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कविता

अयोध्या - 4
उद्भ्रांत


कनकमहल

कनकमहल में
अब तो कनक दिखाई देता नहीं कहीं

अपने भग्नावशेषों तक में
किंतु जगत-माता सीता की
छवियाँ-प्रतिछवियाँ
मुग्ध करती हैं
इस विपन्न कलिकाल में भी
रामदरबार में
राम के सँग सिंहासन पर
बैठी हुई सीता की
झुकी हुई नजरों की छवि के विपरीत
यहाँ दिखती है
सर्वथा अनूठी छवि।
पलकें उठाए
सीधी दृष्टि किए
आँखों में अधिकार लिए
सीता कनकमहल में
आधुनिक नारी की प्रतिष्ठा
और स्वाभिमान की प्रतीक
सीता का यही
एकमात्र
विरल, गौरवमयी रूप देख
माता धरित्री भी
अब तक विभोर
भूलकर उस त्रास, उस संत्रास को जो
शताब्दियाँ गुजरीं
उसकी बेटी ने
जिया अपनी आत्मा में
कोई अपराध किए बिना भी!

वह भी इस सीमा तक कि
अंततोगत्वा उसकी
सुन पुकार-कातर
माता ने ही अपने
कलेजे पर पत्थर रख
उसे अंतिम निद्रा के लिए
समयपूर्व
शरण दे दी!
सीता का
कनकमहल में उभरा हुआ रूप
आज की युवा कर्मठ
नारी में प्रतिबिंबित होकर
काल के तराजू पर
न्याय की कसौटी को कसता हुआ
एक नई क्रांति का
उद्घोष कर रहा है!

 


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