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कविता

अस्पताल में पिता
रविकांत


पिता अस्पताल में हैं
अस्पताल है बगल के शहर में
अब तक आ-जा रहे थे हम सब
अब सिर्फ जा रहे हैं वहाँ

नब्ज डूब रही है

पिता हिम्मती हैं और जुझारू
उनका अंतिम प्रश्न
क्रिकेट के स्कोर को लेकर था
पर अब अर्धचेतना में, वे
हमें अपनी बाँहों में जकड़ कर
कुछ और भी कहना चाहते हैं

उनकी आँखों पर हमें नाज था
वे चलती कलम को देख कर
डाक्टरों का नुस्खा पढ़ लेती थीं
उनकी आँखों में अब सिर्फ
हमारी छायाएँ हैं

माँ पिता के पास ही हैं
उन्हें भी आभास हो गया है
कि अब उनके बच्चों को
'बेटवा' कह कर पुचकारने वाला नहीं रहेगा
कि अब हमेशा के लिए
वह मित्र-विहीन हो रही है

मृत्यु का तीर चल चुका है
उसकी विजय निश्चित है
हमने मान ली है अपनी हार
दे दी है हमने
मृत्यु का जश्न मनाने की इजाजत
(जिसे भी चाहिए हो वह)

भेज दिए हैं हमने लाव-लश्कर इधर से
कि जाओ और प्रार्थना का ढोंग करो
जब तक कि
मृत्यु का अट्टहास न हो
और जीवन का सूर्य
बिल्कुल ही बुझ न जाय

पिता अभी जीवित है यद्यपि
एक ही रात में
सीख लिया है हमने
पिता के बिना जीना

हर उस जगह में
जहाँ पिता की ठोस देह
निश्चय के साथ अड़ी थी
हमने अपना हाथ-पाँव-मुँह
कुछ न कुछ लगा दिया है
या फैसला कर लिया है
कुछ न कुछ भिड़ा रखने का वहाँ

फिर भी
जो खाली जगहें छूटी जा रही हैं
(वह पिता का अस्थिशेष है
जो जलाए नहीं जलेगा)

उन्हें मृत्यु के आगे समर्पित करना होगा
उपेक्षापूर्वक, हमने मन बना लिया है
हमें इंतजार है
पिता का नहीं, उनकी देह का
इस बीच मृत्यु को आना है

हमें उसका इंतजार नहीं है
अभी पिता जीवित हैं

 


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