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कविता

तुम्हारी याद ओस है
विमल चंद्र पांडेय


तुम्हारी यादें गिर रही हैं मुझ पर
ओस की तरह
तुम बीत गई हो मुझ से
जैसे बीता है वक्त
मुझे हक्का बक्का छोड़ कर
मुझे कविताओं से प्रेम है और
इसकी कोई कीमत नहीं
बारिश के इस मौसम में

तार पर बैठे हैं कौए
एकदम अकेले
बिना करंट लगे
जब भी देखता हूँ रेलगाड़ी
रो पड़ता हूँ और याद करता हूँ
अकेली यात्राओं को
जो जाती थीं तुम्हारे देस

तुम अपने देस में याद करती होगी मुझे
हँसती हुई भीगी आँखें पोंछ कर
कोसती होगी शहर में बढते जा रहे प्रदूषण को
मैं हर पल याद करता हूँ तुम्हे
और बढ़ता जाता है मेरा साइनस

मेरी कलाई पर बँधी घड़ी बंद है
और हवा में ऑक्सीजन कम होती जा रही है
तुम्हारी उँगलियों पर जो जलने का निशान था
वैसा ही हुबहू उतर आया है मेरी आत्मा पर
तुम्हारी यादों को लेकर सिर्फ चुप रह सकता हूँ
रेलगाड़ियों के शोर में
जो जाती हैं तुम्हारे शहर
कविता लिखना चाहता हूँ
तो लिखता हूँ अनर्गल प्रलाप
तुमने मुझे छोड़ दिया है
एक अच्छे कवि की हत्या हो गई है

 


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