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मैं किस तरह लिखती हूँ?
गेब्रिएला मिस्‍त्राल


हम स्त्रियाँ केवल कुछ ठिठोली या परिहास करने के लिए नहीं लिखतीं कि कुछ खास लम्‍हों के लिए लेसवाली जैकेट लटकाकर इतराते हुए बड़े सजीदा ढंग से महोगनी डेस्‍क पर बैठ जाती हों।

मुझे अपने घुटनों पर रखकर लिखना पसंद है। मुझे कभी मेज की जरूरत नहीं पड़ी। चिली, पेरिस या लंदन - कहीं भी नहीं।

मैं केवल सुबह या रात को लिखती हूँ। दोपहर मुझे कभी लिखने के लिए प्रेरित नहीं करती। मैं कभी इसकी सृजनहीनता, इसके बाँझपन की वजह नहीं समझ पाती और न ही इस समय सृजन की कोई इच्‍छा मुझमें जगती है।

मैंने कभी कोई कविता बंद कमरे में या नीरस दीवार की तरफ मुँह करके नहीं लिखी। मैं हमेशा आसमान से उसकी पूरी नीलिमा भरा एक टुकड़ा लपक लेती हूँ जो चिली ने मुझे दिया है। यूरोप से मुझे बादलों से आच्‍छादित टुकड़ा मिला है। जब मैं अपनी थकी आँखों से दूर सीधी दिशा में वृक्षों के झुंड देखती हूँ तो मेरा मन खिल उठता है।

जब मैं अपनी नस्‍ल और अपने देश की एक बच्‍ची थी, तब मैं वही लिखती थी जो मैं अपने आसपास देखती थी या जो मुझे सहज हासिल था - विषय की पूरी उष्‍मा के साथ। चूँकि मैं स्‍वभाव से खानाबदोश हूँ, स्‍वेच्‍छा से चुने निर्वासन में रहते मुझे ऐसा लगता है कि मैं एक ऐसी केंद्रीय जगह से ही लिखती हूँ जो प्रेतों की रहस्‍यात्‍मकता से घिरी हुई हो। अमरीकी धरती, मेरे अपने लोग वे चाहे जीवित हों या मृत; एक अवसाद में डूबे हुए एक निष्‍ठावान जुलूस की शक्‍ल में मेरे पास लौटते हैं। ये केवल मुझे घेरते ही नहीं, मुझे पूरी तरफ ढाँप लेते हैं और मुझे उत्‍पीड़ित करते हैं। शायद ही कभी ये मुझे दूर-दूर तक फैले नजारे और विदेशी लोगों को देखने देते हैं। जब मैं लिखती हूँ, आमतौर पर कभी भी जल्‍दबाजी में नहीं होती; कभी-कभार ऐसा भी समय होता है जब मैं ऐसी गति से लिखती हूँ जैसे पर्वत शिखर से पत्‍थर लुढ़कते चले जा रहे हों। पर दोनों ही मामलों में यदि मुझे रुकना पड़े तो बड़ी झुँझलाहट होती है; मैं हमेशा चार-छह नुकीली पेंसिलें पास रखती हूँ क्‍योंकि मैं बहुत आलसी हूँ। आराम की ऐसी आदत पड़ चुकी है कि मैं चाहती हूँ सब कुछ मुझे तैयार मिले - सिर्फ कविताओं को छोड़कर...

लिखते वक्‍त जब मैं भाषा से जूझती हूँ, उसकी पूरी तन्‍मयता, तीव्रता की उम्‍मीद कर रही होती हूँ तब मुझे अपने भीतर बेहद क्रोध से दाँतों के किटकिटाने, शब्‍दों की नुकीली धार पर सैंड पेपर के रगड़ने की तीखी आवाज सुनाई पड़ती है।

अब मैं शब्‍दों के साथ नहीं जूझती किसी और चीज से जूझती रहती हूँ... मुझे अपनी कविताओं से एक अरुचि और एक खास तरह का विराग पैदा हो गया है। वहाँ मैं ऐसी किसी बोली गई भाषा को नहीं पहचान पाती जिसे डान माइगुएल दि बास्‍क ने "बातचीत की भाषा" कहा है।

मैं अपनी कविताओं में इतनी बार रद्दोबदल करती हूँ कि शायद ही कोई विश्‍वास करेगा। पढ़ते समय अपने अंतिम रूप में भी मुझे अपनी कविताएँ रफ ही लगती हैं। मैं जो कुछ भी रचती हूँ - कविता या गद्य उसमें मुझे लगता है मैंने अपने पीछे पर्वतों की भूलभुलैया को छोड़ दिया है। इस गाँठ में कहीं कुछ ऐसा जिसे खोला नहीं जा सकता, वह जो मैं रचती हूँ उसमें बसा रहता है। लिखना मुझे खुशी से भर देता है। उससे हमेशा मुझे एक अंदरुनी सुकून मिलता है। यह एक वरदान है जो मुझे मासूम, सुकोमल और बच्‍चों जैसे सरल दिन का उपहार देता है। यह एक ऐसी अनुभूति है जब लगता है कि मैंने अपनी सरजमी पर कुछ घंटे बिताए हैं जहाँ मेरे अपनी रीति-रिवाज, मेरी अपनी खामखयाली और मेरी अपनी स्‍वच्‍छंदता है।

मुझे स्‍वच्‍छ कमरे में लिखना भाता है हालाँकि मैं बेहद अव्‍यवस्थित किस्‍म की प्राणी हूँ। मेरी आँखों और आत्‍मा को इस खुली 'जगह' की बड़ी प्‍यास रहती है। कई बार पास की गली में बहती हुई पानी की धार की लय का अनुसरण करते हुए मैंने कुछ लिखा है - अथवा कई बार में प्रकृति की आवाजों का अनुगमन करती हूँ। सभी कुछ मेरे भीतर पिघल जाता है और एक लोरी का रूप धर लेता है।

दूसरी तरफ मैं कथात्‍मक कविताएँ भी लिखती रहती हूँ जो युवा कवि बेहद नापसंद करते हैं।

कविता मेरी इंद्रियों को और उस सबको बहुत सुख देती है जिस मैंने "आत्‍मा" कहा है - पर अपनी कविता से ज्‍यादा किसी और की कविता। दोनों से ही मेरे खून का संचार बढ़ जाता है। ये मेरे बालसुलभ स्‍वभाव की रक्षा करती हैं, मुझे नवजीवन देती हैं और दुनिया के बारे में मुझे एक तरह से रोग-मुक्त हो जाने का अहसास कराती हैं। कविता बस मेरे भीतर बसी हुई है। मेरी गोद में विराजमान है, यह एक जलमग्‍न बचपन की प्‍यास है। हालाँकि इसका जो फल है वह तीखा और कठिन है पर जो कविता मैं करती हूँ वह मुझे दुनिया के ओछेपन से बचाती है, यहाँ तक कि यह ऐसी अभेद्य, अनिवार्य दुष्‍टता से भी बचा लेती है जिसे हम 'बुनियादी पाप' के रूप में जानते हैं। मैं इसे अपने साथ रखती हूँ; मैं इसे पूरी पीड़ा के साथ अपने साथ रखती हूँ। वास्‍तव में 'बुनियादी पाप' और कुछ नहीं, हमारा एक सचेत और तार्किक, लय-विहीन, अभिव्‍यक्ति में हुआ पतन है, जिसने मानव जाति को नीचे गिराया है। यह हम स्त्रियों को अधिक पीड़ा देता है क्‍योंकि हमने उस आनंद को खो दिया है; वह संगीतमय और अंतःस्‍फूर्त सहज भाषा की गरिमा जिसे इस मानव जाति की भाषा बनना था।

अपने अनुभव के बारे में तो बस इतना ही जानता हूँ मुझे इससे अधिक खोजने के लिए बाध्‍य न करें...


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हिंदी समय में गेब्रिएला मिस्‍त्राल की रचनाएँ