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लघुकथाएँ

ज्ञान का मटका
अनुराग


बहुत पुरानी बात है। अफ्रीका में अनानसी नाम का एक व्यक्ति रहता था। पूरी दुनिया में वह सबसे ज्यादा बुद्धिमान व्यक्ति था। सभी लोग उससे सलाह और मदद माँगने आते थे। एक दिन अनानसी किसी बात पर दूसरे मनुष्यों से नाराज हो गया। उसने उन्हें दंड देने की सोची। उसने यह तय किया कि वह अपना सारा ज्ञान उनसे हमेशा के लिए छुपा लेगा ताकि कोई और मनुष्य ज्ञानी न बन सके। उसी दिन से उसने अपना सारा ज्ञान बटोरना शुरू कर दिया। जब उसे लगा कि उसने अपना सारा ज्ञान बटोर लिया है तो उसने मिट्टी के एक मटके में सारे ज्ञान को बंद कर दिया और अच्छी तरह से सील बंद कर दिया। इसके बाद उसने यह निश्चय किया कि वह इस मटके को ऐसी जगह पर रखेगा जहाँ से कोई और मनुष्य उसे प्राप्त न कर सके। अनानसी के एक बेटा था जिसका नाम कवेकू था। कवेकू को धीरे-धीरे यह अनुभव होने लगा कि उसका पिता किसी संदिग्ध कार्य में लिप्त है इसलिए उसने अनानसी पर नजर रखनी शुरू कर दी। एक दिन उसने अपने पिता को एक मटका लेकर दबे पाँव झोपड़ी से बाहर जाते हुए देखा। कवेकू ने अपने पिता अनानसी का पीछा किया। अनानसी गाँव से बहुत दूर एक जंगल में गया। और उसने मटके को सुरक्षित रखने के लिए एक बहुत ऊँचे पेड़ को खोज लिया। अपना ज्ञान दूसरों में बँट जाने की आशंका से भयभीत अनानसी उस मटके को अपनी आँखों के सामने ही रखना चाहता था। इसलिए वह अपनी छाती पर मटके को टाँग कर पेड़ पर चढ़ने लगा। उसने कई बार पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की लेकिन वह जरा सा भी नहीं चढ़ पाया। सामने की तरफ मटका होने की वजह से वह पेड़ पर चढ़ नहीं पा रहा था। कुछ देर तक कवेकू ने अपने पिता को पेड़ पर चढ़ने का अनथक प्रयास करते देखता रहा। जब उससे रहा न गया तो वह चिल्लाकर बोला - पिताजी, आप मटके को अपनी पीठ पर क्यों नहीं टाँगते? तब आप पेड़ पर आसानी से चढ़ पाएँगे। अनानसी मुड़ा और बोला - मुझे तो लगा कि मैंने दुनिया का सारा ज्ञान इस मटके में बंद कर लिया है! लेकिन तुम तो मुझसे भी ज्यादा ज्ञानी निकले। मेरी सारी बुद्धि वह नहीं समझ पा रही थी जो तुम दूर से ही समझ पा रहे थे। उसे कवेकू पर बहुत गुस्सा आया और उसने मटका जमीन पर पटक डाला। जमीन पर गिरते ही मटका टूट गया और उसमें बंद सारा ज्ञान उसमें से निकलकर पूरी दुनिया में फैल गया और सारे मनुष्य बुद्धिमान हो गए।


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