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कलाकार को ईश्वर की तरह से स्वच्छंद होने की छूट नहीं
मनोज कुमार पांडेय


मैं कहानियाँ लिखता हूँ और कभी कभी कविताएँ भी। कविताएँ कहानियों से ज्यादा ही लिखी हैं पर पता नहीं क्यों उनको लेकर मन में सदा एक संकोच और अनिर्णय की स्थिति रही है। यही वजह है कि कविताएँ लिखी ज्यादा पर छपाई बहुत ही कम, जबकि कहानियाँ जितनी लिखीं, सब की सब छपाईं। यह भी रोचक है कि मैंने जब अपनी पहली कहानी बेहया लिखी थी तब वह भी पहले कविता के रूप में ही उतरी थी पर बाद में पता नहीं किस रसायनिक प्रतिक्रिया की वजह से वह कहानी में बदल गई।

कहने का मतलब यह कि कविता मेरे लिए लिखकर छुपा लेने की चीज है पर कहानी के साथ ऐसा कुछ नहीं हैं। उसे लिखते ही सार्वजनिक कर देता हूँ। कह सकता हूँ कि कविता मेरे लिए एक बेहद निजी चीज है, यहाँ कविता से मेरा मतलब संसार की उन सारी अच्छी कविताओं से है जिनके नजदीक जाने का मुझे मौका मिला है। कहानी या उपन्यास मैं शोर और भीड़ के बीच भी पढ़ सकता हूँ पर कविता पढ़ने के लिए मुझे हर हाल में एकांत चाहिए होता है। मेरे निकट कविता और कहानी में एक और निजी अंतर है कि मैं अपनी अनछपी कविताओं की तरफ देर से ही सही पर लौटता जरूर हूँ पर छप जाने के बाद कभी गलती से भी पिछली कहानियों की तरफ मुड़कर नहीं देखता। उन्हें पीछे छोड़ आगे बढ़ जाता हूँ। कविता और कहानी को लेकर ये मेरी एकदम निजी प्रतिक्रियाएँ हैं। ये मेरे लिए ज्यादा आसान होगा कि मैं निजी घेरे में रह कर ही इन पर बात करूँ। क्या पता कि ये घेरा इतना निजी न हो। हो सकता है कि इसमें कोई भी बड़ी या उल्लेखनीय बात न हो, या कुछ बहुत छोटे छोटे सवाल भर हों फिर भी। इसके पहले मैंने कविता और कहानी के अंतर्संबंध मतलब कि द्वंद्व या साहचर्य पर या उनके बीच के लेन देन के रिश्ते पर कभी नहीं सोचा था। कविताएँ और कहानियाँ लिखता रहा, कविताएँ और कहानियाँ पढ़ता रहा।

बचपन में मेरे हिस्से में किस्से कम ही आए पर जितने भी आए उनमें कविता और कहानी के बीच कोई दूरी नहीं थी। हर किस्से में कविता भरी थी और हर कविता में कहानी थी। कविता कहानी के नैरेशन को ज्यादा प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाती थी। बहुत सारी कहानियाँ पूरी की पूरी कविता के ही शिल्प में हमारे सामने आती थीं। या थोड़ा और बड़े होकर जब आल्हा या बिरहा सुना, जो होती तो कविताओं के शिल्प में थीं पर इनमें कविता के उस अमूर्तन के लिए जगह कम ही थी जिसके लिए कविताएँ जानी जाती हैं। उनके गाने का तरीका या सुनाने का अंदाज हमें अच्छा लगता था पर वो असल चीज उसमें समाई कहानी ही होती थी जो हमें बाँधे रहती थी। हमारे कान गायक या गायकों की आवाज पर लगे रहते थे। जाहिर है कि यहाँ पर मेरे मन में कविता कहानी को लेकर कोई द्वंद्व या विभेद नहीं था। वो मेरे निकट खंडकाव्यों या महाकाव्यों का जमाना था... और मेरी जानकारी में ऐसा कोई महाकाव्य नहीं था जिसके भीतर किस्सों की अनेकानेक धाराएँ न बह रहीं हों... तो वहाँ कोई मुश्किल नहीं थी। इस तरह की मुश्किल वहाँ से आई जब किस्से और कविता ने एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनानी शुरू की। कुछ आधुनिक और नई प्रतिज्ञाओं के साथ। बहुत बाद में जब साहित्य से एक जुड़ाव बना, खासकर आधुनिक और उससे भी ज्यादा समकालीन साहित्य से, तो मेरे लिए कविता और कहानी दोनों का मतलब बदल गया। कविता अब आल्हा या बिरहा नहीं रह गई। आज की कविता तो कामायनी, साकेत, उर्वशी या रश्मिरथी से भी बहुत आगे निकल आई है। कविता के एक बड़े हिस्से में कहानी की गुंजाइश लगातार कम होती गई है। और इसी अनुपात में कविताओं में से जीवन की सरसता गायब होने लगी। कविता सिर्फ विचार या एक खास मूड या मन:स्थिति की चीज बनकर रह गई। जबकि कहानियों में विचार आता तो है पर दूर कहीं पीछे से झाँकता सा, एक तेजस्वी संकोच के साथ। कविता ने या तो ये संकोच खो दिया है या फिर उसने अपनी काया ही ऐसी बना ली है कि उसमें इस संकोच की जगह जरा कम बची है। विनोद कुमार शुक्ल जैसे लोग कम ही हैं जिनके यहाँ वह रचनात्मक संकोच अभी भी अपने पूरे सौंदर्य और एंद्रिक बोध के साथ बचा हुआ है। यही हाल कहानियों में भी रहा पर कहानी कविता की तुलना में जरा कुछ कम बदली। शायद इसलिए भी कि कहानी तो है ही अभी जुम्मा जुम्मा चार दिन की। पंचतंत्र, कथा सरित्सागर या किस्सा तोता मैना जैसे तमाम उदाहरणों के बावजूद। मेरी इन बातों को मूल्यगत स्तर पर न लिया जाय, मैं स्वरूप की ही बात कर रहा हूँ। हालाँकि रचनाओं के मूल्य के स्तर पर भी बहुत सारे सकारात्मक नकारात्मक बदलाव मुमकिन हुए हैं जो आज की रचनाओं को पहले की रचनाओं से अलग करते हैं। पहले जो चीजें मूल्य के रूप में स्वीकृत थी आज उनमें से बहुतेरे नकारात्मक अर्थ देने लगी हैं। पीढ़ियों का द्वंद्व कुछ इस तरह से भी प्रकट होता है।

एक बात और यहीं पर मैं साफ कर देना चाहता हूँ कि मैं कविता या कहानी के शास्त्र से जरा भी परिचित नहीं हूँ इसलिए जो भी कहूँगा वे पाठक के रूप में मेरे निजी विचार हैं जो स्वतंत्र रूप से कहानियाँ और कविताएँ पढ़ते हुए मेरे भीतर प्रकट हुए हैं। और उन्होंने मेरे भीतर अच्छी या बुरी जैसी भी सही पर एक शकल ली है और जो लगातार बदलते भी रहते हैं। बाकी रामचंद्र शुक्ल का निबंध 'कविता क्या है' या इसी तरह से कहानी कला पर अनेकों निबंध आप सभी ने पढ़ रखे होंगे। आज के समय की ही बात करूँ जो विधाओं की आवाजाही का समय कहा जा रहा है और कविताएँ तेजी से गद्य होने के मोह में फँस रही हैं तो मुझे लगता है कि यह सही समय है कि इस मसले पर जरा रुक कर सोचा जाय कि कविता और कहानी की मूल प्रतिज्ञाएँ क्या हैं, कहाँ पर वे एक हैं और कहाँ अलग अलग हैं! एक ही व्यक्ति कभी कविता तो कभी कहानी क्यों लिखता है? इसके पीछे किसी तरह के रचनात्मक दबाव भी काम करते हैं या फिर सिर्फ यह रचनाकार की स्वच्छंदता का ही मसला है। पर जाहिर है कि कला की दुनिया एक न दिखाई देनेवाली या मुश्किल से पकड़ में आनेवाली आंतरिक संगति से चलती है और कितना भी महान कलाकार क्यों न हो उसे धर्मग्रंथों के ईश्वर की तरह से स्वच्छंद होने की छूट नहीं मिल सकती। मुझे नहीं पता कि हमसे पहले के रचनाकारों ने इस मसले पर किस तरह से विचार किया है या उनके निष्कर्ष क्या हैं! या शायद इस मसले पर उन कवि रचनाकारों की तरफ भी मुड़ना काम का हो जो समान रूप से सिद्धि और अधिकार के साथ कविता और कहानी दोनों लिखते रहे। प्रसाद, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, उदय प्रकाश या कुमार अंबुज, एकदम नयों में गीत चतुर्वेदी या और भी अनेक रचनाकार, यह सवाल कि जब वे कविता या कहानी लिखते हैं तो उस समय उनके रचनाकार के भीतर क्या कुछ खदबदा रहा होता है? कब वे गद्य में सोचते हैं और कब कविता में? या कविता गद्य की तरफ जाते जाते क्या कभी सचमुच पूरी तरह से गद्य में बदल जाएगी या खत्म हो जाएगी जैसाकि कविता के बहुत सारे विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया है! और सवाल तो यह भी है कि क्या कविता के भीतर कहानी का घटित होना या कहानी के भीतर कविता का घटित होना कहानी या कविता के लिए खराब बात है या ये ऐसी चीज है जो रचना को एक नई कलात्मक सिद्धि की तरफ ले जाती है! और जब कभी ऐसा होता है तो वो कौन सी चीज होती है जो कविता को कविता या कहानी को कहानी बनाए रखती है? इस तरह के बहुत सारे सवाल हैं जो मेरे मन में हैं। जाहिर है कि मेरे पास सवाल ही ज्यादा हैं, जवाब तो न के बराबर हैं।

और फिर यह भी कि क्या किसी अनुभव का रूप और प्रकृति ही यह तय कर देता है कि कब कविता लिखी जाएगी और कब कहानी... क्या उसमें रचनाकार का चुनाव जरा भी नहीं होता है? अगर होता है तो किस हद तक? और तब मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय की वे कहानियाँ और कविताएँ कहाँ जाएँगी जो एक ही विषय-वस्तु को आधार बनाकर रची गई हैं जैसे किले में औरत या अँधेरे में या फिर मुक्तिबोध की ही ब्रह्मराक्षस वाली कविता और कहानी। भले ही रघुवीर सहाय या मुक्तिबोध की कहानियाँ उनकी कविताओं का ही विस्तार लगें तो भी, जैसा कि अभी कुमार अंबुज की कहानियाँ लगती हैं। इसके उलट वे कवि कथाकार हैं जिन्होंने अपनी कहानियों और कविताओं में भेद बनाकर रखा है... या कम से कम दुतरफा आवाजाही बचाकर रखी है जैसे प्रसाद, अज्ञेय, श्रीकांत वर्मा या बाद में उदय प्रकाश और अभी एकदम ताजा रचनाकारों में गीत चतुर्वेदी... मेरे लिए ये एक अबूझ सा सवाल है। क्या इसे इतने सीधे तरीके से कहा जा सकता है कि मूर्त अनुभव कहानी में रचे जाते हैं और अमूर्त अनुभव कविता में... जाहिर है कि नहीं। ऐसे और भी बहुत सारे सरलीकरण हैं जिन्हें कई बार आलोचक भी बढ़ावा देते हैं। जो अभी तक कविता और कहानी को कविता की आलोचना के सदियों पुराने और घिसकर तार तार हो चुके औजारों से हाँके जा रहे हैं।

तो आखिर कौन सी चीजें हैं जो कविता और कहानी को एक दूसरे से अलग करती हैं और उन्हें जाने बिना क्या कविता और कहानी के अंतर्संबंधों पर कोई सार्थक बातचीत मुमकिन हो सकती है। पहले छंद अलग कर देता था, अब वह रहा नहीं, क्या लय... कोई आंतरिक लय... वह भी लगभग गायब ही है और जितनी कविता में हैं उतनी तो कई बार कहानी में भी दिखाई पड़ती है। कहानी के भीतर चलनेवाली कहानी और कविता में उसके अभाव की बात हम पहले ही कर चुके हैं। ऐसे ही ज्यादातर अच्छी कहानियों में भीतर ही भीतर बहनेवाली कविता ने भी कहानी से एक दूरी सी बना ली है। ऐसे में बात आखिर कहाँ से आगे बढ़ेगी... मैं कविताएँ खूब पढ़ता हूँ, कई बार वो मुझे समझ में नहीं आतीं तो भी, जैसे शमशेर या विनोद कुमार शुक्ल की अनेक कविताएँ मुझे समझ में नहीं आतीं, जो समझ आती हैं वे भी कितना आती हैं मैं नहीं जानता फिर भी ये दोनों मेरे प्रिय कवि हैं जिनकी तरफ मैं बार बार जाता हूँ, विनोद कुमार शुक्ल के ही शब्दों में कहूँ तो उनके 'पड़ोस' में बैठता हूँ, तो क्या चीज है जो मुझे उनकी तरफ बार बार खींचती है, वह क्या है जो मुझे कई बार नहीं समझ में आता जैसे संगीत जो मुझे अच्छा लगता है बेसुध भी करता है पर समझ में अक्सर नहीं आता। फिर भी लगता है कि कुछ नया दे गया है मुझे, उसके बाद मैं वही नहीं रह गया हूँ जो पहले था... पर यह तो हर अच्छी रचना के साथ होता है, पर अंतर यह है कि यदि वह समझ में आती है तो... अच्छी कविता समझ में नहीं आती तब भी चेतना पर उसका थोड़ा सा ही सही पर असर पड़ जाता है... पेंटिंग की तरह, रंगों की एक आभा न सही, उनके सहमेल और प्रतिरोध से जन्मा चमत्कार न सही, कहीं कोने में हाशिए पर पड़ा एक मटमैला रंग ही सही जो भीतर कहीं छुपकर बैठ जाता है और यही नहीं आपके भीतर छुपकर वह आपकी चेतना को लगातार उकसाता भी रहता है आप उसकी तरफ दुबारा लौटें... यहीं पर कविता के इसी गुण से हम कहानी की तरफ भी रुख कर सकते हैं कि अगर ऐसा ही कहानी में भी हो तो, होता है ऐसा कहानियों में भी... और तब कहानी अपने प्रभाव में कविता के थोड़ी निकट जाकर खड़ी हो जाती है पर रहती है वह कहानी ही। कविता की सूक्ष्मता, सघनता, अपनी बात को वहन करने की क्षमता कहानी के लिए एक ललचानेवाली चीज है। यहीं सवाल उठता है कि क्या कहानी के पास भी ऐसा कुछ है जिसे कविता लालच के साथ देखे, यहीं थोड़ा रुककर इस पर भी विचार किया जा सकता है कि आखिर कौन से रचनात्मक दबाव हैं जिनके चलते हमारे समय के अनेक सिद्ध कवि कहानी की दुनिया की तरफ बड़े अरमानों के साथ देख रहे हैं। क्या सिर्फ इसलिए कि कहानी समय से संवाद ज्यादा मुखर होकर करती है, शायद नहीं बल्कि मुझे तो लगता कि कविता ने ये काम कुछ ज्यादा ही मुखर होकर किया है। ये अलग बात है कि ऐसा करने का दावा करनेवाली कविताओं में ज्यादातर खराब कविताएँ हैं। तो फिर क्या है जो कवियों को खीचकर ला रहा है, आखिर कविता कहाँ पर वह कहने से चूक जा रही है जो ये कवि कहना चाहते हैं! वे कौन से अनुभव हैं जो कविता में बदलने से इनकार कर दे रहे हैं? या वह कौन सी चीज है जो विष्णु खरे सरीखे समर्थ कवि को एक अंतहीन अबूझ गद्यात्मक विस्तार में ले जा रही है?

हिंदी में खूब पढ़े जानेवाले कवि ताद्यूश रोजेविच की एक कविता है - शोधन, जिसमें वे कहते हैं - लजाओ मत आँसुओं से

आँसुओं से न लजाओ युवा कवियों

रीझो चाँद पर

चाँदनी रात पर

रीझो निर्मल प्रेम और कोयल के सुरों पे

स्वर्ग जाने से मत डरो

तारों तक पहुँचो

तुलना करो आँखों की तारों से

अभिभूत होओ जंगली गुलाब से

नारंगी तितली से

उदित और अस्त होते सूरज से

चुगाओ प्यारे कबूतरों को

विहँसते देखो ध्यान से

कुत्तों एंजिनों फूलों और गैंडों को

आदर्शों की बात करो

गीत गाओ जवानी के

भरोसा करो गुजरते अजनबी पर

भोलापन तुम्हें देगा भरोसा सुंदरता पर

भावुकता से तुम पहुँचोगे मनुष्य पर भरोसे तक

लजाओ मत आँसुओं से

आँसुओं से न लजाओ युवा कवियों

मुझे लगता है कि यह भोलापन, दुनिया भर की सुंदरता से बिना शर्त प्यार कविता के भीतर से लगातार कम हुआ है और कहानी में तो आज खैर इस अकारण प्यार और भोलेपन के लिए न के बराबर जगह बची है पर है यह बड़े काम की चीज। कवियों की बात कवि ही जानें पर कवियों को दी जानेवाली यह सीख कहानीकारों के भी बड़े काम की है। कहानी को भी इस भोलेपन पर भरोसा करना होगा जैसा कि विनोद कुमार शुक्ल अपने उपन्यासों और कहानियों में करते हैं। ये भोलापन कहानी की विश्वसनीयता को बढ़ाने का ही काम करेगा।


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ