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वैचारिकी

वैश्वीकरण या पश्चिमीकरण
कृष्ण किशोर


अभी  तक का यथार्थ यही नज़र आता है कि वैश्वीकरण का अर्थ व्यापक रूप में पश्चिमीकरण ही है। कुछ एक देशों की व्यापारिक सफ़लता भी सिवाय औद्योगिक निर्यात के पश्चिम को और कुछ नहीं दे पा रही। चीन और जापान जैसे देश भी पश्चिमी उदारीकरण के अतिरिक्त दूसरे सांस्कृतिक मूल्यों की स्वेच्छा स्वीकृति या घुसपैठ को रोक नहीं पा रहे। वैश्वीकरण में सांस्कृतिकरण एक विशिष्ट आयोजन है, जो केवल पश्चिम द्वारा ही बाकी सब देशों में किया जा रहा है। पश्चिम का पूर्वीकरण, दक्षिणीकरण या उत्तरीकरण नहीं हो रहा है। सभी का सिर्फ़ पश्चिमीकरण ही हो रहा है। इसलिए वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग एक रिक्त गर्वोक्ति मात्र का आभास दिलाता है। सारा विश्व एक हो रहा है, यह एक गर्व का विषय होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है। भीतर ही भीतर अलग-अलग क्षेत्रों के लोग इस बात को समझ रहे हैं और अपनी अपनी पहचान रचने में लगे हुए हैं। सांझे तत्वों के आधार पर ध्रुवीकरण और समूहीकरण हो रहा है।

दूसरे विश्वयुद्ध तक आते-आते उपनिवेश क्षीण हो रहे थे, आज़ादी का संघर्ष सब जगह चल रहा था, लेकिन यूरोप में राष्ट्र सर्वोपरि हो गया था, नाज़िज़्म और फास्ज़िम के रूप में या उसकी प्रतिक्रिया के स्वरूप में। उपनिवेशों का समाप्त होना, राष्ट्रवाद का उदय होना प्रथम विश्व युद्ध के बाद विचारधारा के राजनीतिक स्वरूप का उभरना और शीत युद्ध का आरम्भ - लगभग 50 वर्षों के भीतर ही सब कुछ हो गया। इन में सब से बड़ी घटना थी उपनिवेशों का समाप्त होना और उसके बाद युद्ध क्षेत्र का यूरोप से निकल कर बाकी दुनिया में फैल जाना। एक नए ढंग के युद्ध एशिया और अफ्रीका में फैल गए। आज विचारधाराओं के बाद, उपनिवेशों के बाद, जनयुद्धों के बाद, विश्वयुद्धों के बाद, शीत युद्ध के बाद मुख्य रूप से धर्मों, राष्ट्रों, भाषाओं और संस्कृतियों पर आधारित सभ्यताओं के चेतन रूप का उदय हो रहा है, जो विश्व को एक निर्णायक रूप देने की प्रक्रिया में है। साथ ही विश्व की एकमात्र शक्ति अमरीका के नेतृत्व में वैश्वीकरण की प्रक्रिया और ऊपर से सब के आर्थिक हित में नज़र आने वाली नई विश्व संस्कृति का उदय क्षेत्रीय सभ्यताओं और संस्कृतियों की पकड़ को कितना ढीला कर सकता है यह अभी स्पष्ट होना बाकी है। इतना ही सोचा जा सकता है कि अपनी स्थानीयता में विकसित होते रहने के अतिरिक्त किस रूप में कौन सी सभ्यता या संस्कृति एक वैश्विक रूप का आकार लेने या देने में सक्षम हो सकती है।

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औद्योगिक क्राँति से पहले के संसार को ओझल करना आज बहुत मुश्किल हो रहा है। बदली हुई स्थितियां हमारे पक्ष में नहीं हैं ऐसा लगने लगा है। यूरोप में औद्योगिक क्राँति के बाद धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा था कि कुछ एक समस्याओं का निवारण शायद अब हो जाएगा। जैसे अधिक लोगों को काम मिल सकेगा। जैसे जो कुछ हमारे पास है उस का वितरण काफी दूर-दूर तक आसानी से हो सकेगा। जैसे हमारी सामाजिक मान्यताओं और मानव सम्बन्धों को नए ढंग से प्रायोजित किया जा सकेगा। जैसे कि एक देश का दूसरे से आदान-प्रदान और एक दूसरे के प्रति समझ बढ़ेगी,राजनीतिक ढांचे में भी परिवर्तन आयेगा, ऐसा लगता था। नये-नये शब्द और अर्थ समाज-शास्त्र में और बोलचाल में दाखिल हुए। नई-पुरानी शब्द संस्कृतियां नये अर्थ ग्रहण करने लगीं। वर्ग, काम-संस्कृति, लोकतन्त्र, एंपलोएमेन्ट, जॉब, इन्डस्ट्री, मज़दूर, मासेज, उद्योगपति, पूंजी, वर्गसंस्कृति, आम आदमी, वितरण संस्था और न जाने कितने शब्द और उनसे जुड़े ढेर से नए अर्थ हमें सुनाई-दिखाई पड़ने लगे। हमारी सभ्यता ने एक संज्ञात्मक झुकाव इख्तियार करना शुरू कर दिया। संस्कृति एक व्यक्ति की संस्कृति हो गई। एक कारखाने की संस्कृति हो गई, एक सिस्टम का कल्चर हो गया। इस तरह कितनी ही तरह की वर्ग व्यवस्थाएं खड़ी हो गईं।

आर्थिक वर्गीकरण के साथ-साथ हर नए क्षेत्र के अपने वर्गीकरण हो गए। उन्हीं के अनुसार उन की अलग-अलग मान्यताएं और मूल्य रूप लेने लगे। सारे समाज की एक ही जैसी मान्यताएं हों, एक ही जैसे मूल्य हों, एक ही तरह का व्यवहार हो, एक ही तरह बोल-चाल हो - ऐसी स्थिरता और एकांगिता लुप्त होने लगी। इस तरह का वर्गीकरण वैसे तो हमेशा ही रहा है, पर उनकी श्रेणियों में अचानक जैसे विस्फोट हुआ। चार-छः श्रेणियों की अनगिनत श्रेणियां बनने लगीं। आरम्भ में ही नज़र आना शुरू हो गया था कि जो कुछ हो रहा है, वह सभी कुछ ठीक नहीं है। चीज़ों के उत्पादन के साथ-साथ लोगों का अवमूल्यन भी होगा, यह भी शुरू में ही नज़र में चुभने लग गया था। लोग अपने स्थानों, परिवारों और समाजों से अलग हो कर सिर्फ़ चीज़ें पैदा करने का संतोष भी पूरी तरह नहीं पा सकेंगे, ऐसा भी जाहिर होने लग गया था। टूटने-बिखरने की वेदना भूखे मरने की वेदना से कम कड़ी नहीं है, इस का आभास भी होने लग गया था। इस सारी वेदना और निराशा को सघन अभिव्यक्ति दी जा सकती है, ऐसा चार्ल्स डिकेन्स ने शुरू में ही कर दिखाया था। रोज़गार पाना एक निरन्तर पीड़ा से जुड़ा हुआ कान्ट्रेक्ट (Contract) है इसे भी साधारण सी दूरी पर खड़ा हुआ व्यक्ति समझने लगा था। लेकिन इस दो विपरीत दिशाओं की यात्रा को रोका नहीं जा सका। गरीब आदमी काम मिलते ही सिर्फ़ एक मज़दूर बन कर रह गया।

सभी देशों में अलग-अलग समय पर इस औद्योगिक संस्कृति की दुर्घटनाएं घटीं। अपनी अपनी जगह रह कर अपने अपने तरीकों से इन्सान का विघटन हुआ। दूसरी तरफ़ एक स्थिति थी - औपनिवेशिकता की, जिसने आधे से ज़्यादा संसार को गुलाम बना लिया था। फिर भी अपने-अपने ढोल-मजीरे सभी के थे। अपने तीज-त्यौहार सभी के थे, खानपान, नृत्यगान सभी के अपने अपने थे। कितनी ही सदियां लग जाती हैं एक त्यौहार को समाज का सिंगार बनते हुए या एक लोकगीत को मनों में रचते-बसते हुए। अपनी तन को मोहित करने वाली नृत्य-मुद्राओं को अर्पित होते हुए। मूर्तियों के नैन-नक्श कल्पित करते हुए। लोक-कथाओं के चरित्रों को हृदय की धरती पर रोपित करते हुए। जीवन-दर्शन सभी जातियों का अपना होता है। उसी धरती के पेड़ पौधों की तरह वह भी ख़ास वहीं का होता है। प्रार्थनाओं की संगीत धुनें हमारे नयन-नक्श की तरह अलग-अलग होती हैं। एक महाकाव्य का उदय जब किसी समाज में होता है, तो सदियों की चेतना उस के पीछे होती है। किसी को पुकारने का तरीका भी हमारी पहचान बनाता है। जीना-मरना भी लोग अपने ढंग से सीख जाते हैं। किस मूल्य के लिए सब कुछ त्याग कर एक तरफ़ खड़ा हुआ जा सकता है, ऐसा मनस यों ही कुछ पा जाने या खो देने जैसे प्रक्रिया नहीं है। किस कारण अपनी जान पर खेला जा सकता है, कोई छोटी-मोटी सीख या प्रशिक्षण हमें यह अवचेतना नहीं दे सकता।

हमारी आकांक्षाएं चाहे जितनी भी रंग पहन लें, लेकिन हमारा एक अपना पक्का रंग है जो नहीं उतरता। वह सब का अपना-अपना पक्का रंग है। यही आज विश्व का सांस्कृतिक संकट है। आकांक्षाओं का और सांस्कृतिक स्मृतियों का संघर्ष स्वरूप उग्रतर होता जा रहा है। दुविधाग्रस्त मानसिकता की स्थिति और सांस्कृतिक संक्रमण। भारत की स्थिति ऊपर से थोड़ी भिन्न दिखती है। इसके विस्तार में हम बाद में जाएंगे।

वैश्वीकरण कुछ सम्पन्न लोगों द्वारा सुख सांझा करने का व्यापार है, वृहत्तर दुख सांझा करने की संस्कृति नहीं है। जिन बड़े-बड़े दिग्गजों ने वैश्वीकरण को तुरत-फुरत एक वास्तविकता बना देने का निश्चय स्वप्न देखा था, उन के मन में दूर-दूर तक भी इस व्यापार का मानवीय आधार नहीं था। एक वैश्विक संस्कृति का निर्माण वैश्वीकरण की प्रमुख योजना का हिस्सा है। वैश्विकता के सही मानवीय आधार क्या हो सकते हैं, इस की ज़ोरदार ढंग से बात कहीं सुनाई नहीं देती। एक ही चित्र हमारे सामने लहराता है - सूचना-तन्त्र सांझा हो, बाज़ार में चीज़ें एक साथ प्रकट हों, कोई भी कहीं जाकर अपनी दुकान खोल ले, कारखाना लगा ले। सारा संसार सांझी मण्डी है। मोटे तौर पर अमीर आदमी या देश के लिए वैश्विकता का यही अर्थ है। गुलाम, नकलचियों के लिए यह अर्थ कुछ और भी आयाम ओढ़ लेता है। जैसे, एक ही तरह के शारीरिक व्यवहार, कपड़े लत्ते, खाना-पीना और यहां तक कि तीज-त्यौहार की बिना किसी भावनात्मक या ऐतिहासिक सम्बद्धता के फूहड़ नकल। सारे विश्व में सब को सब कुछ बराबर मिले, अभी तक यह दूर की आवाज़ भी नहीं है। अफ्रीका, एशिया के अरबों लोगों को सिर्फ़ जीवित मात्र रखा जा सके, यह भी चीख़-पुकार कर कोई नहीं कर रहा। ऐसे में वैश्विकता या भूमण्डलीकरण सिर्फ़ एक क्रूर स्थिति है, जिस का पक्ष सिर्फ़ वही लोग ले रहे हैं जिन के पास सब कुछ है या उस की संभावना है। उनका ढकोसला, तर्क यह है कि सम्पन्नता के लम्बे पैर होते हैं, धीरे-धीरे वह सब जगह पहुँच जाती है। आज तक का यथार्थ यही है कि सम्पन्नता हमेशा हथियाई हुई लाठी रही है जो निर्धन को सिर्फ़ अपने दरवाज़े तक पहुंचने देती है, घर में घुसने नहीं देती। कोशिश करने वालों की टांगें तोड़ देती है। एक व्यक्ति या एक पूरा समाज प्रकृति के साधनों की बहुलता से या अपनी धूर्तता से जब भी सम्पन्न हुआ है, उसे हमेशा दूसरों से खतरा महसूस हुआ है। उस ने अपनी सारी अतिरिक्त शक्ति अपने आप को सुरक्षित करने में लगा कर रखी है। अमेरिका इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हम आकाश की तरफ़ दोनों हाथ उठा कर ऐसे वैश्वीकरण को नकारते हैं।

वैश्वीकरण के पक्षधर कहते हैं कि अपनी-अपनी स्थानीय पहचान या संस्कृति के ऊपर उठना आज की आवश्यकता ही नहीं, बल्कि मजबूरी है और यह कि एक सांझी संस्कृति ही इस संघर्ष के अन्त की संभावना जगाती है। उन का तर्क है कि धर्म, भाषा, राजनीतिक व्यवस्थाएं, संस्कृतियां आज तक युद्धों का और हर तरह के नरसंहार का कारण बनी हैं। ईसाई और मुस्लिम, ईसाई और यहूदी, हिन्दु और मुस्लिम, शिया और सुन्नी, प्रोटेस्टैण्ट और कैथोलिक्स इत्यादि संस्कृतियों के आधार स्तंभ रहे और रक्तपात के कारण भी बने। इन से ऊपर उठ कर एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण ज़रूरी है। और भी छोटे-बड़े जातीय विवादों और लड़ाईयों का यह दुनिया घर रही है। चीनियों-जापानियों, चीनियों-वियतनामियों, स्लाव और तुर्क, आरमेनियन और एज़रबाईजानी, आरमेनियन और तुर्क, ग्रीक और तुर्क, सर्बियन और बोस्नियन, हूतू और तूत्सी, काले और गोरे, पर्शियन और अरब, हिन्दू और मुस्लिम इत्यादि सभी अपनी-अपनी लिप्सा और शक्तिहितों का शिकार हुए हैं।

यह सब तर्क उन के हाथ आई हुई लाठी है। वे सिर्फ़ एक जैसा होने की बात करते हैं वे स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि अलग-अलग संस्कृतियां, परम्पराएं, भाषाएं यानी जो शक्ति सम्पन्न हैं, सिर्फ़ उन्हीं का तौरतरीका, उन्हीं का पहनावा, उन्हीं का खान-पान, उन्हीं की वेशभूषा, उन्हीं की भाषा, उन्हीं की संस्कृति और अन्ततः उन की सोच, समझ, विश्वास। आज विश्व सिर्फ़ बड़े शहरों तक सिमट कर रह गया है। न्यूयार्क, लंदन, ब्योनसआईरिस, हांगकांग, सिंगापुर, जोहानसबर्ग, तेल अवीव, टोकियो, मास्को, मैक्सिको सिटी, पेरिस, इसताम्बूल, लास एंजिल्सि, फ्रैंकफ़र्ट, मुंबई या ऐसे ही कुछ और शहर, यहां एक जैसे होटल, एक जैसी कारें, एक जैसी एअरलाईन्स, बाज़ार, कपड़े, खाना-पीना, एक जैसे व्यापारी और एक जैसी सोच, भाषा और धन संस्कृति। इन्हीं देशों में बाकी जगहों पर जहां कुछ नहीं है, वहां कुछ हो जाने से भी लोगों की महत्वाकांक्षाओं में कमी या बढ़त नहीं होगी। आम आदमी, गरीब कस्बों, देहात, खेतमज़दूर, स्कूल, कच्चे घर, कच्चे रास्ते, बीमारी, भुखमरी से भूमण्डलीकरण या वैश्वीकरण का कोई सम्बन्ध नहीं है। जो लोग कहते हैं कि धीरे-धीरे वहां भी सब कुछ होगा, उन की यह भाषा दुनिया के किसी गरीब को समझ नहीं आती।

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यह विश्व अब इतना बड़ा नहीं है कि साधनों और उत्पादनों का वितरण मानव हित में सभी जगह आवश्यकतानुसार न किया जा सके। ज्ञान और विज्ञान अब इतनी ऊँचाई पर हैं कि इन्सान अपने हित की सांझी समझ-बूझ पैदा कर सकता है। विश्व के बारे में नई समझ और नया ज्ञान हमारा सांझा धर्म बन सकता है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है और न ही ऐसी कोई संभावना दिखाई देती है। जो हो रहा है, वह हर स्तर पर यह अहसास दिलाता है कि भय, कृत्रिमता और हवस हमारी चेतना के पहले कोष्ठ में बैठे, जबकि विज्ञान और सोच की इस ऊँचाई पर खड़े होकर निर्भयता, स्वाभाविकता और स्वछन्दस्फूर्तता हमारे जीवन को संचारित करने वाली प्रेरणाएं हो सकतीं थीं। ध्यान से देखने पर ऐसा लगता है कि कपड़े उतारना या कपड़े पहनना एक ही जैसी स्थितियां हैं, डर की चीख़ या वासना की फुफकार का अंतर जैसे समाप्त हो गया है। संदर्भहीन, वातानुकूलित कमरे में एक दफ्तरी वार्ता और परिवार के सदस्यों या मित्रों की बातचीत में अन्तर करना मुश्किल हो गया है। एक तरफ़ ऐसी नीरसता है, दूसरी तरफ़ चीज़ें प्राप्त करने की क्रियाओं में इतनी स्फूर्ति और आक्रामकता है कि भोजन करते हुए इन्सान में और शिकार करते जानवर में भेद नज़र नहीं आता। भोजन सिर्फ़ उन्हीं के लिए है जो हर समय भूखे हैं। पाने की कोई सीमा नहीं है। संसार में कहाँ, क्या पाया जा सकता है, बस वही देखना है। जो नहीं देख रहा, हर समय चौकस होकर नहीं देख रहा है, उसके साथ कोई भाईचारा नहीं, दोस्ती नहीं, दुश्मनी भी नहीं। इसके विपरीत, एक दूसरी दुनिया भी है जो किसी गिनती में नहीं आती। उस दुनिया के लोग अब भी अपने भूख लगने का समय जानते हैं। वंचित लोगों की दुनिया बहुत बड़ी है लेकिन किसी को दिखाई नहीं देती। पहली दुनिया बहुत छोटी है, बहुत कम लोग हैं वहाँ। लेकिन बस वही सब को नज़र आती है।

दूसरी तरफ़ सैनिक शक्ति का इतना खुला प्रयोग एक अजीब दहशत का माहौल पैदा करता है। किसी बाज़ार पर कब्ज़ा करना हो, फौजें भेज कर किया जा सकता है। किसी धरती के तेल पर अधिकार करना हो, फौजें भेज कर किया जा सकता है। किसी धर्म से दुश्मनी हो, फौजें भेज कर निबटारा किया जा सकता है। कमज़ोर लोग सब से अच्छे तमाशबीन बने हुए हैं। सब से ज़्यादा ज़ोर से ताली उन्हीं के हाथ से बजती है। एक शक्तिशाली को दूसरा शक्तिशाली आँखें दिखा कर दूसरी तरफ़ चल देता है, लेकिन किसी बात से टोकता नहीं। विचारधारा कोई भी हो, अपना हित सब से ऊपर है। वास्तव में, विचारधाराएं अब अपने हित के रास्ते में आने लगी हैं।

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वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण सिर्फ़ व्यापारिक व्यापकता के सिद्ध औज़ार हैं। पिछले दस से अधिक वर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है। वास्तव में इस दुनिया के कुछ विभाजन बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक वह हिस्सा है जिसने आधी से ज़्यादा दुनिया पर राज्य किया, यानी यूरोप और उन का समवर्णी, समधर्मी अमेरिका (हालांकि अमेरिका ने कभी किसी दूसरे देश पर राज्य नहीं किया)।

दूसरे - वह प्रदेश जो कभी लम्बे समय के लिए किसी के उपनिवेश नहीं रहे लेकिन जिन की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में उतार चढ़ाव आता रहा जैसे, चीन और जापान।

तीसरे - वे देश जो उपनिवेश रहे मगर जिन की अपनी भाषायें और प्राचीनता हर दृष्टि से समृद्ध थीं – जैसे, भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के देश।

चौथे - वे देश जो उपनिवेश रहे लेकिन जिन की अपनी भाषाओं का लिखित रूप विकसित नहीं था, जिन के पास कोई प्राचीन साहित्य दर्शन का कोई लिपिबद्ध स्वरूप नहीं था - जैसे अफ्रीका के देश और लैटिन अमेरिका। इन देशों ने अपने शासकों की भाषा अपना ली - विशेषकर लैटिन अमेरिका ने - लेकिन यह भाषा अंग्रेज़ी नहीं, स्पेनिश है, क्योंकि स्पेन के लोग ही वहाँ आ बसे थे। वहाँ की मूल भाषाएं समाप्त प्रायः हैं। अफ्रीका में अपनी लोक भाषायें, अपनी संस्कृति पूरे जीवन के साथ धड़कती हुई जीवित है, लेकिन भाषा उन्हें अपने शासकों की अपनानी पड़ी। उनकी अपनी विकसित, लिखित भाषाएं थी ही नहीं।

भारत एक अनोखी स्थिति में है। अपनी उच्च, प्राचीन, संस्कृति और समृद्ध भाषाओं दर्शनों के होते हुए भी अधकचरे रूप में अपने शासकों की भाषा अपनाने की होड़ में लगा हुआ है। आर्थिक असमानता के ऐसे कगार पर खड़ा है कि तल की गहराई का अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। यूरोप के सारे देश जो उपनिवेशिकता की स्थिति में नहीं थे, उन की अपनी भाषाएं और संस्कृतियां सुरक्षित हैं। वे अपनी ही भावनाओं में शिक्षा ग्रहण करते हैं। जर्मनी, फ्राँस, इटली, स्विटज़रलैण्ड, नीदरलैण्ड और पूर्वी यूरोप के सारे देश तथा रूस इत्यादि अपनी ही भाषा में अपनी ज़िन्दगी जीते हैं। अपनी ही भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। अंतर सिर्फ़ इतना ही है कि वे उपनिवेश नहीं थे। उन का शासक अगर कोई थोड़ी बहुत देर तक था भी तो उन्हीं की संस्कृति का, उन्हीं के वर्ण का। ज्ञान-विज्ञान पर उनका भी उतना ही ऊँचा स्थान है जितना किसी भी अगुआ देश का। वे अंग्रेज़ी भाषा को सिर्फ़ एक ''पूल'' के तौर पर प्रयोग करते हैं। उतनी ही अंग्रेज़ी सीखते हैं जिस से वैश्विक ज्ञान-विज्ञान सांझा कर सकें। लेकिन अपनी सृजनात्मकता को अपनी ही भाषा में फलने फूलने देते हैं। लेकिन लगता है कि हमारे देश में यह तर्क एक कमज़ोर आदमी का तर्क है क्योंकि वहाँ सारी ताकत अंग्रेज़ी से आती है। अपनी आत्मछवि को बाहर देखने की और मनोरंजन की भूख स्वाभाविक है और वो हम अपनी भाषा की फिल्में देख कर या अपनी भाषा के अख़बार पढ़ कर पूरा कर लेते हैं। कम उम्र के बच्चों को हम यह आत्मछवि बिल्कुल नहीं देना चाहते। उन्हें, इसलिए हम नाम-मात्र को ही अपनी भाषाओं के संपर्क में देखना चाहते हैं। फिल्में देखना और बात है, लेकिन किताब वे अंग्रेज़ी के इलावा किसी और देशीय भाषा में पढ़ें, यह हीन स्थिति है, माता-पिता की छवि। भविष्य बिगाड़ ने वाली बात! नितान्त औपनिवेशिक मनस्थिति! किसी ऊँचे वैज्ञानिक शोध या आविष्कार की बात तो दूर, कोई अन्य प्रकार का मौलिक चिन्तन भी इस उपनिवेशिक मनस्थिति ने वहाँ कभी पनपने नहीं दिया। सारे मौलिक रूप से आज़ाद देश और समाज अपनी सांस्कृतिक भाषा में ही आज भी सारी शिक्षा प्राप्त करते हैं, किताबें लिखते हैं, पढ़ते हैं। बहुत सीमित रूप से आवश्यक के अनुरूप अंग्रेज़ी सीख लेते हैं। उन के बौद्धिक और नेता भी अपने देशों से बाहर जाकर अपनी ही भाषाओं में विश्वास के साथ बोलते हैं। ठीक जो कहना चाहते हैं, वही निर्भीकता और आत्मविश्वास से कहते हैं।

हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य इतने विस्तृत और विविध और प्राचीन हैं कि उन्हें बाहर से आये हुए मूल्य सम्मानित होकर और भी समृद्ध कर सकते हैं। ऐसा ही पिछले चार हज़ार सालों में हुआ है। पर्शिया में साईरस और डेरियस, ग्रीस का सिकन्दर, तुर्की मुसलमान, मध्य एशिया के लोग इत्यादि अपनी भाषाएं, संस्कृतियां और रीति-रिवाज़ इस तरह इस धरती पर छोड़ गये कि हम किसी को अलग करके नहीं देख सकते। हमारी हिन्दुस्तानी ज़ुबान, तुर्की, पर्शियन, अरबी, संस्कृत तथा कितनी ही अन्य स्थानीय भाषाओं से मिल कर बनी है। ख़ासतौर पर ये सब संस्कृतियां भारत के दामन में अपने पूरे रंगोबू के साथ बसी रही हैं। हमारा पड़ोसी कहीं भी, किसी भी गांव या शहर में मुस्लिम हो सकता है, मुहल्ले में मस्जिद हो सकती है। तीज-त्यौहार लगभग समान अनुभव रहे हैं। मध्य एशिया से लेकर ग्रीस तक हमारी भावनात्मक और विवेकात्मक समझ रही है अरब के देशों, खाड़ी के देशों को छोड़ कर। ऐसी सांझ हमारी अंग्रेज़ों के ढाई सौ साल उपनिवेश रहने पर भी नहीं बनी। कोई गोरा कभी किसी आम आदमी का पड़ोसी नहीं रहा। किसी बाज़ार में उस की छोटी मोटी दुकान नहीं रही। उन का कल्चर हमेशा अचंभे की चीज़ रही। उनके चर्च हमारे गली मुहल्लों में नहीं रहे। कुछ ख़ास इलाकों को छोड़ कर। ईरान के सूफ़ी शायरों की तरह कोई यूरोपियन शायर हमारी चेतना या स्मृति का हिस्सा नहीं रहा। हम उन के भाव नहीं पहचानते। बहुत पुराने इतिहास में न भी जाएं तो भी सूफ़ियों में अमीर ख़ुसरो और मुग़लों में मीर और ग़ालिब और हमारे अपने ज़माने के फैज़, फ़िराक और जोश आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। सभी क्षेत्रों और भाषाओं के अपने अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रतीक हैं जो नए या पुराने की श्रेणी से ऊपर हैं, वे हमारे मानस का हिस्सा हैं। जैसे तुलसी और कबीर हमें निर्देशित करते हैं, कोई दूसरा निर्देशित नहीं कर सकता। मिल्टन, चॉसर और यहाँ तक कि शेक्सपियर भी हमें आपदित नहीं कर सकते। हम केवल क्लासिकस के नाम इसलिए ले रहे हैं कि सिर्फ़ क्लासिकस ही हमारी अन्तरचेतना को सूक्ष्म रूप से आकारित करते हैं और उद्धृत करने योग्य बनाते हैं। आज के 'हैरी पोटर' की बात अभी नहीं की जा सकती। यह आज लगता है हम अपनी स्मृति के साथ जबरदस्ती करने की मुद्रा में आये हुए हैं। दूसरों को साथ ले कर चलना एक बात है। पूरी तरह दूसरों के पीछे चल पड़ना दूसरी बात। ओद्यौगीकरण और उसके साथ जुड़ी हुई आधुनिकता सिर्फ़ एकतरफ़ा नहीं हो सकती। जब भी हमें कहीं से कुछ शक्तिदायक मिलता है, उसे हम स्वाभाविक ही ग्रहण करते हैं, लेकिन आवेश में आ कर नहीं। आज लगता है कि हम आवेश में आए हुए हैं। इसलिए चमकदार पक्की सड़कों से थोड़ी ही दूर उतर कर जाने से वह आवेश काफ़ूर हो जाता है।

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आज सिर्फ़ उन्हीं क्षेत्रों में हमारे युवा लोगों को काम मिल रहा है जिन का सीधा सम्बन्ध किसी बाहर के उत्पादक-तत्वों से सम्बन्ध है जैसे कि I.T., इन्फ़रमेशन इंडस्ट्री और टेलीमार्केटिंग। साफ्टवेयर इन्डस्ट्री जो सूचना उद्योग का ही हिस्सा है, हमारे देश की आन-बान-शान बनी हुई है। किसी भी देश और समाज की सीधी उन्नति और खुशहाली का साधन बनते है, वहां के ज़्यादा और आम आदमी को काम दिलाने वाले उद्योग। कारखाने - जिन में बेशुमार लोग काम करते हों, चीज़ें बनती हों। वहां से चीज़ें बनकर बाहर के समाजों में ख़पत होती हो। जैसे एशिया में चीन और जापान में है। हमारे देश रोज़गार के ज़रूरतमन्द 40 करोड़ लोगों में से सिर्फ़ 1.3 प्रतिशत लोग - आई.टी./बी.पी.ओ. इन्डस्ट्री में काम करते हैं। आने वाले दशक में इन की संख्या 2.3 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया जाता है। एशिया का कोई भी देश या कहीं का भी देश, कारखानों में अच्छा वेतन मिलने की सम्भावना के बिना गरीबी से बाहर नहीं आया। हांगकांग और सिंगापुर इस बात की एक विरल मिसाल हैं।

सूचना उद्योग निर्यात का सिर्फ़ 23 प्रतिशत हिस्सा है। यह कोई तसल्ली की बात नहीं। किरोलस्कर एन्जिन के मालिक अतुल किरोलस्कर का कहना है कि 1982 के बाद अब तक उन्होंने सिर्फ़ एक सौ नए लोगों को काम दिया है। वही 2000 लोग पिछले दो दशकों से वहां काम करते हैं। इन्होंने एक साल में 10 बिलियन रुपयों की सेल की है। फिर भी नए लोगों को काम नहीं मिल रहा। बजाज मोर्टस के मालिक राहुल बजाज के अनुसार-पिछले वर्ष उन्होंने 24 लाख गाड़ियां बनाईं और बेचीं। कारखाने में 10500 काम करने वाले लोग हैं। 1990 के दशक में वे दस लाख गाड़ियां वे बनाते थे और काम करने वालों की संख्या 24000 थी। कई गुणा ज़्यादा मुनाफ़ा कई गुणा कम लोगों को रोज़गार - आज की हकीकत है। भारत में वैश्वीकरण का यही रूप है। सिर्फ़ एक ही तरह के प्रशिक्षण प्राप्त लोगों की हर जगह ज़रूरत है - I.T. में भी और दूसरे उद्योगों में भी। यानी वही एक ही किस्म के पढ़े लिखे लोग हैं जिन की सभी जगह मांग है। अलग-अलग क्षेत्रों का विकास भारत में नहीं हो रहा है, जहां सभी तरह के - अधिक या कम पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल सके। गांव के काम-धंधे बिल्कुल ठप्प हो गए हैं। इन सब समस्याओं का हमारे उद्योगों के गिने चुने मालिकों या सूचना उद्योग के सफ़ेदपोशों के पास कोई हल नहीं है। सभी विकसित देशों में आम आदमी को चाहे उस का प्रशिक्षण कैसा भी हो, काम मिलने का भरोसा बना रहता है। स्थानीयता एक शक्तिशाली सामाजिक सच्चाई है। हर तरह के लोगों को अपनी मनपसन्द पढ़ाई के क्षेत्र चुनने की सुविधा देना ही काफ़ी नहीं है। उन की शिक्षा के अनुसार काम भी मिलना चाहिए। गाँवों में शिक्षा की तरफ़ ध्यान न देकर, बनावटी किस्म के मंहगे लेकिन आधारहीन, दृष्टिविहीन अंग्रेज़ी स्कूलों को पनपने की छूट देना, सामाजिक लापरवाही की बेमिसाल मिसाल है। सिर्फ़ एक ही दिशा में पी से पी सटा कर चलने की भेड़चाल अन्ततः समाज और व्यक्ति दोनों को निराश करती है। हर तरह के संस्थानों से निकलते हुए युवाओं को रोज़ी पा सकने का उत्साह बना रहे तो अलग-अलग तरह के उद्योगों, उन से जुड़े विकास, प्रशासन और मानव संसाधन विभागों के आधार यही युवा लोग बन सकते हैं।

दूसरी तरफ़ मानवीय व्यवहार सिर्फ़ एक कन्ज़्यूमर का व्यवहार नहीं होता। आज हम हर प्रयास को इन्डस्ट्री के रूप में और हर इन्सान को सिर्फ़ एक कन्ज़्यूमर के रूप में देखने के आदी होते जा रहे हैं। लेकिन सच यह है कि हमारे अस्तित्व में कहीं बहुत पीछे के कोने में कन्ज़्यूमर खड़ा होता है। जिन इच्छाओं, संवेदनाओं, स्वरूपों, आकांक्षाओं के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को पाने के लिए व्यक्ति कन्ज़्यूमर बनता है, वही स्रोत हमारे व्यवहार के निर्णायक बने रहते हैं। वे भूतली आकांक्षाएं इतनी क्रूर नहीं होती कि हमें सिर्फ़ विघटन के दरवाज़े तक छोड़ कर वापिस चली जाएं।

विविधता और विभिन्नता किसी भी समाज का प्राण तत्व होता है। वही हमने समाप्त कर ली है। जिस पश्चिमी समाज और संस्कृति की होड़ में हम आए हुए हैं, उनकी सिर्फ़ एक तरह की आकृति को ही हम जानते हैं - सिर्फ़ वही जो मीडिया हमें पहुँचाता है। एक सीमित रूप ही उन का हम देख पाते हैं और उस में भी जिसे हम चुन रहे हैं, वे थका देने वाले और हताश कर देने वाले चित्र हैं। उनकी शक्ति और स्फ़ूर्ति का अन्दाज़ा हमें इन चित्रों से नहीं मिलता। रात भर पैट्रोल पम्प पर काम करने वाली लड़की को हम नहीं जानते। किसी सैनेटर के बेटे को स्टोर में खरीददारों के थैले भरते हुए हम नहीं देखते। एक ट्रक ड्राईवर को बड़े से बड़े नेता से इस तरह बात करते हुए हम नहीं देखते जैसे कि उस का पड़ोसी हो। एक बड़े अफ़सर को एक आम आदमी को अपने कमरे से बाहर आकर रिसीव करते हुए, उसे अपने कमरे में बात करने के लिए खुद ले जाते हुए हम नहीं देखते। एक ही स्थान पर मां, बेटी दोनों को अपने-अपने प्रेमियों के आलिंगन में नृत्य करते हुए देखने के हम आदी नहीं हैं। रात को दो बजे एक लड़का या लड़की को घर आकर अपनी मां या पिता के साथ सहजता से बात करते हुए हम नहीं सुनते। उन का असली साहित्य भी हम तक नहीं पहुँचता ख़ासतौर पर हमारे बच्चों तक। बड़े कृत्रिम किस्म के अहसास में आकर हम एक सांस्कृतिक जोखिम उठा रहे हैं। आत्म-निर्भरता जो वहां हाई स्कूल के बाद ही बच्चों पर लाद दी जाती है, वही उन का सम्बल भी बनती है। हमारे युवा लोग कुछ अच्छी बातें भी वहां से ले रहे हैं। जैसे कि एक संकुचित व्यवहार की रस्साकशी से आज़ाद हो रहे हैं और अधिक आत्म-विश्वास से मानव संबन्धों को ले रहे हैं। लेकिन दूसरे पक्ष जिन्हें हम देख नहीं पाते, वे अधिक महत्वपूर्ण हैं - जैसे आत्म-विश्वास और सहजता। सब से बड़ी बात ये है कि वैश्विकता के नाम पर ये सारा मूल्य व्यापार हो रहा है। क्यों नहीं हम डंके की चोट कहते कि वैश्विक नहीं, सिर्फ़ पश्चिमी व्यवहार का आकाश हमारे सिरों पर है।

पश्चिमीकरण मुख्य रूप से एक सांस्कृतिक व्यवहार है और वैश्वीकरण उस का व्यापारिक पक्ष। दोनों की ही एकांगी स्थिति में आज बहुत सी सामाजिक इकाईयां आई हुई हैं। हमारे देश की स्थिति भी इसी आर्थिक एक स्तरीयता और सांस्कृतिक एकपक्षीयता से निकल ही नहीं रही। दूसरी तरफ़, विश्व का पश्चिमी और गैर पश्चिमी बंटवारा, भूभागों की सभ्यताओं का अस्तित्व संघर्ष हमें किस तरह और किस दिशा में उद्वेलित करता है, आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगा। आशा है, हमेशा की तरह ही, इस संक्रमण को भी हम अपनी प्राचीनता के समकक्ष रख कर देख सकेंगे।

(जुलाई 2006)


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हिंदी समय में कृष्ण किशोर की रचनाएँ