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आलोचना की तकनीक के तेरह सूत्र
वाल्टर बेंजामिन


1. एक आलोचक, साहित्यिक संघर्ष का रणनीतिकार होता है।

2. जो किसी का पक्ष नहीं ले सकता, उसे चुप रहना चाहिए।

3. अतीत के सांस्‍कृतिक वैभव के टीकाकार और एक आलोचक में कोई समानता नहीं होती।

4. आलोचना को कलाकारों की भाषा बोलनी चाहिए। नारे ही उसकी अवधारणाएं होती हैं। और युद्ध का घोष तो नारों में ही सुनाई देता है।

5. ''वस्‍तुगत निर्णय'' की बलि पक्षधरता के हित में दे दी जानी चाहिए, अगर उद्देश्‍यपूर्ण लड़ाई यही मांगती है तो।

6. आलोचना एक नैतिक प्रश्‍न है। अगर गेटे ने होल्‍डरलिन और क्‍लीस्‍त, बीथोवन और ज्‍यांपॉल को गलत समझा तो यह उसकी नैतिक भूल थी, कलात्‍मक क्षमताओं की कमी नहीं।

7. आलोचक के लिए उसके सहयोगी ही उसके उच्‍चाधिकारी हैं। जनता नहीं। नवागत तो और भी कम।

8. नवागत या तो भूल जाते हैं या प्रशंसा करते हैं। केवल आलोचक ही लेखक की उपस्थिति में उसका निर्णय करता है।

9. पोलिमिक्‍स (खंडनात्‍मक विवाद) का अर्थ है किसी किताब के कुछ चुने हुए वाक्‍यों से ही उसे नष्‍ट कर देना। उसे जितना कम पढ़ा जाए उतना ही बेहतर। जो उसे नष्‍ट कर सकता है। केवल वही आलोचना भी कर सकता है।

10. सच्‍ची पोलिमिक्‍स एक किताब के पास उतने ही प्रेम से जाती है। जितने प्रेम से कोई नरभक्षी किसी बच्‍चे पर मसालों का लेप करता है।

11. कलात्‍मक उत्‍साह से आलोचक अनजान ही रहता है। उसके हाथों में कलाकृति, विचारों के युद्ध में चमकती तलवार की तरह होती है।

12. एक आलोचक की कला संक्षेप में यह कही जा सकती है कि वह विचारों को धोखा दिए बिना नारों को गढ़ता है। एक अपर्याप्‍त आलोचना के नारे विचारों को फैशन में बदल देते हैं।

13. जनता को हमेशा गलत सिद्ध किया जाना चाहिए। लेकिन उसे हमेशा यह महसूस भी होना चाहिए कि आलोचक ही उसका प्रतिनिधि है।


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हिंदी समय में वाल्टर बेंजामिन की रचनाएँ