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बाल साहित्य

तीन कहानियाँ
पूनम श्रीवास्तव


गिल्लू गिलहरी

गोल मटोल गिल्लू गिलहरी सभी को बहुत प्यारी थी। उसके शरीर पर पड़ी लंबी धारियाँ और उसकी लंबी सी पूँछ देखते ही बनती थी। वह रोहन के बगीचे में एक पेड़ के कोटर में रहती थी।

रोहन को जब भी मौका मिलता वह उसके पास पहुँच जाता। गिल्लू को आवाज देता तो वह झट से पेड़ से उतर कर आती। और रोहन के चारों ओर चक्कर काटने लगती।

रोहन गिल्लू का सबसे अच्छा दोस्त था। रोहन से गिल्लू जरा भी नहीं डरती थी। वह रोहन की हथेलियों से दाने उठा कर इत्मिनान से कुतरती। और रोहन भी उसे उठा कर प्यार से सहलाता।

एक बार रोहन बीमार पड़ गया। डाक्टर ने उसे बिस्तर से उठने के लिए मना कर दिया। जब दो तीन दिनों तक वह बगीचे में नहीं आया तो गिल्लू परेशान हो गई। वह बार बार पेड़ से उतरती और रोहन के घर के दरवाजे की तरफ देखती। फिर दुखी होकर वापस पेड़ पर चढ़ जाती।

एक दिन वह बहुत हिम्मत करके रोहन के घर में जा घुसी। वह सीधे रोहन के बिस्तर पर चढ़ गई। रोहन उसे देखकर बहुत खुश हुआ। वह भी अपनी दोस्त से मिलने के लिए परेशान था।

डाक्टर के इलाज से रोहन की तबीयत सुधरने लगी थी। गिल्लू भी अपने दोस्त का बहुत ध्यान रखती। जब रोहन आराम करता तो वह भी अपनी कोटर में चली जाती। रोहन के जागने पर वह अपनी पूँछ हिलाती आती और झट उसके बिस्तर में घुस जाती। फिर खूब उछल कूद मचाती। गिल्लू की प्यारी हरकतों से रोहन के मम्मी पापा भी हँसते हँसते लोट पोट हो जाते।

आज रोहन स्कूल जाने लगा तो उसने देखा गिल्लू भी बहुत खुश नजर आ रही थी। उसने आँखें मटका कर रोहन को बाय किया। रोहन हाथ हिलाता अपने स्कूल की तरफ बढ़ गया।

 

जल्दबाज कालू

एक बंदर था। नाम था कालू। पर दिल का बहुत साफ था। हमेशा लोगों की सहायता करता था। पर कालू की एक बुरी आदत थी। हर काम को जल्दबाजी में करने की। इससे अक्सर उसके काम बिगड़ जाते। वह दुखी हो जाता।

एक दिन वह बैठा सोच रहा था कि कैसे अपनी इस आदत को बदले। उसी समय उसे भालू पीठ पर कुछ लकड़ियाँ लेकर जाता दिखा। कालू को लगा कि इसकी सहायता करनी चाहिए। वह कूद कर भालू के सामने पहुँचा, 'लाइए दादा मैं ये लकड़ियाँ पहुँचा दूँ।'

भालू थक गया था। उसे लगा कालू की मदद ले लेनी चाहिए। उसने लकड़ियाँ उसे दे दीं। कालू ने कहा, 'दादा आप आराम से आइए। मैं आपकी ये लकड़ियाँ लेकर आगे चलता हूँ।' और वह लकड़ियाँ लेकर तेजी से आगे बढ़ चला।

थोड़ा आगे एक जंगली नाला था। नाले का बहाव भालू की गुफा की ओर था। कालू बंदर ने सोचा - 'क्यों न मैं लकड़ियाँ नाले में डाल दूँ। पानी के साथ बह कर गुफा तक पहुँच जाएँगी। मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी होगी।'

बस उसने कालू की लकड़ियों का गट्ठर नाले में डाल दिया। नाले का बहाव तेज था। लकड़ियाँ तेजी से बहने लगीं। उनके पीछे पीछे कालू ने भी दौड़ लगा दी।

पर कालू बहुत तेज नहीं दौड़ पा रहा था। लकड़ियाँ आगे बह गईं। कालू ने सोचा कि भालू की गुफा आने तक तो मैं इन्हें पकड़ लूँगा।

कालू बहुत तेज उछला। बहुत तेज दौड़ा। पर वह पानी के बहाव के साथ नहीं दौड़ सका। लकड़ियाँ भालू की गुफा से आगे बह गईं। कालू उन्हें नहीं पकड़ सका। वह उदास होकर गुफा के सामने बैठ गया।

कुछ ही देर में वहाँ भालू भी आ गया। कालू बंदर को उदास देख उसने पूछा, 'क्या हुआ।'

कालू ने उसे पूरी बात बताई। भालू हँस पड़ा। उसने कालू को समझाया, 'जल्दी में काम बिगड़ जाते हैं। अपने काम आराम से किया करो।'

बात कालू की समझ में आ गई। उसने उसी दिन से जल्दबाजी की आदत छोड़ दी।

 

सोनू चिड़िया

सोनू चिड़िया और रुपहली दोस्त थीं। दोंनों पेड़ों पर फुदक रही थीं। तभी सोनू को एक पेड़ पर एक बहुत सुंदर रंग बिरंगा फल दिखा।

सोनू बोली, 'मैं ये फल खाऊँगी।'

उसकी प्यारी दोस्त सुनहरी ने बहुत समझाया। मना किया।

'प्यारी सोनू, ये फल मत खा। इससे तेरा गला खराब होगा।'

पर सोनू ने उसकी बात नहीं सुनी। वह उस रंग बिरंगे फल को चखने का लालच नहीं रोक सकी। बस उसी दिन उसका गला खराब हो गया। गाना, बोलना सब बंद।

जंगल के सारे जानवर दुखी रहते। सोनू के सुरीले गीत सभी को पसंद थे। सोनू भी उसी दिन से उदास रहने लगी।

पूरे छह महीनों तक न वह कहीं गा सकी। न बोल सकी। बहुत परेशान रही वह। पता नहीं कहाँ से उसने वो कसैला फल चख लिया था।

एक दिन सबेरे दोनों दोस्त पेड़ की डाल पर बैठी थीं। आते जाते जानवरों को देख रही थीं। दूसरी चिड़ियों का चहचहाना सुन उसकी आँखों में आँसू आ गए।

'पता नहीं मेरी आवाज कभी ठीक होगी या नहीं।' उसने सोचा।

अचानक वहाँ एक गधा कहीं से भटकता हुआ आ गया। वह उसी पेड़ से अपनी पीठ रगड़ने लगा जिस पर दोनों बैठी थीं। शायद उसकी पीठ खुजला रही थी।

पेड़ पतला था। गधे के पीठ रगड़ने पर वो हिलने लगा। पहले धीरे धीरे फिर तेजी से। रुपहली और सोनू घबरा गईं। उन्हें लगा कहीं ये पेड़ गिर न जाय।

सोनू चीखी, 'बच के रुपहली, ये गधा हमें गिरा देगा।'

उसकी आवाज सुन रुपहली चौंक गई।

'अरे सोनू, तू तो बोल सकती है।' रुपहली चीखी।

'अरे सच में - मैं बोल सकती हूँ। अब मैं फिर गाऊँगी, चहचहाऊँगी।'सोनू जोर से चीखी।

सोनू और रुपहली चहचहाते हुए तेजी से उड़ीं।

दोनों चीख रही थीं। चहचहा रहीं थीं। गा रही थीं। पूरे जंगल में पंख फैलाए उड़ रही थीं।

जंगल के सारे जानवर भी खुशी मना रहे थे।


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