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विमर्श

अथ सवर्ण स्त्री प्रति-आख्यान
गरिमा श्रीवास्तव


सामान्यतः पाठकों की रुचि कथासाहित्य से ज्यादा आत्मकथाओं में होती है ,क्योंकि आत्मकथा से सत्य और प्रामाणिक अनुभवों की गूँज सुनाई देती है| उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में दो अलग भारतीय भाषाओं में लिखी गई आत्मकथाएँ ‘आमार जीबन’ (बाँग्ला) और ‘आत्मचरितमु’ (तेलुगु) का पाठ विश्लेषण क्यों अनिवार्य बन पड़ा है, इसका उत्तर स्त्री आत्मकथाओं की सैद्धांतिकी के व्यावहारिक पक्ष से संबद्ध है। आज पश्चिम और पूर्व दोनों जगहों पर लैंगिक अध्ययन-केन्द्रों, क्षेत्रीय एवं तुलनात्मक अध्ययन केन्द्रों में ऐसे टेक्स्ट की माँग जोर पकड़ चुकी है जो बदलते शैक्षिक आग्रहों की पूर्ति कर सके। ऐसा ‘टेक्स्ट’ जो व्यक्ति और समाज के विविधमुखी अनुभवों को प्रामाणिकता में प्रस्तुत करे। स्त्री आत्मकथा-आलोचना के लिए जरूरी है कि आत्मकथाओं के ‘टेक्स्ट’ खोजे जाएँ, पुराने ‘टेक्स्ट’ का पुनर्पाठ किया जाए और परस्पर असम्बद्ध दिखने वाली कड़ियों को एक जगह रख कर देखा जाए। ‘आत्मकथा’ में संबंधों का परिविस्तार प्रायः रचनाकार, उसके आत्मीयों-संबंधियों तक ही सीमित होता है। फिर भी, जिन अनुभवों से समाज की छोटी-बड़ी अस्मिताओं के सामूहिक अनुभवों का निर्माण होता है, उनको देखने के लिए ‘आत्मकथाएँ’ महत्वपूर्ण होती हैं। विशेषकर स्त्री के आत्मकथ्य का विश्लेषण उसका समाज, पीड़ाएँ, चोटें, लिंगभेद, मनोसामाजिकी, भाषा भंगिमाओं की विशिष्टता को सामने लाने में मदद करता है। बाँग्ला की पहली स्त्री आत्मकथा ‘आमार जीबन’ और तेलुगु की पहली स्त्री आत्मकथा ‘आत्मचरितमु’ के टेक्स्ट का विश्लेषण दो भिन्न प्रदेशों में, भारतीय नवजागरण के दो अलग पड़ावों पर समाज सुधार आंदोलनों की भूमिका, स्त्री की स्थिति, विशेषकर ब्राह्मण सवर्ण स्त्री, जो सतही तौर पर समृद्ध-तृप्त है और स्त्री रचनाकार की जीवन-यात्रा की अभिव्यक्ति, संस्कृति-दर्शन-आत्म के सामाजिक संदर्भ की प्रकृति और वर्गीय अध्ययन की दृष्टि से दिलचस्प हो सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शती के प्रथमांश में प्रकाशित भारतीय आत्मकथाओं के बरअक्स इन्हें रखने से एक पूरी विस्मृत साहित्यिक परम्परा हमारे सामने जीवन्त हो उठती है। ये आत्मकथाएँ व्यक्ति और समाज के बीच की दरारों को दिखाती हैं। ये दरारें काल और समय के साथ परंपरा और प्रचलन की, सत्य और तथ्य की, व्यवहार और विमर्श के बीच के अन्तराल को चिह्नित करती हैं। स्त्री आत्मकथाओं ने इधर हाल के वर्षों में एक बड़ा पाठक-वर्ग तैयार किया है। भारतीय संदर्भ में, साहित्येतिहास के आधुनिक युग की पहली कही जाने वाली अलग-अलग भाषा में लिखी गई ये दो आत्मकथाएँ पढ़ते समय हमें पता लगता है कि कैसे सामाजिक अभ्यास अपनी पूरी तात्कालिकता और संपूर्णता के साथ एक उत्तेजक अनुभव में रूपांतरित हो जाते हैं और तब स्त्री का अनुभव सिर्फ एक व्यक्ति का अनुभव नहीं रह जाता। वह सामाजिक संस्था के अनुभव में रूपांतरित होकर सार्वभौमिक हो जाता है। बगैर कहे भी स्त्री का वक्तव्य राजनीतिक हो जाता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक भारत की नव्य-पितृसत्तात्मक व्यवस्था से ‘आमार जीबन’ और ‘आत्मचरितमु’ अपनी-अपनी शक्ति सीमा में टकराती हैं। जॉर्ज गस्टोर्फ ने लिखा था - ‘किसी ऐसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जहाँ चेतन और आत्म अपने बारे में ठीक तरह से बात नहीं करते वहाँ आत्मकथा लेखन संभव नहीं।’ (कंडीशनंस एंड लिमिट्स ऑफ ऑटोबायोग्राफी, जॉर्ज गस्टॉर्फ,ऑटोग्राफी : एस्सेज थियोरेटिकल एंड क्रिटिकल’, जेम्स ओल्नी (सं.) में, पृ. 28) आश्चर्यजनक रूप से भारतीय पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के औपनिवेशिक दौर में भिन्न-भिन्न भाषाओं को किसी तरह लिख-पढ़ सीख पाने वाली दो स्त्रियाँ, अलग-अलग कालखंडों में (बाँग्ला में राससुंदरी देवी सन 1868 और तेलुगु में सत्यवती की आत्मकथा सन 1934 में लिखी गई) अपनी कथा लिख रही हैं, दोनों स्त्रियाँ भारतीय सामाजिक वर्ण व्यवस्था की उच्चतम श्रेणी से संबद्ध हैं, सवर्ण हैं, लेकिन स्त्री होने के कारण दलित भी। एमिली डिकिंसन ने कहा था - ‘सच बोलो लेकिन थोड़ा-तिरछा करके। सीधे-सीधे सच बोलना भारी पड़ सकता है।’ इसी को कृष्णा हठी सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘विद नो रिग्रेट्स’ में अपनी भतीजियों को, प्रकारान्तर से स्त्रियों को, सलाह दी थी, ‘तुम निःसहाय दिखाई पड़ो, लेकिन सक्षम रहो। तब प्रत्येक व्यक्ति तुम्हारी सहायता के लिए आगे बढ़ेगा और यदि कभी कोई तुम्हारी सहायता के लिए आगे नहीं भी आता, तो भी तुम अपनी देखभाल स्वयं कर सकती हो।’

सच को थोड़ा टेढ़ा करके बोलने की कला राससुंदरी देवी और सत्यवती को सीखने की आवश्यकता नहीं थी। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को अपने अस्तित्व की रक्षा के तमाम उपाय बचपन से ही घुट्टी में पिलाए जाते हैं। सुधा मजुमदार ने आत्मकथ्य में अपनी माँ द्वारा सिखाए मंत्र के हवाले से बताया है कि पिता स्वर्ग है, पिता ही धर्म है, पिता को प्रसन्न करने से परमपिता प्रसन्न रहते हैं... विवाह के बाद मंत्र वही रहता है, बस ‘पिता’ का स्थान ‘पति’ ले लेता है।

एक

राससुंदरी देवी की ‘आमार जीबन’ (आमार जीबनके पहले भाग का प्रारूप सन 1872 ई० में और दूसरा भाग 1901 में प्रकाश में आया। साहित्येतिहास में राससुंदरी की आत्मकथा के उल्लेख अथवा राससुंदरी देवी की जन्मतिथि का अभाव है।) को औपनिवेशिक भारत में सवर्ण स्त्री के बयान के रूप में देखा जाना चाहिए, जहाँ लड़कियों के विवाह की आयु 10-12 वर्ष थी। राससुंदरी देवी का जीवन और लेखन एक-दूसरे के लिए बहुत महत्व रखते हैं। वह 1813 में पबना जिले के पोतजिया ग्राम में पैदा हुईं। बारह वर्ष की उम्र में विवाह और पच्चीस वर्ष की अवस्था तक वह बारह संतानों को जन्म दे चुकी थी। घर-परिवार की व्यस्तता और पारिवारिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए चोरी-छिपे पढ़ना-लिखना सीख लिया और धार्मिक ग्रंथ पढ़ने लगीं - ‘घर में कोई कागज पड़ा रहता था तो उसकी तरफ देखती भी नहीं थी कि कहीं लोग यह न कहें कि वह पढ़ रही है। प्रार्थना करती थी कि हे ईश्वर! मुझे पढ़ना सिखा दो।’ रसोईघर में छुपा कर वह किसी तरह अक्षर मिला-मिला कर पढ़ती हैं, परिवार के सदस्यों को हर संभव तरीके से प्रसन्न रखने का प्रयास करती हैं। घरेलू व्यस्तता के कारण कभी-कभी भोजन भी नहीं खा पातीं, सम्पन्न ब्राह्मण परिवार की बहू और बाद में ‘गृहिणी’ की उपाधि की कीमत कड़े परिश्रम से चुकाती हैं। वर्षों अपने मायके नहीं जा पातीं, यहाँ तक कि माँ के मरने पर भी, उनका जाना नहीं हो पाता - ‘‘मैं अपने घूँघट के भीतर रो लेती थी और कोई जान नहीं पाता था।’’ अपने जीवन के बारे में राससुंदरी लिखती हैं - ‘‘पाँच-छह वर्षों तक कोई विशेष स्मृति नहीं है। जब मेरी उम्र सात या आठ हुई तो बुद्धि आनी शुरू हुई। बारह वर्ष की उम्र में विवाह हुआ, छह वर्षों तक नवेली दुल्हन रही। इसे चमत्कार ही कहेंगे कि मेरे शरीर से इतनी चीजें बाहर निकल आईं और मुझे उनके कारण के बारे में कुछ भी मालूम नहीं। धीरे-धीरे मैं बूढ़ी होती गई, मेरा शरीर झूलता गया, ढीला पड़ता गया। मेरा जन्म 1813 में हुआ 1872 में यह आत्मकथा प्रकाशित हुई। अब मैं 88 वर्ष की हुई, अचानक सब कुछ बदल गया, मेरा शरीर, मेरा दिमाग, आदतें - पहले से नितान्त विपरीत। इस बीच 1875 में मेरे कर्त्ता स्वर्ग सिधार गए। स्वर्णमुकुट मुझसे छिन गया। लेकिन मुझे इसका कोई पछतावा नहीं हैं, ईश्वर जैसे चाहे मुझे रखें।’’

राससुंदरी देवी अपनी आत्मकथा में बार-बार ईश्वर की दयालुता, कृपालुता की चर्चा करती हैं। उन्हें बराबर इस बात का एहसास है कि उनका समाज, स्त्री का पढ़ना-लिखना सहज ही स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए यदि अपनी जीवन कथा पर ईश्वर कृपा या पवित्र ग्रंथ का मुलम्मा जरूरी है, इसके अभाव में पाठक उनकी रचना को ‘संभवतः’ स्वीकार नहीं करेंगे। तत्कालीन बंगाली समाज में स्त्री की साक्षरता स्त्री के विपक्ष में समझी जाती थी। आशापूर्णा देवी की कथाकृति ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ इसे बहुत अच्छी तरह अभिव्यक्त करती है। ईसाई मिशनरियों के सकारात्मक प्रयासों को रूढ़िवादी परिवार संदेह की दृष्टि से देखते थे। समाज के इस अतिवादी, दमनकारी रवैए की मुखालफ़त करना एक निहायत साधारण घरेलू स्त्री के लिए संभव नहीं था, ऐसे में राससुंदरी की आत्मकथा का प्रकाशन अदम्य साहसिक कार्य था। उन परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना जरूरी है, जिनमें राससुंदरी देवी ने आत्मकथा को अभिव्यक्ति की विधा के रूप में चुनने का निर्णय लिया। (आमार जीबनसे पहले के आत्मकथ्यों में तीन उल्लेखनीय हैं - देवेन्द्रनाथ ठाकुर (स्वरचित जीवन चरित), दीवान कार्तिकेयचंद्र (आत्मजीवन चरित) और राजनारायण बोस (आत्मचरित), जिसका अंग्रेजी में An Account of Myself शीर्षक से अनुवाद हुआ। शारदासुन्दरी ने संस्मरण लिखे जो Tale to Myself शीर्षक से अनूदित हुए। ध्यातव्य है कि ये सब प्रसिद्ध और विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी में आते थे। देवेन्द्रनाथ ठाकुर ब्रह्म समाज और सुधार आंदोलन में अगुआई के लिए, शारदा सुन्दरी देवी केशवचन्द्र सेन की माँ केरूप में , कार्तिकेय चंद्र सेन एक बड़ी रियासत के प्रबंधक और राजनारायण बसु प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता और लेखक के रूप में स्थापित थे।) अन्तःसाक्ष्य बताते हैं कि बाँग्ला में चैतन्य महाप्रभु की पहली जीवनी ‘‘चैतन्य भागवत’’ देखकर राससुंदरी में पढ़ने-लिखने की लालसा जगी। राससुंदरी ने जोड़-जोड़कर लिखना सीखा, इस पढ़ना-लिखना सीखने की यात्रा के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन चैतन्य के जीवन पर जितनी पुस्तकें एक समृद्ध परिवार में उपलब्ध हो सकती थीं सबको पढ़ डाला। आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ने का प्रभाव निश्चित रूप से उनके लेखन पर भी पड़ा। वह स्वयं को ‘जिताक्षरा’ कहती हैं - वह जिसने अक्षर की आत्मा को चीन्ह लिया हो। राससुंदरी देवी को लगता है कि कृष्ण और चैतन्य यानी आराध्य और भक्त जैसा संबंध ही उनका भी ईश्वरीय सत्ता से है और ईश्वर ने अन्यान्य कष्ट देकर उनकी भक्ति की परीक्षा की है। परंतु हिन्दूवादी शास्त्रीय अवधारणाएँ आत्मसात कर उन्हें अभिव्यक्त करना मात्र, राससुंदरी का उद्देश्य नहीं है। आत्मकथा को आध्यात्मिक बाना पहनाए जाने के बावजूद रचनाकार अपने जीवन संघर्ष में आस्था, जीवन शक्ति की खोज कैसे करती है - यह देखना महत्वपूर्ण है। अपनी पीढ़ी की पहली स्त्री रचनाकार ‘आत्मचेतना’ की अभिव्यक्ति के लिए कौन-सा औजार इस्तेमाल कर रही थी, जिसे गृहस्थी चलाने का साधन, परिश्रमी देह, अनन्त सन्तानसंभवा से परे कुछ न समझा गया हो, वह स्वयं को देह से परे और देह से ढँके मन की परतों को उघाड़कर देखने के लिए आमंत्रित करती है। परंपरा से आत्माभिव्यक्ति के जो भी माध्यम उसे उपलब्ध हैं - जैसे रोना, गाना, व्रत, पूजा, ईश्वरार्चन आदि, वह उन सब का अतिक्रमण और इस्तेमाल दोनों करती है। लिखना-पढ़ना उसका क्षेत्र नहीं, इसलिए परंपरागत भूमिका और छवि दोनों को बनाए रखते हुए उसके सामने आत्माभिव्यक्ति की चुनौती है। राससुंदरी की भाषा देखकर ऐसा नहीं लगता कि यह एक नवसाक्षर का प्रथम प्रयास है। अनुमान लगाया जा सकता है कि या तो उन्होंने लेखन का निरंतर अभ्यास किया था (हालाँकि उनके नाम से कोई और रचना हमें मिलती नहीं) या उनके लिखे हुए को बाद में चलकर किसी ने सँवार-सुधार दिया हो। कहीं-कहीं उनकी भाषा बिल्कुल बौद्धिक विमर्श या चिन्तन की मुद्रा लिए हुए है। ज्यादातर स्थलों पर ‘आमार जीबन’ की भाषा तत्कालीन पुरुष रचनाकारों जैसी ही है। यह गौरतलब है कि बंगाल में पुरुषों की गद्य रचना और स्त्री लेखन में बहुत ज्यादा अन्तराल नहीं रहा। (बाँग्ला चरित साहित्य - 1801-1941, देवीपद भट्टाचार्य, कोलकाता, 1964, पृ० 79-81)

राससुंदरी ने आश्चर्यजनक रूप से आत्मकथा में सनसनीखेज प्रसंगों का जिक्र नहीं किया। स्वप्न-दर्शन, मृत्यु के पूर्व ‘संज्ञान’, पुत्रों का मृत्यु-शोक इत्यादि दृश्यों के अतिरिक्त आत्मकथा के पहले भाग में वे सिर्फ अपनी कथा कहती हैं - बचपन में एक भयातुर बच्ची, दस वर्ष की उम्र तक आते-आते प्रशंसा की इच्छा से गृहस्थी का समूचा कार्य सीख लेना, परिवार-संबंधियों में उनकी तारीफ, इन सबका जिक्र बार-बार आता है। दूसरे भाग की अपेक्षा पहले भाग में संवादधर्मिता ज्यादा है। साक्षर होने की घटनाओं की प्रस्तुति में तर्क और कौशल दोनों हैं। लेकिन ठीक इसी के बाद वे वैधव्य की घटना पर पहुँच जाती हैं। वृद्धावस्था, स्वप्न-श्रवण, पुत्र शोक, ईश्वरीय अनुरक्ति जैसे विविध प्रसंग संवेदना को घेर लेते हैं। ऐसा लगता है कि जिन घटनाओं की जरूरत थी, या जिन प्रसंगों को कहना सार्थक लगा, उन्हीं को ब्यौरेवार ढंग से लिखा गया है, शेष को यूँ ही निपटा दिया गया है। यहीं आकर ‘आत्मकथा’ का एकान्वित प्रभाव नष्ट हो जाता है। यहाँ से वे स्मृति के एक-एक परमाणु की शिनाख्त करती दिखाई देती हैं। यहाँ घटनाओं और उनके भीतर छिपे अर्थ संदर्भ का पारस्परिक संबंध विश्रृंखलित हो जाता है। छोटी-मोटी घटनाएँ उलझ-सी जाती हैं और जीवन के प्रति एक सामान्य-सी समझ रचनाकार की दृष्टि को आच्छादित कर लेती है। कई बार जीवन के आदि और अन्त का क्रम गड्डमड्ड दिखाई देता है। लेकिन इसे वृद्धावस्था के स्मृति-भ्रम के रूप में न देखकर नूतन परावर्तन के रूप में देखा जाना चाहिए। लिखना-पढ़ना सीखना राससुंदरी देवी के समूचे जीवन की चरम उपलब्धि है। साक्षर होते ही रचनाकार का विश्वास, उसकी बौद्धिकता, उसका परिश्रम और स्त्री होने की पीड़ा - सब संपृक्त हो जाते हैं। भविष्य बिल्कुल प्रत्यक्ष हो जाता है। लिखना सीखकर वह जीत गई है - जीवन के तमाम संघर्ष, बाधाएँ, दुख, अकथ वेदना पर, परिश्रम और लगन ने विजय पाई है। पाठ के भीतर छिपा रहस्य जैसे उजागर हो गया है। स्त्री जो कहना चाहती थी कह चुकी है - अब पाठ भी रिक्त हो गया है। रचनाकार का उद्देश्य पूरा हो गया है, अब जो कुछ बचा है वह घटनाओं का दुहराव भर है। जीवन के उत्तर पक्ष की घटनाओं का भौतिक पक्ष यहाँ गौण है। अब सिर्फ अर्थ विस्तार की आवश्यकता रह गई है, जिसके लिए जीवन के किसी भी मोड़, किसी भी बिंदु, ईश्वरीय चरित्र के किसी प्रसंग से कोई भी उद्धरण दिया जा सकता है। अब वह अपना जीवन पूरी तरह ईश्वर को समर्पित करती हैं, कहीं-कहीं सामाजिक प्रथाओं, साक्ष्यों का विरोध भी करती हैं, समाज की रूढ़ प्रथाओं और दुखद परिणामों का उल्लेख भी करती हैं। इन सबके दौरान रचनाकार कई साहित्यिक विधाओं का इस्तेमाल करती है। संदर्भ, उद्धरणों के साथ-साथ कविता, कहानी, बहस कई विधाएँ साथ-साथ चलती हैं। जैसे-जैसे पाठक आत्मकथा पढ़ता चलता है, यों लगता है कि एक आधुनिक सोच की रचनाकार ईश्वरीय सत्ता और आध्यात्मिक दर्शन की ओर उन्मुख होती जा रही है। कहीं लंबे आत्मालाप हैं, कहीं अत्यंत आत्मीय ढंग से पाठक को संबोधित करती हैं, कहीं-कहीं ईश्वर को सीधे-सीधे संबोधित करती हैं। पूरी आत्मकथा में इस सचेतनता के प्रमाण हैं कि रचनाकार मुद्रित माध्यम से अपनी बात पाठक के सामने पहुँचा रही है। कहीं-कहीं आत्मस्वीकार की मुद्रा भी दिखाई देती है। उसे पूरा एहसास है कि वह पहली स्त्री है जो बांग्ला में ‘आत्मकथा’ लिख रही है। संयुक्त परिवार व्यवस्था जिसमें ‘गृहिणी’ देवी है या दासी। नहीं है तो केवल ‘मनुष्य’। जूता सिलाई से लेकर चंडीपाठ के काम उसके पास हैं। नहीं है तो केवल ‘समय’ - कभी-कभी इतना भी नहीं कि वह भोजन कर सके। सब को खिला चुकने के बाद वह बच्चों को सुलाती है, उनके सो जाने के बाद भात की थाली खींचकर बैठती है तो बच्चा जग जाता है, पति का अनुशासन कड़ा है। स्त्री धर्म का तकाजा है कि पति की नींद में बच्चे के रुदन से खलल न पड़े। कुल की मर्यादा का दायित्व इतना है कि दाई-नौकरों के सामने वह भोजन नहीं कर सकती।

सवर्ण स्त्री के कष्ट की महागाथाएँ अनन्त हैं, पर मूक। वह ‘कुलनारी’ है - सामान्या नहीं। उससे जितने श्रम की अपेक्षा की जाती है - उतना श्रम वह कर पाई, यह ‘ईश्वरीय चमत्कार’ से कम है क्या! दो-दो दिन भूखी रहने पर भी वह स्वस्थ रह पाई, इसके पीछे ‘ईश्वर कृपा’ नहीं तो और क्या है? राससुंदरी का व्यंग्य-बोध यहाँ देखने लायक है। अन्त में राससुंदरी लिखती हैं, ‘मैं चाहती हूँ पाठक इस सबको जाने।’ प्रतिदिन प्रातः चार बजे से रात्रि बारह बजे तक निरन्तर श्रम किसी यातना से कम नहीं। श्रम में, सेवा में, कर्त्तव्य में कोई व्यतिक्रम नहीं, ‘अच्छी बहू’, ‘कुलीन नारी’ के विशेषणों से सुसज्जित स्त्री, यातना का स्मरण अपनी वृद्धावस्था में कर रही है - यातना का प्रत्याख्यान यातना से कम नहीं इसलिए घरेलू जीवन की दिनचर्या के एकाध दिनों की चर्चा वह पर्याप्त समझती है। लिंगाधृत मानसिकता समाज के प्रत्येक वर्ग में स्त्री को पीड़ा और यातना के अनुभव देती है - यहीं पर ‘कुलीन’ स्त्री का आख्यान सामान्य स्त्री के आख्यान में बदल जाता है। वह कहीं-कहीं एकालाप करती है, जिसमें उसका आत्मविश्वास ‘ईश्वर’ के नाम से अभिव्यक्त होता है। अपना सुख-दुख ईश्वर को समर्पित कर देना एक ढंग से अपने एकाकीपन की अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर वैष्णव धर्म में पाई जाने वाली दीनता का प्रभाव भी। ईश्वरीय सत्ता ही उसके निकट अपने किए हुए उचित-अनुचित के निर्णय की क्षमता से संपन्न है, कोई और नहीं।

‘आमार जीबन’ में राससुंदरी देवी एक ऐसी रचनाकार के रूप में उभरकर आती हैं, जिसकी एक स्वतंत्र और निजी सोच है - मनःसंसार है। बचपन से ही उसका अपना संसार है, जिसके बारे में उसकी माँ भी नहीं जानती। माँ ने अनजाने में उसके पूरे व्यक्तित्व को भयाक्रांत कर दिया, उसने मन की बात कभी कही नहीं। विवाह के बाद अपरिचित घर, व्यक्ति, परिवेश का भय सबकुछ आँसुओं के रास्ते बहता है- उसके मन को समझने वाला कोई नहीं। यहाँ तक कि ‘पति’ से भी उसे डर लगता है - उन्हें वह ‘कर्ता’ कहकर सम्बोधित करती है - वह पति के घोड़े तक से भय खाती है। इतनी डरपोक स्त्री पढ़ना-लिखना सीखना चाहती है, बड़े-बुजुर्गों की नसीहत के खिलाफ। अपनी इच्छा के बल पर वह पुस्तकों के निषिद्ध जगत में प्रवेश कर जाती है, चुपचाप, जब कि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह घर-गृहस्थी के जंजाल में खोई रहे और अपने जीवन को सार्थक समझे। ये उसका नितांत निजी चुनाव है, जिसमें कोई सहायक नहीं - स्वयं को देखने का, तलाशने का निजी नजरिया। पूरे जीवन में एक बार ही वह पति की अनुपस्थिति में एक कानूनी निर्णय लेती है, लेकिन प्रतिक्षण डरी हुई रहती है - ‘कर्ता’ क्या कहेंगे। चैतन्य भागवत का एक पन्ना चोरी से फाड़ लेती है, बचपन में सीखे अक्षरज्ञान की स्मृति को पुनरुज्जीवित करती है - यह सब करती है सबसे छुपकर। चूल्हे के पास वह पन्ना छुपा लेती है - घूँघट की ओट में अक्षर मिला कर पढ़ने का प्रयास करती है। पूरे समाज को शिक्षा देने वाले ब्राह्मण वर्ग की स्त्री की विवशता प्रत्यक्ष है। इस विवशता की शृंखला तोड़ने के लिए उसे अपने मानसिक क्षितिज का परिविस्तार करना होगा - यह तलाश उसकी अपनी है, बचपन में राससुंदरी को ‘अच्छी लड़की’ की उपाधि मिली क्योंकि वह खेल-कूद छोड़कर एक लाचार रिश्तेदार की सहायता करने के क्रम में घर-गृहस्थी का काम सीख लेती है, बगैर जाने कि ‘अच्छी लड़की’ का तमगा उसके पैरों की बेड़ी बन जाएगा। वह लिखती हैं, ‘‘इसके बाद मैं कभी खेल नहीं सकी, दिन-रात काम और बस काम।’’ युवावस्था के प्रथम चरण में ही वह समझ जाती हैं कि अच्छी स्त्री और ‘सद्गृहिणी’ का खिताब कृत्रिम है। सुयोग्य गृहिणी बनने के बाद भी वह अपना स्थान परिवार में सुरक्षित नहीं कर पाएगी, इसमें संदेह है, क्योंकि स्त्री परिवार के लिए एक देह है, मर्यादा है, वंशबेल बढ़ाने का साधन, वह माँ है, जिसका ‘अपना’ कुछ भी नहीं - ‘‘जब मैं अपने पिता के घर थी, तब तक मेरा एक नाम था जो बहुत पहले ही कहीं खो गया। अब मैं विपिन बिहारी सरकार, द्वारकानाथ सरकार, किशोरीलाल सरकार, प्रतापचंद्र सरकार और श्यामासुन्दरी की माँ हूँ। अब मैं सबकी माँ हूँ।’’

राससुंदरी देवी जैसी अनेकानेक स्त्रियों को परिवार के खास साँचे में ढालने के लिए समाज अनेक औजारों का इस्तेमाल करता है - यह ‘व्यक्ति’ को ‘टाइप’ बनाने का प्रयास है, व्यक्ति के तौर पर इस मध्यवर्गीय स्त्री की निजी कोई पहचान नहीं। उसे ‘देवी’ बनाने की प्रक्रिया में समाज, गृहस्थी का हित है, लेकिन इस प्रक्रिया से गुजरना स्वयं ‘स्त्री’ के लिए कितना कष्टप्रद है, इसे इसी से समझा जा सकता है कि राससुंदरी देवी अपनी ससुराल को ‘पिंजरे’ की संज्ञा देती है - ‘‘वह जीवन मेरे लिए किसी पिंजरे से कम न था - जीवन पर्यन्त अब मुझे इसी पिंजरे में रहना था। मुझे अपने परिवार से छीन लिया गया था, धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता मैं एक पालतू पक्षी बन गई।’’ राससुंदरी देवी ने परिवारजनों, ससुरालवालों को, नए माहौल को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन ससुरालवालों को उसने जो आदर और सम्मान दिया वह दबाव, प्रशिक्षण और आवश्यकता का परिणाम था। राससुंदरी ईश्वर को धन्यवाद देती हैं कि ईश्वर की कृपा से उसने सब कठिन परीक्षाएँ पास कर लीं जिससे उन्हें सुघड़ बहू, सुघड़ गृहिणी का खिताब मिला।

इस सब के बदले में उन्हें ‘सिर्फ’ अपना जीवन देना पड़ा। सिर्फ उनकी स्वतंत्रता उनसे छीन ली गई, यहाँ तक कि माँ के मरने पर भी उन्हें मायके जाने की इजाजत नहीं मिलती। (द डिफरेंस/डेफरल ऑफ ए कोलोनियल मॉडर्निटी पब्लिक डिबेट्स ऑन डोमेस्टिसिटी इन बंगाल, सबआल्टर्न स्टडीज – खंड 8 में, दीपेश चक्रवर्ती, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली, 1994) यही कारण है कि जीवन के उत्तरार्द्ध में अपना अतीत उन्हें घृणा से भर देता है। राससुंदरी लिखती हैं - ‘‘जब भी पीछे देखती हूँ, घृणा से मन भर जाता है, टशर की साड़ी, भारी जड़ाऊ जेवर, शंख, चूड़ियाँ, सिन्दूर… सब परतंत्रता की बेड़ियाँ।’’ राससुंदरी परम्परागत हिन्दू स्त्री के सुहाग चिह्नों की निन्दा करती हैं। उन्हें गुलामी मानती हैं। उन्हें अपने पुरुष संबंधियों से बातचीत करने की आज्ञा नहीं, घर के बड़े-बूढ़ों से नीची आवाज में बात करने की आदत ऐसी हो जाती है कि आगे चलकर पति और युवा पुत्रों से भी डरती हैं। उनके कर्त्तव्यों का अन्त नहीं, बीमार सास की देखभाल, भोजन, बाल-बच्चों की सार-सँभाल, कुलदेवी की नित्य आडंबरपूर्ण पूजा का वृहत सरंजाम, घर में नित्य पच्चीस सदस्यों के लिए भोजन बनाना - उसपर समूची गृहस्थी का बोझ वो भी चौदह वर्ष की उम्र में । इन सभी उत्तरदायित्वों को पूरा करने में उन्होंने पूरी दक्षता दिखाई लेकिन स्वयं के लिए कोई समय नहीं निकाल सकीं। राससुंदरी का कहना है कि यद्यपि उन्होंने पूरा जीवन अच्छी तरह कर्तव्य निभाए फिर भी मृत्यूपरांत उन्हें ‘आदर्श स्त्री’ के रूप में उन्हें कोई याद करेगा, यह सुनिश्चित नहीं। राससुंदरी परंपरागत आदर्श हिन्दू स्त्री की छवि का विखण्डन करती हैं। जो कार्य उन्हें संवेदनात्मक तृप्ति नहीं देते जैसे भोजन पकाना, देवता-पूजन का नित्य आडंबर, इन्हें वह ‘मजदूरी’ की संज्ञा देती हैं। अट्ठारह से इकतालीस वर्ष के बीच उन्होंने चौदह बच्चों को जन्म दिया। लगभग एक साल के अंतराल से उन्होंने संतानोत्पत्ति की कुल तेईस वर्ष की अवधि में। संतान-प्रसव की यह दर उनके लिए प्राणलेवा हो सकती थी। (1901 की जनसंख्या रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान प्रसूति-मृत्यु दर काफी ऊँची थी - भारत की जनगणना 1901, खंड VI, The Lower Provinces of Bengal and Their Feudatories, Report by E.A. Gait, Calcutta, 1902, पृष्ठ 240) ध्यातव्य है कि इन वर्षों में वह निरन्तर घरेलू श्रम (अनुत्पादक) में भी जुटी रही, जब तक कि पुत्रों का विवाह नहीं हो गया।

राससुंदरी आत्मकथा में जिन प्रसंगों का उल्लेख खास तौर पर करती हैं, वे हैं मुख्यतः पढ़ने-लिखने की इच्छा, गृहकार्य के दायित्व, और ईश्वरीय अनुकम्पा। पंद्रहवें अवतरण में अचानक याद आ जाता है कि अब तक पति के बारे में उन्होंने कुछ कहा नहीं है - ‘‘मैं कह सकती हूँ कि वे एक अच्छे इंसान थे। कद्दावर थे, अपने मातहतों और किराएदारों के प्रति दयालु थे, अतिथि सत्कार करते थे। कानून मानने वाले थे। हमेशा मुकदमों में उलझे रहते थे। मैं अपने पति से डरती थी। वे नैतिक और कर्मशील थे।’’ पूरी आत्मकथा में पति का जिक्र दो-तीन बार ही आया है। राससुंदरी का कहना है कि रात में बच्चे की रुलाई सुनकर ‘कर्ता’ नाराज हो जाते थे। एक प्रसंग ऐसा भी है जहाँ राससुंदरी पति के घोड़े के सामने से गुजरते हुए भी संकोच करती हैं। यह समझना कठिन नहीं है कि पति के साथ स्त्री के संबंध राजा-प्रजा या शोषक-शोषित के दर्जे से बहुत बेहतर नहीं रहे होंगे। लेकिन उसी पति की मृत्यु की घटना को राससुंदरी ‘स्वर्णमुकुट’ का छिन जाना कहती हैं। विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति दयनीय थी, समाज में विधवा पुनर्विवाह जैसी बातें आभिजात्यवंशीय परिवारों द्वारा स्वीकृत नहीं थीं। फिर भी, विधवा होकर जैसे राससुंदरी ‘मुक्ति’ का निश्वास लेती हैं। ‘आमार जीबन’ के दूसरे भाग में वे कहती है - ‘‘मैं चैत्र मास 1813 में जन्मी और अब 1901 चल रहा है। अब 88 वर्ष की हूँ और उस ईश्वर का धन्यवाद करती हूँ जिसने इतनी लम्बी आयु मुझे प्रदान की।’’ एक ओर वे वैधव्य भोग रही हैं, दूसरी ओर स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हैं। उस समय के बंगाल में विधवाओं की स्थिति को देखते हुए राससुंदरी देवी का यह कथन आश्चर्यचकित करता है। लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं पारिवारिक गुलामी से मुक्ति का ‘सौभाग्य’ व्यंजित है, नहीं तो क्या कारण है कि आत्मकथा का पहला भाग उनके पति के मरने के ठीक बाद ही प्रकाशित हुआ।

आत्मकथा का दूसरा भाग ईश्वरीय लीला की चर्चा, कृष्ण और चैतन्य के विभिन्न अवतारों पर केन्द्रित है। राससुंदरी बार-बार ईश्वर को धन्यवाद देती हैं, जिसने जीवन के प्रत्येक क्षण में संकट से उबारा है। स्वयं को तुच्छ मानवी के रूप में घोषित करना और रचना-प्रेरणा के रूप में कृष्ण-चैतन्य का वर्णन करना ही प्रत्यक्ष है जहाँ पाठक रचनाकार को एक दार्शनिक मुद्रा में रूपांतरित होते हुए देखता है। सवाल यह है कि यदि कृष्ण और चैतन्य के लीला प्रसंगों और ईश्वरीय दयालुता का वर्णन करना राससुंदरी का अभीष्ट होता तो वे आत्मकथा जैसी नूतन और आधुनिक विधा का चुनाव क्यों करतीं? उन्नीसवीं के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के आरंभिक दौर में स्त्री लेखन के साक्ष्यों में भक्ति-अध्यात्म और परम्परा से विद्रोह का अद्भुत सामंजस्य हमें दिखाई देता है। स्त्रियाँ अपनी-अपनी सीमाओं में नई संभावनाएँ तलाशती दिखती हैं, साथ ही ऊपरी तौर पर पितृसत्तात्मक समाज में गुलामी भी करती हैं। इस संदर्भ में दमयंती सेन की जीवनी के एक प्रसंग का उल्लेख अप्रासंगिक न होगा जो एक ओर चोरी-छिपे पढ़ना सीख रही थीं और दूसरी ओर पति के चरण धोए पानी को रोज पीती थीं। इसी तरह प्रभावती देवी ने,जो पूर्णतः साक्षर थीं, एक दिन पाया कि देवी-देवताओं की तस्वीर की जगह उनके पति की तस्वीर रख दी गई थी। उनसे कहा गया कि वह अब से पति की तस्वीर की ही पूजा करे। (इंडियन वीमेन : एन इनर डॉयलॉग, इंदिरा पारेख, पुलिन गर्ग, सेज प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989) पढ़ना-लिखना सीख लेने वाली स्त्री पितृसत्तात्मक समाज में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए एक नई ‘रणनीति’ विकसित करती दिखाई देती है - एक ओर स्त्री कर्त्तव्य, स्त्री धर्म, आत्मत्याग , समर्पण, आस्था और स्त्रियोचित मूल्यों की चर्चा बार-बार करती है, दूसरी ओर अब तक न कहा जा सकने वाला सबकुछ कह भी दे रही है। राससुंदरी पूरी आत्मकथा में अपने जीवन को ‘तुच्छ’ कहती हैं और आत्मकथा का शीर्षक देती हैं - ‘आमार जीबन’ जो अपने महत्व की महाप्राण घोषणा करता प्रतीत होता है। दूसरी ओर लेखकीय विवशता का तकाजा ही है कि इसे ‘ईश्वरीयलीलाख्यान’ का जामा पहनाया जाए। इसके अभाव में तत्कालीन समाज में पाठकीय समर्थन मिलेगा क्या? यह रचनाकार की पहली और संभवतः अंतिम रचना है, एक साधारण सद्गृहस्थ स्त्री के जीवन में लेखन/प्रकाशन की रुचि क्यों होगी? कहीं न कहीं आध्यात्मिक आवरण की जरूरत है, ताकि पुस्तक बड़े पाठकीय वर्ग तक पहुँच सके। रचनाकार पाठकों के अभाव के खतरों के साथ-साथ सभ्य शिष्ट समाज के ‘रिजेक्शन’ से भली भाँति वाकिफ है। आश्चर्य की बात है कि पूरे आत्मकथ्य में वृहत्तर वैश्विक परिदृश्य, ब्रिटिश शासन, राजनीति पर कोई टिप्पणी नहीं मिलती। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं - या तो रचनाकार समसामयिक विषयों पर टिप्पणी कर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती अथवा गृहस्थी की व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर किसी तरह लेखन में रत है और ताजा समाचारों, अखबारों की दुनिया से नावाकिफ़। सिर्फ अपनी कथा कहने से कृति की नीरसता के खतरे थे, इसलिए आत्मकथा को एक पवित्र ग्रंथ में तब्दील करने की कोशिश दिखाई देती है।

दो

तेलुगु की पहली स्त्री आत्मकथा का प्रकाशन 1934 में हुआ, जिसे एदिदमू सत्यवती ने ‘आत्मचरितमु’ शीर्षक दिया। औपनिवेशिक शासन के अनन्तर स्त्री लेखन के तेलुगु परिदृश्य को जानने की दृष्टि से ‘आत्मचरितमु’ महत्वपूर्ण है, जो एक लंबे समय तक विस्मृति के गर्भ में दबी रही। तेलुगु या स्त्री साहित्येतिहास में इसके उल्लेख का अभाव दिखाई देता है, जब कि तेलुगु में आत्मकथा लेखन की एक समृद्ध परम्परा रही है। वीरेशलिंगम की आत्मकथा क्रमशः 1911 और 1915 में (दो भागों में) प्रकाशित हुई वहीं लगभग अचर्चित राममोतला जगन्नाथ शास्त्री की आत्मकथा ‘स्वचरितमु’ 1916 में विशाखापत्तनम से छपी। दरअसल जगन्नाथ शास्त्री की आत्मकथा से तेलुगु में आत्मकथा लेखन और प्रकाशन की प्रवृत्ति का प्रारंभ देखा जा सकता है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आत्मकथा लेखन की प्रवृत्ति ज्यादातर समाज सुधारक किस्म के लोगों में देखी गई जैसे रायसमु वेंकटाशिवुडु का ‘आत्मचरित्रमु’ (1933, गुंटूर) जाने-माने वकील वल्लूरी सूर्यनारायणरावु सी. लक्ष्मीनरसिंहमू की ‘स्वीयाचरित्रमु’ (1944), टंगतुरी प्रकाशम, जो आंध्र के मुख्यमंत्री भी रहे, की आत्मकथा ‘ना जीविता यात्रा’ (मेरी जीवन यात्रा, 1946, मद्रास) प्रकाश में आईं। इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण और साधारण रचनाकारों के आत्मकथांश, जिन्हें ‘संस्मरण’ की श्रेणी में रखा जाना बेहतर होगा, बीसवीं शताब्दी के मध्य और उत्तरार्द्ध तक प्रकाशित हुए, जिनमें बसवराजु राज्यलक्ष्म्मा की ‘अप्पारावगारू - नेनु’ (अप्पाराव जी और मैं) 1965 में विजयवाड़ा से छपी, अडविकोलानु पार्वती ने जेल के संस्मरण हैदराबाद से 1980 में ‘ना जेलू नापकालु’ शीर्षक से छपवाए। 1991 में हैदराबाद से ही मलाडी सुब्बम्मा का आत्मकथ्य ‘पातिव्रतम् नुंडी’ प्रकाशित हुआ। सरस्वती गोरा की ‘गोरातो ना जीवितम्’ (गोरा के साथ मेरा जीवन) सन 1992 में विजयवाड़ा से, उतुकुरी लक्ष्मीकांतम्मा की साहितिरुद्रम्मा (स्वीया चरिता) 1993 में छपी। भानुमति रामकृष्णा की नालोनेतु (1993, मद्रास) के अतिरिक्त ‘मनकुतेलियनी मना चरित्र’ (हमारा इतिहास जिसे हम स्वयं नहीं जानते), 1996 में हैदराबाद से छपी, जिसमें तेलंगाना के सशस्त्र आंदोलन में भाग लेने वाली स्त्रियों के साक्षात्कार संकलित हैं, जिसका प्रकाशन अंग्रेजी में के. ललिता के संपादकत्व में ‘वी वर मेकिंग हिस्ट्री लाइफ स्टोरीज ऑफ वीमेन इन द तेलंगाना पीपुल्स स्ट्रगल’ 1986 में दिल्ली से हुआ।

तेलुगु आत्मकथाओं की परंपरा को देखते हुए ‘आत्मचरितमु’ किसी स्त्री द्वारा रचित पहली और व्यवस्थित आत्मकथा सिद्ध होती है। सत्यवती ब्राह्मण परिवार की पुत्री और बहू थीं, जो यौवन में ही विधवा हो गईं। उनकी आत्मकथा का प्रथमांश जीवन की घटनाओं के साहित्यिक वर्णन से परिपूर्ण है, लेकिन उत्तरांश में वैधव्य के बाद धर्म, समाज, रूढ़ियों, ईश्वरीय सत्ता, अध्यात्म इत्यादि का अत्यन्त तर्कपूर्ण एवं विवेकसम्मत विश्लेषण मिलता है। तत्कालीन समाज की परिस्थितियों, बाल विवाह एवं स्त्री-शिक्षा की स्थिति को देखते हुए सत्यवती अपनी साहित्यिक एवं तर्क क्षमता से पाठक को चकित कर देती हैं। सत्यवती के नाम से सिर्फ ‘आत्मचरितमु’ ही मिलता है, जिसका अर्थ है कि सत्यवती ने आत्माभिव्यक्ति और समाज प्रत्यालोचन के लिए आत्मकथा को माध्यम बनाया। सत्यवती के जीवन के विषय में जानकारी का एकमात्र स्रोत आत्मचरितम्’ ही है, जिसमें उनके जन्म, विवाह, वैधव्य आदि की तिथियों का नितांत अभाव है।

‘आत्मचरितम्’ के पहले और दूसरे भाग में परस्पर तनाव दिखाई देता है - पहले भाग में साहित्यिक शैली में निजी वर्णन हैं, जब कि दूसरे भाग में सत्यवती की समाज, परम्परा, रूढ़ि, ईश्वर सम्बन्धी चिंताएँ एवं सरोकार व्यक्त हुई हैं। यहाँ सत्यवती विधवा होते हुए भी स्वयं को ‘पतिव्रता’ घोषित करते हुए लिंगभेद, विधवा स्त्री के प्रति समाज के रूढ़िबद्ध दुर्व्यवहार, पितृसत्तात्मक समाज और धर्म के नाम पर स्त्री के शोषण और दमन का प्रत्याख्यान करती हैं। स्वयं को ‘पतिव्रता’ कहना और साथ ही पतिव्रता धर्म की पोषक व्यवस्था की आलोचना करना तनाव की सृष्टि करता है। यह एक पतिव्रता की इच्छा और मुक्ति चाहने वाली स्त्री के बीच का तनाव है। सत्यवती बार-बार पतिव्रताओं की परंपरा को पुनरुज्जीवित करने की बात कहती हैं, दूसरी ओर पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दमन को लेकर चिंता भी व्यक्त करती हैं। सत्यवती का यह अंतविर्रोध ‘आत्मचरितमु’ के पुनर्पाठ की ओर प्रेरित करता है।

‘आत्मचरितमु’ के पहले भाग में सत्यवती ने अपने विवाह-प्रसंग का सविस्तार वर्णन किया है। अंतःसाक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि सत्यवती के माता-पिता अपेक्षाकृत खुले विचारों के थे। सत्यवती ने पाँच वर्ष की उम्र में बालिका विद्यालय जाना शुरू किया। दस वर्ष की अवस्था में वे गोदावरी जिले के ‘कोरंगी’ ग्राम में माता-पिता सहित एक संबंधी के उपनयन संस्कार में शामिल होने गईं। वहाँ तीसरे दर्जे में पढ़ने वाले 13 वर्षीय किशोर से पहली बार मंदिर-मंडप में मिलीं, जिससे बाद में उनका विवाह हुआ। सत्यवती ने पहली बार सीताराम्मैया से जो बातचीत की वह आत्मकथा में विस्तार से दी गई है -

लड़का - तुम किस गाँव से आई हो?

सत्यवती - मेरे पिता विजयवाड़ा में काम करते हैं।

लड़का - तुम्हारा नाम क्या है?

सत्यवती - सत्यवती

लड़का - तुम्हारे पिता क्या काम करते हैं?

सत्यवती - वे पी.डब्ल्यू.डी. में इंजीनियर हैं।

लड़का - तुम किस कक्षा में पढ़ती हो?

सत्यवती - चौथी कथा में।

लड़का - तुमने संगीत सीखा है क्या?

सत्यवती - नहीं।

लड़का - क्या तुम कोई गीत गा सकती हो?

सत्यवती - हाँ।

लड़का - फिर कोई गीत क्यों नहीं गाती?

सत्यवती ने गीत गाया और दोनों की बातचीत आगे बढ़ी।

लड़का - क्या तुम मुझे जानती हो?

सत्यवती - नहीं।

लड़का - क्या मुझसे विवाह करोगी?

सत्यवती ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।

लड़का - तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। तुम्हें कोई संकोच है या तुमने मुझे पसंद नहीं किया?

(सत्यवती ने आत्मकथा में लिखा है कि वह इतनी छोटी थी कि लड़के के सौंदर्य के बारे में किसी सुनिश्चित विचार तक पहुँच नहीं पा सकती थी। लेकिन बचपन से ही वह पतिव्रताओं की कहानियाँ सुनती चली आ रही थी। इसलिए उसने सोचा कि दैहिक सौंदर्य से ज्यादा यह महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति विशेष के जीवन-मूल्य क्या हैं।)

प्रत्यक्षत: सत्यवती ने कहा – नहीं, ऐसा कुछ नहीं।

लड़का - तो फिर तुम इतना संकोच क्यों कर रही हो?

सत्यवती - इसलिए कि यदि हम दोनों विवाह के लिए तैयार भी हों तो यह जरूरी नहीं कि हमारे अभिभावक भी इस बात पर सहमत हों।

लड़का - तुम्हारी क्या राय है ?

सत्यवती - मेरी राय महत्वपूर्ण नहीं है।

लड़का - देखो, यदि हम दोनों एक-दूसरे को पसन्द करते है तो हम विवाह के लिए कोई न कोई रास्ता निकाल सकते हैं।

सत्यवती - मुझे कुछ पता नहीं।

लड़का - हाँ, मैं समझ गया तुम क्या सोचती हो ? तुम्हें कुछ सुझाव दूँ। जब कोई लड़का तुम्हें विवाह के लिए देखने आए तो तुम ऐसा नाटक करना जैसे तुम्हें वह पसन्द नहीं आया। बाद में तुम्हारे माता-पिता तुमसे स्वयं ही पूछेंगे कि तुम हर रिश्ते को नापसन्द क्यों कर देती हो। मैं भी अपने घर में ऐसा ही करूँगा। कुछ दिनों के बाद हमारे माता-पिता के पास हमारा विवाह आपस में करा देने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा।

सत्यवती इस प्रस्ताव से सहमत थी, उसने अपनी अन्तरात्मा को साक्षी मानते हुए उस लड़के को विवाह का वचन दिया।

इस घटना के वक्त सत्यवती मात्र दस वर्ष की थी। यह आश्चर्यजनक लगता है कि पतिव्रता और जीवन-मूल्य जैसे शब्दों का अर्थ तब भी वह समझती थी। यह भी हो सकता है कि सत्यवती ने, जिसने विधवा होने के बाद ‘आत्मचरितमु’ लिखा, अपनी परिपक्व समझ को बचपन पर आरोपित कर दिया हो। जो भी हो, सत्यवती के माता-पिता ने सत्यवती के ममेरे भाई से उसका विवाह तय कर दिया, लेकिन बाद में अधिक दहेज की माँग के कारण विवाह नहीं हुआ। सत्यवती ने अपनी रुचि के बारे में बताया और सीताराम्मैया के साथ उसका विवाह हो गया। विवाह के बाद सत्यवती बहुत दिनों तक ससुराल नहीं गई, क्योंकि उसकी उम्र बहुत कम थी। उधर सीताराम्मैया ने एम.ए. की परीक्षा पास कर ली। कुछ मुश्किलों के बाद उसे नौकरी मिली। गंजाम जिले में श्रीकाकुलम में सीताराम्मैया सबइंस्पेक्टर के तौर पर नियुक्त हुआ। छह महीने के भीतर ही उसे अचानक नौकरी से निकाल दिया गया। (सत्यवती ‘आत्मचरितमु’ में कहती हैं कि उन दोनों को ही सीताराम्मैया के नौकरी से निकाले जाने का कारण पता नहीं चला। सत्यवती का कहना है कि ईमानदारी की सजा उनके पति को मिली। स्थानीय निवासियों ने सीताराम्मैया को प्रोत्साहन दिया, जिसकी काव्यमय प्रस्तुति भूमिका के तुरन्त बाद दी गयी है। सत्यवती अपने पति को निर्दोष साबित करना चाहती हैं। बाद में, सीताराम्मैया ने मद्रास की अदालत में अपने निलंबन के आदेश के खिलाफ अर्जी दी और उसका निलंबन वापस ले लिया गया।)

बाद में, सीताराम्मैया की नियुक्ति दरीगबड़ी में हुई तो सत्यवती पति के साथ रहने के लिए आईं। सत्यवती के पिता ने सत्यवती के साथ एक बुजुर्ग महिला को भेजा। लेकिन वह अधिक दिनों तक सत्यवती के साथ नहीं रह पाईं। उन्हें घर की याद सताने लगी और वह लौट गईं। सत्यवती ने अकेले ही घर की साज-सँभाल की। वह जगह सीताराम्मैया के स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं थी, उसे बीमारी में पालकी में लिटाकर डाक्टर के पास ले जाया गया। सत्यवती भी नई जगह पर बीमार रहने लगीं। सीताराम्मैया ने छुट्टी की दरख्वास्त दी। छुट्टी मिलने में बहुत देर हुई। इस बीच बीमारी की हालत में सीताराम्मैया की मृत्यु हो गई। सत्यवती ने आत्महत्या का प्रयास किया, लेकिन उन्हें वापस माता-पिता के पास भेज दिया गया। वैधव्य के बाद सत्यवती ने ‘आत्मचरितमु’ लिखा जो 60 पृष्ठों में 1934 में विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश से छपा। (सत्यवती ने फरवरी 1934 में अवनीगुड्डा, कृष्णा जिला, आंध्र प्रदेश, में रहकर अपनी पुस्तक आंध्र प्रदेश के आन्ध्र ग्रंथालय प्रेस से छपवाई। के. कोंडाराम्मय्या का नाम उनके पिता के रूप में आता है, जो अवनीगुड्डा में रहते थे।) यह ‘आत्मचरितमु’ सत्यवती ने अपने मृत पति को समर्पित की। पति का आह्वान करते हुए सत्यवती ने लिखा कि पति ने ही उन्हें जीवन और जगत का व्यावहारिक ज्ञान कराया इसलिए यह पुस्तक उन्हीं को समर्पित है। पुस्तक के प्रारंभ में ही सत्यवती और सीताराम्मैया की अलग-अलग तस्वीरें छपी हैं। सत्यवती ने, पिता के मित्र दिवी नरसिंहाचार्यालु, जो विद्वान और पंडित थे, के प्रति भूमिका में आभार प्रकट किया है।

सत्यवती की भाषा और लालित्यपूर्ण शैली पाठक को चमत्कृत करती है। कथा प्रवाह और अलंकृत भाषा ‘आत्मचरितमु’ को समकालीन रचनाकारों से अलग और विशिष्ट पहचान देते हैं। सत्यवती अपने कथनों और वक्तव्यों को कई दूसरे विद्वानों के कथनांशों से पुष्ट करती चलती हैं। ऐसा लगता है कि उनकी साहित्यिक अभिरुचि का स्तर उत्कृष्ट है। उदाहरण के लिए, सत्यवती अपने प्रथम दृष्ट्या प्रेम-प्रसंग का वर्णन अत्यंत काव्यात्मक शैली में करती हैं। सीताराम्मैया के बारे में वे बताती हैं कि वह लंबा, बलिष्ठ, सुन्दर, चमकीली आँखों वाला किशोर था। जिस मंदिर-प्रांगण में उन दोनों की पहली मुलाकात हुई वह स्थल अत्यंत काव्यात्मक है। ग्राम-प्रान्तर की सुषमा मनमोहक है - ‘गाँव के पूर्व में झरना है, झरने के किनारे पुराना प्रस्तर देवालय है, जिसकी दीवारों पर सुन्दर चित्र उकेरे हुए हैं। मंदिर की दक्षिण दिशा में ताजा पानी का सरोवर है और एक फूलों का उपवन जहाँ बैठकर मंदिर का सौंदर्य निहारा जा सकता है।’ सीताराम्मैया से यहीं वह पहली बार मिली थी और उन्होंने भावी जीवन के स्वप्न बुने थे।

सत्यवती के शब्दों में, ‘‘इस उपवन में मालती, पारिजात, मंदरम् के फूल खिले हैं, जिसकी सुवास वातावरण को पवित्र और मनमोहक बना रही है। वे दोनों एक फूलों की झाड़ी के बगल में बैठे। जैसे ही सीताराम्मैया ने उससे विवाह का प्रस्ताव किया, वह भविष्य की सुखद कल्पना में खो गई और उसे सावित्री और सत्यवान की कथा (सावित्री और सत्यवान की कथा ‘महाभारत’ के अरण्यपर्व में है।) स्मरण हो आई। उसकी अंतरात्मा से यह आवाज आई कि उसे सीताराम्मैया से ही विवाह करना है, उसी क्षण से सीताराम्मैया को उसने पति मान लिया, और अपना प्रण उसे बता भी दिया – “पश्चिम का यात्री समुद्र में विलीन होने से पहले इस पल का साक्षी बना। संध्या का आकाश, जो सुनहरी सूर्य किरणों से सुसज्जित है, देखकर ऐसा लगता है ज्यों पश्चिमी आकाश रूपी युवती ने सुनहरी रेशमी साड़ी पहनी हो, गोधूली-वेला में बसेरों को लौटती चिड़ियों की चहचहाहट और कोयल की कूक ने पृष्ठभूमि को संगीतमय बना दिया है।’’

सत्यवती के वृत्तांत प्रसंगानुरूप शैली बदलते हैं, उदाहरण के तौर पर सीताराम्मैया की मृत्यु का प्रसंग देखा जा सकता है। वह ईश्वर से प्रार्थना करती हुई लिखती हैं, ‘‘हे प्रभु, मेरी विनती सुनो। इस सूने एकाकी वन में मेरा कोई नहीं। क्या सावित्री की प्रार्थना पर स्वयं यमराज चल कर नहीं आए थे? सत्यवान के प्राण क्या लौटाए नहीं उन्होंने? क्या तुम इतना -सा मेरे लिए नहीं कर सकते हो? हे ईश्वर, मेरी प्रार्थना पर तुम ध्यान क्यों नहीं देते? तुमने न जाने कितनी पतिव्रताओं की प्रार्थनाएँ सुनी होंगी और मनोकामनाएँ भी पूरी की होंगी। मेरे पति ने हमेशा न्याय और ईमानदारी का जीवन जिया। फिर तुमने उनको इतनी बड़ी सजा क्यों दी। उनकी जगह तुम मेरे प्राण ले सकते थे। लोग कहते हैं कि यह पूर्वजन्म के पापों का दंड है, तो तुम बताते क्यों नहीं हमें कि पूर्वजन्म में हमने कौन-से ऐसे पाप किए, जिनकी सजा हम अब भुगत रहे हैं। जब तक हमें अपने किए पापों का पता नहीं चलेगा, हम प्रायश्चित कैसे कर सकते हैं? तुम्हारी दयालुता का वर्णन पुराणों और महाभारत में है - क्या वह सब मिथ्या है? या फिर तुम मेरे धैर्य की परीक्षा लेना चाहते हो? जितने कष्ट इस जीवन में मैं भुगत चुकी हूँ क्या वे पर्याप्त नहीं है?’’

सीताराम्मैया के दाह-संस्कार के प्रसंग में सत्यवती कहती हैं - ‘‘मैं अपने पति को नहीं जाने दूँगी। मैं सावित्री की तरह अपने पति के प्राण वापस लौटा ले आऊँगी अन्यथा सती हो जाऊँगी।’’ वहाँ उपस्थित लोगों ने कहा – “तुम अभी अल्पवयस्क और अनुभवहीन हो, तुम्हारे अभिभावक भी तुम्हारे साथ नहीं? क्या इस कलियुग में कोई सत्यवान की तरह वापस आया है? क्या हमने कलियुग में ऐसी कोई कथा सुनी है? यदि तुम पति की चिता के साथ सती होना चाहोगी भी तो क्या सरकारी कानून तुम्हें सती होने देगा? क्या हमारे शास्त्रों में आत्महत्या को सही कहा गया है?” अन्ततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं - ‘‘ईश्वर ने मुझे धोखा दिया, मुझे पति के साथ नहीं जाने दिया। फिर भी मेरी आस्था और विश्वास अपने पति में कायम है। मैं हमेशा उनकी छवि की उपासना करूँगी। मुझे पूरा विश्वास है कि अगले जन्म में हमारा पुनर्मिलन होगा। अब भी विश्वास है कि ईश्वर मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे, मैं ‘पातिव्रत्य’ को भारत में पुनर्जीवित कर सकूँगी। इन दिनों ‘पातिव्रत्य’ का भारतवर्ष में लोप हो गया है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो मैं अपना जीवन पति की स्मृति में त्याग दूँगी और पति के साथ मोक्ष प्राप्ति करूँगी।’’

सत्यवती के ‘आत्मचरितमु’ का पहला भाग सतही तौर पर तथ्यों की जगह भावों को प्रधानता देता है। लालित्यपूर्ण गद्य का प्रयोग, प्रसंगानुकूल भाषा का चुनाव पाठक को आकर्षित और चमत्कृत करता है। आत्मकथा का दूसरा भाग पहले भाग से बिल्कुल अलग है। इस भाग में सत्यवती के जीवन की कोई घटना, कोई प्रसंग नहीं मिलता। वैधव्य ग्रहण कर पिता के घर लौट आने के बाद वे वैश्विक दृष्टि की अभिव्यक्ति करती हैं। स्त्री जीवन, लैंगिक विभेद, जीवन-ईश्वर संबंधी प्रसंग आदि इस दूसरे भाग में अभिव्यक्त हैं। इस भाग को पूर्णतः विच्छिन्न या स्वतंत्र रूप से एक स्त्री के बौद्धिक विमर्श के रूप में पढ़ा-सुना जा सकता है। यहाँ सत्यवती की विश्वदृष्टि को विभिन्न उपशीर्षकों के अन्तर्गत देखा जा सकता है - जैसे, पतिव्रता स्त्री, पातिव्रत्य धर्म, हरिकथा गायन, विधवाएँ, बाल विवाह और विधवा विवाह, ईश्वरीय सत्ता का खेल, सृजन प्रश्न, ईश्वरीय सत्ता, मृत्युभोज आदि। इनमें से कुछ प्रसंगों का पुनर्पाठ दिलचस्प होगा।

समकालीन तेलुगु समाज, नवजागरण के सुधारवादियों के प्रयासों के व्यावहारिक पक्ष, भारतीय समाज में विधवा का जीवन जीने के लिए बाध्य स्त्री के प्रश्नों/प्रतिप्रश्नों के ब्याज से नव्यपितृसत्ताक व्यवस्था का प्रतिपक्ष भी इसमें अभिव्यक्त है। (द नेशन एण्ड इट्स फ्रेगमेंट्स : कोलोनियल एवं पोस्टकोलोनियल हिस्टरीज, प्रिंस्टन, 1993) ‘आत्मचरितमु’ के उत्तरांश में अनेक ऐसे तीक्ष्ण और भेदक प्रसंग हैं जो समाज की चली आती हुई मान्यताओं पर प्रहार करते हैं। निम्नलिखित प्रसंगों को सत्यवती ने प्रमुख रूप से विवेचित किया है -

1. पतिव्रता - सत्यवती ने ‘पतिव्रता धर्म’ की चर्चा बार-बार की है - ‘‘कलियुग से पहले ईश्वर पतिव्रताओं के सम्मुख स्वयं उपस्थित होते थे और उनके पतियों को पुनर्जीवन देते थे। अब यह नहीं होता। इसलिए स्त्रियों ने पतियों के शव के साथ सती होना शुरू कर दिया है। सती प्रथा भी अब खत्म हो गई क्योंकि स्त्रियाँ मरने से डरती हैं। लेकिन यदि पति के मरने के बाद स्त्रियाँ जीवित न रहें, तो अच्छा ही है, ताकि वे विधवा का अभिशप्त जीवन जीने से बच जाए।’’ (‘पतिव्रता’ शब्द का उल्लेख तत्कालीन स्त्री रचनाकारों ने बार-बार किया है। ताराबाई शिन्दे (1882) ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ में यह प्रश्न उठाया था कि पुराणों में जिन स्त्रियों को पतिव्रता का दर्जा दिया गया है, क्या ये वास्तव में उस पद के योग्य हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ अपने पति, परिवार के साथ विश्वासघात न करके ‘पतिव्रता’ का दर्जा पा सकती हैं। देखें, A comparison between men and woman : Tarabai shinde and the critique of gender relations in colonial india : Madras, 1994, पृष्ठ 80-81, 124)

2. हरिकथा गायक - सत्यवती ने हरिकथा गायक को ‘कौतुक’ कहा है। उनका कहना है, “हरिकथा गायन परम्परा में सबसे पहले ‘गणपति वंदना’ होती है, इसके तुरन्त बाद वे स्त्री निन्दा करने लगते हैं। गायन में वे कहते हैं कि कलियुग में कोई ‘स्त्री’ पतिव्रता नहीं होती। हरिकथा गायक ‘पुरुषों’ की निन्दा नहीं करते। क्या सभी पुरुष एकपत्नीव्रत का पालन करते हैं? क्या हरिकथागायकों ने पूरा संसार छान मारा है और तब वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि समूचा कलिकाल पतिव्रताविहीन हो गया है? (ताराबाई शिन्दे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ में लिखा है - ‘‘पुरुष पतिव्रत धर्म के बारे में इतना हल्ला क्यों मचाते हैं जब कि वे दूसरों के घर-परिवार बर्बाद करते हैं (पृ० 114)। पतिव्रत धर्म का पालन न करने के लिए स्त्रियों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति के खिलाफ ताराबाई ने उलट कर पुरुषों की नैतिकता पर सवाल खड़ा किया। स्त्रियों को बहला-फुसला कर उनसे व्यभिचार करने वाले, फिर उन्हें त्याग देने वाले पुरुषों को अदालत कोई सजा क्यों नहीं देती? ताराबाई इस कानून से वाकिफ नजर आती हैं कि बिना गवाही के व्यभिचारी को सजा नहीं मिल सकती और ऐेसे मामलों में अक्सर गवाही मिलनी मुश्किल होती है। इस अंजाम के लिए ताराबाई अंग्रेज सरकार को भी जिम्मेदार ठहराती हैं। वे सुझाती हैं कि जैसे सरकार रिश्वत लेने और देने वाले, दोनों को सजा देती है, उसी तरह व्यभिचार के मामले में भी स्त्री-पुरुष दोनों को सजा मिलनी चाहिए - स्त्री से दुगुनी सजा उस पुरुष को मिलनी चाहिए, जिसने व्यभिचार का जाल बिछाया।’’ - स्त्री-पुरुष तुलना, ताराबाई शिन्दे, अनु. डॉ० राजम नटराजन पिल्लै।) प्राचीन और आधुनिक दोनों कालों में सब प्रकार के स्त्री-पुरुष मिलते हैं - अच्छे भी और बुरे भी। आज भी बहुत-सी पतिव्रताएँ हैं। और यदि मान भी लें कि वास्तव में स्त्रियों में पातिव्रत्य धर्म का लोप हो गया है तो उन्हें कौन बताएगा कि उनके लिए ‘सन्मार्ग’ क्या है - वे कैसे सन्मार्ग पर चल सकती हैं। गांधी जी लोगों के सोचने का तरीका और विचार दोनों को बदलने की चेष्टा कर रहे हैं, वे भी तो सिर्फ कुप्रथाओं की आलोचना करके सन्तुष्ट हो सकते थे!”

3. विधवाएँ - सवर्ण जातियों में विधवाओं के प्रति सामाजिक अपमान और प्रताड़ना की कोई सीमा नहीं है - विशेषकर ब्राह्मणों में – “स्त्री का विधवा होना जैसे दंडनीय अपराध है, उसके केश मूँड़ दिए जाते हैं। व्रत-उपवास से उसका शरीर कमजोर कर दिया जाता है। विचार की क्षमता को कुंद करने के लिए हमेशा शुभ कार्यों से उन्हें दूर रखा जाता है। घर का सारा काम करने के बावजूद कोने में बैठे रहना उनके लिए बाध्यता है। जीवन के सभी सुखों से उन्हें वंचित कर दिया जाता है। सबसे बुरा तो यह है कि उन्हें पुरुष की छाया से भी बचाया जाता है। यदि यह बात है तो नाई - जो उनके केश छीलता है - वह भी तो पुरुष है।” सत्यवती ने विधवा केश-मुंडन पर जो विचार व्यक्त किए हैं, ठीक वैसे ही विचार पार्वती अठवले ने भी व्यक्त किए हैं। ‘मेरी कहानी’ में पार्वती ने लिखा है, ‘‘मैंने बहुत जोर दिया कि विधवा स्त्रियों का मुण्डन नाई न करें बल्कि परिवार का ही कोई सदस्य जैसे भाई या पिता करे। लेकिन स्वयं विधवाओं ने ही इसका विरोध किया। उन्हें लगता है कि इससे पति-पुत्र का अमंगल होगा।” (हिन्दू विडो : एन ऑटोबायोग्राफी - पार्वती अठवले, अनु. रेवरेंड जस्टिन ई एबोट, 1986 संस्करण, रिलांयस पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली)

सत्यवती ने विधवा स्त्रियों की वेशभूषा पर टिप्पणी करते हुए कहा है, ‘‘अगर कोई विधवा स्त्री ब्लाउज पहनकर भोजन पकाती है तो पुरुष वह भोजन खाने से इनकार कर देते हैं। लेकिन जब कोई मेहमान आता है तो उनसे पर्दा करने के लिए कहा जाता है, वे घर से बाहर नहीं निकल सकतीं - कम से कम पति की मृत्यु के एक वर्ष बाद तक। उन्हें दिन में चार बार स्नान और भूमिशयन करना पड़ता है। यदि पूछा जाए कि स्त्रियों को ये दण्ड क्यों भुगतना पड़ता है तो उत्तर मिलता है कि नियोजित एवं मारक दिनचर्या से वे अपनी कामवासना और शारीरिक आवेगों को नियंत्रित रख सकती हैं। मेरे विचार से यह तर्क अत्यन्त हास्यास्पद है। आत्मनियंत्रण के लिए अच्छे विचारों की आवश्यकता होती है, शरीर धोने से आत्मशुद्धि नहीं हो सकती।” ताराबाई शिन्दे ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। उनके अनुसार ‘‘स्त्रियों के माथे का कुंकुम और माँग का सिन्दूर पोंछ देने, चूड़ी तोड़ देने, केश छील देने से, उन्हें कुरूप और अप्रस्तुत्य बनाने से स्त्री धर्म को बचाया जा सकता है क्या? यदि उनकी अंतरात्मा और विचार नहीं बदले तो बाहर का यह सारा कर्मकाण्ड व्यर्थ है। एक स्त्री के सौभाग्य चिह्न छीन लेने से उसकी अन्तरात्मा आहत हो जाती है, उसके भीतर एक सामान्य मनुष्योचित अच्छे और बुरे विचारों का वास रहता है। तुम उसके शरीर को कुरूप बना सकते हो, उसे ढँक-छुपा सकते हो, लेकिन उसकी अन्तरात्मा का तुम क्या करोगे? (स्त्री पुरुष तुलना, ताराबाई शिन्दे, अनु. डॉ. राजम नटराजन पिल्लै) वस्तुतः विधवा स्त्रियों का समाज में रहना पुरुषों की व्यभिचार-वृत्ति के लिए अनिवार्य था। विधवा स्त्रियाँ आचार-विचार का पालन करती थीं और पुरुष उन्हें अवैध संबंधों के लिए इस्तेमाल करते थे। केशमुंडन जैसे कृत्यों को स्त्री के बधियाकरण और स्त्रीत्वहीन बनाने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। (रीराइटिंग हिस्ट्री - द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ पंडिता रमाबाई, उमा चक्रवर्ती, नई दिल्ली, 1998, पृ. 270-271)

4 . बाल विवाह एवं विधवा विवाह - सत्यवती ने आत्मकथा में बाल विवाह एवं विधवा पुनर्विवाह तथा अनमेल विवाह पर जो विचार व्यक्त किए हैं, उन पर नवजागरण की समाज सुधारवादी दृष्टि का प्रभाव साफ दिखाई देता है। ‘आत्मचरितमु’ 1934 में प्रकाशित हुआ, उससे पहले गुरजड़ा अप्पाराव (1861-1915) ने ‘कन्याशुल्कम्’ शीर्षक कृति में कन्या विक्रय एवं दहेज प्रथा की घनघोर निंदा की थी। सत्यवती इस विषय में लिखती हैं - दहेज लेने और कन्याविक्रय जैसे कुप्रथाएँ हमारे समाज में प्रबल हैं। धनलोलुप अभिभावक अपनी अल्पव्यस्क लड़कियों का विवाह उम्रदराज पुरुषों से कर देते हैं। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर लड़की बहुत कम उम्र में विधवा हो जाती है। हमारे देश में विधवा समस्या के मूल में बाल विवाह है। कुंदुकुरी वीरेशलिंगम् बाल विधवाओं की शोचनीय दशा न देख सके और उन्होंने विधवा पुनर्विवाह पर बल दिया। विधवाओं का पुनर्विवाह अवैध यौन संबंधों को पनपने से रोकने का बड़ा साधन हो सकता है। युवा विधवाओं से अपनी नैसर्गिक इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की अपेक्षा करना मूर्खता है, इसलिए वीरेशलिंगम् ने कहा कि जो लड़कियाँ रजस्वला होने से पहले ही विधवा हो जाती हैं उनका विवाह फिर से हो सकता है। इन दिनों संतानवती विधवाएँ भी पुनर्विवाह के लिए आगे आ रही हैं, लेकिन ऐसे विवाह उचित प्रतीत नहीं होते।” यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि सत्यवती प्रकारांतर से वीरेशलिंगम् जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के अनेक समाज सुधारकों की तर्ज पर बात कर रही हैं।

सत्यवती भी वीरेशलिंगम (अ बॉयोग्राफी ऑफ एन इंडियन सोशल रिफार्मर, जॉन ग्रीनफील्ड लियोनार्ड, कुंदुकुरी वीरेशलिंगम (1848-1919), हैदराबाद, 1991 तथा सोशल रिफार्म्स इन आंध्र (1848-1919), वी. रामकृष्णा, नई दिल्ली, 1933) की तर्ज पर संतानवती या युवती स्त्रियों के पुनर्विवाह के पक्ष में नहीं हैं। पितृसत्तात्मक समाज का मानसिक अनुकूलन उन पर इस कदर हावी है कि बाल विवाह रोकने जैसी तर्कपूर्ण बात कहते हुए भी वे संतानवती विधवाओं के पुनर्विवाह से सहमत नहीं हैं। अन्तःसाक्ष्य के अनुसार वे स्वयं युवती विधवा थीं और लगभग 18-19 वर्ष की उम्र में उन्हें वैधव्य झेलना पड़ा। तत्कालीन समाज सुधारकों ने विधवाओं की दो श्रेणियाँ बनाईं - पहली श्रेणी में वे स्त्रियाँ थीं जिन्होंने पति को जाना ही नहीं और रजस्वला होने के पहले ही विधवा हो गईं। दूसरी श्रेणी उन विधवाओं की थी जो संतानवती थीं और सहजीवन जी चुकी थीं। उमा चक्रवर्ती का मानना है कि समाज सुधारक हिन्दू समाज की परंपरागत दृढ़ संरचना को बिना कोई नुकसान पहुँचाए समाज सुधार करना चाहते थे, इसलिए पहली श्रेणी की विधवाओं के पुनर्विवाह का तो समर्थन उन्होंने किया जब कि दूसरी श्रेणी की स्त्रियों को यथास्थिति पालन की ही सलाह दी गई। (रीराइटिंग हिस्ट्री, उमा चक्रवर्ती, पृ. 89 ) पार्वती अठवले ने भी अक्षतयोनि विधवाओं - ऐसी विधवाओं जिनकी कोई संतान न हुई हो, जिनका पति से कोई संसर्ग न हुआ हो, को पुनर्विवाह का अधिकारी माना। (हिन्दू विडो - अ ऑटोबायोग्राफी, पार्वती अठवले, अनु. रे. जस्टिन . एबोट , पृ. 31)

5. दांपत्य - सत्यवती ने ‘आत्मचरितमु’ में लड़कियों के विवाह और दांपत्य के सन्दर्भ में लिखा है – “लड़कियों का विवाह 10 या 12 वर्ष की अवस्था के बाद ही किया जाना चाहिए। उन्हें अपना इच्छित वर चुनने का अधिकार चाहिए। शिक्षित स्त्रियाँ अपने अभिभावकों की अपेक्षा जीवनसाथी का चुनाव बेहतर कर सकती हैं। दांपत्य में आपसी संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं - रीति-रिवाजों की अपेक्षा। यदि कोई स्त्री अपनी पसन्द से पति का चुनाव करती है और आगे चलकर उनके दांपत्य संबंध में किसी प्रकार की कठिनाई आती है तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, उसे ईश्वरेच्छा मानकर संतोष कर लिया जाता है। ऐसे मामलों में स्त्री किसी से शिकायत नहीं कर सकती। क्या सावित्री ने अपने मार्ग में आए कष्टों की परवाह की? पतिव्रताएँ कठिन परिस्थितियों में भी संतुष्टि ढूँढ लेती हैं। यदि लड़कियों को मनपसन्द वर चुनने की छूट हो तो उन्हें अवैध संबंध बनाने से रोका जा सकता है। दाम्पत्य सुख, संसार का सर्वोत्तम सुख है। विशेषकर यदि पति-पत्नी एक-दूसरे से प्रेम करें। स्त्री अपने पति से सर्वाधिक प्रेम करे और पति के प्रति अपने सभी कर्त्तव्यों का पालन करे। कुछ स्त्रियाँ अपने पति के बुरे वक्त में उसकी आलोचना-निन्दा करती हैं और अच्छे वक्त में प्रेम करती हैं। आर्य धर्म यही है कि दोनों, समभाव से, सुख-दुख में एक-दूसरे को प्रेम करें। पति-पत्नी को एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करना चाहिए। पुरुष को यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘सतीत्व’ का प्रश्न उसके लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि स्त्री के लिए।

6. सृजन प्रश्न - सत्यवती का कहना है कि ऐसे बहुत-से प्रश्न हैं, जो अनुत्तरित हैं, जैसे हम इस संसार में क्यों आए हैं? यह संसार किसने बनाया है? इन सब का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है। सिर्फ एक ही ढंग से हम सोच सकते हैं कि हम सब ईश्वर के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। वही ईश्वर पूरे विश्व का नियामक और नियंता है।

7 . मृत्युभोज - सत्यवती का कहना है कि जब जीते जी एक व्यक्ति अपना खाया भोजन दूसरे में स्थानांतरित नहीं कर सकता तब मृत्यु के बाद ब्राह्मणों को खिलाने से मृतक की क्षुधा कैसे तृप्त हो सकती है। मृत्यु के बाद पुत्र ही श्राद्ध का अधिकारी होता है, लेकिन यदि कोई पुत्रहीन हो तो? यदि मृतक पुनर्जन्म लेता है तो श्राद्ध करने का क्या प्रयोजन है? कई लोग अपने माता-पिता से जीते जी तो दुर्व्यवहार करते हैं और मृत्यूपरान्त श्राद्ध-भोज करते हैं। यह सब सामाजिक ढकोसले के अलावा कुछ नहीं है। मृत्यु के बाद किसी के लिए कुछ करने का क्या अर्थ है। श्राद्ध की रीत इसीलिए बनाई गई है ताकि धनी व्यक्ति कम से कम, इस दिन क्षुधित, निर्धनों को अच्छा भोजन खिलाएँ, मृत व्यक्ति के नाम पर अन्न-वस्त्र का दान निर्धनों को मिल सके।

8. ईश्वरीय सत्ता का खेल - सत्यवती का मानना है कि यदि मनुष्य के सभी कार्य विघ्नरहित होते जाएँ तो ईश्वरीय सत्ता पर से उसका विश्वास उठ जाएगा। इसलिए ईश्वर मनुष्य के मार्ग में बाधाएँ और रुकावटें डाल देता है। सुख-दुख सब ईश्वर के रचे हुए खेल हैं।

9 . कर्मफल - मनुष्य द्वारा किए हुए सभी कार्यों का उत्तरदायी कौन है? हम स्वयं कर्त्ता हैं, या ईश्वरीय सत्ता हमसे कर्म करवाती है? हमेशा हमारे कर्मफल इच्छानुरूप नहीं होते। यह कहा जाता है कि जो लोग अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें स्वर्ग और बुरे कर्म करने वालों को नर्क मिलता है। लेकिन क्या किसी ने भी स्वर्ग और नर्क देखा है? क्या किसी ने ईश्वर को देखा है? ग्रंथों में ईश्वर का जो वर्णन मिलता है, क्या वह स्वानुभूत है? स्पष्ट है कि मनुष्य ने स्वयं ही पाप और पुण्य की अवधारणाओं का निर्माण किया है। पापी वही है जो दूसरों का दमन करे और पुण्यकर्ता वही है, जो मनुष्य मात्र के लिए हृदय में प्रेम और दया रखे।

10. ईश्वरीय संसार के अन्तर्विरोध - सत्यवती ईश्वर के बनाए हुए संसार के अन्तर्विरोधों के उदाहरण देती हुई कहती हैं कि ईश्वर ने पाप की रचना की, लेकिन मनुष्यों से कहा कि पाप से दूर रहो। ईश्वर इस जन्म में, हमें पूर्वजन्म के पापों का दण्ड देता है। महाभारत और भागवत जैसी पुस्तकों में पाप और पुण्य की बातें लिखी हैं। उसी ईश्वर ने हम में से किसी को सच्चा और किसी को झूठा इंसान बनाया है - उसी ने हम में से किसी को निर्धन और किसी को धनवान बनाया है। यह क्या विरोधाभास नहीं है? ईश्वर तो भक्तों के रक्षार्थ है, इसके बावजूद वह कभी-कभी अपने भक्तों की रक्षा नहीं करता। क्या यह वादाखिलाफी नहीं है? पतिव्रताओं को जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों को झेलने के लिए ढकेल देना - ईश्वरोचित तो नहीं है न। जब स्वयं ईश्वर में अच्छाइयों और बुराइयों का सम्मिश्रण है तो वह मनुष्यों से कैसे अपेक्षा रख सकता है कि उनमें केवल गुण हों - अवगुणों का लेश भी नहीं? क्या यह ईश्वर की तरकीब नहीं है, चालाकी और अन्तर्विरोध नहीं है? इसलिए अच्छा है कि ईश्वर की मिथ्याचारिता में विश्वास करने और भ्रम में जीने की अपेक्षा मनुष्य मात्र में विश्वास किया जाए।

सत्यवती के ‘आत्मचरितमु’ का विश्लेषण दो स्तरों पर किया जाना चाहिए। पहले विश्लेषण का आधार पाठ हो सकता है, अर्थात पाठ का गहन विश्लेषण और दूसरे विश्लेषण का आधार व्यापक सामाजिक संदर्भ हो सकता है। चूँकि ‘आत्मचरितमु’ में आत्मकथाकार के जीवन से संबंधित किसी भी तिथि का अभाव है, अतः गहन पाठ विश्लेषण ही हमें विश्लेषण के द्वितीय चरण तक पहुँचा सकता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सत्यवती की आत्मकथा के पहले और दूसरे भाग में तनाव दिखाई देता हैं। पाठक चाहे तो दोनों को स्वतंत्र रूप से अलग-अलग भी पढ़ सकता है। पहला भाग पूरी तरह सत्यवती के जीवन की वैधव्यपर्यन्त घटनाओं तक सीमित है और दूसरा उनकी ‘विश्वदृष्टि’ को बताने के लिए लिखा गया है, जिसमें किसी भी जीवन प्रसंग का नितांत अभाव है। भूमिका में सत्यवती ने पुस्तक के उद्देश्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि स्त्री जाति के दमन के प्रतिरोध में वह पुस्तक लिखने में प्रवृत्त हुई हैं। पुस्तक के दूसरे भाग में इसलिए वह स्वयं को ‘पतिव्रता’ कहती हैं और समाज, ईश्वर, परंपरा, रीति-रिवाज की तीक्ष्ण आलोचना करने का लाइसेंस भी प्राप्त कर लेती हैं।

यहाँ सवाल है कि क्या वह ईश्वर, ईश्वरीय सत्ता, परम्परा, रीति-रिवाज का तर्कपूर्ण विश्लेषण करने या उनका कोई विवेकपूर्ण समाधान खोजने में सक्षम हो पाई हैं? पाठ विश्लेषण बताता है कि प्रारंभिक अंशों में आलोचना का स्वर तीक्ष्ण और कटु है जो परिशिष्ट तक आते-आते मद्धम और भोथरा हो गया है। वे रीति-रिवाजों, रूढ़ियों की आलोचना तो करती हैं, लेकिन उनका तर्कपूर्ण समाधान प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं। कभी ईश्वरीय सत्ता में अनास्था की बात करती हैं कभी आस्था और विश्वास की। वे विधवाओं के पुनर्विवाह की हिमायत करती हैं, लेकिन मनुष्यता की दृष्टि से नहीं, तत्कालीन समाज सुधारकों के प्रभावानुरूप। यहाँ तक कि वे वीरेशलिंगम (1848-1919) का हवाला प्रायः 25 वर्ष बाद दे रही हैं। ऐसा लगता है कि वह वीरेशलिंगम की ‘हितकारिणी’ सभा और उसके उद्देश्यों से प्रभावित थीं। (कुंदुकुरी वीरेशलिंगम पंतुलु स्त्री शिक्षा के बड़े पैरोकार और समाज सुधारक थे, ब्रह्म समाज के प्रभावस्वरूप उन्होंने 1908 में राजमुंदरी में पहले थियोसॉफिस्ट हाईस्कूल की शुरुआत की। उन्होंने मद्रास में पहले विधवाश्रम की स्थापना भी की-‘हिस्ट्री ऑफ द ब्रह्म समाज’, शिवनाथ शास्त्री)

‘आत्मचरितमु’ को देखकर कहा जा सकता है कि औपनिवेशिक भारत में बदलते जीवन मूल्यों और बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव से सत्यवती का अच्छा परिचय रहा होगा। यह वह दौर था जब हिन्दुओं के घरेलू जीवन पर ब्रिटिश जीवन शैली के कई सकारात्मक प्रभाव देखे जाने लगे थे। बंगाल पहला प्रान्त था जहाँ के भद्र पुरुषों ने अपने लेखों, पत्र-पत्रिकाओं में घरेलू जीवन विशेषकर स्त्री के आचरण को विचार-विमर्श के लिए विशेष अनुकूल पाया। इसे घरेलू जीवन में सुधार की आकांक्षा कहा जा सकता है। पार्थ चटर्जी का मानना है कि औपनिवेशिक समाज में केवल परिवार और गृहस्थी का क्षेत्र ही ‘उसके’ विशिष्ट ‘निजी’ कार्यक्षेत्र के रूप में बच रहा था। (द नेशन एंड इट्स फ्रेगमेंट्स - कोलोनियल एंड पोस्ट कोलोनियल हिस्टरीज, प्रिंस्टन, 1993 तथा अ कंपेरिजन बिटविन वीमेन एंड मेन, मेरेडिथ बॉर्थविक, ‘द चेंजिंग रोल ऑफ वीमेन इन बंगाल में’, 1849-1905, प्रिंस्टन 1984।)

आंध्र प्रदेश तक आते-आते बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक नौकरीपेशा वर्ग, मध्य वर्ग के नाम से जाना जाने लगा था। इस वर्ग की स्त्रियाँ साक्षरता की पहली सीढ़ी भी पार कर चुकी थीं। सत्यवती ने जिस तरह भावी पति के संग रोमांस का चित्रण किया, वह इस बात की पुष्टि करता है कि नई बदली हुई जीवन शैली के प्रति उनमें आकर्षण था। औपनिवेशिक शासन के अनन्तर पुरुष वर्ग बड़ी तेजी से सरकारी नौकरियों की ओर आकर्षित हो रहा था, जिसने संयुक्त परिवार के विघटन में बड़ी भूमिका निभाई। सत्यवती के पति ने भी नौकरी पाने के बाद परिवार से दूर एकल गृहस्थी बसाई। इस नई एकल परिवार व्यवस्था ने पति-पत्नी को व्यक्तिगत विकास और परस्पर समझ विकसित करने के बेहतर अवसर प्रदान किए होंगे। साथ ही, दांपत्य प्रेम की अभिव्यक्ति के अपेक्षाकृत अधिक अवसर भी उन्हें मिले होंगे, जो पहले से चली आती हुई संयुक्त परिवार व्यवस्था में एक सीमा तक ही संभव था।

दांपत्य प्रेम से मिले ‘आत्मविश्वास’ को सत्यवती के ‘पतिव्रता’ (विधवा होने के बावजूद) के दावे के पीछे पहचानना कठिन नहीं। परम्परा से, भारतीय समाज में ‘विधवा’ का दर्जा अपमानजनक और निचला है। (रीराइटिंग हिस्ट्री : द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ पंडिता रमाबाई, उमा चक्रवर्ती, नई दिल्ली, 1998, पृ. 270-271) सुहागिन स्त्री को पहला दर्जा मिलता है - यदि वह पुत्रवती हो। पुत्रियों वाली माता का स्थान इससे नीचा है। ऐसे में एक विधवा द्वारा ‘पतिव्रता’ पद का दावा करना अपने आप में चली आती हुई व्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण है। दूसरी तरफ सत्यवती ईश्वर, ईश्वरीय सत्ता को तर्कपूर्ण चुनौती देती हैं लेकिन पुनर्जन्म लेकर पति को पुनः प्राप्त करने के लिए पति की तस्वीर की पूजा और ईश्वर से प्रार्थना भी करती हैं।

तीन

‘आमार जीबन’ और ‘आत्मचरितमु’ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दो पड़ावों, समाज और स्त्री मन पर पड़े प्रभावों की पड़ताल करने के लिए विशिष्ट पाठ की भूमिका निभा सकते हैं। राससुंदरी ने 1872 में और सत्यवती ने 1934 में आत्मकथा-लेखन किया - दोनों में लगभग बहत्तर वर्ष का अन्तराल है। सात दशकों के अन्तर को भारतीय स्त्री की मनुष्य के रूप में पहचान और अन्तर्विरोधों के बावजूद हाशिए की आवाज को केन्द्र में सुनवाए जाने की पुरजोर कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। देश के किसी भी अन्य भाग से पहले बंगाल में समाज सुधारों का दौर शुरू हुआ। ब्रह्म समाज के प्रभाव से वीरेशलिंगम ने समाज सुधार के प्रयास प्रारंभ किए। इन समाज सुधारकों की केन्द्रीय चिन्ता स्त्री को लेकर थी। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक ग्रामों तक स्त्री शिक्षा जैसे संदेश क्रिया-रूप में परिणत नहीं हो पाए थे, लेकिन कलकत्ता जैसे शहरों में एक ‘नई स्त्री’ का उदय हो रहा था, जो पूर्व-औपनिवेशिक स्त्री से अलग थी। भले ही विवाह की उम्र 10-12 वर्ष रही हो, लेकिन आर्यसमाज के प्रभाव एवं विभिन्न प्रान्तों के समाज सुधारकों के प्रभाव से वह शिक्षित होने की प्रक्रिया में थी, हालाँकि यह प्रक्रिया असाधारण रूप से मन्द थी। सती प्रथा के विरोध में कानून बन जाने से सार्वजनिक तौर पर किसी भी स्त्री को सती होने के लिए बाध्य करना संभव नहीं रह गया था, हालाँकि देश के कुछ भागों में अब भी यह चोरी-छिपे ही सही, व्यवहार में थी। धीरे-धीरे स्त्रियों के विवाह की न्यूनतम उम्र को लेकर भी समाज सुधारक चिंतित और प्रयासरत दिखाई दे रहे थे। लेकिन यहाँ भी स्त्रियों के सामाजिक विकास की एक सीमा थी। बदले हुए समय में भी वे अंग्रेजी शिक्षा से वंचित ही रखी जा रही थीं, जब कि पुरुषों के लिए अंग्रेजी का ज्ञान नौकरी और सम्मान पाने के माध्यम के रूप में पहचाना जा चुका था। सरकारी नौकरी में स्त्री का कोई स्थान नहीं था। यह एक नई तरह की पितृसत्तात्मक व्यवस्था थी, जिसमें स्त्री पढ़-लिख तो सकती थी लेकिन केवल पौराणिक, आध्यात्मिक ग्रन्थ - जो उसे तर्क की जगह आस्था सिखाएँ। स्त्री भारतीय सामाजिक परंपरागत मूल्यों का सम्मान करे। इन मूल्यों में अनुशासन का पालन, कम खर्च में गृहस्थी चलाने के गुर, घर-रसोई, संतान, पति की देखभाल (कपड़े धोने, साफ-सफाई से लेकर तेल-मसाले ठीक-ठाक रखने तक) तथा और भी अनंत कर्त्तव्य निहित थे। नई बदली परिस्थितियों में स्त्री को अधिकांश काम खुद करने थे। साथ ही, उससे यह भी अपेक्षित था कि वह खुद को पश्चिमी स्त्री से बेहतर साबित करे, यानी सामाजिक मेल-जोल, वेशभूषा, खान-पान, धर्म का ज्ञान ग्रहण करे, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन को न भूले, पति को परमेश्वर मानती रहे। उसे पुरुषों के समान खाने-पीने, बातचीत करने का अधिकार नहीं था। पुरुष की कड़ी निगरानी उस पर रहती थी। व्रत-उपवास से लेकर तीज-त्यौहार, स्त्री धर्म के पालन में दिन-रात के चौबीस घंटे उसके कर्त्तव्य के लिए कम पड़ते थे। यानी ‘‘गृहस्थी को बगैर तितर-बितर किए, बगैर मेमसाहब बने, स्त्री को अपनी सीमाओं में रहकर आजादी तलाशने की चुनौती इस नई पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने दी। (नेशन एण्ड इट्स फ्रेंगमेन्ट्स : कोलोनियल एंड पोस्ट कोलोनियल हिस्टरीज, पार्थ चटर्जी, प्रिंस्टन, 1993)

‘आमार जीबन’ में एक स्त्री का संघर्ष, आत्माभिव्यक्ति की जद्दोजहद और साक्षर होकर अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने की तीव्रतम इच्छा व्याप्त है, इसलिए राससुंदरी देवी विधवा होने को ‘स्वर्णमुकुट के छिन जाने’ का रूपक देती हुई भी पति से स्वतंत्र अपना व्यक्तित्व गढ़ती हैं। पूरी आत्मकथा में सिर्फ एक बार वह कायदे से पति की चर्चा करती हैं - वह भी अति संक्षेप में, पति की निन्दा नहीं करतीं लेकिन पति से ‘भय खाती हैं’ और इस भय को वह बालमन में, माँ के द्वारा बिठाए गए भय से जोड़ती है, जिसके कारण उसका बचपन अन्य सामान्य भारतीय कन्याओं की तरह कुंठित और दमित रह जाता है। ससुराल का प्रत्येक प्राणी उसके लिए डर और भय का कारण है, यहाँ तक कि पति का घोड़ा भी। इसके बरअक्स ‘आत्मचरितमु’ की सत्यवती नई स्त्री है - वह पति के साथ रोमांस का वर्णन साहित्यिक शैली में निर्द्वन्द्व भाव से करती है। सदैव पति का पक्ष लेती है। अकारण नौकरी से निकाल दिए जाने को चुपचाप स्वीकार नहीं करती। पर्याप्त प्रतिकार करती है। सीताराम्मैया की नौकरी लगने के बाद वह पति के साथ गृहस्थी बसाती है, ससुराल की ओर से उसे किसी रोक-टोक का सामना नहीं करना पड़ता। वह स्वतंत्र भाव से दाम्पत्य जीवन जीती है, पति की मृत्यु के बाद उसके प्रेम और सद्गुणों को बार-बार याद करती है। वह दांपत्य जीवन को सुन्दरतम बताती है, क्योंकि पति के साथ वह मित्रवत रही होगी, उसे संयुक्त परिवार की उन रूढ़ियों, परंपराओं को निभाने की जरूरत नहीं पड़ी, जिनके कारण राससुंदरी छिप-छिप कर छपा हुआ अक्षर पढ़ने की जद्दोजहद करती रहीं। राससुंदरी अपने दांपत्य जीवन पर (जो लगभग 46 वर्षों का था) पर अलग से कोई टिप्पणी नहीं करतीं, सिवाय इसके कि इस दौरान उन्होंने 14 बार प्रसव किया। जब कि यह दांपत्य जीवन के गहन आवेग का स्मरण ही है जो ‘आत्मचरितमु’ की सत्यवती को पति के साथ सती होने और आत्महत्या की प्रेरणा देता है। इसके बरअक्स राससुंदरी, जो 59 वर्ष की उम्र में विधवा हुईं, 88 वर्ष की उम्र में, आत्मकथ्य के दूसरे भाग में ईश्वर को, इतनी लंबी उम्र के लिए धन्यवाद ज्ञापित करती दिखाई देती हैं। यह आकस्मिक नहीं कि पति की मृत्यु के ठीक एक वर्ष बाद राससुंदरी देवी ‘आमार जीबन’ का प्रकाशन कराती हैं - क्या इसका प्रकाशन पति, जिसे वे ‘कर्ता’ संबोधित करती हैं, के जीवन काल में संभव था? संभवतः नहीं। संयुक्त परिवार की प्रौढ़ा गृहिणी को भी तब आत्मकथ्य के सार्वजनिक प्रकाशन का साहस होता, इसमें सन्देह है। अन्तःसाक्ष्य बताते हैं कि राससुंदरी पति की मृत्यु के बाद के वर्ष अध्ययन और लेखन को समर्पित करती हैं और अपने समस्त जीवन को ईश्वरीय कृपा मानती हैं। इसकी तुलना में, सत्यवती में एक ढंग का हिन्दू पातिव्रत्य का अहंभाव देखा जा सकता है, जिसे पति में अखण्ड आस्था रखने के कारण ‘पतिव्रता’ की पदवी मिल गई है और साथ ही यह अधिकार भी कि वह ईश्वर की कड़ी आलोचना कर सके।

राससुंदरी देवी ईश्वरीय चमत्कारों, दुर्घटनाओं के पूर्वाभास की चर्चा करती हैं - जिनका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं, वहीं सत्यवती अपने विश्लेषणों में ज्यादा प्रखर और विवेकसम्मत दिखाई देती हैं। वे यूँ ही ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं कर लेतीं। वे संसार, जीव की निर्माण प्रक्रिया पर प्रश्न करती हैं, संतोषजनक उत्तर के अभाव में वे ईश्वरीय सत्ता की उपस्थिति मान लेती हैं और अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि ईश्वर निश्चय ही सर्वशक्तिमान है तभी तो वह इतना बड़ा संसार रच पाया और करोड़ों मनुष्यों को कठपुतली की भाँति नचाता रहता है। वे पाप-पुण्य की परंपरागत अवधारणा (सिंबल्स ऑफ सबस्टांस : कोर्ट एंड स्टेट इन द नायक पीरियड, तमिलनाडु, वेलचेरु नारायण राव, दिल्ली, 1992) को एक सिरे से खारिज कर देती हैं और ईश्वरीय सत्ता की अपेक्षा मनुष्यता में अखण्ड विश्वास रखने का सुझाव देती है। सत्यवती के किसी भी समकालीन समाजसुधारक, रचनाकार में दृष्टि की ऐसी प्रखरता नहीं मिलती। सत्यवती की विश्वदृष्टि के निर्माण में सामाजिक -राजनीतिक आंदोलनों के साथ -साथ स्त्री आंदोलनों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी। इसके अतिरिक्त कुछ पुस्तकों विशेषकर गुडीपति वेंकटाचलम (1894-1979) की ‘स्त्री’, (स्त्री, गुडीपति वेंकटाचलम, विजयवाड़ा, 1961) जिसका प्रकाशन सत्यवती के ‘आत्मचरितमु’ के चार वर्ष पहले 1930 में हो चुका था और ‘सावित्री’ (सावित्री (पौराणिका नाटिकालु), गुडीपति वेंकटाचलम, विजयवाड़ा) शीर्षक नाटक जो 1924 में प्रकाशित हुआ - इन दोनों से सत्यवती भली भाँति परिचित रही होंगी। ‘स्त्री’ में चलम ने स्त्री संबंधी विभिन्न मुद्दों - प्रेम, विवाह, सेक्स, शिक्षा और स्वातंत्र्य तथा पितृसत्तात्मक मूल्यों का विश्लेषण किया था। ‘सावित्री’ नाटक में सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा का नाट्य रूपांतर किया गया, जिसके अंत में यम द्वारा सावित्री के पातिव्रत्य की परीक्षा लिया जाना वर्णित था कि सावित्री ‘पातिव्रत्य’ की रक्षा के लिए ‘यम’ की हत्या करने के लिए भी तत्पर हो जाती है। यम अन्ततः सावित्री के पातिव्रत्य की प्रशंसा करते हैं कि वह सच्ची पतिव्रता है जो पति- प्रेम के लिए कुछ भी करने को तत्पर है।

‘आत्मचरितमु’ से गुजरते हुए बार-बार ऐसा लगता है कि वैधव्य ने ‘सत्यवती’ को विश्वदृष्टि दी। यदि वे विधवा न हुई होतीं तो सामाजिक रूढ़ियों से कोई असंतुष्टि उन्हें संभवतः न होती। कहीं न कहीं उनके अवचेतन में दांपत्य जीवन जीने की प्रबल आकांक्षा है, जिसकी संभावना का अभाव उन्हें कटु बना देता है। वैधव्य के बाद, सत्यवती ने निजी तौर पर क्या झेला, समाज और उसकी रूढ़ परम्पराओं का सामना कैसे किया - इसके बारे में ‘आत्मचरितमु’ मौन है। यहाँ तक कि इसमें तिथियों, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों, हलचलों का उल्लेख तक नहीं मिलता। इस अर्थ में यह आत्मकथा अपूर्ण लगती है।

राससुंदरी की आत्मकथा 88 वर्षों का पूरा वृत्त अपने में समेटे हुए है। रचनाकार का कहना है कि उसकी मृत्यु के बाद परिवार का कोई सदस्य यदि चाहे तो आत्मकथा का तीसरा भाग पूरा कर दे। राससुंदरी में पढ़ने-लिखने की प्रबल आकांक्षा है। उनकी विश्वदृष्टि का निर्माण घर में ही उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थों ने किया है। ‘आमार जीबन’ में भी तत्कालीन सामाजिक हलचलों की कोई आहट नहीं मिलती। राससुंदरी संयुक्त परिवार की गृहिणी हैं जिसे अपने युवा पुत्रों से भी पुस्तक माँगने में संकोच है। वे भरसक चाहती रही हैं कि उनके लिखने-पढ़ने का पता किसी को न चले, क्योंकि लोकनिन्दा होगी। पहला उपयुक्त अवसर मिलते ही ‘आमार जीबन’ लिख डालती हैं और बता देती हैं पाठकों को, कि स्त्री होना एक अभिशाप से कम नहीं - भले ही वह सवर्ण हो या दलित। सवर्ण स्त्री के शोषण में कुल मर्यादा, वंश परंपरा, ब्राह्मणवादी अनुष्ठान, आडंबर अपनी-अपनी आतंककारी भूमिका निभाते हैं - स्त्री केवल ‘श्रमिक’ है, दिन-रात के घरेलू श्रम के बदले में भी उसे ‘उत्पादक’ का दर्जा अप्राप्य है। संतान पैदा करना गार्हस्थ्य धर्म का अंग है - उसमें कैसा वैशिष्ट्य? पूरे दिन काम करने के बाद भी नियमित एवं पोषक आहार मिलने की कोई गांरटी नहीं। उसे अपनी तकलीफ को घूँघट के भीतर छिपाकर ‘सद्गृहिणी’ के खिताब के लिए निरन्तर श्रमशील रहना है, वह निंदा के भय से अपनी भूख-प्यास सब मार देती है। पति के लिए उसका अस्तित्व शारीरिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले उपकरण का है। घर की साज-सँभाल, बच्चों की देख-रेख के बाद जब वह गृहस्थी के बोझ को नई पीढ़ी को सौंप देती है तभी मुक्ति की साँस ले पाती है। लेकिन ऐसी कितनी स्त्रियाँ निजी विलाप को रचनात्मकता में परिणत कर पाती हैं? करती भी हैं तो पाठकीय रुचि, लोकनिन्दा का भय, सामाजिक अस्वीकृति का भय इतना हावी रहता है कि आत्माभिव्यंजना को आध्यात्मिक खोल ओढ़ाए बिना काम नहीं चलता। राससुंदरी इसी आध्यात्मिक आवरण में आत्मकथ्य कहती हैं, जिसमें अदेखे ईश्वर से निरंतर शिकायत की व्यंजना प्रच्छन्न है - वस्तुतः वही समूची रचना का अन्तर्वर्ती सुर है। राससुंदरी कहीं भी ईश्वर निन्दा नहीं करतीं, उलाहना नहीं देतीं, लेकिन दो -दो दिन निराहार रहकर भी जी जाने को, बीस-बीस घंटे निरन्तर श्रमशील रहकर भी, बीमार न पड़ने को ‘ईश्वरीय चमत्कार’ से कम नहीं मानतीं। प्रच्छन्न व्यंग्यात्मकता पूरी कृति को विवेक दृष्टि से रचित परिपूर्ण आत्मकथ्य बनाता है।

अब ‘आत्मचरितमु’ को देखें, जहाँ नव्यपितृसत्तात्मक व्यवस्था में जी रही अपेक्षाकृत स्वतंत्र स्त्री है। लेकिन उसकी सारी स्वतंत्रता ‘पति’ पर अवलंबित है, जिसके मरते ही सारी स्वतंत्रता छिन जाती है। उसे वापस उसी रुढ़िबद्ध पितृसत्तात्मक समाज में लौट आना पड़ता है। यह ‘नई स्त्री’ मानसिक तौर पर अपेक्षाकृत ज्यादा कन्फ्यूज्ड है, उसने ‘मुक्ति’ का स्वाद चखने के बाद बंधन पाए हैं।

सत्यवती विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर किसी विशिष्ट स्त्रीवादी दृष्टि का अनुगमन करती नहीं दिखाई देती हैं। वे पुरुष समाज सुधारकों की तर्ज पर ही संतानवती और पति-संसर्ग कर चुकी विधवाओं के पुनर्विवाह से सहमत नहीं हैं। जब कि देखा जाए तो जब वे ‘विधवा’ होकर के ‘पतिव्रता’ का दावा करती हैं तो पुनर्विवाह के लिए ‘अक्षतयोनि’ होने की शर्त क्यों? राससुंदरी देवी भी भारतीय विधवाओं की दुर्दशा, उनके लिए बनाए गए कड़े नियमों की आलोचना करती हैं, क्योंकि वैधव्य के बाद स्त्री से उसके अच्छा दिखने का अधिकार छीन कर एक ढंग से उसके बधियाकरण की प्रस्तावना की जाती है।

नवजागरण के दौर में लगभग प्रत्येक भारतीय भाषा में स्त्रियाँ आत्मकथ्य रच रही थीं। कुछ का प्रकाशन हुआ, कुछ विस्मृति के गर्भ में अभी भी हैं। ‘सत्यवती’ की आत्मकथा आंध्र प्रदेश राज्य आर्काइव के पन्नों से बमुश्किल बाहर आ पाई। इस तरह के अनुसंधान एवं पाठ विश्लेषण स्त्री लेखन को नया आयाम देंगे, ऐसी संभावना है।

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लेख के शीर्षक में ‘प्रति-आख्यान’ शब्द में 'प्रति' विरोध या विरुद्ध के अर्थ में है। (सन्दर्भ : संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, वामन शिवराम आप्टे)


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