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कविता

रोने ने बचाए रखा है अब तक
विमल चंद्र पांडेय


आप इस बात से सहमत हों या न हों
समझ लीजिए
हमारी आधी से अधिक समस्याओं के विकराल होते जाने का कारण यही है
हमने छोड़ दिया है रोना

रोने को लेकर जो फलसफे बने हैं
उन्हें कृपया यहाँ प्रयोग मत करें
वे उतनी ही सच्ची हैं
जितनी हमारे यहाँ महिलाओं, जातियों और पाप-पुण्य को लेकर बनी कहावतें

नहीं रोकर हम बन गए मजबूत
जीत लिए किले
कहलाए मर्द
और शराब पीकर महफि़लों में की क्रूर बातें
इस तरह हमने साबित किया कि हमारे भीतर महिलाओं वाली कमजोरियाँ नहीं हैं

अपन कभी नहीं रोते वाले भाव से
हम अशिष्ट घटनाओं, निकृष्ट चुटकुलों और वीभत्स दुर्घटनाओं पर हँसे
और इस तरह से नष्ट कर दी अपने शरीर की रोने वाली कोमलतम ग्रंथि
जो हमारी लाख कु-कोशिशों के बावजूद हमें इनसान बनाए रखती थी

तुम जितनी बातें मुझे सिखा कर गई थी
ज्यादातर चीजें फिर उसी दौड़ में खो गई हैं
और मैं भूलता जा रहा हूँ
आत्मा की पवित्रता के साथ रोना
जबकि जानता हूँ कि इनसान नाम की इस प्रजाति को
रोने ने ही बचाए रखा है अब तक

तुम तो जानती ही हो गुड़िया !
आत्मा और पवित्रता कितनी आउटडेटेड चीजे हैं
आजकल इनके बिहाफ पर एक बार का मोबाइल रिचार्ज भी नहीं हो पाता
अब बुद्धिजीवियों की तरह यह मत पूछना
कि आखिर मोबाइल रिचार्ज कराने की जरूरत क्या है
तुम साथ रहती गर, जरूरत तो रोटी की भी नहीं होती

अब देखो न गुड़िया !
आखिरी दिनों के इंतजार में बैठा हूँ तो उम्र लंबी मालूम पड़ती है
तुम्हारे साथ जब तितली के पंखों की गति से फड़फड़ाता था समय
मैं नहीं जानता था कि इतने महीने साल हैं मेरे पास
नहीं पता था दुनिया के इतने जंजाल हैं मेरे पास

रोने की सुविधा देने के बदले में माँगे गए हैं हमसे सिर्फ कुछ आँसू
एक जीवित हृदय
और दो पारदर्शी पानीदार आँखें

हालाँकि रोते हुए आँखों से आँसू और होठों से कराह निकलना कोर्इ शर्त नहीं है
कविता में रो पाने का वरदान बहुत कम कवियों को मिला है
क्या पता डायनासोर भी जब न लड़ पाते जलवायु से
तो किसी के कंधे पर सिर रख थोड़ी देर रो लेने के बाद
बढ़ा लेते अपनी ताकत, विपरीत से लड़ने की क्षमता

क्या पता वे बचे होते अब तक गर उन्हें रो सकने का वरदान मिला होता

हम भूलते गए रोना
किसी भावुक फिल्म को देखते हुए
किसी की भीगी कहानियाँ सुनते हुए
घोंसले से गिरे एक चिड़िया के बच्चे को उठाते हुए

हरे पेड़ को सूखता देखते रहे
करते रहे अपने अगले प्रमोशन की बातें
यह भूलकर कि हम पेड़ की जगह हैं
और पेड़ हमारी जगह
जो हमसे ज्यादा दुखी हैं हम पर

 


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