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बाल साहित्य

आँखें मूँदो नानी
दिविक रमेश


"नानी मैं पहाड़ ला सकती हूँ।" - कहकर डोलू हँसी।

नानी चौंकी। बोली - "हे भगवान! लड़की है कि तूफान। क्या तो इसके दिमाग में है ।" फिर

बोलीं - "लेकिन कैसे? क्या तुम्हारी कोई परी दोस्त है, जो मदद करेगी?"

"हाँ नानी! है न मेरी परी दोस्त।"

"अच्छा !" नानी ने आश्चर्य से आँखें फैलाई - 'पर तुझ पर विश्वास कौन करेगा। कम्प्यूटर के जमाने में कैसी बातें कर रही है?'

"नानी जब देखो तब अपनी ही बातें करती हो। मुझे परी अच्छी लगती है। वही मेरी दोस्त है।"

"अच्छा क्या तुम्हारी परी पहाड़ उठा सकती है?" नानी ने बात टालने को पूछा।

"हाँ... हाँ...!"

"पर परी तो कोमल होती है?"

"पर उसमें ताकत बहुत है। वह बहुत कुछ कर सकती है। एक बार मैंने परी दोस्त से कहा कि धरती पर खड़ी खड़ी तारा छूओ। परी ने मुझे गोद में उठाया और लम्बी होती चली गयी और पहुँच गये हम तारे के पास। मैंने तो खूब छुआ तारे को।"

"और क्या क्या था तारे पर?" नानी ने पूछा।

डोलू को नानी की जिज्ञासा अच्छी लगी। उसने उत्साह से जवाब दिया - "तारे पर लम्बे-लम्बे बच्चे थे। बांस जैसे! नीचे खड़े-खड़े ही पहली मंजिल की छत से सामान उतार सकते थे। मुझे तो ऐसा लगा जैसे कुतुब मीनार के पास खड़ी हूँ। सच्ची! और इससे मजेदार बात यह है कि उनके माँ-बाप कद में बौने थे।"

"ऎं !" नानी सचमुच चौंक गयी थी।

"हाँ मुझे भी अचरज हुआ था नानी। पर परी दोस्त ने बताया कि तारे की धरती और हमारी धरती में अंतर है। तारे की धरती पर आयु बढ़ने के साथ कद छोटा होता है धरती पर बड़ा।"

"और क्या वे बोलते भी थे। तूने बात की।" नानी ने पूछा

"हाँ… हाँ नानी, खूब बातें की। पर मैं आपको बताऊँगी नहीं। अरे, मैंने तो परी को नदी उठाकर आसमान में उड़ते भी देखा है।" डोलू ने बताया।

"नदी को उठाकर! और पानी?"

"अरी नानी, पानी समेत। बिल्कुल लहराते लंबे-से कपड़े-सी लग रही थी। दूर-दूर तक। कितना मजा आया था।"

नानी को डोलू की बात पर बहुत मजा आ रहा था। पर डोलू नाराज होकर कहीं बात रोक न दे, इसका भी तो डर था न!

सो बोली - "अच्छा डोलू तू तो रोज परी से मिलती है, परी कभी थकती भी है कि नहीं?"

"थकती है न नानी। जब कोई उस पर विश्वास नहीं करता। जब कोई उसे बोर करता है, तो बहुत थक जाती है। ऐसे लोगों को वह पसन्द नहीं करती। मैं तो न उस पर शक करती हूँ और न ही उसे बोर करती हूँ।"

"चलो आज से मैं भी तुझ जैसी ही हो गई।" नानी ने कहा।

"तो सुनो नानी। एक बार मुस्कराते हुए परी ने कहा - चलो आज तुम्हें पूरा जंगल निगल कर दिखाती हूँ। सुनकर मुझे कुछ कुछ अविश्वास हुआ। देखते ही देखते परी का मुँह उतरने लगा। उदासी छाने लगी। मैंने झट - से अपनी गलती समझी। परी पर विश्वास किया। परी के मुँह पर खुशी लौट आयी। वह मुझे जंगल के पास ले गयी। परी ने देखते ही देखते पूरा जंगल निगल लिया। मैं तो अचरज से भरी थी। पर खुश बहुत थी। मैंने पूछा - "तुम्हारे पेट में जंगल क्या कर रहा है?"

परी बोली - ''लो तुम ही देख लो और सुन भी लो।''

परी ने आँख जैसा कोई यंत्र मेरी आँखों पर लगा दिया। यह क्या! मैं तो उछल ही पड़ी थी। परी के पेट में पूरा का पूरा जंगल दिख रहा था न। जैसे जंगल को 'मूविंग कैमरे' से देख रहे हों। पेड़ हिल रहे थे। जानवर घूम रहे थे। पक्षी बोल रहे थे। नदी बह रही थी।

मैंने पूछा - ''परी, यह जंगल अब क्या तुम्हारे पेट में ही रहेगा?"

परी बोली - ''नहीं… नहीं! मैंने तो इसे बस तुम्हें मजा देने के लिए निगला था। जंगल तो हमारा दोस्त है। क्या-क्या नहीं देता आदमी को ! जंगल खत्म हो जाये तो आदमी का जीना ही दूभर हो जाए। पता नहीं कैसे राक्षस हैं वे जो जंगलों को काट कर तबाह कर रहे हैं। लो, यह रहा तुम्हारा जंगल। कहते-कहते परी ने जंगल उगल दिया। जंगल फिर अपनी जगह था। 'धुला धुला' शायद परी के पेट में धुल गया था।"

नानी को सिरे से विश्वास नहीं हो रहा था। पर डोलू का मन रखने और उसकी बातों का मजा लेने के लिए उत्सुकता जरूर दिखा रही थी। उधर डोलू को पूरा मजा आ रहा था। खुश होकर बोली - "नानी, आप विश्वास करें, तो एक और कारनामा बताऊँ। एकदम सच्चा।"

"हाँ...हाँ, जरूर सुनाओ!''

डोलू हँसी। मानो नानी को हरा दिया हो। उसका चेहरा गर्व से भर उठा था। थोड़ा पानी पीया और दादी-नानी की तरह खँखारा। बोली - "नानी, परी तो अपनी आँखों में पूरा समुद्र भी भर सकती है। मछलियों और जीव-जन्तुओं समेत। बिल्कुल 'एक्वेरियम' लगती हैं तब परी की आँखें। एक बार तो सारे बादल ही पकड़ कर अपने बालों में भर लिए थे। बाल तब कितने सुन्दर लगे थे। काले-सफेद। फूले फूले से। मैंने हाथ लगा कर देखा, तो गीले भी थे। लगा जैसे परी ने बादलों का बड़ा-सा टोप पहन लिया हो। पर थोड़ी ही देर में परी ने उन्हें छोड़ भी दिया। अगर उन्हें पकड़े रखती तो बारिश कैसे होती? और बारिश न होती, तो पूरी धरती को कितना दुःख पहुँचता। परी कहती है कि हमें हमेशा पूरी धरती का हित करना चाहिए। कोई भी नुकसान पहुँचाने वाली बात नहीं करनी चाहिए। नानी, मैं भी किसी को कभी भी नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी, प्रोमिस..."

"अरे हाँ, वह बात तो भूल ही चली थी।" डोलू जोर-जोर से हँसी - "कितना मजा आया था! मैं परी के साथ एक दिन स्टेशन गयी। यूँ ही घूमते-घूमते। रेलगाड़ी आयी। मैंने परी से कहा कि क्या रेलगाड़ी को अपनी हथेली पर उठा सकती हो? परी बोली - ''लो।'' और देखते-ही-देखते परी ने पटरी और स्टेशन समेत रेलगाड़ी को अपनी हथेली पर उठा लिया। मैंने जब पूछा कि रेलगाड़ी में बैठे आदमी अब अपनी-अपनी जगह पहुँचेंगे कैसे? तो परी ने अपने कान के पास लगी बटन जैसी चीज को दबाया। कमाल ही हो गया। रेलगाड़ी चलने लगी। स्टेशन आने लगे। लोग उतरने और चढ़ने लगे। मैं तो पूरी हैरान थी। आपकी ही तरह नानी।" नानी तो जैसे डोलू की बातों में पूरी तरह डूब चुकी थी।

"नानी कहीं आप झूठ तो नहीं समझ रही न?"

नानी जरा सँभली। आँखें मसली। सिर को भी सहलाया। बोलीं - 'नहीं-नहीं डोलू! सच जब ऐसे-ऐसे कारनामे अपनी आँखों से देखूँगी, तो कितना मजा आयेगा। सच, मैं तो अविश्वास की बात मन में लाऊँगी तक नहीं।'

"हाँ-हाँ, मैं उससे आपको मिला दूँगी ! डोलू की आवाज में गजब का विश्वास था। "पर पहले यह तो बताओ कि मैं पहाड़ लाकर दिखाऊँ?"

"अच्छा, दिखा। पर चोट नहीं खा जाना।" - नानी ने बच्चों की तरह कहा।

"तो फिर आँखें मूँदो। मैं अभी आयी पहाड़ लेकर।"

नानी ने आँखें मूँद ली। बच्ची जो बन गयी थीं। डोलू थोड़ी ही देर में पहाड़ लेकर आ गयी। बोली - "नानी आँखें खोलो और देखो यह पहाड़ !" नानी ने आँखें खोल दी। पूछा - "कहाँ?"

"यहाँ। यह क्या है?"

"पहाड़!"

अब क्या था, दोनों खूब हँसी, खूब हँसी। नानी ने डोलू को खींचकर उसका माथा चूम लिया। प्यार-से बोलीं - "तुम सचमुच बहुत नटखट हो डोलू!"

असल में डोलू ने एक कागज पर पहाड़ का चित्र बना रखा था। उसी को दिखाकर जब उसने नानी से पूछा - "यह क्या है" तो नानी के मुँह से सहज ही निकला - "पहाड़!"

नानी ने मुस्कुराते हुए पूछा - "भई डोलू अपनी परी दोस्त से भला कब मिलवाओगी?"

"कहो तो अभी।"

"ठीक है। मिलाओ !"

"तो करो आँखें बन्द।"

नानी ने आँखें मूँद ली। थोड़ी ही देर में डोलू ने कहा - नानी आँखें खोलो।" नानी ने आँखें खोल दीं। पूछा -"कहाँ है परी?"

"तो यह क्या है?"

"परी।" - नानी ने कहा।

दोनों फिर खूब हँसी, खूब हँसी। असल में इस बार डोलू ने अपनी ही फ्रॉक पर कागज लगा रखा था। जिस पर लिखा था - 'परी।'

नानी ने हँसते-हँसते पूछा - ''और वे सब कारनामे"'

"आप अविश्वास तो नहीं करेंगी न नानी?" - डोलू ने थोड़ा गम्भीर होते हुए पूछा।

"अरे, नहीं।"

"जब परी मैं हूँ तो कारनामे भी तो मेरे ही हुए न !

नानी की आँखें खुशी से भर आयीं। सोचा - 'कितनी कल्पनाशील है मेरी बच्ची। बड़ी होकर एक अच्छी माँ ही नहीं बहुत बढ़िया दादी और नानी भी बनेगी।'

और वह रसोई में चली गई। क्यों? सोचो!


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