सुकवि की कविता की हरी-भरी मनहर काई से गिरता हूँ फिसल कर वापस उसी जगह पर अपने अनगढ़पन पर इतराती हुई है जहाँ प्रकृति एक आँकी-बाँकी नदी है जहाँ कुछ भी नहीं करीने से न पेड़ न पहाड़ न लाग न लोग
यह दुनिया सुकवि की चिकनी मेज की तरह समतल नहीं...।
हिंदी समय में कुमार अनुपम की रचनाएँ