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कविता पढ़ने की कला
मिरोस्‍लाव होलुब


जो वास्‍तविक अर्थों में कवि होते हैं, उनके कविता पढ़ने के कुछ बड़े कठोर नियम हैं। सबसे पहले तो यह कि उनमें एक कामचलाऊपन होना चाहिए; वे पूरी तरह से अस्‍त व्‍यस्‍त होने चाहिए। आप यदि कवि हैं तो जिन कागजों में से आप कविताएँ पढ़ेंगे केवल उन्‍हीं कागजों को लेकर आपको मंच पर नहीं पहुँचना चाहिए। आपके पास एक बड़ा-सा झोला होना चाहिए जिसे पढ़ते समय लापरवाही से कहीं पटक देना चाहिए। इस झोले में से आपको अपनी पुस्‍तकें धीरे धीरे एक-एक कर निकालनी चाहिए ताकि लोगों को यह पता चले कि आपने अब तक कितनी किताबें प्रकाशित कराई हैं। कविता पढ़ने से पहले आपको अपनी कविता पुस्‍तक के पृष्‍ठ लगातार पलटते हुए बीच में कुछ भेद भरे जुमले कहते हुए सभाकक्ष में बैठे श्रोताओं में एक तनाव को पैदा करना चाहिए। अब देखें कि इसके बाद आपको क्‍या करना है। आप कभी भी अपने लिए निर्धारित समय की परवाह न करें। केवल कवि यशःप्रार्थियों की भीड़ ही ऐसा करती है। कविता पढ़ते समय कविताओं को चिन्हित करने के लिए आपने जो पर्चियाँ किताब के पृष्‍ठों में बीच-बीच में रखी थीं, उन्‍हें जमीन पर गिरा दें। आप किसी भी तरह का कचरा फैलाएँगे वह अपके आजाद व्‍यक्तित्‍व की निशानी होगी। और भी ज्‍यादा आजाद व्‍यक्तित्‍व के लिए जरूरी है कि आप मंच पर शिष्‍ट व्‍यवहार के किसी भी नियम का पालन न करें। मंच पर आते समय बेहतर होगा आप अपनी पतलून को दोनों बाहों से खींचकर अपने पेट पर चढ़ा दें। आप बार-बार सिर खुजाते रहें क्‍योंकि इससे आपकी प्रतिभा और गहरी सृजनात्‍मक क्षमता का पता चलता है। कभी भी किसी सामान्‍य नागरिक की तरह कपड़े न पहनें। वास्‍तविक कवि की छवि के लिए जरूरी है कि आपको सिर पर कुछ पहने होना चाहिए। वह डेनिम की चिमनी हो सकती है, एक बास्‍केटबाल खिलाड़ी की कैप भी हो सकती है। यह उलटकर पहनी होनी चाहिए ताकि पता चले कि एक सच्‍चा कवि कैंसरजन्‍य रेडिएशन के सम्‍मुख बिना किसी रक्षात्‍मक उपाय के खड़ा है।

आयोजकों को भी कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। कविता वाचन कार्यक्रम के पहले उन्‍हें मंच पर लगे माइक और प्रकाश व्‍यवस्‍था की जाँच हर्गिज नहीं करनी चाहिए। गड़बड़ी होने की स्थिति में बिजली मैकेनिक की ढूँढ़ मचना जो एन वक्‍त पर कहीं भाग जाता है, एक खास तरह के नाटकीय संवेग को पैदा करता है जो अन्‍यथा आपकी कविताओं में मौजूद नहीं होता। जो सचमुच कल्‍पनाशील आयोजक होते हैं वे मंच पर पढ़ने का ऊँचा स्‍टेंड, कुर्सी या तिपाई रखना भूल जाते हैं। मंच पर दिखाई देता खालीपन श्रोताओं में वही भाव जगाता है जो 'वेस्‍टलैंड' या 'हाउल' जैसी कविता को पढ़कर जगता है। इसके अलावा मंच पर पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ जितना संभव हो सके उतनी ऊँची और अदृश्‍य होनी चाहिए। इससे कवि को अपनी कुछ शारीरिक चपलता और अतींद्रिय दृष्टि प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। कला की रहस्‍यात्‍मकता को बढ़ाने के लिए कवि के जो परिचयात्‍मक विवरण दिए जाएँ वे दस वर्ष से अधिक पुराने होने चाहिए। कवि को अपना दस वर्ष पुराना फोटोग्राफ छपाना चाहिए।

दक्षिण अफ्रीका के डरबन में नाताल विश्‍वविद्यालय के हावर्ड कालेज के विशाल सभागार में इनमें से कुछ नियमों का पालन किया गया था। हालाँकि सारे नियमों का पालन वहाँ भी नहीं हुआ। मैं हमेशा की तरह कुलीन कवियों से अलग दिखना चाहता था। पर मेरा क्रम आने के पहले ही महान जुलु कवि मात्‍सी क्‍युनेने को कविता पढ़ने के लिए बुला लिया गया। क्‍युनेने एक विशाल काया और श्‍वेत केशों वाले अश्‍वेत कवि हैं। उनके साथ दो अश्‍वेत भी बड़े-बड़े मृदंग लिए वहाँ पहुँचे और स्‍टेज के पार्श्‍व में बैठ गए। आठ से सोलह वर्ष की आयु के आठ जुलु लड़के भी थे जिनमें से प्रत्‍येक के हाथ में एक कागज था। इन लोगों ने जर्सी और पतलूनों वाली खास वर्दियाँ पहन रखी थीं और ये मंच पर आकर माइक को जिस तरह घेर कर खड़े हो गए वह घबराहट पैदा करने वाला दृश्‍य था। ये डरबन की सड़कों के आवारा बच्‍चे थे और मात्‍सी क्‍युनेने ने इन्‍हें अपनी छोटी-छोटी आत्‍म‍कथाएँ लिखना और पढ़ना सिखाया था। क्‍युनेने ने ढोल बजाने वालों को निर्देश दिया और उनका संचालन करने लगे। ढोल बज रहे थे, लड़कों के एकरस बालसुलभ स्‍वर उठते और गिरते थे। लड़के कागज पर अपने शब्‍दों का अपनी उँगलियों के साथ पीछा कर रहे थे। वे भावनाएँ ज्‍यादा प्रदर्शित नहीं कर रहे थे क्‍योंकि वे अक्षरों के अर्थ खोजने की प्रक्रिया में उलझे हुए थे। यह सारा कुछ पूरी तरह आयोजित था, आकस्मिक नहीं था। यह कविता के पठन का सर्वश्रेष्‍ठ रूप था। मैं इससे बेहतर तरीके की कल्‍पना नहीं कर सकता।

मुझे लगता है कि कोई भी कविता मृदंगों के साथ बेहतर प्रभाव छोड़ेगी। पर उन लड़कों का जो सादगी भरा, लड़खड़ाता-सा पाठ था, जिसमें उनके इस संसार में पैदा होने, खो जाने, पाए जाने, बचे रहने की दास्‍तानें थीं, वह इस तरह की मंच व्‍यवस्‍था में एक जीवंत अनुभव था। कला थी। पर उसमें बनावट नहीं थी। यह कुछ इस तरह था कि कविता का जन्‍म हुआ था - बिना कृत्रिम गर्माधान के।

अब जब इसकी तुलना हम मुख्‍य धारा की कविताओं से करें तो इन कविताओं के पाठ (मैं इन्‍हें केवल जुलु से हुए अनुवादों के माध्‍यम से ही समझ सकता था) एकदम सादा से वक्‍तव्‍य थे; वे कही भी उस तरह की शिकायतें नहीं थीं जो हमारी उत्‍तर आधुनिक काव्‍यात्‍मक आत्‍मस्‍वीकृतियों के मूल में हैं। उस दिन नाताल विश्‍वविद्यालय के हावर्ड कालेज थियेटर में यह भावना रह रहकर उठ रही थी कि बहुधा तो हम केवल कविता के खेल खेलते हैं - अपनी पीठ पर लिखे ऐसे शब्‍दों के साथ कि 'आश्‍चविच के बाद अब कविता नहीं लिखी जा सकती'। शायद यही सबकुछ है जो हम कर सकते हैं - हम सड़कर के उन मैले-कुचैले, कविताओं से भरे आवारा बच्‍चों की तरह व्‍यवहार करना चाहते हैं। ढोल-मृदंग हों या न हों, बात कुछ बनती नहीं।

मात्‍सी क्‍युनेने और उनके उस समूह को कविता वाचन के प्रत्‍येक कार्यक्रम में, हर समारोह और उत्‍सव में याद किया जाना चाहिए हालाँकि उस सब की नकल की ही नहीं जा सकती (यह अपने आप में एक गहरे अर्थ में कविता होने का प्रमाण है)।


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हिंदी समय में मिरोस्‍लाव होलुब की रचनाएँ