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बाल साहित्य

निराला-बचपन
पूनम श्रीवास्तव


बचपन तो होता है निराला
निश्छल, निर्मल, मस्ती वाला
दुनिया से उसको क्या मतलब
वो तो खुद ही भोला-भाला।

माँ की गोदी में लोरी
सुन कर वह तो सो जाता
बातें करता परियों के संग
सपनों में वो मतवाला।

ना कोई चिंता, ना ही फिकर
मस्ती में बीते हर पल
चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान
देख के हँस दे रोने वाला।

बचपन सबके संग में खेले
ऊँच नीच की बात न मन में
सबके दिल को प्यार से जीते
वो तो है मन मोहने वाला।

वो धमा चौकड़ी, वो लड़ी पतंग
वो ब्याह रचाना गुड़िया का गुड्डे के संग
वो पूड़ी हलवा मेवे वाला
सच में वो बचपन अलबेला।

कुछ खट्टा कुछ मीठा बचपन
होता कुछ कुछ तीखा भी बचपन
भूले से भी ना भूलने वाला
यादों में हरदम बसने वाला।

काश ये बचपन हरदम रहता
दुनिया का उस पर रंग ना चढ़ता
कोई अगर मुझसे पूछे तो
माँग लूँ दिन फिर बचपन वाला।

 


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