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कविता

अभिनेता और श्रमिक
ओसिप मांदेल्श्ताम


जलक्रीड़ा प्रेमियों के क्‍लब के अहाते में
जहाँ ऊँचे हैं मस्‍तूल, लटके हैं सुरक्षा-पहिए
समुद्र के पास दक्षिण के आकाश के नीचे
बन रही है खुशबूदार लकड़ी की दीवार।

यह खेल है जो खड़ी कर रहा है दीवार।
काम करना भी क्‍या एक तरह का खेल नहीं?
चौड़े मंच के ताजा तख्‍तों पर
कितना रोमांचक है पाँव रखना पहली बार!

दुनिया की डेक पर खड़ा अभिनेता भी है पोतचालक,
लहरों पर बना है उसका घर।
स्‍नेहभरे हाथों के भारी हथौड़े से
नहीं डरी है वीणा कभी आज तक।

कलाकार का कथन होता है श्रमिक का भी कथन :
सच कहें तो हमारा सत्‍य भी होता है एक ही!
जिस उद्देश्‍य के लिए जीता है मिस्‍त्री
उसी के लिए जीता है सर्जक भी।

धन्‍यवाद सबका! रात-दिन मिलकर
बनाते रहे हम, लो, अब तैयार हुआ घर।
सख्त भंगिमा वाले इस मुखौटे के भीतर
छिपाये होता है मजूर आने वाले समय की विनम्रता।

कविता की प्रसन्‍नचित्‍त पंक्तियों मे से महक आती है समुद्र की
खेल दिये गये हें रस्‍ते पोत के - शुभयात्रा !
एक साथ प्रस्‍थान करों भविष्‍य की सुबहों की ओर
ओ अभिनेता, ओ श्रमिक, दोनों के लिए मना है आराम करना!

 


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