Error on Page : Count must be positive and count must refer to a location within the string/array/collection. Parameter name: count अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध :: :: :: अधखिला फूल :: उपन्यास
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उपन्यास

अधखिला फूल
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


आज तक मरकर कोई नहीं लौटा, पर जिसको हम मरा समझते हैं, उसका जीते जागते रहकर फिर मिल जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अवसर पर जो आनन्द होता है-वह उस आनन्द से घटकर नहीं कहा जा सकता-जो एक मरे हुए जन के लौट आने पर मिल सकता है। पारबती बड़ी भागवाली है-आज दो बरस का खोया हुआ पति ही उसको नहीं मिला, उस की आँखों की पुतली, वह देवहूती भी अचानक आकर उससे गले मिली-जिसको वह डूब मरी समझकर आठ-आठ आँसू रोती थी। आज उसके आनन्द का पार नहीं है। कुछ घड़ी के लिए वह बावली बन गयी, अपने देह तक की सुध भूल गयी, संसार उसकी आँखों में कुछ और हो गया, न उससे हँसते बनता था न रोते। पर कुछ ही बेर में वह भाप जो धुन बाँधकर भीतर उठ रही थी, बाहर निकल पड़ी, और वह फूट-फूट कर रोने लगी। जब बहुत दिनों की जी में लगी दुखड़ों की काई झर-झर बहते हुए आँसुओं से धुल गयी और पारबती का जी कुछ हलका हुआ, उस घड़ी वह और सब बातें भूलकर हरमोहन से कहने लगी-क्या आपको मुझको इस भाँति छोड़ देना चाहिए था-आप किसके हाथ मुझको सौंप गये थे, जो दो बरस तक मेरी सुधा भी न ली? सब तो गया ही था, मैं आपका ही मुँह देखकर रोती थी, फिर आप इतने कठोर क्यों हुए? पर फिर भी मेरे भाग्य अच्छे हैं, जो आपने इतने दिनों पीछे भी चेता, और मेरे उजड़े हुए घर को बसाया।

हरमोहन पाण्डे भी इस बेले चुपचाप आँखों से आँसू बहा रहे थे, जब पारबती कह चुकी, वह बोले-जिस होनहार ने धन सम्पत्ति और गाँव घर मुझसे छुड़ाया था, उसी ने तुम्हारी ऐसी घरनी, देवहूती जैसी लड़की, और देवकिशोर जैसा लड़का भी मुझसे छुड़ाया। मुझको सब भाँत का दुख तो था ही, पर जमाई के किसी साधु के संग कहीं निकल जाने की बात मैंने सुनी, उसी घड़ी मेरे दुख का पार न रहा, मैंने सोचा ऐसे घर से तो बन अच्छा है, और इसी धुन में मैं बन में निकल गया। निकलने को तो मैं बन में निकल गया, पर वहाँ मुझको बहुत कुछ भुगतना पड़ा। महीनों मुझको बनफल खाकर और झरनों का पानी पीकर अपने दिन बिताने पड़े। बात यों है-बन में निकल जाने पर जब दो-चार दिन पीछे जी ठिकाने हुआ, तो मेरे जी में कई बार यह बात उठी-मैं घर लौट चलूँ-मैं घर की ओर चला भी। पर जिस पथ से मैं बन में घुसा था, वह पथ कुछ ऐसी भूल-भुलइयाँ के ढंग का है, जिसने मुझको घर न लौटने दिया। जाते समय मुझको कहाँ जाना है, यह विचार तो था ही नहीं, इसलिए नाक की सीध में मैं बन में घुसता चला गया, पर निकलते समय मैं जिधर से निकलना चाहता था, कुछ दूर चलने पर फिर वहीं आ जाता था, महीनों तक मैं नित बन से निकलने का जतन करता रहा, पर एक दिन भी मेरे मन की न हुई। उलटे लेने के देने पड़ गये। महीनों बनफल खाने, झरनों का पानी पीने और धरती पर सोने से मैं रोगी हो गया, और मेरा चलना-फिरना तक रुक गया। इन दिनों मैं एक पत्ते की झोंपड़ी में-जिसको मैंने अपने हाथों बनाया था, दिन रात पड़ा रहता था। और इतना दुबला हो गया था, जिससे किसी जंगली जीव का सामना होने पर किसी भाँति अपने को बचा न सकता था।

पर मेरे दिन पूरे नहीं हुए थे, इसीलिए रोगी होने के थोड़े ही दिनों पीछे किसी ओर से घूमते घामते दो भील मेरे पास आये, इन दोनों ने मुझको देखा, मेरा नाम धाम पूछा और चुपचाप मुझको अपने घर उठा ले गये। मैंने उन दोनों से घर पहुँचा देने के लिए बहुत कहा, भाँति-भाँति की लालच दिलायी, पर उन्होंने मेरी एक न सुनी, कहा, आप इतने घबराते क्यों हैं? जब आप अच्छे हो जावेंगे, घर पहुँचा दिया जावेगा। मैं उनकी बातें सुनकर चुप हो रहा, कुछ डरा भी, पर अपने घर लाकर उन दोनों ने मेरी जितनी टहल की, मैं उसके लिए उनका जन्म भर ऋणी रहूँगा। मैं पाँच छ: महीने अच्छा नहीं हुआ, पर उन दोनों ने एक दिन भी मेरी टहल और सम्हाल करने से जी न चुराया। जब मैं भली-भाँति चंगा हुआ, उस समय मुझको घर से निकले एक बरस हो चुका था। बीच-बीच में कई बार मैंने उन सबों से घर पहुँचाने के लिए कहा, पर जब मैं घर की बात उठाता, तभी वे सब टालटूल करते। क्यों वह टालटूल करते, मैं पहले इस भेद को न समझता था, इसलिए मैं सोचता-इन सबका प्यार मेरे साथ बहुत हो गया है, इसीलिए ये सब मुझको घर पहुँचाना नहीं चाहते। धीरे-धीरे यह बात मेरे जी में जम गयी, और मैंने सोचा, अपने आप मुझको जंगल से बाहर निकलने के लिए कोई जतन करना चाहिए। पर यह काम मैं इस भाँति करना चाहता था, जिसमें वे दोनों भील जानें तक नहीं। क्योंकि सेवा टहल करके उन्होंने इस भाँति मुझको अपने हाथों में कर लिया था, जिससे मैं किसी भाँति उनका जी तोड़ना अच्छा न समझता था।

तुम कहोगी भीलों की ओर इतना ध्यान! पर इन भीलों के बरताव की बात मैं क्या कहूँ। क्या बस्ती में बसनेवालों में इतनी भलमनसाहत हो सकती है? कभी नहीं! छल कपट का वे सब नाम तक नहीं जानते, सीधे और सच्चे इतने हैं जितना होना चाहिए। हम लोग मुँह पर बात बनाते हैं, बात चलने पर धरती आकाश एक करते हैं, कभी-कभी ऐसी चिकनी चुपड़ी सुनाते हैं, जिससे पाया जाता है हमसे बढ़कर भला कोई दूसरा हो नहीं सकता। पर भीतर की सड़ी गन्ध से जी भिन्ना जाता है-काम पड़ने पर ऐसा भण्डा फूटता है, जिसके कहते हुए भी लाज लगती है। मुझको बस्ती के लोगों से भली-भाँति काम पड़ चुका था, मैं बहुत से लोगों का रंग-ढंग देख चुका था, इसलिए जंगल में पहुँचने पर जब भीलों से पाला पड़ा, तो मुझको जान पड़ा, बस्ती के लोग इन भोले-भाले भीलों से कितनी दूर हैं। कभी-कभी मेरे जी में घर न पहुँचाने की बात खटकती थी, पर इसको भी मैं उनका प्यार ही समझ चुका था, चाहे मेरे साथ उनका यह प्यार न था, तब भी जिसलिए वे मुझको घर न पहुँचाते थे, यह भी एक ऐसी बात थी, जिससे वह और अच्छे समझे जा सकते हैं। कामिनीमोहन की ओर से वे सब बन के रखवाले थे, कामिनीमोहन ने उनसे कह रखा था, जो बन के भीतर गाँव का कभी कोई पाया जावे तो उसको बिना मुझसे पूछे बाहर न निकलने देना, फिर वह क्यों उनकी बातों पर न चलते? अवसर पाकर उन सबों ने कामिनीमोहन से मेरे घर पहुँचा देने के लिए पूछा भी था, पर जान पड़ता है उन दिनों उसकी दीठ देवहूती पर पड़ चुकी थी, इसलिए उसने मुझको जंगल में रख छोड़ने के लिए ही कहा। ये बातें कामिनीमोहन के मरने पर मुझको भीलों ने बतलायी थीं।

जब बन में एक बरस बीतकर दूसरा लगा, और बाल-बच्चों का नेह बहुत सताने लगा, तब मैं चुपचाप नित्य बन से निकलकर घर पहुँचने के लिए पथ ढूँढ़ने लगा। पर मुझ ऐसे आलसी जीव के लिए बन में पथ ढूंढ़ लेना कठिन बात थी। जब बन में मैं पथ ढूँढ़ने निकलता और कहीं कुछ उलझन पड़ती, तभी मैं अपनी झोंपड़ी में पलट आता, कहता अब कल्ह पथ ढूँढ़ईँगा। पर इस भाँति कल्ह-कल्ह करते दो बरस बीतने पर आये और मुझको पथ न मिला।

भाग्य से एक दिन देवस्वरूप से भेंट हुई। उन्होंने मुझे देखकर साधु समझा, और कहा, आपका दर्शन बड़े अवसर पर हुआ, आज मैं एक सती स्त्री का धर्म बचाना चाहता हूँ, पर मुझको डर था वह मेरी परतीत करे न करे। पर आपको देखकर मैं सुखी हुआ, आप बड़े बूढे हैं, आपकी परतीत करने में उसको कुछ आगा पीछा न होगा। आप मेरे साथ चलिए और एक धर्म के काम में सहाय हूजिए। मैं उनकी बातों को कुछ न समझ सका, पर धर्म की दुहाई देते देखकर उनके साथ हो गया। वे मुझको एक सुरंग से एक कोठरी में ले गये। ज्यों मैं कोठरी में पहुँचा एक डयोढी में से निकलकर देवहूती को कोठरी की ओर आते देखा। मैंने देवहूती को देखकर पहचाना, और उनसे कहा, यह तो मेरी लड़की है। यह यहाँ कैसे आयी, आप सब बातें मुझसे खोलकर कहें। उन्होंने मेरी बात सुनकर कहा तब तो और अच्छा हुआ, पर आप इस घड़ी न कुछ पूछें-पाछें और न कुछ बोलें-इस घर से बाहर निकल चलने पर सब बातें अपने आप जान जावेंगे। जब हम तीनों सुरंग से बाहर निकले, तो देवस्वरूप मेरी झोंपड़ी तक हम लोगों के साथ आये, पथ में बहुत सी बातें देवहूती की भलमनसाहत और कामिनीमोहन की चाल की उन्होंने मुझको सुनायीं, मैंने भी अपना सारा दुखड़ा उनको सुनाया, बीच-बीच में देवहूती फूट-फूट कर रोती थी। जब मैं अपनी झोंपड़ी में पहुँचा, वे कहने लगे-इस समय मैं एक काम से बंसनगर जाता हूँ, आप देवहूती के साथ कुछ दिन और बन में रहिये, थोड़े ही दिनों पीछे मैं आपको देवहूती के साथ आपके घर पहुँचा दूँगा। गाँव के पंचों के कहने से आज वही देवहूती के साथ मुझको घर लिवा लाये हैं, पथ में गाँव की बड़ी चौपाल में मुझको थोड़ी बेर के लिए ठहरा लिया था, चौपाल से थोड़ी दूर पर देवहूती की पालकी भी उतरवायी थी, सोचा था, क्या जाने कुछ काम पड़े। पर मुझको जीता देखकर गाँववालों ने देवहूती के लिए कुछ पूछपाछ न की। इसी बीच बासमती का पचड़ा फैल गया। मैंने देखा अब यहाँ रहना ठीक नहीं, इसलिए देवहूती के साथ घर चला आया। तुमने जो कुछ कहा ठीक है, पर होनहार किसी के हाथ नहीं, जो-जो नाच उसने नचाया, वह सब नाचना पड़ा, अब भी जो नाच वह नचावेगा, नाचना पड़ेगा, पर इस बुढ़ौती में एक बार हमारी तुम्हारी भेंट और बदी थी, वह हुई, आगे की राम जानें।

पारबती चुपचाप हरमोहन पाण्डे की बातें सुनती रही, कभी रोती, कभी ऊँची साँसें लेती, और कभी चुपचाप उनके मुँह की ओर ताकती रही। जब हरमोहन पाण्डे चुप हुए, वह बोली, भगवान ने जैसा मेरा दिन फेरा, सबका दिन फिरे। आपको और देवहूती को इन दो बरसों में जैसी बिपत झेलनी पड़ी, राम किसी बैरी को भी ऐसी बिपत में न डालें। मैंने जब भूलकर भी कभी किसी का बुरा नहीं किया, तो मेरा बुरा कैसे होता। कामिनीमोहन के मरने पर बासमती मेरे पास दो-तीन दिन आयी थी, उससे देवहूती की सब बातें सुनी थीं, मैं उससे मिलने की आस में ही दिन गिन रही थी, पर अचानक आपका भी दर्शन कर भगवान ने मेरे किस जनम के पुण्य का फल आज मुझको दिया है, मैं नहीं कह सकती।

पारबती इन्हीं बातों को कह रही थी, इसी बीच गाँव की बहुत-सी स्त्रियों देवहूती से मिलने के लिए वहाँ आयीं। देखकर हरमोहन वहाँ से उठकर एक दूसरे घर में चले गये। पारबती देवहूती को स्त्रियों के पास छोड़कर पहले हरमोहन के पास गयी। उनका हाथ मुँह धुलाया, उनको कुछ खाने को दिया, पीछे स्त्रियों के पास लौट आयी। पारबती, देवहूती, और आयी हुई स्त्रियों में क्या बातचीत हुई, मैं इसको लिखना नहीं चाहता। ऐसे अवसर पर जैसी बातें हुआ करती हैं, उसको आप लोग अपने आप समझ लें।

पच्चीसवीं पंखड़ी

जब तक हमको पेट भर खाने के लिए नहीं मिलता, हम दो मूठी अन्न के लिए तरसते रहते हैं, उन दिनों हमको यही सोच रहता है, कैसे पेट भर खाने को मिलेगा, कहाँ से दो मूठी अन्न लायें, जिससे पापी पेट की आग बुझे। पर पेट भर खाना मिलने पर, दो मूठी अन्न का ठिकाना हो जाने पर, हमारा जी पहले का-सा नहीं रह जाता। इस घड़ी हम सोचते हैं, कुछ कमाना चाहिए, हमारे पहनने के कपड़े कैसे फटे और बुरे हैं, भलेमानसों को मुँह तक नहीं दिखाया जाता, कहाँ से कुछ मिले, जो आये दिन पत रहे। जो भगवान ने दया की, इस दुखड़े से भी छुट्टी मिली, तो जी में आता है, घर चारों ओर से गिरा पड़ा है, बरसात में घर की छतें चलनी बन जाती हैं, धूप के दिनों लू और लपट के थपेड़ों से जी पर आ बनती है, जैसे हो घर बनवाना चाहिए। जो भाग ने साथ दिया, पैसे हाथ चढ़ गये, तो घर बनते भी बेर नहीं होती। पर क्या हमारी चाहें यहीं आकर ठिकाने लगती हैं ? नहीं, घर बना तो हाथी घोड़ा चाहिए, धन धरती चाहिए, रुपये चाहिए। सच बात यह है, चाह कभी पूरी नहीं होती। जिसके लिए आज हम बेकल हैं, जो वह कल्ह मिल गया, तो परसों दूसरी ही उधेड़ बुन में हम लगते हैं, और उसके लिए हाथ-पाँव मारते हैं, जो अब हमारे पास नहीं है। पारबती आजकल दिन-रात हरमोहन पाण्डे और देवहूती के लिए रोती-कलपती थी; सोते-जागते उसको इन्हीं का ध्यान था। राम-राम करके उसके दुख की रात बीती, सुख के सूरज ने मुँह दिखलाया, हरमोहन पाण्डे और देवहूती ने आकर उसके अंधेरे घर में उँजाला किया, वह दो-एक दिन इस सुख में भूली रही। पर दो ही दिन पीछे उसका जी फिर दुखी रहने लगा, वह देवहूती का रूप जीवन देखती, उसके धन विभव की बात विचारती, और सोचती, क्या कोई दिन वह भी होगा, जिस दिन देवहूती का उजड़ा हुआ घर बसेगा? फिर सोचती, यह भी बावलापन है! जो साधु हो गया, वह घरबारी कैसे होगा!!! फिर जी में बात आती, तो भगवान ने इसको इतना रूप क्यों दिया! इतना धन विभव क्यों दिया!!! जो सदा उसको जलना ही है, तो यह रूप और धन विभव किस काम आवेगा! क्या देवहूती को विपत से उबारनेवाले देवस्वरूप उसकी इस बिपत से रच्छा करने का भी कोई उपाय सोचेंगे! देवस्वरूप का नाम मुँह पर आते ही वह चौंक उठी। देवस्वरूप को एक दिन अचानक पारबती ने देख लिया था, देखते ही उसके जी का भाव न जाने कैसा हो गया था, इस घड़ी भी उसके जी का भाव वैसा ही हुआ, वह मन-ही-मन सोचने लगी, देवस्वरूप का मुखड़ा देवहूती के पति से इतना क्यों मिलता है? देवहूती का पति भी साधु हो गया है, देवस्वरूप भी साधु है! फिर क्या देवस्वरूप ही तो देवहूती का पति नहीं है? इन बातों को सोचकर पारबती बड़े गोरखधंधे में पड़ी। वह जानना चाहती थी, देवस्वरूप कौन है? कहाँ का है? क्यों दूसरों की भलाई के लिए दिन-रात उतारू रहता है? क्यों उसने देवहूती के साथ इतनी भलाइयाँ कीं? पर बहुत कुछ पूँछपाछ करने पर भी वह इन बातों को न जान सकी। इसी बीच एक दिन पारबती ने सुना, कल्ह देवस्वरूप बंसनगर से चले जावेंगे, उनको कई तीर्थों में जाना है, इसीलिए वे उतावली कर रहे हैं। पारबती ने गाँव से चले जाने के पहले एक दिन अपने यहाँ उनका नेवता करना चाहा-और यह बात हरमोहन पाण्डे से कही। उन्होंने पारबती की बात मानी, और नेवता देकर एक दिन देवस्वरूप को अपने यहाँ बुलाया। जब वह खा-पी चुके तो घर से मिली हुई एक बैठक में उन दोनों जनों में इस भाँति बातचीत होने लगी।

हरमोहन-आपने हम लोगों के साथ जितनी भलाइयाँ की हैं, उनका हम लोग कहाँ तक निहोरा करें-बिना किसी अर्थ के इस भाँति दूसरों की भलाई करते आपसे पहले मैंने किसी दूसरे को नहीं देखा। आप अब बंसनगर छोड़कर आजकल में जाना चाहते हैं, इससे हम लोगों का जी मल रहा है, आँखों से आँसू निकल रहे हैं। क्या आप फिर दर्शन देकर हम लोगों को कृतार्थ करेंगे? आप जैसे साधुओं का दर्शन करने ही से हम जैसे घरबारियों का भला होता है।

देवस्वरूप-एक के बिपत में फँसने पर दूसरे का उसके बचाने के लिए उतारू हो जाना, हम सब लोगों का सबसे बड़ा धर्म है। मैंने वही किया है, इसमें आप के निहोरा मानने की कोई बात नहीं है। यह आपका बड़प्पन है जो इस बहाने आप मुझको सराहते हैं। और जो प्यार आप लोगों का मेरे साथ है, वह आप लोगों की दया है, मुझमें कोई गुण ऐसा नहीं है, जिसके लिए आप लोग मुझको इतना चाहें। यह सच है, मैं आज कल में बंसनगर छोडँगा, पर कुछ दिनों पीछे आप लोगों का दर्शन करने की फिर चाह है। मेरा जनम ब्राह्मण के घर में हुआ है, एक तो यों ही ब्राह्मण और साधुओं का भेस बहुत मिलता-जुलता है-दूसरे इधर दो-तीन बरस में साधुओं के साथ रहा भी हूँ। इससे मेरा भेस कुछ साधुओं का-सा देखकर आप मुझको साधु समझ रहे हैं, पर सच बात यह है, मैं साधु नहीं हूँ। साधु क्या, साधुओं के पाँव की धूल भी नहीं हूँ।

हरमोहन-आपकी बातें ठीक-ठीक मेरी समझ में नहीं आती हैं, क्या आप साधु नहीं हैं? घरबारी हैं?

देवस्वरूप-हाँ! घरबारी ही समझिए, जब मैं साधु बनने योग्य अभी नहीं हूँ तो अपने को घरबारी कहने में क्यों हिचकूँगा। साधु होना टेढ़ी खीर है, बड़ा कठिन काम है। सर पर जटा बढ़ाये, भभूत रमाये, गेरुआ पहने, हाथ में तूँबा और चिमटा लिए, आप कितनों को देखते हैं, पर क्या वे सभी साधु हैं? नहीं, वे सभी साधु नहीं हैं। भेस उनका साधुओं का सा देख लीजिए, पर गुण किसी में न पाइयेगा। कोई पेट के लिए भभूत रमाता है, कोई चार पैसा कमाने के लिए जटा बढ़ाता है, कोई लोगों से पुजाने के लिए गेरुआ पहनता है, और कोई घर के लोगों से लड़कर बिगड़ खड़ा होता है, और झूठ-मूठ साधुओं का भेस बनाए फिरता है। इन सब लोगों से निराले कुछ ऐसे लोग होते हैं-जो न तो कुछ काम कर सकते-न किसी काम में जी लगाते-जिस काम को वे करना चाहते हैं, आलस से वही काम उनके लिए पहाड़ होता है-फिर उनका दिन कटे तो कैसे कटे! वे सब छोड़-छाड़ कर साधु बनने का ढचर निकालते हैं, और इसी बहाने किसी भाँति अपना दिन काटते हैं। जब तक इन लोगों को तन ढाकने और पेट भरने ही तक मिलता है, तब तक कहने-सुनने को ये लोग कुछ भले होते भी हैं, पर जो कहीं कुछ रुपया पैसा हाथ चढ़ गया, कुछ धन धरती मिल गयी, तो अनर्थ होता है, जो काम बिगड़े से बिगड़ा घरबारी नहीं कर सकता, उन कामों को यह झूठा साधु करता है और जितनी बुराई देश और देश के लोगों की इन लोगों के हाथों होती है, दूसरों के हाथ कभी नहीं हो सकती-हमसे जवान साधु तो और अनर्थ करते हैं। अभी भली-भाँति मूँछ भी नहीं आयी है-अठारह-बीस बरस का बय है-जवानी ऊपर फिसली जाती है-अकड़ तकड़ देह में भरी हुई है-मन में सभी ढंग की चाहें हैं-एक चाह ने भी पूरा होने का अवसर नहीं पाया-इसी बीच साधु बनने की धुन समायी। साधु बने, भभूत रमाया, जटा बढ़ायी, गेरुआ पहना, पर इसी साधु बनने से क्या हुआ, जब तक मन हाथ न आया, और जी की चाहें न मिटीं। हाँ! इतना होगा, भोले-भाले लोग उनको साधु महात्मा समझकर उनसे किसी बात की झिझक न रखेंगे और वह महामना देश की और देश के लोगों की बुराई करते रहेंगे। किसी पोथी में इस भाँति साधु होना नहीं लिखा है, कहीं ऐसे साधुओं की बड़ाई नहीं की गयी है। आजकल साधु होना भेड़ियाधसान हो गया है-जिसको देखो वही साधु बना फिरता है, पर इस भाँत साधु होने से साधु न होना ही अच्छा है।

मैं यह नहीं कहता सभी साधु ऐसे हैं, जितने साधु देखने में आते हैं, सभी बुरे और खोटे हैं। पर यह कहूँगा जो भली-भाँति पढ़ा लिखा नहीं है, जिसके साधु होने का समय नहीं आया, जो यह नहीं जानता साधु किसलिए हुआ जाता है, जिसने यह नहीं समझा, साधुभेस बनाने के पहले साधु का गुण होना चाहिए, उसका साधु बनना जग को धोखे में डालना है। साधु का भेस देखकर हमारा आपका उसका आदर मान न करना, एक ऐसी बात है, जिससे कभी किसी अच्छे साधु का मान न करने का दोष भी हमको आपको लग सकता है। इसी से हम लोगों में जो साधु के भेस में देखने में आते हैं, उन सबका आदर और मान करने की चाल है। पर यह हमारा और आप का करतब है, ऐसे झूठे भेस बनाने वाले के लिए यह और लाज की बात है। जितनी बातें मैं ऊपर कह आया हूँ, उससे आपने समझा होगा, मुझमें ऐसे गुण अब तक नहीं हैं, जिससे मैं साधु हो सकूँ, और इसीलिए मैंने आपसे कहा है, मैं साधुओं के पाँव की धूल भी नहीं हूँ। हाँ! साधु होने के लिए जतन कर रहा हूँ-आप बड़ों की दया से जो मेरा जतन पूरा हुआ, मेरा मन ठीक हो गया, और चाहें मिट गयीं, तो समय आने पर मैं साधु होने की चाह रखता हूँ। इस समय साधु कहकर आप मुझको न लजवावें।

हरमोहन-आप बहुत बड़े लोग हैं जो ऐसी बातें कहते हैं, मैं आपकी बातों को काटकर यह न कहूँगा-आपसे बढ़कर कौन साधु हो सकता है। पर यह कहूँगा, हम लोगों का बड़ा भाग्य है, जो आप फिर दर्शन देने के लिए इस गाँव में आने की चाह रखते हैं। जो कभी आकर आप दर्शन दे जाया करेंगे, तो हम लोगों का बहुत कुछ भला होगा। इस घड़ी हम आपसे अपनी एक और भलाई की आशा रखते हैं। आप जानते हैं, दो बरस हुआ, देवहूती का पति किसी साधु के साथ कहीं निकल गया। आप कितने तीर्थों, नगरों और गाँवों में जाते हैं, ऐसा संजोग हो सकता है, जो आपके साथ उसकी भेंट होवे, आप का जी इधर होने से ऐसा होने में और सुभीता होगा। जो भगवान यह दिन दिखलावें, और आपके साथ किसी दिन उसकी भेंट हो जावे, तो आप उसको घर फेर लाने के लिए जतन करेंगे। जिस भाँति देवहूती को आपने कितनी बिपतों से बचाया है उसी भाँति देवहूती को इस बिपत से भी बचावें। हम लोगों की बड़ी गिड़गिड़ाहट के साथ आपसे यही बिनती है।

देवस्वरूप-आपके बिना कहे उसी दिन से मेरे जी में यह बात बैठी हुई है, जिस दिन यह बात मैंने जानी। मैं जहाँ तक हो सकेगा देवहूती के पति को ढूँढ़ने में न चुकूँगा, पर आप दया करके उनका रूप रंग क्या कुछ बतला सकते हैं?

हरमोहन-मैंने सुना है उसका रूप रंग आपसे बहुत मिलता है।

देवस्वरूप यह सुनकर कुछ घड़ी चुप रहे-एक-एक करके कई बार हरमोहन के मुखड़े पर दीठ डालते रहे। फिर बोले-आपका नाम हरमोहन पाण्डे छोड़ कुछ और है? क्या देवहूती का कोई दूसरा नाम भी है?

हरमोहन-मेरा नाम तो हरमोहन पाण्डे ही है-पर मुझको लोग कहते मोहन पाण्डे हैं। इसी भाँति देवहूती का भी कोई दूसरा नाम नहीं है-हाँ! प्यार से लोग उसको पियारी पुकारा करते हैं, क्यों? आपने यह क्यों पूछा?

देवस्वरूप कुछ इधर-उधर करके बोले-पियारी तो मर गयी न?

देवस्वरूप को इधर-उधर करते देखकर हरमोहन पाण्डे ने एक गहरी दीठ उनके ऊपर डाली, इस समय उनके मुखड़े पर एक रंग आता, और एक जाता था, जी में अनोखा उलट फेर हो रहा था। पर उन्होंने सम्हल कर कहा, नहीं वह मरी नहीं, अब तक जीती है। क्यों देवहूती के मरने की बात आप जानते हैं?

देवस्वरूप ने धीरज के साथ कहा-हाँ! मैंने सुना कुछ ऐसा ही था, पर आपकी बात भी सच हो सकती है। किसी बड़े रोग में बेसुधा हो जाने पर बहुत लोगों के लिए ऐसी बातें फैल जाती हैं।

हरमोहन-ठीक ऐसा ही देवहूती के लिए भी हुआ है, जिस दिन यहाँ यह बात फैली, उसके थोड़े ही दिनों पीछे, मैंने उसके पति के किसी साधु के साथ निकल जाने की बात सुनी। जान पड़ता है अपनी स्त्री को मरा समझ कर ही, उसने ऐसा किया है। जो हो, पर आप यह बतलावें, आप इन बातों को कैसे जानते हैं? क्या आप रामनगर के रहनेवाले हैं?

एक जन सच्चे जी से तीर्थ जाने के लिए सजधज कर खड़ा है, कैसे वहाँ जाकर देवताओं की सेवा पूजा करके अपना जनम सफल करेगा! कैसे साधु महात्माओं का दर्शन करके अपने को बड़भागी बनावेगा!! वह इन्हीं उमंगों फूला नहीं समाता है। इसी बीच अचानक उसने एक ऐसी बात सुनी, जिससे उसको तीर्थ जाने का विचार छोड़ना पड़ा, सारी चाहें उसकी धूल में मिल गयीं, और मुखड़े पर निराशा-भरी गहरी उदासी झलकने लगी। ठीक यही दशा हरमोहन की बात सुनकर देवस्वरूप की हुई। मुखड़े का चमकता हुआ चटकीला रंग फीका पड़ गया, आँखों की जोत कुछ मैली हो गयी, और अचानक वह कुछ घबरा से गये, पर देखते-ही-देखते ये सब बातें दूर हुईं, धीरज मुखड़े पर खेलने लगा, और उन्होंने कुछ चौंकते-चौंकते कहा, हाँ! मैं रामनगर का ही रहनेवाला हूँ।

हरमोहन पाण्डे ने कुछ उकताहट के साथ कहा, आपके बाप का नाम?

देवस्वरूप ने वैसे ही धीरज के साथ कहा, पंडित गोबिन्दस्वरूप?

अबकी बार हरमोहन का कलेजा धाक से हो गया, उन्होंने लड़खड़ाती जीभ से कहा, और आपका नाम? फिर से कहा-क्या देवस्वरूप ही आपका नाम है?

देवस्वरूप बोलना ही चाहते थे, इतने में लाल पगड़ीवाले, थाने के दो मुचण्डे, अचानक बैठक में घुस पड़े, और डाँट कर बोले तुम लोग बासमती को मरवा कर यहाँ बैठे अट-कौसल कर रहे हो! उठो! अभी उठो!! देखो आज कैसी गाढ़ी छनती है। हरमोहन की नानी तो थानेवालों को देखते ही मर गयी थी, इस पर उन्होंने जो डाँट बतलायी, उससे उसके रहे सहे औसान भी जाते रहे। पर देवस्वरूप ने बिना किसी घबराहट के कहा, देखो ऊधम करने का काम नहीं है, जहाँ तुम लोग कहो वहाँ हम लोग चल सकते हैं। देवस्वरूप का रंग-ढंग और धीरज देखकर फिर वे दोनों कुछ न बोले और जिधर से आये थे, देवस्वरूप और हरमोहन को लेकर चुपचाप उसी ओर चले गये।


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