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निबंध

शब्द, मौन, अस्तित्व
अज्ञेय
संपादन - कन्हैयालाल नंदन


( बेओग्राद (बैलग्रेड) रेडियो से जून, 1966 में प्रसारित वक्तव्य। मूल हिन्दी वक्तव्य के कुछ अंश और कविता के उद्धरण लेखक के स्वर में प्रसारित किये गये थे, पूरे वक्तव्य का सृप्स्की-ख्रावात्सी (सर्बो-क्रोएशियन) अनुवाद पढ़ा गया था।)

मैं क्यों लिखता हूँ? यह प्रश्न अब मैं अपने से नहीं पूछता, क्योंकि पूछना होता तो कम-से-कम तीस वर्ष पहले पूछना चाहिए था। और इसकी तो और भी कम सम्भावना करता हूँ कि दूसरा कोई मुझसे एकाएक यह सवाल पूछ बैठेगा। फिर भी, मन के भीतर कहीं गहरे में, हर लेखक के पास इसका कोई उत्तर होना ही चाहिए; और जब-तब इसकी पड़ताल कर लेना भी अच्छा ही है कि क्या वह उत्तर अब भी सन्तोषजनक है?

ईमानदारी का उत्तर-और ऐसा उत्तर जो दिया जा सकता है-एक ही है। या कि दो हैं, लेकिन दूसरा तो पहले की व्याख्या भर है।

पहला उत्तर है : ‘मैं नहीं जानता कि क्यों।’ और दूसरा : ‘शायद इसलिए कि मैं पागल हूँ।’
क्योंकि लेखक पागल होता ही है। यह कोई बड़ी मौलिक बात नहीं है। लेकिन मौलिकता शायद इस चिरन्तन आविष्कार का ही नाम है कि कला के क्षेत्र में वास्तव में नया कुछ नहीं होता। यहाँ तक कि जो नएपन का आभास देता है वह नए के रूप में तब तक प्रतिष्ठित नहीं होता जब तक कि हम उसमें, अथवा उसके द्वारा, जो कुछ उससे पहले था उसके नए मूल्यांकन का आधार न पा लें और उससे एक अर्थवान सम्बन्ध न स्थािपत कर लें-दूसरे शब्दों में जब तक कि हम उसमें वह न पहचान लें जो कि ‘नया नहीं’ है।

लेकिन अगर मैं इसलिए लिखता हूँ कि मैं जरूर पागल हूँ, और इससे आगे अपने भीतर गहरे से कहीं इस प्रश्न का उत्तर पाना भी ज़रूरी है कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि मैं जानता हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ?

हाँ, हुआ तो। लेकिन जानने और जानने में अन्तर होता है और इसीलिए पाये हुए उत्तर और दिये जा सकने वाले उत्तर में भेद करना आवश्यक हो जाता है।

वास्तव में इन दो उत्तरों के बीच में जो तनाव रहता है वही मुझे लिखने की प्रेरणा देता है। शायद कला मात्र में जो शक्ति सृजन की प्रेरणा बनती है वह यही तनाव है-जाने हुए उत्तर और दिये जा सकनेवाले उत्तर के बीच का तनाव। लेखन इस तनाव का हल या उसे हल करने का प्रयत्न है। नि:सन्देह यह हल अन्तिम नहीं हो सकता, क्योंकि अगर संवेदन है तो नया अनुभव नया तनाव पैदा करता है-ज्ञान के क्षेत्र के विस्तार के साथ जाने हुए उत्तर और दिये जा सकने वाले उत्तर के बीच नई दूरी पैदा हो जाती है।

इसी से हमें लेखक-अथवा कलाकार मात्र-के लिए चिरयात्री का प्रतीक मिलता है। अपने से इतर उस दूसरे की ओर अपनी यात्रा में, वह बीच की दूरी को-दूरी को ही, निरन्तर मिटाता चलता है।-उस दूसरे की ओर अपनी यात्रा में, जिसमें वह जानता है कि उसकी अपनी प्रतिमूर्ति भी है। यह सहज ज्ञान ही उसे यह आस्था देता है कि उस दूसरे तक पहुँचा जा सकता है और उससे सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है-कि उससे समालाप सम्भव है, कि सम्पर्क की एक भाषा अवश्य है, केवल सही शब्द मिल जाएँ तो।

आँगन के पार
द्वार खुले
द्वार के पार आँगन
भवन के ओर-छोर
सभी मिले-
उन्हीं में कहीं खो गया भवन।
कौन द्वारी
कौन आगारी, न जाने,
पर द्वार के प्रतिहारी को
भीतर के देवता ने
किया बार-बार पा-लागन।
(आँगन के पार द्वार)

‘केवल सही शब्द मिल जाएँ तो’ लेखक के नाते, और उससे भी अधिक कवि के नाते मैं अनुभव करता हूँ कि यही समस्या की जड़ है। मेरी खोज भाषा की खोज नहीं है, केवल शब्दों की खोज है। भाषा का उपयोग मैं करता हूँ, नि:सन्देह : लेकिन कवि के नाते जो मैं कहता हूँ वह भाषा के द्वारा नहीं, केवल शब्दों के द्वारा। मेरे लिए यह भेद गहरा महत्त्व रखता है।
भाषा का मैं उपयोग करता हूँ। उपयोग करता हूँ लेखक के नाते, कवि के नाते, और एक साधारण सामाजिक मानव प्राणी के नाते, दूसरे सामाजिक मानव प्राणियों के साधारण व्यवहार के लिए। इस प्रकार एक लेखक के नाते मैं कला-सृजन के माध्यमों में सबसे अधिक वेध्य माध्यम का उपयोग करता हूँ-ऐसे माध्यम का जिसको निरन्तर दूषित और संस्कारच्युत किया जाता रहता है। अथवा उसका उपयोग मैं ऐसे ढंग से करना चाहता हूँ कि वह नए प्राणों से दीप्त हो उठे। ऐसा मैं कैसे करता हूँ या कर सकता हूँ? अपना ध्यान शब्द पर-हमेशा शब्द पर-केन्द्रित करके ही।

नि:सन्देह दूसरी कलाएँ भी वेध्य हैं। इन सभी को व्यापारिक, लौकिक, पापुलर बनाया जा सकता है और निरन्तर बनाया जाता है। लेकिन चित्रकारी किये बिना, गाये बिना, पत्थर या लकड़ी उकेरे बिना भी सामाजिक हुआ जा सकता है; बोले बिना सामाजिक नहीं हुआ जा सकता। भाषा को भी यह चिन्त्य विशिष्टता प्राप्त है कि उसे निरन्तर और अनिवार्य हीनतर संस्कार का शिकार बनना पड़ता है।

शायद ‘हीन’ संस्कार का प्रयोग मैं जैसे कर रहा हूँ उसका कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है। भाषा के बारे में कोई झूठा आभिजात्य या स्नॉबरी मुझमें नहीं है। लेकिन इस बात पर मैं जोर देना चाहता हूँ कि जो विभिन्न प्रक्रियाएँ काम कर रही होती हैं उनमें गुणात्मक भेद होता है। किसी भी कला-माध्यम का जितनी उसकी क्षमता है उससे कम कहने के लिए उपयोग करना उसे घटिया संस्कार देना है, संस्कारभ्रष्ट करना है, उसका वल्गराइजेशन है। कवि का उद्देश्य केवल शब्द की निहित सत्ता का पूरा उपयोग करना नहीं बल्कि उसका जानी हुई सम्भावनाओं के परे तक उसका विस्तार करना है। जैसे साधारण व्यवहार में किसी नए व्यक्ति से परिचित होने पर हम जब कहते हैं कि हम कृतार्थ हुए अथवा मुग्ध हो गये तो हमारा अभिप्राय कुल इतना ही होता है कि हम आशा करते हैं कि यह नया सम्पर्क सुखद अथवा प्रीतिकर होगा; या कि जब हम जो केवल साधारण रम्य है उसे मर्मस्पर्शी अथवा विमुग्धकारी कहते हैं, तब हम इन अर्थगर्भ शब्दों का बहुत ही साधारण अर्थ में सम्प्रेषण के लिए उपयोग करते हैं। दूसरी ओर जिस किसी ने भी अच्छा काव्य पढ़ा है उसने लक्ष्य किया होगा कि कवि शब्दों का न केवल भरपूर सार्थक प्रयोग करता है बल्कि कभी-कभी शब्दों या वर्णों का उपयोग न करके ही अर्थ की वृद्धि करता है-यानी शब्दों का ही अर्थगर्भ उपयोग नहीं, अर्थगर्भ मौन का भी उपयेाग करता है। मुझे हमेशा लगा है कि यही भाषा का श्रेष्ठ कलात्मक उपयोग है-जिसमें न केवल शब्दों के निहित और सम्भाव्य अर्थों का पूरा उपयोग किया जाता है बल्कि उन अर्थों का भी जो कि शब्दों के बीच के शब्दहीन अन्तराल में भरे जा सकते हैं। मैंने जब कहा ‘केवल सही शब्द मिल जाएँ तो’ उसका यही आशय है। सही शब्द वे ही हैं जो उनके बीच के अन्तराल का सबसे अधिक उपयोग करें-अन्तराल के उस मौन द्वारा भी अर्थवत्ता का पूरा ऐश्वर्य सम्प्रेषित कर सकें। इतना ही क्यों, पूर्व की एक परम्परा के उत्तराधिकारी के नाते मैं यहाँ तक कह सकता हूँ कि कविता भाषा में नहीं होती, वह शब्दों में भी नहीं होती; कविता शब्दों के बीच की नीरवताओं में होती है। और कवि सहज बोध से जानता है कि उससे दूसरे तक पहुँचा जा सकता है, उससे संलाप की स्थिति पायी जा सकती है, क्योंकि वह जानता है कि मौन के द्वारा भी सम्प्रेषण हो सकता है।

मुझे तीन दो शब्द
कि मैं कविता कह पाऊँ।
एक शब्द वह :
जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ।
और दूसरा :
जिसे कह सकूँ
किन्तु दर्द मेरे से
जो ओछा पड़ता हो
और तीसरा : खरा धातु
पर जिसको पाकर पूछूँ
क्या न बिना इसके भी काम चलेगा?
और मौन रह जाऊँ।
मुझे तीन दो शब्द
कि मैं कविता कह पाऊँ।

एक समय था जब मैं एक क्रान्तिकारी संगठन का सदस्य था और ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ रहा था; उस युद्ध में मैंने सभी साधनों का उपयोग किया-शब्दों का भी। पिछले महायुद्ध के समय मैं भारतीय सेना के एक सदस्य के रूप में भारत के सीमान्त पर था; भारतीय सेना तब कभी ब्रितानी सेना ही थी। उस समय भी मैंने कई साधनों का उपयोग किया जिनमें क्रान्तिकारी जीवन में प्राप्त किये हुए कौशल भी थे। अवसर आया होता तो और भी साधनों का उपयोग मैंने किया होता। आज मैं दिल्ली से एक राजनीतिक समाचार-साप्ताहिक का संपादन कर रहा हूँ। इनमें से किसी कार्य का भी मुझे अनुशोच या परिताप नहीं है। इनमें से कोई भी कलाकार के जीवन का अनिवार्य अंग नहीं है; पर दूसरी ओर इन कामों में और काव्य-रचना में कोई विरोधाभास भी दीखता है तो मैं अपनी सफाई में नि:संकोच वाल्टर ह्विटमैन की एक उक्ति का सहारा ले सकता हूँ:

मैं अपनी बात का खंडन करता हूँ।
तो ठीक है, मैं अपनी बात का खंडन करता हूँ।
मैं विराट् हूँ : मुझमें विविध समूह समा जाते हैं।

लेकिन विरोध का केवल आभास है, वह वास्तविक नहीं है। वास्तव में उन सब अनुभवों ने मुझे जो मैं हूँ वह बनाया है और अपनी बात कहने का साहस दिया है-अपनी भूलें स्वीकार करने का और अपने विश्वासों को घोषित करने का-यह मानते हुए भी कि ये विश्वास निराधार भी सिद्ध हो सकते हैं और उन्हें बदलना, शोधना या छोड़ भी देना पड़ सकता है। लेखक के नाते मैंने समाज में कोई विशिष्ट स्थान या सहूलियत नहीं चाही है। समाज के एक सदस्य के नाते मैंने स्वतन्त्रता के लिए, सामाजिक न्याय के लिए और मानव-व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिए, विशालतर सामान्य उद्देश्यों की सिद्धि के प्रयत्नों के लिए आग्रह करना अपना कर्तव्य समझा है, कवि के नाते मैंने उस कर्तव्य से मुक्ति कभी नहीं चाही। बल्कि इसके प्रतिकूल कवि के नाते भी मैंने कुछ मूल्यों पर आग्रह करना आवश्यक समझा है। और इन मूल्यों के लिए अपने प्रयत्नों पर किसी तरह की रोक या नियन्त्रण लगाने का समाज का कोई अधिकार मैं नहीं मानता। ये मूल्य और ये प्रयत्न हैं मेरे कला माध्यम और सभी कला माध्यमों की शुद्धि और संस्कारिता के लिए अनवरत प्रयत्न; व्यावहारिकता या प्रत्युत्पन्न लाभ से ऊपर स्थायी नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा-(यह मानते हुए कि ज्ञान-क्षेत्र के विस्तार के साथ नैतिक मूल्य अपने-आप परिवर्तित हो सकते हैं), अनुभूति की प्रामाणिकता, सोचने, मानने, अभिव्यक्त करने, वरण करने और होने अर्थात् अस्तित्व रखने की व्यक्ति की स्वतन्त्रता... सम्पृक्तता (कमिटमेंट) का विवाद और देशों की भाँति मेरे देश में भी होता रहा है और अब भी जारी है। इसकी शायद अभी आवश्यकता भी है क्योंकि अभी शायद बहुत-से लोगों को इसमें निहित प्रश्नों का स्पष्ट निरूपण करना है। लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है, यद्यपि मैं अब भी हर किसी की बात ध्यान से सुनता हूँ और कभी-कभी विवाद में भाग भी लेता हूँ, मुझे लगता है कि अनुभव ने मुझे संघर्ष के शोर और धुएँ से बाहर निकालकर ऐसी जगह पहुँचने का मार्ग दिखा दिया है जहाँ से मैं परिवेश को भी देख सकूँ, और साधनों और उपकरणों का अधिक सोद्देश्य उपयोग कर सकूँ। लेखक न केवल असम्पृक्त नहीं होता बल्कि उसी सम्पृक्ति दोहरी होती है-वह निरन्तर दो मोर्चों पर लड़ता है। यह तो सम्भव है कि वह कभी एक मोर्चे पर और कभी दूसरे मोर्चे पर बल संग्रह करे; लेकिन किसी एक मोर्चे को छोड़ देने में वह भारी जोखिम उठाएगा।

बात को यों कहने में लग सकता है कि लेखक की परिस्थिति बड़ी संकटपूर्ण और अप्रीतिकर है। वास्तव में ऐसा नहीं है। वास्तव में उसकी परिस्थिति अत्यन्त रुचिकर और रसमय है। मुझे एक पौराणिक दृष्टान्त याद आता है जिसका समकालीन अर्थ भी है बल्कि जो ‘कन्दिस्यों यूमेन’-मानव नियति-का उसके आधुनिक पश्चिमी अस्तित्ववादी निरूपण की अपेक्षा कहीं अधिक सच्चा प्रतिबिम्ब है।

बाघ से बचने के लिए एक मनुष्य पेड़ पर चढ़ता है और उसकी दूरतम शाखा तक पहुँच जाता है। उसके बोझ से शाखा झुककर उसे एक अन्धे कुएँ में लटका देती है। ऊपर दो चूहे शाखा को काट रहे हैं, नीचे कुएँ में अनेक साँप फुफकारते हुए उसके गिरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस अत्यन्त संकटापन्न परिस्थिति में वह देखता है कि कुएँ की जगत् से घास की एक पत्ती उसकी ओर झुकी हुई है और उसकी नोक पर मधु की एक बूँद काँप रही है। वह जीभ बढ़ाकर मधु चाट लेता है-और कितना सुस्वादु है वह मधु...

कितना सुस्वादु, अनिवर्चनीय स्वादिष्ट मधु... हम सभी ने, प्रत्येक ने अपने अलग ढंग से उस मधु का स्वाद जाना है जो कि हमारा जीवन है। लेकिन मैं समझता हूँ कि जिन्होंने मधु के साथ-साथ अपनी अवस्थिति का भी आस्वादन किया है उन्होंने अस्तित्व का गम्भीरतर अनुभव प्राप्त किया है, क्योंकि उनके लिए अवस्थिति का स्वाद भी मधु के स्वाद का एक अंग बन गया है। और उनके लिए मधु के प्रति सम्पृक्ति में अवस्थिति के साथ सम्पृक्ति (कमिटमेंट) भी अनिवार्यतया निहित है। और दृष्टान्त का सार तो यही है कि यह (अस्तित्ववादी मुहावरे की) ‘चरम परिस्थिति’ कोई ऐसी चरम परिस्थिति नहीं है, क्योंकि वह सार्वलौकिक है, साधारण है। महत्त्व की बात इसके प्रति चेतन होना ही है : पहचान होते ही व्यक्ति की अवस्थिति व्यापक सार्वलौकिक अवस्थिति से एकात्म हो जाती है और हमारी तात्कालिक चिन्ताएँ उस एक चरम चिन्तन में परिणत हो जाती हैं जो कि आधुनिक व्यक्ति के लिए आस्था, विश्वास, धर्म या उसे और जो कुछ भी नाम दे दें उसका पर्याय है-वह ठोस आधारशिला जिस पर वह मूल्यों की इमारत खड़ी करता है-इस आशा के साथ ही कि वे टिकाऊ सिद्ध होंगे।

भीड़ों में
जब-जब जिस-जिससे आँखें मिलती हैं
वह सहसा दिख जाता है
मानव :
अगार-सा-भगवान-सा
अकेला।
और हमारे सारे लोकाचार
राख की युगों-युगों की परतें हैं।


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