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फाँसी का औचित्य
मोहन राकेश


एक व्यक्ति को इसलिए फाँसी की सजा दे दी जाती है कि वह व्यक्ति न्याय-रक्षा के लिए खतरा है। वह व्यक्ति जो न्याय-रक्षा के लिए खतरा हो सकता है, वह नि:सन्देह उस न्याय से अधिक शक्तिवान होना चाहिए।

न्याय, जो सदियों से नस्लों और परंपराओं का सामूहिक कृत्य है, यदि एक व्यक्ति के वर्तमान में रहने से अपने लिए आशंका देखता है, तो वह न्याय जर्जर और गलित आधार का न्याय है।

वास्तव में ऐसे न्याय के लिए खतरा कोई एक व्यक्ति नहीं होता - व्यक्ति तो उसके लिए खतरे का संकेत ही हो सकता है। उसके लिए वास्तविक खतरा भविष्य है, जिसे किसी भी तरह फाँसी नहीं दी जा सकती।

अतीत कभी भविष्य के गर्भ से बचकर वर्तमान नहीं रह सका।

समय सदा दिन के साथ और अगले कल का साथ देता है।

मनुष्य को फाँसी देकर नष्ट करना वहशत ही नहीं, पागलपन भी है। यह पागलपन और वहशत डरे हुए हृदय के परिणाम होते हैं जो अपने पर विश्वास और नियन्त्रण खो देता है।

समय ऐसे हृदयों का साथ नहीं देता।

वे झडक़र नष्ट हो जानेवाले पत्ते हैं, जो झड़ने से पहले अपनी कोमलता खो बैठते हैं।

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एक वस्तु का अपना प्राकृतिक गुण होता है। व्यक्ति का भी अपना प्राकृतिक गुण होता है। मूल्य व्यक्ति और वस्तु के प्राकृतिक गुण का न लगाया जाकर प्राय: दूसरों की उस गुण को बेचने की शक्ति का लगाया जाता है। संसार में जितने धनी व्यक्ति हैं, उनमें से अधिकांश दलाली करके - वस्तु या व्यक्ति के गुण को बेचने में माध्यम बनकर - धन कमाते हैं। यह दलाली वस्तु और व्यक्ति के वास्तविक मूल्यांकन और मूल्य ग्रहण में बाधा है।

जिस हवा में फूल अपने पूरे सौन्दर्य के साथ नहीं खिल सकता, वह हवा अवश्य दूषित हवा है। जिस समाज में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का पूरा विकास नहीं कर सकता, वह समाज भी अवश्य दूषित समाज है।

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मासूमियत और धूर्तता के बीच कभी-कभी बहुत सूक्ष्म रेखा होती है जिसे आदमी पकड़कर भी पकड़ नहीं पाता। कहीं समझ में आ जाता है कि यह ऐसे है - फिर भी आदमी दूसरे को 'बेनीफिट ऑफ डाउट' दिए जाता है। परिणाम आखिर वही निकलता है जिसकी कि उम्मीद होती है। मगर यह मीठा धोखा खाने का खेल वह फिर-फिर खेलता जाता है। शायद इससे भी अपने अन्दर की ही कोई जरूरत पूरी होती है।

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इसमें क्या सार्थकता है कि आदमी एक ही जिए हुए दिन को बार-बार जिए : फिर-फिर से उसी तरह, उसी क्रम से और उसी दायरे में। वही बातें करे - या वे नहीं तो वैसी ही। उसी तरह हँसे। उसी तरह हैरानी जाहिर करे। उसी तरह बैठे। उसी तरह उठे। और उसी तरह मुँह उठाए। कल की तरह आज भी बस के क्यू में आ खड़ा हो?

एक घटनाहीन घटना अपने अन्दर घटित होती रहती है - घटनाहीन नहीं, क्रियाहीन। वह जो मन को, मनन को, ग्रहणहीन अनुभूति को एक प्रलक्षित क्रम से तोड़कर फिर-फिर से बनाती चलती है। हर आज, हर बीते कल का परिणाम होता है, उसका नया, बदला हुआ संस्करण, उससे समृद्ध और परिष्कृत। पर यह घटना क्या सभी के अन्दर घटित होती है? होती हो, तो क्यों फिर...?

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...हिमालय जिसने अनन्त विचारों को जन्म दिया है, क्या उस समुद्र से कम महान है जिसके प्रति वे सब निर्झर समर्पित हैं?

...अपनी विस्मृति ही जीवन का रहस्य है, दूसरे की प्रतिभूति नहीं।

...सम्बन्ध तो संयोग है, चांस है, एक घटना है। उसे पुरानापन छा लेता है। नित्य नूतन अपना काल है, जो घटना नहीं, चांस नहीं, संयोग नहीं।

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किसी भी अपरिचित व्यक्ति से, चाहे उसकी भाषा, उसका मजहब, उसका राजनीतिक विश्वास तुमसे कितना ही भिन्न हो, यदि मुस्कराकर मिला जाए तो जो तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाता है, वह कोरा मनुष्य होता है : कुछ ऐसी ही मुस्कराहट की प्रतिक्रिया नाना व्यक्तियों पर मैंने लक्षित की है। यह ठीक है कि बाद में भाषा, मजहब और विश्वास के दाग उभर आते हैं, परन्तु वे सब फिर उस वास्तविक रूप को छिपा नहीं पाते, और मनुष्य की मनुष्य से पहचान बनी रहती है। मुझे याद आता है कि डेल कार्नेगी की पुस्तक 'हाउ टु विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लुएंस पीपल' में एक जगह उसने लिखा है कि ''जब अपरिचित व्यक्तियों से मिलो, तो उनकी ओर मुस्कराओ।'' यद्यपि लेखक एक मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन करने में सफल हुआ है, फिर भी मनुष्यता के इस गुण का व्यापारिकता, और परोक्ष लाभ की कूटनीति से सम्बन्ध जोडक़र उसने एक अबोध सत्कौमार्य को कटे-फटे हाथों से ग्रहण करने की चेष्टा की है। वह मुस्कराहट जो तहों में छिपे हुए मनुष्यत्व को निखारकर बाहर ले आती है, यदि सोद्देश्य हो तो, वह उसके सौन्दर्य की वेश्यावृत्ति है।


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