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कविता

इतने अधिक अपराध, इतने कम प्रायश्चित
विमल चंद्र पांडेय


दुख लटका है हमारी कमीजों की जेबों से
कई रंगों में, कई डिजाइनों में
वह हम पर आक्रमण करता है अचानक
हम लिख डालते हैं अपने बच निकलने की दास्तान
और जी जाते हैं
मरने की बस एक सूरत होती है
कि ऐन वक्त पर चलती ही नहीं कलम

विरोधाभासों और विरोधियों से घिरे रहे मेरे तीनों काल
विरोधियों में कोई विरोधाभास नहीं था
वह था मित्रों में, प्रेमिकाओं में और संबंधियों में
रात और दिन
काला और सफेद
सुख और प्यार
मौत और माँ
मैं विरोधाभासों में जीने का आदी हो चुका हूँ

जब तक खोलता हूँ सफर के लिए अपनी कश्ती
सूरज डूबने का वक्त हो चुका होता है
कई कश्तियाँ हैं जो बँधी ही रहती हैं उम्र भर किनारे से
उनकी अधूरी यात्राओं का कब्रिस्तान मेरी आँखों में है

मेरे चाहने से नहीं चलती दुनिया
नहीं होता दिन, रात, मौत, प्यार
जैसी चीजें सिर्फ हवा में हैं
हम नहीं पकड़ पाते उन्हें

जब हम अवसाद में होते हैं
तो सोचते हैं न पकड़ सकने वाली चीजों के बारे में

किसी नियम से बँधी है उसकी हँसी, उसकी नींद
हम तोड़ते हैं नियमों को और पाप करते हुए यह भूल जाते हैं
कि कानूनों के न तोड़े जाने से कहीं जरूरी है उसकी नींद का न तोड़ा जाना
हम कभी कोई प्रायश्चित नहीं करते जबकि दुनिया में रोज होती हैं लाखों मौतें
हर पल टूटते हैं हजारों दिल और सपने
कितनी हँसियाँ खो जाती हैं कितनी ही नींदें अनिद्रा की अतल गहराइयों से चीखने लगती हैं

इतने सारे लोग हैं हर तरफ और इतने कम कंधे
इतनी सारी आवाजें और उसकी एक भी नहीं
इतनी आँखें घूरती हैं हर रोज मेरी उदासी
मगर एक भी आँख नहीं जो थाम ले मेरे हारे आँसू
इतने अधिक अपराध पर इतने कम प्रायश्चित हैं
कि हर पल डरावनी होती जाती है दुनिया

दुनिया को कविता से अधिक प्रायश्चित की जरूरत है
कवियों हमारा अपराध यह है
कि हमने इसलिए नहीं किए प्रायश्चित
कि हम यह कह कर छूटे
कि हमने तो नहीं किया कोई भी अपराध

 


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