी हुई होने की वजह से तो और भी अच्छी हो गई है, ज्यादा नर्म और मुलायम। देखो रोद्या, मैं समझता हूँ कि इस दुनिया में निभाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत इसकी है कि आदमी मौसम के हिसाब से चले। अगर जनवरी में खाने का शौक नहीं तो पैसे बचा कर बटुए में रखो। यही बात इस सौदे के बारे में सच है। आजकल गर्मी है, इसलिए मैं गर्मी की चीजें खरीद कर लाया हूँ। पतझड़ में इससे ज्यादा गर्म कपड़ों की जरूरत पड़ेगी, तब ये चीजें यों भी फेंक ही देन