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कविता

अशोक का प्रायश्चित
जसबीर चावला


अशोक ने देखा / सुना
लाख की मौत / डेढ़ लाख का विस्थापन
युद्ध भूमि में बिखरे / बिलखते / रक्तरंजित घायल
गलीयों में मँडराते / नोचते / गिद्ध / चील / कौए
भग्नावेश / हाहाकार /आगजनी
भागते /बच्चे /वृद्ध / महिलाएँ
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कलिंग पर हमला
गणतंत्र था
यही कसूर था उसका
आजाद / स्वतंत्र चेता बाशिंदे / प्रजातांत्रिक व्यवस्था
हर धर्म / जाति के लोग
**
और वह महिला
जो पूछ रही / झकझोर रही
बार बार
क्या दोष था उन सबका
क्यों नरसंहार / किस सत्ता के लिये
पिता / पति / पुत्र / युद्ध की भेंट चढ़े
अजन्मे शिशु मरे
किसके लिये / किसके सहारे / क्यों जिये वो
क्या अर्थ है इस जीवन का
मार दो उसे भी
**
हिल गया अशोक
याद आई सब घटनाएँ
एक कम सैकड़ा भाइयों को मारा
सत्ता हथियाई
सैकड़ों रानियों को जिंदा आग में झोंका
किसी ने उसे कुरूप कहा था
पाँच सौ मंत्रियों को यातना दी
मौत के घाट उतारा
यही बहादुरी / जीत है
तो हार क्या है
**
अंतरात्मा जाग गई
अब न होगा युद्ध
तोड़ दिया उस खूबसूरत यातनागृह को
कोई न लौटा जाकर जहाँ से
मुख्य अधिकारी क्रूर गिरीक
उसे भी हवाले किया यातनागृह के
उसी नियम के तहत
साधु समुद्र ने राह दिखलाई
जो यातनागृह में बचा चमत्कार से
**
बुद्ध का मार्ग पकड़ / शांति / अहिंसा / की राह चला
चालीस साल
राज्य / विदेशों मे प्रचार
पुत्र / पुत्री / महेंद्र / संघमित्रा भी उसी राह
ग्रीक / सिरिया / मिश्र / यूनान / श्रीलंका गये दूत
बौद्ध धर्म की ध्वजा उठाए
स्तूप / चेत्य / विहार / बनाये
स्थानीय भाषा / संस्कृति में शिलाखंड / खंबे उकेरे
**
जूनागढ़ गुजरात का गिरनार पर्वत
राजाज्ञा लिखी
सभी धर्मों का सम्मान हो
धर्ममहामात्र की नियुक्ति
जो देखते हर धर्म का विकास / सद्भाव /दान
देश / विदेश में
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तेरहवीं राजाज्ञा में कबूला हत्याओं / विस्थापन को
माफी माँगी / उकेरा अमिट चट्टान पर
पुत्र / पौत्रों / प्रपौत्रों को विरत किया भावी युद्धों से
सद्भावना / सर्व धर्म समभाव से जीतें
भेरीघोष नहीं धर्मघोष हो
धर्मविजय हो दिग्विजय नहीं
स्वनियंत्रण / स्वपरीक्षा / सच्चाई / दान / दया / नैतिकता
हैं जीवन मूल्य
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प्रासंगिक हैं पत्थर लिखी राजाज्ञाएँ
आज भी
प्रेरित करते
भूल स्वीकारते उकेरे हलफनामे
सदियों बाद
नफरत / हिंसा की
लपलपाती हवाओं बीच

 


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हिंदी समय में जसबीर चावला की रचनाएँ