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कहानी

अधूरे अंत की शुरुआत
विमलेश त्रिपाठी


मैं पाठकों को साक्षी मनकर कसम खाता हूँ कि यह कहानी नहीं, एक सत्य घटना को क्रमवार लिखकर कहानी बनाने की एक असफल और अधूरी कोशिश भर है। साथ ही मुझे यह भी कहना चाहिए कि तथ्यों की जानकारी प्रदान करने के लिए मैं खुदी यादव का आभारी हूँ जिसके कारण मैं यह पहली कहानी लिखने की कोशिश कर सका।

यह कहानी खुदी यादव के लिए...

प्रभुनाथ की डायरी, कुछ अनाप-शनाप बातें यानी कि कथा की शुरुआती कोशिश में कुछ तथ्य

'यही थी वो जगह जो दिन-रात सपने में एक सितार की तरह बजती थी...!! हर गुनगुनी सुबह की जम्हाई के साथ सूरज का सीना चौड़ा हो जाता था...एक चिड़िया कान में गुनगुनाती थी और कह जाती थी कि सब कुछ बँधा है तुम्हारी ही मुट्ठी में। एक हाथ बढ़ाने भर की दूरी कि दुनिया की सारी खुशियों को लपक लिया जा सकता था। ...लेकिन उस जगह से दूरी कितनी बढ़ गई है...!!! नादानियों का समय बहुत दूर कहीं छूट गया है।'

- राकेश कुमार, दि. 7.08.2004

आखिरी अंश प्रभुनाथ ने लिखा। फिर नाम और नाम के साथ दिनांक लिखना जरूरी लगा। डायरी के पिछले पन्नों पर लिखीं बातों को पढ़ा और यह महसूस कर गर्व किया कि यदि उनके मर जाने या कहीं चले जाने के बाद इसे कोई पढ़े तो कितना प्रभावित होगा।

उनकी रोज की आदत थी कि वे सोचते थे कि प्रत्येक आदमी को डायरी जरूर लिखनी चाहिए और इसी सोचने की आदत के तहत जिस दिन अपने को बहुत अकेला अनुभव करते थे उस दिन रात के समय डायरी लिखने जरूर बैठते थे। हालाँकि वे हमेशा ही अकेलापन महसूस करते, उनका मानसिक गठन ही कुछ ऐसा था कि सबके साथ रहते हुए भी मन का एक कोना किसी अँधेरी सुरंग की तरह उन्हे परेशान करता था, जिसमें बार-बार जाकर जाकर वे लौट आते थे और डायरी में कमोबेश उसी आवाजाही की प्रतिक्रिया की छाया दिखाई पड़ती थी। हालाँकि यह लेखक का सिर्फ अनुमान है और इसमें खुदी यादव की सहमति शामिल है।

कहना जरूरी है कि उनके डायरी लिखने की एक विशेषता थी। वे रोजमर्रा की घटनाओं को दुहराने से बचते थे और कोशिश करते थे कि उनकी डायरी किसी दार्शनिक के चिंतन की दस्तावेज-सी बने। इसलिए ही जब अपने प्रेम की असफलता पर लिख रहे होते थे तो प्रेम क्या है और क्यों प्रेम करना चाहिए और क्यों नही, इस बात पर ही उनकी लेखनी केंद्रित रहती थी। देखने से वे प्रेमी की तरह नहीं लगते थे। उनका दावा था कि वे स्त्रियों को माँ के रूप में देखते हैं। लेकिन उनके शिष्यों में से ही एक शरारती शिष्य का कहना था कि अरे, आप लोग नहीं जानते हैं - प्रभु तो डूब-डूब कर पानी पीने वाले आदमी हैं। प्रभु की डायरी का वह अंश जिसे उन्होंने नाटक वाले दिन लिखा था उससे खुदी यादव की बातों पर विश्वास करने का मन करता है। खुदी यह दावा करता है कि नाटकवाले दिन वह प्रभु के साथ था। यहाँ उसका एक अंश पाठकों की सुविधा के लिए दिया जा रहा है -

'फूल का गंध जिस तरह सबको अच्छा लगता है वैसे ही मुझे भी। इसमें कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं है। लेकिन फूल अच्छा लगे और इतना अच्छा लगे कि बस उसे हाथों में लेने का मन करे, ऐसा पहली बार मेरे साथ हो रहा है। मुझे कालिदास याद आ रहे हैं... ऐसा क्यों हो रहा है यह मेरी समझ से परे है। ऐसा पहली बार हो रहा है। मानव हृदय एक रहस्य है और इस रहस्य से मैं सचुमुच जूझना चाहता हूँ।'

इस अंश के बाद हिंदी के किसी पुराने कवि की किसी प्रेम कविता की कोई पंक्ति लिखी हुई थी, कुछ आड़ी-तिरछी आकृतियाँ बनी हुई थीं जिसे समझ पाना बहुत मुश्किल था। खुदी के अनुसार उस रात प्रभु कुछ उद्विग्न-से थे। सुबह उठे तो आँखें लाल थीं। जैसे सूरज बहुत दिनों के बाद निकलने पर टहटह लाल होता है याकि सिर्फ हमारे देखने में लाल होता है कि सूरज तो सूरज की तरह ही होता है। और प्रभु भी पहली बार सूरज की तरह नहीं निकले होंगे, उनके निकलने की एकबारता, दोबारता या बारंबारता के बारे में खुदी बहुत कुछ जानता होगा। उसे बीड़ी और बीयर का लालच देकर मुहल्ले से दूर किसी फटीचर बार में ले जाना होगा तब जाकर कहीं कुछ पता चलेगा कि अचानक एक दिन कलकत्ते से प्रभु क्यों गायब हो गए थे... कहाँ चले गए थे? लेखक की चाईं दृष्टि मुझमें पहले से ही है। इतनी आसानी से हाथ में आए प्लॉट का मुँह मारकर कोई कबाड़ी कहानी लिखना होता तो कविताएँ ही क्या खराब थीं। पहली ही कहानी में कमजोर लेखक साबित हो गया तो मार्केट में पानीफल जितना महत्व भी न रह जाएगा। गहरा रिसर्च करना होगा... तो आइए जाँच-पड़ताल शुरू करते हैं... अथ श्री प्रभु कथा...

राकेश कुमार से श्री श्री 1008 प्रभु तक का सफर

पंडित प्रभुनाथ का उसली नाम राकेश कुमार था यह बताने की उतनी दरकार नहीं जितनी यह बात कि उनका नाम प्रभु पड़ा कैसे। तो हुआ यूँ कि राकेश कुमार पहली बार गाँव से भागकर इस महानगर में आए थे। जैसे-तैसे बारहवीं पास किया। साहित्य के अच्छे अध्येता तो थे ही। अच्छे अंकों के कारण इस महानगर के सबसे अच्छे कॉलेज में उन्हें दाखिला तो मिल गया था लेकिन एक मुसीबत थी। बचपन से आज तक उन्होंने किसी अजनबी लड़की से बात न की थी। गीता पढ़ते थे। रोज लगभग एक घंटे की पूजा भी नियमित चलती थी। पुरानी प्रथा के अनुसार शिखा भी रखते थे। कॉलेज में आए तो देखा कि लड़कियों की संख्या यहाँ बहुत थी। प्रायः सबने उनसे उनकी शिखा के बारे में पूछा। कई लोगों ने मजाक के स्तर पर भी। प्रभुनाथ बहुत चिढ़े। लड़कों ने उन्हें और चिढ़ाया।

उनकी एक और आदत थी। बल्कि एक शगल जो उन्होंने ने ही विकसित की थी और वह भी जान-बूझकर। हर बात में सच्चाई, आदर्श और नैतिकता के भारी-भरकम संवाद उनके मुँह से वैसे ही निकलते थे जैसे उनके गाँव के बच्चों के मुँह से बहिन-महतारी की गालियाँ निकलती थीं। हालाँकि गाँव में बीते समय को वे अपनी नादानियों का समय कहते थे जिसे छोड़कर वे इतनी दूर यहाँ कलकत्ता आ गए थे। और यह भी सच था कि उन्हें किसी झुलनी का धक्का नहीं लगा था (पाठक याद करें वह प्रसिद्ध लोक गीत - लागल झुलनिया के धक्का बलम कलकत्ता पहुँच गए)। शुरू दिनों में कहीं ठहरने की जगह नहीं थी सो पता नहीं कैसे खुदी से उनकी मुलाकात हो गई और राकेश कुमार के ठहरने के लिए कपूरगली के एक गंदे मुहल्ले में छोटी-सी जगह मिल गई।

मुहल्ले के लोग उनको पंडित कहते। देखते-देखते शिष्यों की एक अच्छी-खासी जमात भी तैयार हो गई। रोज शाम खुदी यादव के घर मजलिस लगती। राकेश कुमार धर्म, राजनीति, प्रेम, संस्कृति और दर्शन पर बोलते जाते। अथक-अबाध।

- आजकल के प्रेम को क्या कहेंगे प्रभु...?

दुसरा दुहराता था - बोलिए प्रभु!!

आजकल का प्रेम कुत्तों की तरह हो गया है। इस प्रेम को कुकुर प्रेम कहना चाहिए। एक कुतिया देखी नहीं कि सारे कुत्ते उसके पीछे लग जाते हैं - राकेश जी अपनी रौ में कहते और शिष्य दुहराते - क्या बात कही आपने प्रभु!! जय हो... जय हो प्रभु!! ऐसे ही बहुत दिनों तक यह क्रम चलता रहा। मुहल्ले से होता हुआ यह जयकार कॉलेज तक में गूँजना शुरू हो गया। जब राकेश कुमार की एक-एक बात पर जयकार होना शुरू हुआ और यह होते-होते कॉलेज के कैंटीन तक पहुँचा तो उन्हें लगा कि उनका असली नाम कहीं बिलाता जा रहा है। कोई पूछता - क्या पढ़ रहे हैं प्रभु आजकल? राकेश कुमार कहते - अपराध और दंड। पूछनेवाला अजीब शक्ल बनाकर कहता - जय हो प्रभु... जय हो...

इन जयकारों की इतनी आवृति हुई कि वे इससे डरने लगे। फल यह हुआ कि वे सबसे अलग और अकेले रहने की कोशिश करने लगे। उनका पहनावा ऐसा था कि उन्हें अच्छे कपड़े पहने लोगों के सामने जाने, उनसे बात करने में अजीब-सी झिझक महसूस होती। अपने भारी-भरकम संवादों से इस कमी को ढाँपने का उनका प्रयास जयकार के भद्दे मजाक में मानो कहीं खो गया था। इस झिझक को 'इनफेरिअरिटी' और उसके साथ लगे हुए शब्द को 'कॉम्पलेक्स' कहते है, ये तो उन्हें बाद में पता चला। इसके साथ ही 'फ्रस्ट्रेशन' और 'डिप्रेशन' जैसे भारी-भरकम शब्द भी सामने आए जिनसे उन्हें कभी फोबिया-सा हो गया था। इसके बाद आदि-आदि शब्द और आदि-आदि बातें और इत्यादि-इत्यादि घटनाएँ जिनकी खुदी को बराबर याद नहीं। लेकिन खुदी कहता है कि तब तक लोग उनका असली नाम भूल चुके थे, प्रभु नाम स्थापित हो चुका था, हर कहीं उनका जयकार होता था। उनके न चाहने के बावजूद। जय हो प्रभु... जय हो...।

जागती आँखों में रूमानी सपने यानी कि शुरुआत में एक भूमिका

एक दिन राकेश कुमार अकेले बैठे अपनी डायरी के पन्ने पलट रहे थे... कि मानो कनखी से लड़कियों की हरकत देख रहे थे, जैसे गाँव के धूल भरे आईने में शहर के शोर और रंगीनियों की तस्वीर भर रहे हों। दूर एक पेड़ की ऊँचाई पर धूप का एक सतरंगा टुकड़ा अटका हुआ था, और उनको लग रहा था कि उनके हृदय के किसी कोने में किसी 'कॉम्प्लेक्स' का कोई बस्ता रखा हुआ है जिसे अपनी पीठ पर लादकर सुबह की टनटनाती घंटी की ताल पर वे स्कूल की तरफ दौड़ते थे... कि बीच रास्ते में ही कहीं ताश का पत्ता बँटने लगता था और न चाहकर भी उनके लिए स्कूल पहुँचना नामुमकिन के करीब हो जाता था। लेकिन अब घंटी नहीं बजती, समय बजता है। समय का बजना उन्हें रोकता नहीं इसी तरह एकांत में पहुँचाता है जहाँ से 'इनफेरिअरिटी' को 'सुपररिअरिटी' के पास पहुँचाया जा सकता था। ऐसा बाद के दिनों में हुआ था। और बाद के दिनों में ही कुछ ऐसा भी हुआ था जो छूट गए नादानियों के समय में होता था...। कि वह कहीं न कहीं से आती ही थी... कि जैसे हवा की तरह। और उसकी मुस्कान में धूप का धुला हुआ चेहरा जैसे कहता था कि इतना अकेले रहना नॉर्मल नहीं है... कि और किसी को न सही पर कम-अज-कम धूप के टुकड़े को अपने पास बुलाकर बैठाया जा सकता है... और इससे किसी तरह की नैतिकता की हानि न होती थी।

तो वे अकेले बैठे आपनी पुरानी पीली डायरी के पन्ने पलट रहे थे और धूप का एक टुकड़ा उनके पास बैठा हुआ था कि उन्होंने बैठा लिया था कि इतने में वह आई कि उसकी जुल्फों की महक से प्रभुनाथ मदहोश हुए कि उनकी चेतना जाती रही कि जैसे लगा कि वे सपने में बहुत देर तक उसके 'सेंटेड' बालों से खेलते रहे थे...। ...कि खुदी यादव ने आकर कहा - चलिए प्रभु, पांडे सर का क्लास हो रहा है। आज बिहारी का श्रृंगार वर्णन पढ़ाने वाले हैं।

- खुदी तुम जानते हो कि मुझे रीतिकालीन कवियों से कितनी चिढ़ है। तुम जाओ, मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है।

- यार, तुम तो एकदम गुरू निकले।

- क्या कर दिया हमने यार, वहाँ गाँव के अँधेरे में ही भले-चंगे थे। यहाँ आकर मसखरा बन गए। साले यहाँ सब ही खुद को मॉड समझते हैं। तुम जानते हो कि मॉड के मायने...।

खुदी समझ गया कि गुरू अब चाटने के मूड में है। कोई बड़ी-सी फिलॉसफी झाड़ देगा और न चाहते हुए भी जयकार करना पड़ेगा। सो, उसने पाला बदल कर कहा - आज कॉलेज में वो भी है गुरू। क्या लग रही है यार। सब उसे ही देख रहे हैं प्रभु।

प्रभु चाहकर भी अपने चेहरे की लाली छुपा न सके।

- तुमसे क्या कहने आई थी? - खुदी की आँखों में शरारत भरी मुस्कान थी।

- क्या वह आई थी... सचमुच? मैने सोचा कि हवा का एक झोंका आया था और मुझे अचेत कर के चला गया। मुझे तो कुछ भी याद नहीं।

- वाह गुरू तो अब भूलने भी लगे। कल को कहोगे कि खुदी किस बटेर का नाम है। चलते हो क्लास में...?

खुदी को क्लास में पहुँचने की जल्दी थी कि मानो देर होने से किसी महत्वपूर्ण बात से वह वंचित हो रहा हो...

- ठीक है तब मैं तो चलता हूँ... जय हो प्रभु...

उसने ज्यादा देर न करते हुए क्लास रूम तक जाने वाली सीढ़ी की ओर कदम बढ़ा दिया।

और प्रभु फिर अकेले थे। नहीं, धूप का टुकड़ा कुछ और चमक के साथ उनके साथ था। लेकिन धूप का वह टुकड़ा जैसे प्रभु को चिढ़ा रहा था - ये क्या मिस्टर राकेश कुमार, इससे गाँव में बकरी बांधा करते थे? प्रभु ने अपनी शिखा पर हाथ फेरा। मन थोड़ा उद्विग्न हो चुका। तो कहाँ चलें... क्लास में... कि फिर से नींद में... कि सपने में...??

यह समय है आपके कक्षा में आने का? - पांडे सर थोड़ा नाराजगी से पूछते हैं।

- सर मुझे नहीं पता था कि मैं क्लास में आ रहा हूँ। मैं तो नींद में था।

प्रभु की बेहोशी जैसे टूटती है। और उन्हें भीड़ की एक खिलखिलाहट सुनाई पड़ती है। वे एक कोने में दुबक कर बैठ जाते हैं। कक्षा में वह भी बैठी है। लेकिन दूर कोने से उन्हें सिर्फ उसकी पीठ दिखाई पड़ती है। सपने में खुली हुई जुल्फ हकीकत में बंधी हुई है। सपने में मदहोश प्रभु हकीकत में होश में हैं। बरबस उनका हाथ अपनी शिखा पर जाकर मचल रहा है और सामने पुरानी पीली डायरी रखी है। कक्षा में नायिका भेद है और वे सोचने लगते हैं कि नायक भेद में टिक्की रखनेवाले नायक का क्या भेद हो सकता है। लेकिन वह भी बैठी है सामने... और उसके होने की हकीकत को वे झुठला नहीं पा रहे हैं... फिर से स्वप्न में जाने का कोई फायदा नहीं।

{ अब यहाँ थोड़ी देर के लिए कहानी रुकती है। रुकती नहीं, कह लें कि रोक दी जाती है। सच मानिए यह लेखक की मजबूरी है। ध्यान रहे कि फिर कहानी शुरू होने की सूचना लेखक नहीं देगा... कहानी के प्रवाह में बाधा न आए ...इसलिए...। अस्तु।}

आइए अब आपको कुछ साल पीछे लिए चलते हैं। आप विश्वास कीजिए कहानी को रोककर कुछ साल पीछे ले जाने का कारण कहानी में कोई प्रयोग करना नहीं है और ना ही आप सुधी पाठकों को बेकार के चक्कर में उलझाना। बल्कि लेखक पाठकों को सीधे-सीधे एक ऐसी जगह ले जाना चाहता है जहाँ कहानी के कुछ तार उलझे हुए हैं और कि यह लेखक पाठकों को साथ लेकर याकि विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहता है। आशा है लेखक की इस धृष्टता को सुधी पाठक क्षमा करेंगे।

गाँव की जिंदगी में बनी ग्रंथियाँ और कोलकाता का बुखार

कभी-कभी तो अपने लेखक बनने की धुन पर झल्लाहट आती है। एक बेचारा आदमी जिसके मन में पता नहीं कितनी बातें होंगी जो उसके बचपन से चलती आ रही हैं, उनके पुर्जों को खोलना क्या अच्छा लगता है... पर किया क्या जाय पाठक देव, किसी-किसी को यही करना अच्छा लगता है और फिर इस तरह के लोग न हों तो आप तक पहुँचना कितना मुश्किल है, यह मैं गुरू लोगों से सुन चुका हूँ। तो देखिए, यही वह गाँव है जिसकी एक छोटी-सी मड़ई में राकेश कुमार का निवास रहा होगा। और मेरा अनुमान यही है कि जब वे उदास होते होंगे तो इसी गाँव की किसी गली में या किसी झाड़ी में याकि एक अंधी सुरंग में भटकते होंगे। वैसे तो राकेश कुमार जैसे खयालात के लोग, जिनका बचपन ऐसे गाँवों में गुजरता है, उनके मन में ग्रंथियों की एक श्रृंखला तो बन ही जाती है। लेकिन हमें उस सुरंग के बारे में पता करना है जिसका जिक्र उन्होंने गाँव छोड़ने के एक दिन पहले लिखी अपनी डायरी में किया था। खुदी तो पढ़कर चकरा गया था लेकिन मैं इतना कमजोर खिलाड़ी नहीं हूँ। चकराने की बात तो दूर मैं तो और उत्साहित हो गया हूँ कि आगे आने वाली गुत्थियों का राज यह डायरी ही खोलेगी। आप चिंता न करें, मैं आपकी समझ को पहचानता हूँ और मुझे विश्वास है कि अतिरिक्त व्याख्या की जरूरत नहीं पड़ेगी और कहानी को खींचकर पीछे लाने का लेखकीय उद्देश्य भी आपको समझ में आ जाएगा। यदि आपको चक्कर न आए और आप यदि आप मुझपर भरोसा रखें तो यह अंश यूँ है -

'मैं एक ऐसे समाज में जी रहा हूँ जिससे मुझे बहुत शिकायतें हैं। यह वही समाज है जिसने मेरे मन में एक अंधी सुरंग बनाई है और मुझे इतना कमजोर बना दिया है कि मैं प्रतिवाद की भाषा तक नहीं सीख पाया हूँ। यहाँ से कुछ ही दूरी पर मेरा स्कूल है जिसकी घंटी रोज सुबह मेरे कानों में बजती थी और मैं नंगे पाँव स्कूल की ओर दौड़ता था... और पहुँच जाता था झाड़ियों के एक ऐसे बीहड़ में जहाँ ताश के पत्ते खुले मिलते थे। तब पत्ते केवल पेड़ के होते थे हमारे लिए... और हम इस तरह अकेले में जाकर बड़ों का अनुकरण करते थे और सुलेख न लिख पाने के कारण परमा सिंह मास्टर से मिलने वाली सजा से बच जाते थे, लेकिन क्या पता था कि स्कूल की बजती हुई घंटी समय को बजाती हुई मुझे इस अंधे सुरंग तक ले आएगी... बचपन का वह खेल!!! ...एक सुरंग है जो मेरे मन में अनजाने ही बनी है... इसकी एक पगडंडी गाँव के घने ईख के खेतों से गुजरती है, दूसरी पता नहीं कहाँ को ले जाती है, कि ले जाएगी। मैं एक पगडंडी पकड़ता हूँ और कुछ आवारा दोस्तों के साथ ईख के खेत के बीचोंबीच चला जाता हूँ... बहुत घने अँधेरे में पहुँचकर सब चुप हो जाते हैं... सबकी प्रतीक्षा का अंत होता है... ईख का एक पौधा नंगा हो जाता है... कि पूरी प्रकृति नंगी हो जाती है... सबकी नसें तनती हैं... और कुछ ऐसा होता है कि सुरंग और अधिक भयानक और उत्तेजक हो जाती है... कि जैसे सफेद बादल काले हो जाते हैं

...और झर-झर सफेद बूँदें हमारी प्यासी चेतना के उपर टपकती हैं... प्रकृति की उत्तेजना कुछ पल के लिए थोड़ी शांत होती है... अँधेरा कुछ पल के लिए कमता है... नए सिरे से एक और अंधी सुरंग बनती है... जो हर रास्ता मेरा पीछा करती है... मैं अनैतिक और नैतिक प्रश्नों के अँधेरे में बेचैन घूमता हूँ... कि फिर पहुँचता हूँ वहीं जहाँ से चलना शुरू किया था...।

पर इस बार मुझे फुसलाकर ले जाया गया है... बिरजू से मुझे ऐसी आशा कभी नहीं थी कि मुझे ही वह अपना शिकार बनाएगा... मेरे पास बंदूक नहीं है कि मैं उसे मार दूँ और वह रहे भी तो इतना लाहस कहाँ से लाऊँ... मेरी सजा यही है कि मैं यह गाँव छोड़ दूँ... कि किसे बता सकता हूँ कि मुझे क्या हुआ कि इतनी विरक्ति भर रही है इन बातों से... किस लक्ष्य के लिए मैं इस धरती पर आया हूँ... और क्या ऐसी शर्मनाक बात भूल जाने लायक है... ब्रह्मचर्य... बस... वही एक रास्ता... इस सुरंग से निकलने का... इस ग्रंथि से निकलने का... हे प्रकृति, हे जननि मुझे क्षमा करें... जो भी क्षमा दे सकता है वह भी करे क्षमा...'

इसके बाद लिए गए निर्णय पर अमल करने की बारी थी...। अँधेरे के पेट से सूरज का प्रसव होता इससे पहले ही वे घर से निकल गए। खुदी कहता है कि जब राकेश कुमार घर से चले तो उनके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उन्होने कलकत्ता जाने के लिए पैदल रास्ता चुना। रास्ते में किसी सराय या मंदिर में ठहर जाते और किसी तरह कुछ भोजन मिल जाता तो संतोष कर लेते थे। कलकत्ता उनके लिए एक सपनों की नगरी थी... देश की पहली राजधानी जहाँ जादू वाली परियाँ हुआ करती थीं। हालाँकि उन्हें विश्वास था कि उनके उपर किसी का जादू नहीं चल सकेगा। वे अपने को मन ही मन दृढ़ भी बना रहे थे। वहाँ क्या साफ-सफाई रहती होगी... सभ्य लोग और सभ्य परिवेश। वहाँ रहकर पढ़ने का मजा ही कुछ और होगा... उन्होंने हिंदी की एक पाठ्य पुस्तक में एक कहानी पढ़ी थी। उस कहानी का नायक गाँव से भागकर कलकत्ता चला जाता है, वहीं काम करते हुए पढ़ाई करता है और आगे चलकर बहुत बड़ा लेखक बन जाता है और उसके बड़ा लेखक बनने में एक सुंदर नायिका का हाथ होता है। तो राकेश कुमार के मन में भी ऐसी बातें उभरतीं, पर गाँव की अँधेरी याद उनको उदास बना देती थी...। खुदी अपने अनुमान से कहता है कि रह-रह कर उन्हें लगता था कि जिस सुरंग से भागकर वे कलकत्ता जा रहे हैं, वह सुरंग कहीं वहाँ भी तो नहीं या क्या पता कि जिसे पीछे छोड़कर आए हैं उसी का विस्तार वहाँ तक हो... यह सोचकर उन्हें डर लग जाता था... पर नहीं वे ऐसा नहीं होने देंगे। कलकत्ते की सभ्य दुनिया में पहुँचने से पहले ही वे सुरंगों की याद तक बिसरा देंगे... वहाँ की जिंदगी संघर्ष की जिंदगी होगी जहाँ से उनके बनने की शुरुआत होगी। राकेश कुमार अपने को और दृढ़ बना रहे थे और आहिस्ते-आहिस्ते गाँव और कलकत्ते के फासले को तय कर रहे थे।

और उसके बाद का गल्प यह है कि गाँव में राकेश कुमार के कहीं चले जाने की खबर आँधी की तरह फैली होगी... उनके अवारा दोस्तों को तो कोई फर्क नहीं पड़ा होगा... उनके लिए ईख के अँधेरे खेत थे... ताश के पत्ते थे... और एक अनैतिक खेल था। उनकी सौतेली माँ तो मन ही मन अलबत्ता खुश ही हुई होंगी। हाँ, उनके पिता कई-कई दिनों की बेचैनी के बाद शांत हो गए होंगे। पर राकेश कुमार पूरी तरह से अपने को इस गाँव और अँधेरे से दूर जाने को प्रतिबद्ध थे... आगे की पढ़ाई करनी थी... बहुत सारे काम पूरे करने थे... इत्यादि-इत्यादि...।

...और बाद की कहानी तो आपको मालूम ही है, लेकिन एक प्रश्न आपके मन में होगा कि नाटक वाले दिन क्या हुआ था और अचानक राकेश कुमार उर्फ प्रभुनाथ कलकत्ते से कहाँ गायब हो गए थे... कहीं इसके बाद अमेरिका तो नहीं चले गए न...? ...जरा धैर्य रखिए पाठक देव!!! हम आगे उसी की पड़ताल करने वाले हैं... तो चलिए आगे की ओर बढ़ते हैं... खुदी से सीधे-सीधे बात करते हैं... क्यों?? कैसा आइडिया है सर जी??

कालिदास की याद और नायिका की खोज

खुदी को बीड़ी पीने की बुरी लत है। शुरुआत तो वैसे कॉलेज में सिगरेट से हुई थी लेकिन बाद के दिनों में जब कड़की का आलम तारी होता था और यह अक्सर ही होता था तो बीड़ी से ही काम चलाना पड़ता था। ...और काम चलाते-चलाते ये दुरवस्था हुई कि एक बंडल बीड़ी और एक बोतल बीयर का लालच देकर उससे गड़े-से-गड़े मुर्दे का पता पूछा जा सकता था... हालाँकि खुदी आज भी इस बात को स्वाकार करता है कि वह राकेश कुमार के सामने कभी नहीं पीता था... अब तो वे रहे नहीं... तो अब खुदी जमकर बीड़ी पीता है और बीयर की खुमारी में प्रभु की कहानी कभी खुशी कभी गम में सुनाया करता है।

हम मुहल्ले से दूर एक फटीचर बार में बैठे हुए हैं। खुदी एक गिलास बीयर खत्म करने के बाद बीड़ी का एक लंबा टान मारता है और शुरू हो जाता है।

- अच्छा गुरू एक बात बताओ, तुम तो लेखक हो और प्रभु के उपर कहानी लिख रहे हो लेकिन मैं तो कहता हूँ कि गुरू इसमें कहानी लायक तो बात ही नहीं है। जानते हो प्रभु के मन में एक ऐसा कोना था जहाँ किसी की पहुँच नहीं थी। जब वह गाँव से पहली बार आया तो तमाम नैतिकता, धर्म, आदर्श पर जिस तरह से उसने बातें शुरू कीं उससे मुझे लगता था कि वह अपने चारों ओर एक कवच का निर्माण कर रहा था ताकि कोई भी उसके मन के उस कोने तक न पहुँच सके... जिसे क्या लिखा था उसने अपनी डायरी में... हाँ, अंधी सुरंग...। ...और देखो कि उसके इतने करीब रहते हुए भी मैं तक नहीं समझ नहीं पाया कि उसके मन में क्या है... मुझे तो बता सकता था कि वह कहाँ जा रहा है। इस तरह अचानक गायब होकर उसने मुझे कितनी ठेस पहुँचाई है तुम कभी जान सकोगे मेरे लेखक बंधु!!! मैं तो पूरे कलकत्ते में एकदम अकेला हो गया यार...।

खुदी दूसरा गिलास एक ही साँस में खाली कर देता है। मुझे लगता है कि खुदी अब नायिका का नाम बताएगा और कहानी में नायिका की खोज पूरी हो जाएगी। मेरे अंदर लेखक की बेशर्म उत्सुकता और बढ़ जाती है।

- अच्छा, नाटक वाले दिन क्या हुआ था?

बीच में रोक कर उसे मैं कहानी के प्लॉट की ओर मोड़ने की कोशिश करता हूँ।

- होगा क्या, प्रभु को शकुंतला पसंद आ गई थी। खुदी की आवाज में लापरवाही है।

- ये तुम्हें कैसे पता चला?

मैंने गोली दागी।

- यार तुम काहे के लेखक हो, ऐसी बातें भी छुपती हैं क्या!! प्रभु की आँखें पल्लवी को ऐसे देख रही थीं जैसे कि सौंदर्य की सुधा पी रही हों और नाटक खत्म होने के बाद पहली बार अकेले में उसने पल्लवी से कहा कि आपकी आँखें बहुत सुंदर हैं और आप बहुत अच्छा अभिनय करती हैं। नाटक खत्म हो गया और प्रभु पूरे रास्ते मुझे कालिदास के बारे में बताता रहा और हर बात पल्लवी पर ही आकर खत्म होती थी। फिर उस रात वह बहुत उद्विग्न दिखा। तुमने तो डायरी पढ़ी है जो उस रात उसने लिखी थी। पर इतना घोंचू आदमी था कि सुबह मैं लाख पूछता रह गया कि क्या तुम्हें पल्लवी पसंद है, बार-बार वह यही कहता रहा कि उसका इन अनैतिक बातों से कोई सरोकार नहीं है और वह पल्लवी की कला की तारीफ करता है। लेकिन उसको क्या पता था कि मैं उसकी डायरी पढ़ चुका हूँ। प्रभु था दिल का बहुत अच्छा लेकिन एकदम बेवकूफ...पोंगा पंडित।

खुदी के चेहरे से हँसी और उदासी की समवेत रोशनी झाँकती है और वह बीयर का दूसरा गिलास उठा लेता है।

पागल रे वह मिलता है कब और गायब होने की खबर

फिर क्या हुआ था?

- मैं खुदी को टटोलता हूँ। वह पूरी तरह से मौज में आ चुका है। मुझे तसल्ली होती है कि मैं इसी बैठक कहानी के क्लाइमेक्स तक पहुँच जाऊँगा। दुबारा इस बदबूदार बार में आने का मेरा मन नहीं था। वह एक नई बीड़ी सुलगाता है और धुएँ का एक उजला गुबार छोड़े हुए लगभग कुछ धुँधली बातें कहना शुरू करता है।

- लेकिन यार प्रभू का तरीका गलत था। उसने मेरी सलाह कभी नहीं ली। शायद वह नैतिकता के जिस सिंहासन पर अपने को बैठा चुका था या अपनी छद्म व्यक्तित्व की बदौलत हम लोगों के द्वारा बैठाया जा चुका था, वहाँ हमारी सहायता लेने का कोई स्पेस नहीं बचा था। विपरीत सेक्स को लेकर उसके मन में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ थीं जिसकी थोड़ी जानकारी मुझे उसकी डायरी के पन्ने दे चुके हैं। जिसे वह अंधी सुरंग कहता है वह और कुछ नहीं वह क्या तो कहते है...हाँ, वह सेक्स-ग्रंथि ही है जिसे छुपाने के लिए ही उसने नैतिकता और आदर्श की एक दीवार बनाई थी... वह यही कर सकता था... इसके अलावा उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।

- क्या किया उसने? - मेरी उत्सुकता और बढ़ जाती है। अभी तक भी मुझे लगता है कि मैं एक बोर कहानी के पीछे बेकार में पड़ा हुआ हूँ। इससे अच्छी कहानियाँ तो आपको सरस सलिल में भी पढ़ने को मिल चुकी होंगी लेकिन अब लगता है कि मैं कोई नई चीज अपनी कहानी में दे सकूँगा

- क्या किया था उसने? - मेरा धैर्य चुकता जा रहा है।

- लोग तो बहुत कुछ कहते हैं - वह एक क्षण के लिए बहुत गंभीर दिखने लगता है।

अपनी मिचमिचाई आँखें बंद कर के वह बीड़ी का एक लंबा टान मारता है और अचानक बात बदल देता है और...

- तुम मिले हो कभी राकेश कुमार उर्फ श्री श्री 1008 प्रभु से...? तुम मिले रहते तो शायद कहानी लिखने के बारे में सोचते भी नहीं। वह आदमी सिर्फ अपनी बातों से तुम्हें चमत्कृत कर सकता था। ऐसा लगता था कि वह किसी क्लासिकल उपन्यास का कोई पात्र है जो किसी लेखक की किताब से चल कर हमारे साथ रहने आ गया है। लेकिन मैं जानता हूँ और सिर्फ मैं ही जानता हूँ कि वह इतना बड़ा ढोंग अपनी पिछली अनैतिक जिंदगी को छुपाने के लिए करता रहा। हालाँकि उसे कई बार यह भी पता नहीं होता था कि वह ढोंग कर रहा है। इसलिए अब जब कि मैं बहुत सारी बातें उसके बारे में जान चुका हूँ, मुझे उस पर दया आती है।

खुदी की उत्तेजना अंतिम वाक्य तक आते-आते ढीली हो गई हैं। बीड़ी का नया कश उसे फिर से मौज में ला देता है।

- अच्छा बताओ लेखक बंधु, तुम्हें कभी कोई लड़की पसंद आई है? - वह एक शरारत से भरी मुस्कान हवा में फेंकता है।

- नहीं, लड़की नही, एक कहानी पसंद आई है मुझे। मेरी पत्नी है मेरे घर में और वह मुझे बहुत पसंद है।

मैं थोड़ा सजग हो जाता हूँ।

- यार तुम्हें पता है एक रात प्रभु कुछ लिखता है अकेले में बैठकर... शायद कोई कविता। दुसरे दिन उसे एक रंगीन कागज में उसे साफ अक्षरों में उतारता है और पल्लवी से नजर बचाकर उसकी किताब में रख आता है। अरे हाँ, यह उसी दिन की बात है, जिस दिन पांडे सर रीतिकाल पढ़ा रहे थे।

- ये तुम्हें कैसे पता?

- खुदी को सब पता है मेरे दोस्त। मैंने चुपके से वह कविता पढ़ ली थी। मैंने बताया न प्रभु उस मामले में एकदम घोंचू था

- फिर?

- फिर क्या गुरू! दूसरे दिन से लड़की की आँख बदल गई। वह प्रभु से कतराने लगी। प्रभु को लगा कि उसके प्रेम की उपेक्षा हुई है और वह एकदम से प्रतिक्रियावादी हो गया। एकदम चुप। न किसी से बोलना न चालना। लगता था कि किसी आत्मीय को श्मशान में फूँक कर आया है और मातम मना रहा है। पूछने पर गालिब का कोई शेर बोलता था और किसी दर्द भरे धुएँ में खो जाता था। अब इतना भी अव्यावहारिक कोई हो सकता है!! अरे यार किसी भी चीज का एक प्रोसेस होता है। अब तुम कहानी लिख रहे हो तो इसका भी एक प्रोसेस होगा कि नहीं या ऐसे ही कुछ भी लिख दोगे और उसे लोग कहानी मान लेंगे। वह कविता लिखकर लड़की को 'इंप्रेस' करने चला था। इसमें इतनी शर्म की बात तो नहीं थी कि... यार जरूर कोई गंभीर बात थी जिसका पता मुझे नहीं मालूम।

मैं मन ही मन सोच रहा हूँ कि सचमुच कहानी लिखने का एक प्रोसेस तो होता ही है। यहाँ उस प्रोसेस का निबाह मैं कर पाऊँगा कि नहीं वह तो हे पाठक देव आप ही निर्णय करेंगे।

- कैसी बात? फिर से एक उलझन आन खड़ी हुई है फटीचर बार के फटीचर बैरे से मैं एक बोतल बीयर और मँगवाता हूँ। खुदी लगभग उदास हो गया है। उसकी उदासी देखकर मुझे खुशी होती है कि खुदी अब जरूर किसी गंभीर बात की ओर जाएगा। मैं एक सिगरेट सुलगा लेता हूँ और दूसरा खुदी की तरफ बढ़ा देता हूँ। आहिस्ता-आहिस्ता ही वह जैसे गहरी सुरंग में धँसता चला जाता है।

'मैंने घोर अनैतिकता से नैतिकता की तरफ प्रयाण किया था... अपने को एक कठोर अनुशासन में रखने के बावजूद मुझे लगा कि मैं अपने पिछले समय से उबर नहीं पाया हूँ... कि वह सुरंग अब भी मेरा पीछा करती है... मैं इसीलिए अपने मन पर एक स्वाभाविक परिवर्तन को स्वीकारता रहा कि हो सकता है किसी के स्नेह का लेप मुझे उस सुरंग से बचा ले और किसी भी तरह की अतिवादिता से मैं मुक्त हो सकूँ, लेकिन शायद यह ईश्वर को... कि उसको भी मंजूर नही... पागल रे वह मिलता है कब...'

- यही वो अंतिम पंक्तियाँ थीं जिसे प्रभु अपनी डायरी में लिख के चला गया था... लगभग पागलपन की अवस्था में। उसके बाद वह नहीं लौटा था। एक दिन, दो दिन, तीन दिन और ऐसे ही सैकड़ों दिन गुजर गए हैं... वह अपनी डायरी छोड़ गया है... और कुछ छोटे-छोटे कागज के टुकड़े... मैं तो कहता हूँ कि यह उसका अंतिम पलायन नहीं है बंधुवर...।

उस दिन रात में वह देर से लौटा था... उसने शराब पी रखी थी... सिगरेट तो वह पहले ही पीना शुरू कर चुका था... मैं तो कहता हूँ कि यह सब उसका पागलपन था... एक बचकानी हरकत...। उसने शिखा कटवा ली थी... वह आकर सीधे बिस्तर पर धड़ाम से गिर गया और लगभग सुन्न हो कर बैठा रहा... मैंने पूछा कि क्या हुआ तो उसने मेरी ओर पराजित नजरों से देखा... उसकी आँखों से लगातार आँसुओं की धारा बह रही थी। वह नशे में बड़बड़ा रहा था जिसे मैं साफ सुन सकता था... मैं अपराधी हूँ... मैं अपराधी हूँ...। उसकी यह हालत देखकर हँसी भी आती थी और दुख भी हो रहा था। मैने कई बार पूछा कि तुमने क्या अपराध किया है... लेकिन मेरी बात सुने बिना ही वह बड़बड़ता रहा कि मेरा जीवन ही एक अपराध है... मेरे अंदर एक अंधी सुरंग है... मैं अपराधी हूँ...

मैं साफ देखता हूँ कि खुदी की आँखें लाल हो आई हैं। किसी से किसी के रिश्ते की गहराई का पता सिर्फ आँखें ही होती हैं, यह मुझे पहली बार समझ में आया है...

(पहले मालूम हो जाता तो उस औरत की आँखें पढ़कर ही मैं बहुत कुछ समझ लेता और तब शायद कहानी लिखने के बारे में कभी सोचा ही न होता... खैर...।)

कहनेवालों का कुछ नहीं जाता

अलस्सुबह उठते ही मैने सोचा कि प्रभु से पूछूँगा कि रात में वह इतना किस बात पर रो रहा था और कौन सा इतना बड़ा अपराध हो गया है कि उसे अपना जीवन निस्सार-सा लगने लगा है। - खुदी आगे कहता है।

- लेकिन प्रभु कहीं नहीं मिलता। मैं आस-पास हर जगह ढूँढ़ आया पर कहीं पता नहीं। कमरे में ठाकुर जी की मूर्ति खंड-खंड होकर बिखरी पड़ी थी कभी प्रभु उसके सामने बैठकर ध्यान लगाया करता था... कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम लगभग जला हुआ था... कुछ दिनों से प्रभु ने पूजा करना छोड़कर अभिज्ञान शाकुंतलम के श्लोकों का पाठ करना शुरू कर दिया था... श्लोक के कुछ शब्द बचे रह गए थे मेरी स्मृतियों में गूँजने के लिए... जैसे जाने के बाद भी प्रभु मेरे अंदर कहीं बचा रह गया है - एकदम साबुत...। डायरी साबुत बची ही थी उसके उपर चिपके एक सफेद कागज के टुकड़े पर लिखा था - पल्लवी नहीं... तुम्हारे लिए ...अलविदा खुदी भाई...

इसके बाद खुदी स्मृतियों की खोह में जाकर प्रभु की जली हुई किताबों की राख बटोर रहा है। उसके चेहरे पर बेचैनी की एक अजीब सी परत को मैं महसूस कर रहा हूँ। इस समय उसे छेड़ना ठीक नहीं - मैं सोच में पड़ जाता हूँ।

मैं बीयर के कुछ कड़वे घूँट अपनी हलक से उतारता हूँ और स्मृतियों की खोह से उसके लौटने का इंतजार करने लगता हूँ।

- वो तो चला गया... पता नहीं कहाँ और यहाँ लोग मुझे चैन से जीने नहीं देते हैं... लोगों को उत्सुकता है कि वह कौन सा कांड कर के चला गया है... और तुम्हें कहानी की फिकर लगी हुई है... लिखो यार!! कहानी लिखो... पर वह तो चला गया और कहाँ चला गया मेरे कलेजे पर एक भारी बोझ रखकर... और क्या कर के चला गया... किस शर्म से चला गया... इसका पता मुझे भी नहीं है, फिर तुम सोचो कि पाठकों को क्या बताओगे...

- क्या किसी को भी कुछ पता नहीं कि आखिर क्यों इस तरह से प्रभु... मैं लगभग झल्लाकर पूछता हूँ।

- लोगों को तो खूब पता रहता है बंधु, कहने वाले तो बहुत कुछ कहते हैं... और यह खुदी बेचारा सिर्फ सुनता है। कल को हो सकता है कि अपनी कहानी में मसाला डालने के चक्कर में तुम भी कोई नया शिगूफा गढ़ लो। ये तुम जैसे लेखक बड़े चाईं होते हैं। प्रभु वाला करेक्टर थोड़ा हेर-फेर कर के तुम लेखकों में भी ढूँढ़ा जा सकता है। लिखो कहानी तुम... वह तो चला गया और...

- क्या कहते हैं लोग?

- यही कि प्रभु ने साहस कर के एक दिन पल्लवी का रास्ता रोका था और परिणय निवेदन किया था लेकिन पल्लवी ने सीधे-सीधे कह दिया कि अपनी शकल आईने में देखो... एक दम लंगूर की तरह दिखते हो। प्रभु के अंदर इतनी 'इनफेरिअरिटी' आ गई कि उन्होंने सोच लिया कि अपना हुलिया बदल देंगे और निर्णय किया कि पल्लवी को अपने कदमों में झुकाकर मानेंगे, कि उसने उनके पुरुषत्व को ललकारा है।

- और...??

- कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि प्रभु ने अकेले में पल्लवी का हाथ पकड़ लिया था और पल्लवी ने प्रभु के पिचके गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया था। ये उसी दिन की बात है जिस दिन प्रभु की आँख से झर-झर आँसू बह रहे थे। एक दबी हुई अफवाह यह भी सुनने को मिलती है कि प्रभु को पल्लवी के किसी प्रेमी ने किडनैप कर लिया है। कहीं-कहीं मुहल्ले को बच्चों को कहते सुना गया कि प्रभु ने आत्महत्या कर ली है और भूत बनकर मुहल्ले में घुमता है...।

- पल्लवी के बारे में कुछ पता है तुम्हें ??

मैं उसकी बातों पर ध्यान दिए बगैर ही पूछता हूँ... नशे में वह कहीं भी भटक सकता है...।

- आश्चर्य की बात तो यही है बंधु कि जिस दिन से प्रभु गायब हुआ, उसी दिन से पल्लवी ने कॉलेज आना छोड़ दिया। मैंने कई बार सोचा कि पल्लवी से मिलकर कुछ बातों की पड़ताल करूँगा। उसके घर का पता कर के एक दिन मैं उसके घर भी गया लेकिन उसके खड़ूस बाप ने कहा कि पल्लवी अपने मामा के यहाँ गई हुई है और बाकी की पढ़ाई वहीं करेगी। लेकिन इतना कुछ करने के बावजूद भी पता नहीं चला कि आखिर प्रभु कैसे गायब हुआ... कि कहाँ चला गया...??

- पल्लवी का मामा घर ?? मैं लगभग निराश होकर पूछता हूँ। खुदी की आँखें चढ़ गई हैं और वह बुदबुदाता जा रहा है...

- अरे, सब तो उस पल्लवी की ही करामात है... पहले तो प्रभु से हँस-हँस के बात करती थी और जब प्रभु ने कविता लिखकर दे दी तो लगी चोन्हा दिखाने। यदि वह मुझे मिलती न लेखक बंधु तो सच कहता हूँ... अपने यार प्रभु की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मैं उसका वो हाल करता कि दुनिया देखती... साली...कमीनी... और ये प्रभु भी तो अपनी प्रभुताई के बेवकूफाना में पागल हो गया... कम से कम कह के तो जाता कि कहाँ जा रहा है... लोग उसका भले मजाक उड़ाते थे लेकिन उसके प्रति लोगों के मन में स्नेह था...। जानते हो लेखक बंधु ये प्रभु जैसे करेक्टर जिंदगी भर ऐसे ही भागते रहते हैं। जहाँ भी वह गया है... तुम क्या समझते हो कि वह वहाँ टिका रहेगा...?? नहीं... वह फिर वहाँ से भी भागेगा... ऐसे ही जीवन भर भगता रहेगा... तुम बेकार ही ऐसे भगोड़े के चक्कर में पड़े हो... लेकिन यार वह ऐसा क्यों था... कंबख्त की याद भी दिल से नहीं जाती...

- मैं तो कहानी के चक्कर में पड़ा हूँ... लेकिन तुम इतने क्यों परेशान हो खुदी भाई...?? - मैं खुदी की डबडबाई आँखों में धंसकर पूछता हूँ। वह मेरी ओर एक असहाय-सी नजर फेंकता है और अपनी भीगी हुई आँखों के कोर को अपनी हथेलियों से पोंछ लेता है...।

- लेकिन एक बात है लेखक! प्रभु दिल का बहुत अच्छा था। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उसके हाथों किसी का बुरा होना संभव ही नहीं था। उसके मन में कई ऐसी ग्रंथियाँ भी थी जिनके बारे में उसे पता तक न था और ऐसी ही बेचैन जिंदगी भगवान ने उसे बख्शी है... उस पर दया करना भी उसका एक तरह से अपमान होगा। कहनेवालों का तो कुछ नहीं जाता... लोग तो बस सवाल पूछते हैं...पर जख्मों के हिसाब तो तुम जैसे लेखक ही ढूँढ़ते हैं। ...मैं भी सोचता हूँ कि कहीं भाग-भूग जाऊँ... लेकिन उससे पहले पल्लवी मिल जाए तो उससे कुछ सवाल पूछने हैं... और उसकी एक थाती मेरे पास पड़ी है... उसे उसको सौंप देना है... इसके बाद मैं भी आजाद...

वह नशे में बड़बड़ता है...।

मैं अचानक किसी सूत्र के मिलने के संकेत पाकर चौंक पड़ता हूँ...

- थाती... कैसी थाती...???

नायक का अंतिम बयान और खुदी यादव का दुख

मैं रात भर सो नहीं सका हूँ मुझे रह-रह कर खुदी कि वह बात याद आ जाती है... एक थाती...। कैसी थाती की बात कह रहा था खुदी?? क्या उस थाती से कहानी में कुछ दम आ सकता है, मुझे उसके बारे में जरूर पता करना होगा।

दूसरे दिन जब खुदी यादव से मिलता हूँ तो वह मुहल्ले में एक पान की दुकान पर बीड़ी फूँक रहा होता है। मुझे देखते ही दोनों हाथ उठाकर नेताओं की तरह अभिवादन करता है।

- आओ, आओ लेखक बंधु, बीड़ी पिओगे...?

- हाँ, क्यों नहीं...।

फिर से उसी कहानी का चक्कर होगा। मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों इस कहानी के पीछे तुम हाथ-पैर धोकर पड़े हो... कुछ भी लिख दो... लिख दो कि प्रभु ने आत्महत्या कर ली। कोई और कल्पना कर लो... कोई घटना गढ़ लो। तुम लेखकों के लिए यह क्या मुश्किल है। ...मुझे तो लगता है कि तुम किसी जासूस कंपनी से आए हो... तुम्हारा प्रभु के साथ तो कोई नाता नहीं दिखता...। - वह रहस्यमयी नजरों से मुझे देख रहा है और उसके देखने में पता नहीं क्या है कि मैं असहज हो जाता हूँ।

- कल तुम किसी थाती की बात कर रहे थे?

- तुम सचमुच चाईं लेखक हो। चलो मेरे घर।

हम दोनों लगभग मौन होकर खुदी के घर की ओर चल पड़ते हैं।

मेरे दिल की धड़कन कुछ तेज हो रही है। मैं अपने कथानायक की कभी रहनवारी रही जगह पर जा रहा हूँ। क्या सिर्फ यही कारण है, मैं अपने दिल से पूछता हूँ।

एक गंदी गली से गुजरते हुए खुदी गली से ही लगे एक दरवाजे के सामने रुक जाता है। गली में कई महिलाएँ बैठी आपस में खुसर-फुसर कर रही हैं। खुदी के साथ किसी अजनबी को देखकर उनके बीच कोई कानाफूसी चल रही है। वह ताला खोलकर एक अंउसाए घर में प्रवेश करता है

- आओ, लेखक बंधु गरीब की कुटिया में तुम्हारा स्वागत है।

मैं एक नंगी सी पुरानी खाट पर बैठ जाता हूँ। भीतर को एक और कमरा खुलता है। कमरे का दरवाजा अधखुला है... भीतर घुप अँधेरा है। खुदी दरवाजा खोलकर कमरे के भीतर चला जाता है

- यही है श्री श्री 1008 प्रभु का साधना गृह...।

मैं भी उत्सुकता में अंदर चला जाता हूँ। कमरा भयंकर तरीके से अस्त-व्यस्त है। चीजें बिखरी हुईं... और कुछ कागज के टुकड़े अधजली अवस्था में फर्श पर छितराए हुए... प्रश्न भरी दृष्टि खुदी की ओर फेंकता हूँ।

- दरअसल प्रभु के चले जाने के बाद यह कमरा वैसे ही पड़ा है। मैने एक-एक चीज वैसे ही छोड़ दी है... आज पूरे दो वर्ष बाद इस कमरे में आया हूँ... प्रभु को गए हुए भी लगभग उतना ही समय हो रहा है - वह भर्राए हुए स्वर में कहता है। कागजों की ढेर से वह एक लिफाफा निकालता है। धूल-गर्द में लिथड़ कर वह लिफाफा किसी म्युजियम के किसी कीमती दस्तावेज की तरह दिखाई पड़ रहा है। वह अपने हाथों से उसका गर्द साफ करता है, मेरा दिल एक बार धक से रह जाता है... उपर लिखे अक्षर अब साफ-साफ पढ़े जा सकते हैं - पल्लवी जोशी, 36/7, गोरा बाजार, पोस्ट ऑफिस रोड, दमदम, कोलकाता।

- यह थाती मुझे इन कागजों की भीड़ में प्रभु के जाने के दो दिन ही बाद मिली थी... मैने इसे खोला नहीं है... पल्लवी तो शायद अब न मिले...। आप ही बताइए...कि इस पत्र का क्या करें... आप...।

- हो सकता है इसमें कुछ ऐसी बात लिखी हो जिससे प्रभु के बारे में कुछ पता चले...। - मैं काँपते हाथों से लिफाफे को थाम लेता हूँ... वह इतना जर्जर हो चुका है कि उसे फाड़ने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती... और कागज पर लिखे अक्षरों को खुदी की तरफ एक कसैले मन से बढ़ा देता हूँ... वह लगभग उतने ही जोर से पढ़ना शुरू करता है कि हम दोनों के अलावा उसकी आवाज कोई तीसरा न सुन सके...

पल्लवी...

मैं जो कुछ भी कर गुजर गया... वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी अप्रत्याशित और शर्मनाक था... दरअसल मैं उस बात को दुहरा कर तुमसे क्षमा भी नहीं माँगूँगा कि मेरे मन के कोने में बचपन से बैठी एक अंधी सुरंग... एक ग्रंथि ने मुझे ऐसा करने को उकसाया... दरअसल उस समय मैं एक जानवर था... एक ऐसा जानवर जिसके ऊपर जोर की चोट की गई हो और वह खूब गुस्से में बदले की कार्रवाई कर रहा हो... तुम्हारे ऊपर जो अत्याचार मैंने किए... उसके लिए कभी भी मैं क्षमा के योग्य नहीं हो पाऊँगा... तुम्हारे शरीर पर ही नहीं, तुम्हारी आत्मा पर भी मैने ऐसी चोट पहुँचाई है जिसकी गूँज सदियों मेरे मन पर रहेगी... और शायद तुम्हारे ऊपर भी। ...मैं तमाम तरह की बातों में उलझकर और अपने से जुड़े लोगों को उलझाकर खुद को मनुष्येतर बनाने का ढोंग करता रहा... दरअसल यह सब करके मैं स्वयं को बचाने की कोशिश करता रहा... मेरे जैसे लोग जिस सामाज में जीते हैं और उनके एक विशेष मानसिक गठन वाले मन पर वह समाज जिस तरह की ग्रंथियाँ बनाता है उनके वशीभूत हो क्या कुछ कर गुजरते हैं उन्हें खुद भी पता नहीं होता... फिर भी तुम्हारा स्नेह मुझे आदमी बना सकता था... जो मैं कभी था ही नहीं... परंतु मेरे मन की अंधी सुरंग और पुरुषत्व के अहंकार ने मुझसे यह सब करवाया... यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि तुम मुझे क्षमा कर दोगी... बल्कि इसलिए कि यह मेरा अपराध स्वीकरण है... एक कन्फेशन... आज के बाद मैं तुम्हारे सामने नहीं आऊँगा... क्योंकि मैं स्वयं को सिर्फ एक मनुष्य बनाने की अनंत यात्रा पर जा रहा हूँ... तुम मेरे जानवर को कभी क्षमा मत करना... और शायद जब मैं इस सदी में मनुष्य हो जाऊँ... तब... और तब का पता नहीं...

अपराधी

... ...

कितना अजीब है न कि अब मेरा कोई नाम नही...।

खुदी अंतिम शब्दों तक आते-आते काठ हो जाता है... और मैं धम्म से जमीन पर बैठ जाता हूँ... बीच में बस पंखे की फड़फड़ाहट सुनाई पड़ती है... सन्नाटे को चीरती उस फड़फड़ाहट के बीच लगता है कि पल्लवी जोर-जोर से चीख रही है... और प्रभु फफक-फफक कर रो रहा है...। इसके अलावा सब शांत... कोई कुछ नहीं बोलता। खुदी की आँखें लाल हो आई हैं और मेरी आँखें शायद सुन्न कि उन्हें नहीं पता कि उन्हें रोना चाहिए याकि खुदी की ही तरह एकदम काठ हो जाना...।

- तुम जाओ लेखक, मुझे अकेला छोड़ दो... तुम्हारी कहानी का यही अंत है... अब हमारा-तुम्हारा कोई वास्ता नहीं...। - मैने खुदी को इतना स्तब्ध और इतना शांत कभी नहीं देखा था।

- नहीं खुदी, यह अंत नही है। आओ मेरे साथ। - मेरी आवाज अप्रत्याशित रूप से गंभीर हो जाती है।

मैं खुदी का हाथ पकड़ता हूँ और वह किसी बच्चे की तरह मेरे साथ चल पड़ता है...

अधूरी कथा के अधूरे अंत की शुरुआत

मुझे क्षमा करें पाठक देव!! दरअसल नायक के अंतिम बयान के बाद कहानी में अब कुछ भी बचा नहीं रह जाता। फिर भी एक बात है जो मैं आपसे और उससे भी अधिक खुदी से साझा करना चाहता हूँ।

खुदी यहाँ मेरे साथ सुन्न-सी अवस्था में आया है। हम दोनों पैदल ही यहाँ तक आए हैं। हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं हुई है जिसका जिक्र यहाँ किया जाए... खुदी तो जैसे जड़ हो गया है...। वह एक बार मुझे शून्य आँखों से देखता है मानो कह रहा हो कि तुम मुझे अब कहाँ लेकर आए हो लेखक बंधु !!!

मैं एक मकान की सीढ़ियों पर चढ़ना शुरू करता हूँ ...और खुदी मेरे पीछे।

जिस घर में मैं जाता हूँ उसका दरवाजा एक बच्चा खोलता है - पापा... आप इतनी देल त्यूँ लदा दिए...? और मैं बच्चे को गोद में उठा लेता हूँ।

- यह मेरा बेटा है, किट्टू। मैं खुदी की तरफ देखते हुए कहता हूँ... वह चुप है और अब वह एक खाली काठ की कुर्सी पर बैठ गया है। उसकी आँखें अब भी पूछ रही हैं कि तुम मुझे यहाँ किसलिए लेकर आए हो।

- पल्लवी, ...देखो कौन आया है तुमसे मिलने। मेरी आवाज सुनते ही बच्चे की माँ बाहर आ जाती है।

खुदी को जैसे साँप सूँघ जाता है। वह हड़बड़ाकर खड़ा हो जाता है... और एकटक पल्लवी को देखे जा रहा है।

- यह पल्लवी है... तुम मिलना चाहते थे न इससे...

खुदी बर्फ की तरह शांत... अवाक...

कुछ देर बाद जैसे खुदी को होश आता है।

- यह क्या लेखक बंधु... यह तो आपकी पत्नी हैं... यह पल्लवी नहीं है... - वह धीरे से कहता है।

कुछ ही देर बाद मैं देखता हूँ कि खुदी एकदम बच्चे की तरह किट्टू के साथ खेल रहा है... किट्टू उसे नाच दिखा रहा है... और खुदी तालियाँ बजा-बजाकर खिलखिला रहा है...।


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हिंदी समय में विमलेश त्रिपाठी की रचनाएँ