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तब तक क्षमा करना
घुघूतीबासूती


मैं पॉलिथिन को उसकी जान निकलने तक रीसायकल करती हूँ। अपने पर्स में सदा, नायलोन का पतला थैला व कई पॉलिथिन बैग रखती हूँ। सदा उन्हीं में समान लेती हूँ। दुकानदार यदि सामान नए पॉलिथिन बैग में डालकर भी दे तो उसे वापस देकर अपने थैले में डालती हूँ। यदि ढंग की खरीददारी के लिए जाती हूँ तो बहुत सारे कपड़े के थैले व छोटे पॉलिथिन साथ लेकर जाती हूँ। मेरी महरी तक मेरे पॉलिथिन न फेंकने के बारे में जानती है। और यह आज की बात नहीं, बहुत पुराने समय से कर रही हूँ।

जन्म से लेकर आज तक लगभग सदा बिजली-पानी का बिल, जिन कारखानों में पिता और फिर पति काम करते थे व करते हैं, वे ही भरते रहे हैं। किन्तु कहीं भी अधिक बिजली खाने वाला साधारण बल्ब नहीं लगाती। बिजली की बचत के पीछे हाथ धोकर पड़ी रहती हूँ। हर दिन घर का कोई न कोई प्राणी मेरी इस आदत से परेशान होता है।

कार का उपयोग करने का मुझे बहुत दुख है। यदि मैं नित नौकरी पर जा रही होती तो शायद कार में न जाती। हमें कार का कोई विकल्प ढूँढ़ना ही होगा। जब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहतर नहीं होता, टैक्सी एक विकल्प हो सकती है। कम से कम एक ही टैक्सी का दिन में सैकड़ों लोग तो उपयोग करते हैं। पेट्रोल की बचत न भी हो पाए तो कम से कम सड़कों पर कुछ कारें तो कम उतरेंगी।

मैंने जीवन में सकड़ों वृक्ष तो लगाए ही होंगे। जितनी बार बदली होकर नए मकान में गई हूँ वहाँ अधिक से अधिक पेड़ लगाए हैं। मकान के बगीचे ही नहीं, उसके आसपास भी।

हम जो कुछ भी उपयोग करते हैं उसके लिए अपनी इस धरती को कुछ न कुछ कीमत चुकानी ही पड़ती है। वह भी हमारे उपयोग में आने वाली वस्तुओं को वैसे ही पैदा करती है जैसे अपने शरीर से माँ संतान को। सो धरती को जितना कम कष्ट देंगे वह उतनी ही खुश, सुन्दर व स्वस्थ बनी रहेगी।

इतने प्रयास के बाद भी धरती के प्रति न जाने कितने पाप करती ही रहती हूँ। आशा है कि समय के साथ समझ बढ़ने के साथ पर्यावरण के प्रति और सतर्क रहूँगी। शायद अन्य भी हो जाएँगे। समझदारी से नहीं तो कानून के डंडे से डरकर।

तब तक प्रकृति हमें क्षमा करना। हाँ, बीच-बीच में बिना जीवन लिए हल्के-फुल्के पाठ भी पढ़ाती रहना।

बटन टाँगने की शैली

विचित्र बात है कि टीवी व शायद सिनेमा में भी प्रायः स्त्रियाँ पति/ प्रेमी की कमीज में तब बटन टाँक रही होती हैं जब वह उसे पहन चुका हो। मैं काफी सिलाई करती हूँ किन्तु यूँ बटन तो कभी नहीं टाँका। क्या इसलिए क्योंकि मैं पहले से ही कमीजें देखभाल कर रखती हूँ या पहनने वाला टूटे बटन वाली कमीज पहनकर बटन लगवाने आने के बजाय दूसरी पहन लेता है? जो भी हो, मैं खतरनाक सुई लेकर खतरनाक मुद्रा में बड़े प्रेम से निहारे जाने के सुख से तो वंचित रही। वैसे सबसे बेहतर दर्जी पुरुष होते हैं तो आम पुरुष सुई में धागा डाल उधड़े में दो टाँके या एक टूटा बटन क्यों नहीं लगा पाता?

ghughutibasuti.blogspot.in


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