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कविता

आग की जरूरत सबसे ज्यादा है
विमल चंद्र पांडेय


बेशक हमें जीने के लिए पानी की जरूरत है और उसे बचाया जाना चाहिए
लेकिन हमें बने रहने के लिए और खत्म होने से बचने के लिए
सबसे ज्यादा जरूरत आग की है
जो खत्म होती जा रही है

तुम्हारी हथेलियाँ अपनी हथेलियों में भरते हुए
अगर मुझे पहले जैसी गरमाहट नहीं महसूस हो रही
तो यह झूठ बहुत दिनों तक नहीं चल सकता इस बार ठंड ने कुछ रिकॉर्ड तोड़े हैं

मेरे दोस्त इसी शहर में रहते हैं
और मैं आज की रात पुष्पांजलि में अकेला शराब पीता हुआ
वेटर को उठ कर गले लगाने के बारे में गंभीरता से सोच रहा हूँ
तो दोष सिर्फ ट्रैफिक का है, मैं कैसे मान लूँ

कभी किसी को यूँ ही खूब प्यार करने का मन होता है
भले ही वह पापड़ और सिगरेट सर्व करने के बाद पैसे माँगे
हम ऐसे दौर में हैं
जहाँ कोई पैसे लेकर भी कुछ देने से अंतिम समय तक बचना चाहता है

हमारी आँखों में नमी है और हम इसे गुण मानते रहे हैं
हमारी कविता में तरलता है और यह संवाद करती है
मैं जानता हूँ मेरे दोस्त आज भी बड़ी जरूरतों में मेरे साथ खड़े हैं
लेकिन मैं तारतम्यता तोड़ते हुए फिर कहूँगा
अगर हमें घुट कर आत्महत्या नहीं कर लेनी
तो सबसे ज्यादा जरूरत आग की है
आँखों में, रिश्तों में और सबसे ज्यादा कविता में

 


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