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व्यंग्य

अगला स्टेशन
केशवचंद्र वर्मा


इस देश के तमाम लोगों की तरह मुझे भी यकीन हो रहा है कि इस देश के भविष्‍य का निर्माण करने का काम सिर्फ फिल्‍मों का है। जैसा संदेश लोगों में पहुँचाना हो, वैसी फिल्‍म बनाकर लोगों को दिखला दीजिए - बस, दुनिया अपने-आप बदलती चली जाएगी। इधर जैसे ही मुझे फिल्‍मों के जरिए यह संदेश मिला, कि 'समाज को बदल डालो', तैसे ही मैंने अपनी समाज-सेवा को अधिक गहरे स्‍तर पर करने का फैसला कर लिया, और मौके की तलाश करने लगा, ताकि मैं समाज को एक ही दाँव में बदल दूँ! इस तरह के मौके रोज-रोज आते नहीं, कि आपको समाज को बदल डालने का अधिकार सब लोग देते फिरें। लेकिन आदमी लगन का पक्‍का हो, तो समाज एक-न-एक दिन मौका देता ही है।

और इस विचार को कार्य में बदल डालने की शुरुआत मैंने रेलवे-स्‍टेशन से करने का शुभ संकल्‍प किया। ऐसा कुछ पहले से तय नहीं था, लेकिन जब अपने कुछ मेहमानों को एक पैसेंजर गाड़ी से छोड़ने के लिए स्‍टेशन गया, तो समाज ने मुझे अदबदाकर कुछ ऐसा मौका दे दिया, कि समाज-सेवा करने के लिए मेरी तबीयत मचलने लगी। जो लोग यात्रा का सुख आज की दुनिया में भी उठाने के लिए कृतसंकल्‍प हैं, उन्‍हें रेल-व्‍यवस्‍था की एक मामूली बात तो मालूम ही होगी, फिर भी उनके लाभ के लिए मैं दोहरा रहा हूँ। रेलगा‍ड़ियाँ कई तरह की होती हैं - डाकगाड़ी, एक्‍सप्रेस (तेज) गाड़ी, पैसेंजर गाड़ी, पार्सल गाड़ी, मालगाड़ी वगैरह-वगैरह। डाकगाड़ी डाक ले जाने के लिए बनी थी, पर मुसाफिर भी ले जाती है। पार्सल गाड़ी पार्सल ले जाने के लिए बनी थी, अब मुसाफिर भी ले जाती है। मालगाड़ी सिर्फ माल ले जाती है। एक 'पैसेंजर' गाड़ी यानी मुसाफिर गाड़ी थी, जो मुसाफिरों के लिए बनी थी, अब मुसाफिरनुमा माल ले जाती है। यानी पैसेंजर गाड़ी में जो भी मुसाफिर चलते हैं, उन्‍हें रेलवे सिर्फ माल की तरह ढोती है। जहाँ मन आए, तहाँ रोकती है, और धीरे-धीरे चलती है, रास्‍ते भर बिना पंखा और बिना बत्ती का सफर कराती है, पुराने डिब्‍बों का नया किराया लेती है, और चार-छह घंटे आगे-पीछे पहुँचाती है। इसकी सुनवाई कहीं नहीं। यह मान लिया गया है कि पैसेंजर गाड़ी यानी मुसाफिर गाड़ी की यही नियति है। उसमें गाँव-गाँव में उतरने-चढ़नेवाला चलता है। उसके लिए न तो बैठने की जगह की जरूरत है, न पंखे की, न बत्ती की। वक्‍त तो उसके पास अनंत होता है। उनके यहाँ वक्‍त के नाम पर सिर्फ सुबह, दोपहर, शाम और रात होती है तो पैसेंजर गाड़ी सिर्फ सुबह, दोपहर, शाम या रात के वक्‍तों से बँधी हुई चलती है। फिर किसी को क्‍या शिकायत हो सकती है?

उसी पैसेंजर गाड़ी पर मैं अपने कुछ मेहमानों को छोड़ने के लिए रेलवे-स्‍टेशन पहुँचा। शाम को चलकर सुबह पहुँचने का वादा करती हुई उस पैसेंजर गाड़ी के हर डिब्‍बे में पंखे लगे हुए थे, जो मुसाफिरों के क्रोध की तरह शांत थे। बत्तियाँ या तो थीं ही नहीं, या दीपक राग की प्रतीक्षा कर रही थीं। तीसरे दर्जे में ठुँसे हुए मुसाफिर दफ्तियाँ, रूमाल और हाथ-मिलाकर उस डिब्‍बे से गर्मी को बाहर कर देना चाहते थे। अँधेरा हो रहा था, और हर मुसाफिर अपने से ज्‍यादा अपने संदूक की फिक्र करने में मशगूल था। ऐसा दृश्‍य देखकर मुझे सहसा यह याद आने लगा कि मैं समाज को बदल डालने का वादा कर चुका हूँ, और मुसाफिरों के जन्‍मसिद्ध अधिकार के लिए लड़ने को मुझसे अच्‍छा कोई आदमी नहीं हो सकता। जो लोग सफर करने के लिए आए हुए थे, वे भीतर घुसकर बैठ गए थे, और निकलने की कोशिश करते ही अपनी जगह पर दूसरों को बैठा हुआ देखते। वैसे उसमें से निकल पाना अपने-आप में आदमी की मर्दानगी में चार चाँद लगा देता! और निकलकर घुस पाना सिर्फ एक घुटी हुई चाँद का तल्‍ख अनुभव दे सकता था। ऐसे में प्‍लेटफार्म पर खड़े हुए व्‍यक्तियों की ही यह नैतिक जिम्‍मेदारी हो जाती थी कि वे पैसेंजर के मालगाड़ी रूप से लोगों को परिचित कराएँ और समाज-सेवा करें। वही मैंने किया।

निहायत बुजुर्ग दीखनेवाले गार्ड साहब, पान खाए हुए, एक कुचैली लाल टाई (मैली कहना मैलेपन का अपमान होगा) लगाए आधा कोट बाँह पर डाले हुए, बाँस के छोटे-छोटे डंडों में लाल, हरी झंडियाँ लपेटकर रख रहे थे। उनका बड़ा लोहे का बक्‍स प्‍लेटफार्म पर खुला हुआ था और उनको तमाम कुली-कबाड़ी घेरे खड़े थे। एक ने उनको चाय लाकर दी, और वे चाय पीने लगे। मैंने समाज-सेवा के कुछ नियमों का ध्‍यान किया और भीड़ चीरता हुआ उनके पास पहुँचा। उनसे मैंने डिब्‍बों में बत्ती और पंखा न चलने की शिकायत की। थोड़ी देर तक वह चुपचाप अपनी चाय पीते रहे और कुलियों को कुछ सामान लादने की हिदायत देते रहे। मैंने अपनी बात दोहराई। उन्‍होंने एक बार मेरी तरफ देखा, और फिर कुलियों से बातें करने लगे। मैं जानता हूँ कि बेहयाई का गुण एक समाजसेवी में बड़ा लाजिमी होता है। अतः मैंने फौरन अपनी बात को और भी तेजी से गार्ड साहब के सामने दोहराया। अबकी गार्ड साहब ने पहली बार जवाब दिया, 'कह तो दिया साहब कि अभी सब ठीक हो जाएगा। प्‍लेटफार्म पर बिजलीवाला होगा। उससे कह दीजिए। ठीक कर देगा।'

बहरहाल, मैं आश्‍वासन लेकर लौट पड़ा। अपना देश ही आश्‍वासनों पर चल रहा है। अगर वह भी हटा लिया जाए, तो फिर रह ही क्‍या जाएगा? और फिर जब सभी लोग आश्‍वासनों को सही मानकर चुप बैठे रहते हैं, तो मुझे पहली ही बार आश्‍वासन को चुनौती देना ठीक नहीं लगा। डिब्‍बे के सामने पहुँचा, तो अपने मेहमानों ने भीतर से पूछा, 'क्‍या हुआ?'

मैंने तड़ से अपनी कारगुजारी बयान कर दी, 'अभी सब ठीक हुआ जाता है। पंखा भी ठीक, बिजली भी ठीक।'

एकाध इधर-उधर की बात हो सकती थी, लेकिन गाड़ी छूटने का वक्‍त निकट आ रहा था। और मुझे लग रहा था कि गाड़ी बिना बत्ती के ही चल देगी। मैं बिजलीवाले मिस्‍त्री की खोज में चला। आखिरकार वह मिला। एक तेज दुबला-पतला लड़का प्‍लेटफार्म की बिजली से तार लगाकर पहले दर्जे के डिब्‍बे में बिजली का पंखा ठीक कर रहा था। मैंने खद्दर का कुरता पहन रखा था। मुझे किसी से भी बात करने में डर नहीं लग रहा था। मैंने उससे उस डिब्‍बे की बिजली और पंखा ठीक करने को कहा। उसने पहली बार में उत्तर दिया, 'पंखा-वंखा नहीं चलेगा। बिजली भी रामभरोसे है।'

मैंने कहा, 'गार्ड साहब ने कहा है।'

'तो उन्‍हीं से ठीक करा लीजिए।'

मैं गार्ड साहब की तरफ लपका। अब तो कुछ आन का भी सवाल था। डिब्‍बे के सामने लौटकर जाता, तो क्‍या मुँह दिखाता? वे लोग फिर वही सवाल पूछते। गार्ड साहब ने अपनी हरी बत्ती भी ठीक-ठाक कर ली थी। पान खा रहे थे। भीड़ वैसी ही थी। मैंने फिर गार्ड साहब से अपनी मुसीबत दोहराई, और उस लड़के मिस्‍त्री की शिकायत की। गार्ड साहब ने अपनी आदत के मुताबिक तीसरी बार में मेरी शिकायत पर कान दिया। अबकी नए सिलसिले से बातचीत हुई।

'कहाँ जा रहे हैं आप?'

'मैं नहीं जा रहा हूँ।'

'तो फिर आप गाड़ी के पंखे और बिजली को लेकर क्‍यों परेशान हैं? जिन्‍हें जाना है, वह तो आराम से चुप किए बैठे हैं। आप खामख्‍वाह के काजी बने हुए हैं।'

'जी नहीं। खामख्‍वाह के नहीं। मेरे घरवाले इस गाड़ी से जा रहे हैं। उन्‍हें बड़ी परेशानी होगी।'

'रास्‍ते में बिजली ठीक हो जाएगी। अब तो गाड़ी छूटने का वक्‍त हो रहा है। देर हो जाएगी यहाँ पर। अगले स्‍टेशन पर ठीक करा देंगे।'

'अगला स्‍टेशन तो गाँव है। वहाँ मिस्‍त्री कहाँ मिलेगा?'

'अजी साहब, गाड़ी मैं ले जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता, और आप सब कुछ जानते हैं।'

अब गार्ड साहब ने जैसे मुझे धमकाने के लिए मुँह में सीटी दबा ली, और हाथ में हरी बत्ती वाली लालटेन उठा ली। वैसे झंडी पहले से ही खुली हुई थी। मैं भी समाज-सेवा पर तुला बैठा था। बोला, 'देखिए, गार्ड साहब, जब तक पंखा और बत्ती ठीक नहीं होगी, तब तक गाड़ी यहाँ से नहीं चल सकती। समझ लीजिए।'

'अरे साहब, ठीक हो जाएगा, सब ठीक हो जाएगा। आप चलिए, बैठिए। मैं अभी आता हूँ उसे डिब्‍बे के पास।'

मेरे मेहमान खिड़की से सिर निकाले मुझे बुला रहे थे। गाड़ी छूट जाएगी, और चलते वक्‍त एक टा-टा तक नहीं कह पाएँगे। लेकिन 'टा-टा' को देखें, कि अपनी बेइज्‍जती को देखें। गार्ड साहब टहलते हुए आगे बढ़े। उनके साथ पूरा जमघट। हमारे डिब्‍बे के सामने से वे निकले। हम भी उन्‍हीं के साथ-साथ चल रहे थे। मैंने मेहमानों को डिब्‍बे के सामने से निकलते हुए यों देखा, कि जैसे 'देखो, मैं चाहूँ तो पूरी दुनिया को हिलाकर रख दूँ।' गार्ड साहब आगे बढ़कर किसी के पास रुक गए और बोले, 'क्‍या बात है, भई! बत्ती-पंखा क्‍यों नहीं ठीक कर देते?'

मिस्‍त्री लड़का ताव में था। 'मैं क्‍या खुद पंखा बन जाऊँ, गार्ड साहब? जब उसमें पॉवर है ही नहीं, तो...'

गार्ड साहब ने निहायत नरमी से कहा, 'अरे भाई, तेज पड़ने की क्‍या जरूरत है? बात क्‍या है?'

उसने कहा, 'क्‍या करें, साहब? अभी पुराने चार्जर पर इन्‍क्‍वायरी हो रही है। कहते हैं कि जब आएगा, तब मिलेगा। तो हम क्‍या करें? जितना है, उतना फर्स्‍ट क्‍लास में किए दे रहे हैं। गाड़ी चलेगी, और कुछ चार्ज हो गया, तो बत्ती में करेंट चली आएगी। रोशनी तो होगी नहीं, सिर्फ लाल लकीर दिखाई देगी। पंखा-वंखा कुछ नहीं चलेगा। मेरी कोई सुनता नहीं। ...सब साले ...और मुसाफिर मेरे डंडा किए हुए हैं। मैं कोई स्‍टेशन मास्‍टर की... उसमें से लाकर लगा दूँ...?'

भीड़ ने मजा लेना शुरू कर दिया था। 'एंग्री यंगमैन' चिल्‍ला रहा था। सब मेरी तरह ही जान रहे थे कि अब गार्ड साहब की किरकिरी हो जाएगी। तब तक गार्ड साहब बोले, 'कितने साल से नौकरी कर रहे हो, म्‍याँ?'

'तीन साल से।'

'तभी! तभी अभी इतनी तेजी है। अरे बाबू साहब, यह सब कोई नई बात तो नहीं। मैंने तो सोचा, कि न जाने क्‍या बावेला आपने मचा दिया। तीन साल से तुम इस गाड़ी को आते-जाते देख रहे हो। कभी तुमने इसमें पंखा चलते देखा, या कभी बत्ती जलती देखी? नहीं न? तो फिर आज इस चीज को लेकर इतना गरम होने की क्‍या जरूरत पड़ गई? मुसाफिरों से तो दो बोल मीठे-मीठे बोल ही सकते हो। कह दो कि 'बत्ती आगे ठीक हो जाएगी। पंखा अभी चलाए देते हैं।' तुम भी जानते हो, और हम भी जानते हैं कि न तो पंखा चलेगा, और न रास्‍ते भर बत्ती जलेगी। ये मुसाफिर भी यह जानते हैं। ये भी अँधेरे में बिना पंखे के चलने के आदी हैं। लेकिन अब इनका भी तो कुछ फर्ज है, कि डिब्‍बे में पंखा नहीं चल रहा है, तो आकर किसी से कहें। अब हमारा-तुम्‍हारा यह फर्ज है कि बिना पंखा-बत्ती चलाए हुए इन्‍हें खुश कर दें। इसमें गाली-गलौच करने से मुसाफिर बिगड़ता है, और बात कुछ बनती नहीं। अब चार्जर नहीं है, तो तुम क्‍या हमारे बाप भी डिब्‍बे में बिजली नहीं दे सकते। पर यह कहने में क्‍या लगता है, कि अगले स्‍टेशन पर ठीक हो जाएगी? अव्‍वल तो म्‍याँ, वह 'अगला स्‍टेशन' पूरे सफर में कभी आता नहीं, और अगर किसी ने याद ही दिलाया, तो तुम तो यहीं छूट जाओगे। मैं निबट लूँगा। रोज इसी 'अगले स्‍टेशन' के भरोसे मैं गाड़ी यहाँ से लेकर चला जाता हूँ। मुसाफिरों से तुम 'अगले-स्‍टेशन' का ख्‍वाब भी छीन लोगे, तो, बेटे, गाड़ी किसके भरोसे चलेगी?'

मिस्‍त्री के पास कोई जवाब न था। गार्ड साहब ने सीटी बजा दी और झंडी और रोशनी हिलाना शुरू कर दिया। मेरे पास शिकायत दोहराने का वक्‍त नहीं था। कुछ डिब्‍बों से निकले हुए मुसाफिर गाड़ी लेट होने की वजह मुझी को बताते हुए मुझे धिक्‍कार रहे थे और चुपचाप अपने डिब्‍बे में लौट जाने के लिए कह रहे थे।


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