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डायरी

शहर शहर जादू
मधु कांकरिया


21.1.2010

नींद कामयाब ही थी। बस एक छोटे से सपने ने हलकी सी खलबली मचा दी थी। कामयाब होते होते रह गयी नींद। यदि सपनों में सत्य के बीज छिपे रहते हैं तो यह तय है कि आनेवाला समय मेरे लिए उतना आसान नहीं रहेगा।

बचपन में बुर्केवाली औरतों को देखते ही कँपकँपी छूट जाती थी। जाने किसने दिमाग में उनको लेकर डर भर दिया था कि ये औरतें अपने बुर्के में बच्चों को छुपा लेती हैं। मैं इन्हें देखते ही कभी किसी मकान में छिप जाती तो कभी किसी पेड़ कि ओट में दुबक जाती और ऊँट की तरह गर्दन उचका उचका कर देखती कि बुर्केवाली चली गयी है या नहीं।

जाने कब खत्म हुआ यह डर?

शायद तभी खत्म हुआ होगा जब खत्म हुआ होगा बचपन का जादू।

आज उस बुर्केवाली का डर तीन कोट में तब्दील हो गया है। मेरे मामा कहते थे कि जीवन में काला कोट,सफेद कोट और भूरे कोट... इन तीन कोट से हमेशा बचकर रहो। काला कोट यानी वकील, सफेद कोट यानी डाक्टर और भूरा कोट यानी पुलिस। सौभाग्य से इन दिनों तीनो ही कोटों से मुठभेड़ हो रही है। डर कि जाने कब पुलिस आ धमके और मुझे धक्का मार मेरा सामान ही बाहर न फेंक दे। क्योंकि वकील की मेहरबानी से मुझे बहुत बाद में पता चला कि कोर्ट का आर्डर आ गया है फ्लैट खाली करवाने के लिए। वकील झूठमूठ मुझे बहलाता रहा कि कोर्ट मुझे 6 महीने का समय देगी, ऐसा कुछ भी करने के पहले। 'सब ठीक होगा' वाला मेरा मध्यवर्गीय मन। और अब उसने जानबूझ कर सप्ताह भर पहले ही यह शुभ सूचना दी जिससे तनाव का प्रेसर पॉइंट अधिकतम हो सके और मोटी रकम वो मुझसे वसूल सके कोर्ट से 'स्टे ऑर्डर' लेने के लिए। मकान मालकिन उधर मुस्तैद कि कैंड़े सी 'मैं' को कैसे ध्वस्त किया जाए कि पुलिस के खर्चे बिना ही मुझे भगाने में कामयाबी मिल जाए। इसलिए हर दिन नए नए प्रयोग चल रहे है। दिन के सारे प्रयोग उसके बेकार हुए। पानी बंद, मुख्य दरवाजा बंद, लेटर बॉक्स गायब... सब कुछ करके देख लिया तो अब उसने नए प्रयोगों के लिए रात चुनी है क्योंकि डर के लिए सबसे माकूल समय यही होता है। सारे डर रात के समय ही आदमकद होते हैं। स्त्री विमर्शवाले एक बार देख लें मेरी मकान मालकिन को तो अपनी राय बदल दें। वह औरत नहीं सिर्फ चाकू-छूरी और दाँत है।

आधी रात, गहरी नींद, खामोश फ्लैट, साँय साँय सन्नाटा और अचानक काल बेल की कर्कश घंटी। घंटी पर घंटी। पहली सोच यही कि कोई आक्रमण, कोई दुश्मन या कहीं से किसी की मौत का पैगाम। दिमाग की सारी कोशिकाओं पर हथोड़े सी पड़ती है घंटी की आवाज। आजकल हर रात चलती है यही कहानी। अकेली जीव, भुतहा मकान, न पड़ोस, न दरबान। स्वप्न और जागरण के संधिस्थल पर एक कविता उनींदी चेतना में रात भर आवा-जाही करती रही 'जब-जब सूना लगे जीवन अपना/तुम मुझे बुलाना/मैं गुंजन बन आऊँगा'

कौन आएगा गुंजन बन? 55 वर्षों के जीवन का यही प्राप्य रहा - खाली घोंसला। सब चेहरे धुल-पुँछ गए। छोटे मन से बड़े काम नहीं होते। मैं बड़ी नहीं बन पायी। शायद यही कहता है, आधी रात का यह अकेलापन।

 

30.1.10

अलबिदा गोवा बगान! 35 वर्षों का साथी! मेरा घर!

तुम्हे उजड़ते देखना दिल को उजड़ते देखने से कम यातनाप्रद नहीं। कितना दर्दनाक होता है दीवारों पर टँगी तस्वीरों को उतारना और जगह की कमी के चलते न रख पाना और न ही फिंकवा पाना, देखते रहना और सोचते रहना। पत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों का एक पूरा अंबार। क्या रखूँ क्या छोड़ूँ? हाथ चीजों को समेट रहे हैं, पर आँखें देख रहीं हैं वर्तमान के उजाड़ के पार। दिमाग सोच रहा है कि इस कहानी को कैसे लिखूँ, रोशनी से या स्याही से?

इस घर ने हमारी तीन तीन पीढ़ियों को पाला था। यह घर मेरे लिए सिर्फ घर ही नहीं था वरन मेरे लिए मेरे कर्मों की कर्मभूमि भी थी, जहाँ मैंने अपने जीवन के साथ भी कई प्रयोग किये थे। जहाँ मैं तपी थी, पली थी और फिर निर्मित हुई थी, जहाँ मेरे स्वप्नों की पहली खेप लहराई, पाला खाई पर इसी वक्त ने मुझे अपने सीमित स्व से बाहर निकाल मार्टिन लूथर की तरह हिम्मत दी और कहना सिखाया - 'I too have a dream'. इसी वक्त ने मेरे जीवन, सोच और विचारों को दिशा दी थी। यहीं खुला था मेरे लिए संभावनाओं का नया आसमान। उम्मीदों का बड़ा संसार। स्मृतियों से सिंचित और भावनाओं से समृद्ध मेरा यह ऐतिहासिक घर जहाँ मैंने अपने पिता को अंतिम विदाई दी। मेरे जीवन में इतना समृद्ध घर अब शायद ही दूसरा बने। चारों उपन्यास मैंने इसी घर में बैठकर लिखे। जाने कितनी कहानियाँ लिखी यहीं। जाने कितनी महत्वपूर्ण पुस्तकें यहीं बैठकर पढी। कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों से भी यहीं मुलाकात हुई, कइयों के चरण भी इस घरमें पड़े।

यहीं आकर मैंने देखी, नक्सलियों की वह पनाहगार लाल गली। जहाँ उत्तर कोलकाता के नक्सली पुलिस को चकमा देकर छिप जाते थे। आज की सिकदर बगान लेन तब 70 के दशक में लालगली के नाम से मशहूर थी। पुलिस मुख्य सड़क पर उन्हें ढूँढ़ती रहती और वे इस सँकरी सी गली में आकर छिप जाते थे। इसी गली में आकर मैंने देखी थी बचपन और यौवन के संधिस्थल पर खड़े एक नक्सली युवक की समाधि, जिसके ऊपर लिखा था 'लाल सलाम' इसी सिकदर बगान लेन में मुझे मिले थे गोपाली दा जो बाद में मेरे उपन्यास 'खुले गगन के लाल सितारे' में मुख्य किरदार बने। जिन्होंने कई वर्षों तक भूमिगत रहते हुए नक्सलवादियों के प्रमुख पत्र 'देशव्रती' का संपादन भी किया। आज भी वे लंगड़ा कर चलते है,पुलिस टॉर्चर के दौरान उन पर थ्री डिग्री हुआ था।

आज पहली बार हलके से महसूस कर रही हूँ विस्थापितों के दर्द को। मेरा तो सिर्फ घर छूट रहा है, देश नहीं, शहर नहीं तो भी मैं कितनी आकुल व्याकुल हो रही हूँ। मन को धीरे से समझाती हूँ, 'न घर तेरा न घर मेरा, दुनिया रैन बसेरा'

 

12.3.10

बेटे की पहली पोस्टिंग चेन्नई, आज मिली यह खबर।

मन आशंकित... कैसे रहूँगी? कोलकाता ने मुझे काट लिया है। और कहते है कि जिसे यह शहर काट लेता है वह फिर कहीं रह नहीं पाता है। क्या भुला पाऊँगी कोलकाता को? मन के आसमान पर भय, आशंका अकेलापन और कोलकाता बिजली की तरह कौंध रहे हैं। कोलकाता, जहाँ खुली मेरी मानस-खिड़कियाँ। जहाँ के बहते जीवन ने सिखाया मुझे जिंदगी और संघर्ष का रिश्ता। जिसने दिखाया मुझे आदमी द्वारा आदमी का शोषण।

अच्छी बात यह है कि कुछ आमंत्रण मिल गए हैं मुझे जिन्होंने इस दुख का गला दबा दिया है।

जम्मू यूनिवर्सिटी का आमंत्रण। दिल्ली से श्री राम सेंटर का भी आमंत्रण। मेरी कहानी 'बस दो चम्मच औरत' का नाट्य रूपांतरण। और भी कई लेखकों की कहानियों का नाट्य रूपांतरण। उदयप्रकाश की कहानी 'राम संजीवन की प्रेमकहानी' का भी।

उखड़े मन को सँभालने के लिए फिर लिया जाए घुमक्कड़ी का सहारा। सोचती हूँ दिल्ली में कहानी का नाट्य रूपांतरण भी देख आऊँ और दो-तीन दिन मन्नू जी के पास भी रह आऊँ। बहुत इच्छा है मन्नू जी को करीब से देखने की... कैसे रचता है एक लेखक अपने को? अपने एकांत को?

 

17.3.10

कल शाम, मानिकतला मंदिर में घूमते घूमते फिर मिली मिसेज बक्सी, 'बस दो चम्मच औरत' कहानी के सूत्र मुझे इनसे ही मिले थे। आभास मिलते ही मैं जुट गयी थी कि कैसे उतरूँ उनके मन कि सीलन भरी अँधेरी सुरंगों में। लेखक से बढ़कर कमीना कोई नहीं होता। उसका बस चले तो मरते आदमी को भी नहीं छोड़े, पूछ ही डाले, कैसा लग रहा है। कल शाम भी उन्होंने मुझे एक अजीब बात बताई। उन्होंने बताया कि अमेरिका में पढ़ रही उसकी बेटी को जब एक फार्म भरना पड़ा तो उसमे माँ के कई कॉलम थे, मसलन :- सेरोगेट मदर, नेचुरल मदर, लीगल मदर, रीयल मदर आदि। मैं भौंचक! कैसी सभ्यता! माँ के भी इतने टुकड़े! लेकिन एक अच्छी बात भी उसी ने बताई, अमेरिका के बेंटन विले नामक एक एकदम से छोटे शहर में सड़क पर उसने एक सरकारी विज्ञापन देखा जिस पर लिखा था 'कृपया गाड़ी धीरे चलाएँ क्योंकि इस एरिया में एक Austistic boy (कुछ कुछ मंद बुद्धि सा) रहता है। मैं मुग्ध, कितनी मानवीय सभ्यता!

 

30.4.10

जबसे 'युद्ध और बुद्ध' कहानी शुरू की है एक ट्रांस में ही रहती हूँ। कुछ आवाजें इस कदर गूँजती रहती है भीतर कि लगता है जैसे मेरी कोई आवाज ही नहीं बची है। सोते-जागते उठते बैठते जैसे वही आवाज करती रहती है मेरा पीछा।

मन विचलित है। यह मानने को तैयार नहीं कि जिंदगी का बोझ किसी पर इस कदर वजनी चट्टान की तरह टूट कर गिर सकता है कि जीने की विवशता के चरम क्षणों में एक माँ को अपने ही जेहादी बेटे को मरवाने में आर्मी की सहायता करनी पड़े कि अपने दूसरे बेटे,जवान होती बेटी, और अधमरे बूढ़े बीमार पति की रक्षा हो सके। मेजर विवेक को मैं बार बार फोन लगाती हूँ। वे झल्ला उठते हैं - कितनी बार कहूँ कि मैं खुद शामिल था उस ओपरेशन में। हाँ हाँ खुद उसकी माँ ने ही हमें बताया था और कहा था कि वो आ रहा है कल, हाँ भई, यही शब्द थे उसके। क्या ऐसे ही चरम क्षण परिभाषित करते हैं इंसान को? नाजी जर्मनी के कोंस्त्रेशन कैंप के बारे में पढ़ा था कि वहाँ मानवीय अनुभूतियाँ इस कदर कुचल दी गयीं थीं कि लोगों के भीतर की आत्मा और आत्मा के भीतर का ईश्वर दोनों ही मर जाते थे थे। एक घटना आज भी कौंधती है जहाँ एक यहूदी बेटा जो कि खुद भी कोंस्त्रेशन कैंप में था उसे अपने बीमार बाप को जो गैस चैंबर में भेज दिए जाने के लिए चिन्हित किया जा चुका था, को कुछ राहत दिलवाने के लिए अपने चाकू से अपने दाँत के ऊपर मढ़े सोने के क्रौउन को उखाड़ कर जालिम वार्डेन को दे देना पड़ा था।

कहानी लिख रही हूँ पर गहरा अविश्वास और अंतर्द्वंद्व कुहासे की तरह आत्मा पर पसरा हुआ है। फिर फोन करती हूँ मेजर विवेक को, 'क्या तुम पुत्र के मार दिए जाने पर भी मिले थे उस परिवार से, उसकी माँ से? कैसे थे वे? कैसी थी उसकी माँ? विवेक कहता है 'हाँ मिला था, जब जब उस गाँव में गश्त लगाता था, उसके घरवालों से भी दुआ सलाम कर लेता था। मैं फिर पूछती हूँ, 'कैसी थी उसकी माँ? वह झल्ला जाता है 'उफ कैसी होगी?' फिर कुछ सोचकर बोलते हैं, 'उसे कठघरे में मत खड़ा करना।'

क्यों लगता है मुझे कि मेजर का यह गुस्सा मुझसे ज्यादा उस सिस्टम के प्रति है जहाँ कुछ भी नहीं कर सकते हैं वे सिवाय ऑर्डर मानने के।

3.5.10

जाने किस मिजाज में राजा ने कहा 'मामा तुम अपने पापा के बारे में बताओ।' मैं अचानक मैं नहीं रही... भीतर देर तक कुछ कँपकँपाता-थरथराता रहा। उदास धुन की तरह भीतर बजते रहे पिता। जीवन से जुड़कर रहना पिता से ही तो सीखा था।

हर दोपहरी पीछे घूम जाती है आँखें। रिश्तों की उन जमीनों पर जहाँ कभी जीवन था, खिलखिलाहटें थी। ऐसा नहीं है कि आज वैसे पल नहीं आते हैं, आते हैं, पर वे पल मेरे लिए नहीं होते हैं। क्योंकि अब मैं वह नहीं रही।

तस्वीर थोड़ी धुँधली चाहे पड़ गयी हो, पर पिता आज भी वहीं खड़े हैं। वैसे ही।

जीवन भर पिता चले, सिर्फ चले, संघर्ष, यातना और हताशा को बूँद बूँद पीते हुए चले। और जब सुस्ताने का, ठहर कर ठंडे झोंको का आनंद लेने का समय आया तो चल दिए, निःशब्द। जीवन की कड़ी धूप में तपे पिता राजस्थान से मात्र सोलह वर्ष की उम्र में कोलकाता कमाने के लिए आये थे। कमाने में ही उनकी सारी उर्जा बह जाती और घर की जिम्मेदारियाँ उन्हें अनचाहे बोझ की तरह लगती थी। 'भूल गए राग,रंग/भूल गए छकड़ी/तीन चीज याद रही/तेल नून लकड़ी।' पिता अक्सर कहते। विशेषकर तब जब पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उनकी जिंदादिली को निगलने लगती।

घनघोर पढ़ाकू पिता। जाने कितनी साहित्यिक किताबों का नाम मैंने पिता के मुख से ही सुना था।

वे गृहस्थी के पचड़े से दूर भागते, पर माँ थी कि उन्हें जीवन और व्यवहार में जबरन खींचती। ताउम्र चलती रही यह खींच-तान।

पर पिता कभी भी वह बन ही नहीं पाए जो वे बुनियादी तौर पर थे ही नहीं। एक घटना आज भी कौंधती है जेहन में। दार्जिलिंग से छोटे भाई के दोस्त उपहार स्वरूप कुछ शो-पीस लेकर आये। जैसे ही खोले उन्होंने पैकेट्स, हम सभी टूट पड़े उपहारों पर। लगे उन्हें छू-छू-कर देखने। पर निर्विकार-निर्लिप्त मेरे पिता पढ़ने लगे उस अखबार को जिसमे लिपटे थे वे उपहार। माँ बताती है कि एक बार कोलकाता में पिताजी के नए बने एक दोस्त पिताजी को बदमाशी से सोनागाछी के लालबत्ती इलाकों मे ले गया। और भाव तोल करने लगा। जैसे ही पिताजी को लगा कि कुछ गलत है वे वहाँ से भाग खड़े हुए। घर आकर पिताजी घंटे भर तक ध्यानमग्न रहे। उस शाम उन्होंने ग्लानिवश कुछ खाया भी नहीं।

व्यवसायी थे पिता, पर कभी भी उन्होंने चमड़ा बनानेवाली, मांस बेचनेवाली कंपनियों के शेयर नहीं खरीदे। कभी भी उन्होंने रेलवे की चोरी का माल नहीं खरीदा। वे मुनाफा में नहीं वरन शुद्ध लाभ में विश्वास करते थे। और यह बात तब की है जब जीवन अभावों की तपती हुई जमीन था। हम एक कमरे में रहते थे, वही हमारा सोने का, पढ़ने का, खाने का और रहने का कमरा था। और पिता सिर्फ 6 पैसे बचाने के लिए सिअलदाह से कॉलेज स्ट्रीट तक (लगभग 2.5 किलोमीटर) पैदल आते थे।

माँ बताती है कि पहली बार जब पिता उन्हें लेकर अपने गाँव आये तो देखा कि माँ ने चश्मा पहना हुआ है। उन्होंने कहा, चश्मा उतार दो। अन्यथा लोग फब्तियाँ कसेंगे कि बहू कितनी फेशनेबल है। माँ ने आनाकानी की, कहा की बिना चश्मे के साफ कैसे दिखेगा। पर पिता ने उनकी एक भी नहीं सुनी।

ऐसे थे हमारे पिता, सिद्धांतों और अंतर्विरोधों से घिरे!

जब तक पिताजी थे मेरी कोई भी कहानी किसी भी प्रतिष्ठित पत्रिका में नहीं छपी थी। जहाँ जहाँ मैं भेजती कहानी वह अविलंब वापस लौट आती। बेबाक पिता मजा लेने से कभी नहीं चूके। एक बार कहा भी 'एक प्रेमचंद थे जिन्हें संपादक बंद कर बैठा देते थे कि कोई कहानी लिख कर दीजिये और एक तुम हो कि कोई छापता ही नहीं है।' उस समय शायद मुझे अखरा था, पर आज सोचती हूँ कि पानी से मिले पानी की तरह कितना सहज और स्वाभाविक था हम पिता-पुत्री का रिश्ता।

जिंदगी में जो कुछ मिला पिता से ही मिला। व्यस्त बेटा मुझे अतीत में डुबो कर खुद काम से निकल गया है, अपने नाना की स्मृतियों की सेवा टहल करने का और अधिक समय शायद उसके पास नहीं है। पर मैं अभी भी तैर रही हूँ। तब आज की तरह अति और गति में नहीं जीते थे हम। तब 6 महीने में एक फिल्म देखते थे हम और फिर आनेवाले 6 महीने तक उसी की बात करते। मजा लेते। फिर काफी सोच समझ कर इधर उधर से पता लगाकर नयी फिल्म के टिकट खरीदे जाते।

अभी जमशेदपुर से आयी मेरे बेटे की मित्र ने डेढ़ दिन में तीन फिल्में देख डाली। मैं हैरान। कैसे देख पायी तुम डेढ़ दिन में तीन फिल्मे? वह हँसी, 'आंटी, समय कम था क्या करती?'

समय कम है इसलिए जीवन जीएँ नहीं, निगल लें। मैं कहना चाहती हूँ, पर कह नहीं पाती।

 

27.4.10

आज भारत बंद। महँगाई के विरोध में व्यापक प्रदर्शन। बंगाल और केरल में इसका जोरदार असर। गाड़ियाँ, यातायात सब ठप्प। कुछ टूरिस्टों को कोलकाता के सियालदह स्टेशन से एअरपोर्ट तक जाना था। कोई यातायात नहीं। 18 किलोमीटर का लंबा सफर और साथ में 150 किलो सामान। कैसे पहुँचे एअरपोर्ट? भारी समस्या। आखिर समाधान भी निकला। जिंदाबाद कोलकाता के हाथ रिक्शा जो पेट्रोल से नहीं, खून से चलते है। पेट की भूख से चलते हैं। मोईन खान और उसके मित्र शेख नुरुल हसन (65) और असमान अंसारी सामने आये - सुबह 8 बजे निकले और कभी तेज तो कभी धीरे चलते चलते 10 बजकर 45 मिनट पर पहुँच गए एयर पोर्ट तक। प्रत्येक को मिले 500/-। चिलचिलाती धूप, दमघोंट उमस और पसीने में तरबतर बदन। मन में डर की कहीं चक्कर खाकर बेहोश ही न हो जाएँ। पर 500/- की एक मुश्त कमाई। सारी मुसीबतें, थकान, चुनौतिया और डर परे खिसक गए। श्रम जीत गया। थक कर चूर होने के बावजूद रिक्शेवालों के चेहरे दमक रहे थे। यह चमक सिर्फ 500/- की ही नहीं थी। चमक थी इस अहसास की कि वे जो कर पाए बड़े बड़े लोग नहीं कर पाए।

 

13.12.2012

चेन्नई या फुरसतों का फाल्गुन। सोचती थी कैसे रहूँगी? क्या करूँगी? बेटा सप्ताह में तीन दिन हैदराबाद। बंद फ्लैट और अपने खोल में ही पोटली, सी पड़ी रहती मेरी काया। आखिरकार समझाया मन को, जहाँ निभे जिंदगी वही घर।

और देखते देखते निकल गया चेन्नई का प्रवास भी वैसे ही जैसे देखते देखते बह गये जिंदगी के 55 वर्ष। विश्वास ही नहीं हो रहा है कि कल राजा और दिव्या हनीमून से वापस घर आरहे हैं। मैंने भी सोचा, चलो आज जिंदगी का उत्सव मनाया जाए। उनका कमरा सजाया जाए। एक राज... दरअसल यह कमरा मैं उनके लिए नहीं अपने लिए ही सजाना चाहती थी। अपने उस कमरे को सजाना चाहती थी जो कभी मुझे शिद्दत से हर रात लुभाता था, पर जिसे जिंदगी मेरे नाम करना भूल गयी थी।

चेन्नई के फूल अपनी सुगंध के लिए मशहूर हैं। सुबह चेन्नई की बसें महकती हैं उन फूलों की महक से जो तमिलियन स्त्री के बालों में झूलते रहते हैं। मैंने अपनी मकान मालकिन से फूलों के बारे में बात की, उसने अपने माली से बात की। तय हुआ की उनका माली बेटे के कमरे को आकर सुगंधित फूलों से महका देगा...

कल सुबह माली फूल दे गया। लेकिन दोपहर के पाँच बज गए। माली नदारद। राजा और दिव्या नौ बजे तक आनेवाले थे।

मैं परेशान, सोचने लगी क्या करूँ कि तभी मेरी मकानमालकिन राज लक्ष्मी जी हँसते हुए आयी और कहा 'माली नहीं आएगा। चलिए हमलोग ही मिलकर सजा देते हैं कमरा।'

मैं फिर हैरान। गजब की व्यस्त कस्टम अफसर राजलक्ष्मी जी और वे सजाएँगी मेरे बेटे का कमरा! मैंने सोचा माली बीमार पड़ गया होगा इसलिए राजलक्ष्मी जी उदारता वश...। लेकिन जब माली के नहीं आने का सही कारण जाना तो मैंने माथा पीट लिया, यह है मेरा भारत महान! माली नहीं आया था क्योंकि उसे अगली सुबह राजलक्ष्मी जी के यहाँ हवन करना था। चूँकि हवन एक पवित्र एवं धार्मिक अनुष्ठान था और सुहाग सेज एक श्रृंगारिक कार्य जिसकी परिणति संभोग में होनी थी। माली नहीं आया था क्योंकि सुहाग सेज सजाने के बाद उसकी पवित्रता और शुद्धता बरकरार नहीं रहती। और इसीलिए डॉक्टरेट राजलक्ष्मी जी ने उनकी जिम्मेदारी सहर्ष सँभाल ली थी। मैं लज्जित और निरुत्तर राजलक्ष्मी जी का चेहरा ही देखती रही। कैसी निगाहें जो जीवन के सौंदर्य और सृजनात्मकता को नहीं देख पाती? जीवन का आदिम राग सुन नहीं पाती? सभ्यता की इतनी सुदीर्घ यात्रा करने के बाद भी हमने कैसे मनुष्य रचे हैं? अभी कुछ दिन पूर्व ही मेरे भतीजे की बहू ने मुझे बड़े ही सहज भाव से बताया था कि उसके पिताजी ने पिछले कई सालों से ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया है। मैं अवाक्! तुम्हें कैसे पता? उसने और भी हैरतअंगेज जबाब दिया। मुझे क्या घर भर को पता है। पिताजी ने ब्रह्मचर्य लेने के पहले दादी से आज्ञा ली और फिर गुरुदेव से व्रत लिया।

क्या? शर्म से सर झुक गया। कैसे घृणित मस्तिष्क हैं हमारे धर्मगुरु? 23 करोड़ लोग देश में रोज भूखे सोते हैं, इतने किसान आत्महत्या कर रहे हैं, कन्याएँ भ्रूण में ही दम तोड़ रही है, बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। देश भ्रष्टाचार में गले गले डूब रहा है, इसकी चिंता नहीं, चिंता है स्त्री-पुरुष के सोने की। उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, सेक्स के भूत ने सभी धर्माचार्यों को एक जैसे ही जकड़ रखा है। क्या करें वे भी, अवचेतन में जब जब काम का कीड़ा काटता है, सेक्स पर पहरा बैठा देते हैं ये।

 

18.8.11

जाने क्यों मुझे लगता है की हम माँ-बेटे कम, आकाश में उड़ती हुई दो पतंगें ज्यादा हैं। मौका मिलते ही हम एक दूसरे से पेंच लड़ाते हैं, काटते हैं, गिराते हैं। जबसे बेटे ने हिंदुस्तान लीवर ज्वाइन किया है। मैं उससे भिड़ जाती हूँ। क्या मेरे मन में डर है कि कोरपोरेट माहौल कहीं जींस ही न बदल डाले मेरे बेटे का? कि कहीं अदृश्य दिशाओं से आती वैभव की चाँदी उसकी सूक्ष्मता, तेजस्विता, और उसके सौंदर्यबोध पर गोबर ही न पोत दे। अत्यधिक सुख सुविधाएँ बर्फ ही न बना दे उसे। मूल्य कितनी तेजी से बदल रहे हैं। कोरपोरेट कल्चर में घुसने तक कितना सीधा साधा था राजा। ऊँची सोच, तड़क-फड़क और दिखावा से कोसों दूर। लेकिन लगता है जैसे आजकल उसने अपने भीतर के सारे सवालों को अफीम पिला कर सुला दिया है, और इसी कारण अपने बॉस के कहने पर अपना मोबाइल बदल लेता है क्योंकि बॉस का तर्क है कि 'तुम अपने जूनियर के लिए एक आदर्श हो, वे तुम्हारे जैसा बनना चाहेंगे लेकिन जब वे देखेंगे कि तुम भी उन्हीं कि तरह साधारण कपड़े, साधारण मोबाइल और सरकारी बस में घूमते हो तो सोचो वे क्यों बनना चाहेंगे तुम्हारे जैसे? क्या प्रेरणा मिलेगी उन्हें तुमसे?' कितनी सतही सोच। सोच कर भी सोच नहीं पाती कि ये देश की क्रीमी लेयर है जो होने से ज्यादा दिखने में विश्वास करती है। मुझे असंतुष्ट और खिन्न देख वह डोर जरा ढीली छोड़ता है और मुझे दूसरी तरह से समझाता है 'ममा कम खर्च करना और देख देख चलना कमजोर आदमियों के तर्क हैं, हम खर्च नहीं करेंगे तो इकोनोमी ग्रो कैसे करेगी?' मैं चुप नहीं रह पाती, आखिर पेंच लड़ा ही देती हूँ। 'बेटा इकोनोमी तब ग्रो करेगी जब हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और उत्पादन क्षमता तब बढ़ेगी जब हम खुद हर क्षेत्र में उत्पादन करेंगे। तभी अधिकतम लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी और माँग में वृद्धि होगी। सिर्फ कुछ लोगों के बेहिसाब भोग से इकोनोमी ग्रो नहीं करेगी। यूँ भी सोचो, यदि धरती का सारा तेल, ईंधन, कपास, खाद्यान, आक्सिजन और हरियाली तुम खुद ही भोग लोगे तो बाकी लोगों के लिए क्या बचेगा? श्रेष्ठ इंसान वे होते हैं जो कम से कम लेकर समाज को अधिक से अधिक वापस लौटा देते हैं।

राजा सोच में डूबा मुझे देखता रहता है। उसकी आँखों में देख रही हूँ मैं एक अधूरी कहानी जो पूरा होना चाहती है। मेरी बात से न तो वह पूरी तरह सहमत हो पा रहा है और न ही असहमत। पर शायद उसे भी लग रहा है मेरी ही तरह कि जिंदगी का मकसद कुछ और है और जिंदगी कहीं और है।

 

10.3.12

विदा चेन्नई!

अँधेरों-उजालों का, बेखौफ घूमती गरीबी का, अमेरिका को मात करती अमीरी का, गिरजाघरों, मंदिरों, फूलों-गजरों, समुद्र और मछुआरों का शहर चेन्नई!

जीवन की तल्ख सच्चाइयों का शहर चेन्नई! अब अगला ठौर मुंबई।

कुछ लम्हे होते हैं जो जिंदगी भर खिंचते हैं, विस्तार पाते हैं। ऐसे ही हैं ये क्षण... चेन्नई से जुदा होने के क्षण।

पर कैसी बिडंबना कि जब आप शहर को समझने लगें, शहर एक फड़फड़ाहट बन आपके भीतर फड़फड़ाने लगे। शहर के छुपे हुए मुखड़े रात की दुल्हन की तरह आपके सामने खुलने लगे। उसकी तासीर को आप आत्मसात करने लगें, उसकी भाषा को सीखने लगें, उससे घुलने मिलने लगें, ठीक तभी आपको फतवा मिले वहाँ से निकलने का।

सोचा था कि यहाँ रहकर यहाँ के मछुआरों पर लिखूँगी, जिन्हें देख लगता है जैसे वे हाड़-मांस से नहीं वरन समुद्री माटी और अँधेरे से मिलकर बने हैं जिनमे से अधिकांश 10वीं शताब्दी के आसपास ईसाई बना दिए गए थे। दक्षिण भारत का पुरोहितवाद और ब्राह्मणवाद इस हद तक क्रूर था कि विश्वास नहीं होता कि एक समय यहाँ दलित स्त्रियों को कमर के ऊपर वस्त्र पहनने की इजाजत नहीं थी। पुरुष घुटनों के नीचे धोती नहीं पहन सकते थे। मछुआरों के बीच यह अंधविश्वास प्रचलित था कि जब तक उसकी पत्नी पतिव्रता और एकनिष्ठ है समुद्र की तूफानी लहरें मछुआरे का बाल भी बाँका नहीं कर सकती है। यानी खुदा न खास्ता मछुआरे को यदि कुछ भी हो जाए तो कठघरे में पत्नी का सतीत्व। सुबह उठते ही यहाँ चारों ओर से वेद-मंत्र सुनाई पड़ते हैं। लोग भोरे-भोरे ही उठ जाते हैं यहाँ। यहाँ की पढ़ीलिखी महिलाएँ भी इतनी कर्मकांडी की जितना समय अपने बच्चों के साथ नहीं बिताती उससे ज्यादा समय मंदिरों में भगवान के साथ बिताती हैं। कितना कुछ था लिखने को पर अफसोस कुछ भी लिख नहीं पायी। हम ऐसे ही आते हैं, यथार्थ से पराजित होते हैं और बह जाते हैं। मैं भी जीवन से घबड़ा कर साहित्य और साहित्य से घबड़ा कर जीवन में भागती रही। देखते देखते वन-पाखी सा उड़ गया समय और आज एक बार फिर खाली होते घर और सूने होते मन को समेटने में लगी हूँ।


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