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कविता

अखबार
जसबीर चावला


मुझे तो खाना ही है
चाहे जो परोसो
अखबार के पन्ने पर
पूर्वाग्रह ग्रसित / एक पक्षीय
धर्म परोसो चाहे गॉसिप
रूढ़ियाँ / नफरत / पाखंड / चमचागिरी
धंधा परोसो
अखबर को खबर बनाओ
खबर को अखबर
सामाजिक सरोकारों से विरक्त रहो
तिल का ताड़ / ताड़ को तिल
दरी के नीचे छुपाओ
अफवाहें / कानाफूसी
जो मन आये परोसो
जानते हो
भाग नहीं सकता
दूसरे / तीसरे / चौथे ढाबे
वहाँ भी यही परोसा है
यही मालिक / बंधुआ रसोइये संपादक
हजूरिये संवाददाता
बेस्वाद / सारहीन / विचार शून्यता
कितनी बार बगावत
मन से
न खाने की / उपवास करूँ
कब तक
सब भकोस रहे
फास्ट फूड
रंगबिरंगा अखबारी हिंगलिश खाना
चर्चे / चटखारे लेकर
यही नियति है
यही खाना / पढ़ना / चटखारों में जीना

 


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हिंदी समय में जसबीर चावला की रचनाएँ