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उपन्यास

अधखिला फूल
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


बासमती जाने से कुछ ही पीछे हरलाल को ले कर लौट आयी। हरलाल छड़ी से टटोल-टटोल कर पाँव रखते हुए घर में आया। उसके आते ही पारबती और देवहूती वहाँ से हटकर कुछ आड़ में बैठ गयीं, पर पड़ोस की दोनों स्त्रियों पहले ही की भाँति लड़के की सम्हाल में लगी रहीं। हरलाल घर में आकर सीधे लड़के की खाट के पास चला गया, पहले उसने उसकी नाड़ी देखी, पीछे सर और छाती को टटोला, नाक के छेदों के पास हाथ ले जाकर देखा, साँस कैसे चल रही है, आँखों को खोलकर उनके तारों को देखा, फिर सर में जो चोट आयी थी, उसकी देखभाल की, और यह सब करके बहुत ही अनमना सा होकर कहने लगा-बासमती! तुम मुझको लिबा तो लाई हो, पर बाबू की दशा बहुत ही बिगड़ गयी है, इनके सर से बहुत लहू निकल गया है, और अब तक निकल रहा है, इससे इनका प्राण इस घड़ी बड़ी जोखों में है। मैं क्या करूँ क्या न करूँ, कुछ समझ में नहीं आता, जो चला जाऊँ तो कल्ह सबको मुँह कैसे दिखाऊँगा, और जो जतन और उपाय करने लगूँ तो जी को एक बड़ा भारी खटका होता है। पर दुरगा माई जो करें, जो मैं आ गया तो बिना कुछ किये अब न जाऊँगा। हाँ! यह बात मैं कहे देता हूँ, मुझको बल भरोसा दुरगा माता का है, जो कुछ मैं करूँगा उन्हीं के भरोसे करूँगा, बिना उनका सुमिरन किये मैं कुछ नहीं कर सकता, बिपत में उन्हीं का नाम सहाय होता है, उन्हीं का नाम लेने से दुख कटता है, इसलिए अब मैं दुरगा माता का सुमिरन करूँगा, तू थोड़ा सा धूप, गूगुल ला दे।

पारवती की इस घड़ी बुरी गति थी, बेटे की बुरी दशा देख सुनकर उसका कलेजा फट रहा था, आँखों से लहू गिर रहा था, रह-रह कर जी बावला होता था। इसी बीच हरलाल ने अपना टंट घंट फैलाया। आया था बैदई करने, ओझाई करने पर उतारू हुआ। यह देखकर पारबती के रोयें रोयें में आग लग गयी, उसका जी जल भुन गया, पर वह करे तो क्या करे, चुपचाप सब कुछ सहना पड़ा। बिपत सामने खड़ी है, लड़का अचेत खाट पर पड़ा है, भाँत-भाँत की बातें जी में उपज रही हैं, न जाने कहाँ-कहाँ जी जा रहा है, ऐसे बेले दुरगा माता का सुमिरन करने को कौन रोक सकता है। जी न होने पर पारवती ने घर में से धूप और गूगुल ला कर मालिन को दिया। धूप गूगुल को पाकर हरलाल के जी की अटक भी दूर हुई। उसने आग मँगा कर उस पर धूप और गूगुल जलाया। देखते-ही-देखते सारा घर महँकने लगा, और इसके थोड़े ही पीछे एक सुरीले गले का सुर चारों ओर फैल गया। हरलाल ने सुमिरन के बहाने गाया।

गीत

दुरगा माता सीस नवाता हूँ चरणों पर तेरे।

मैं हूँ दास तुम्हारा दया करो तुम ऊपर मेरे।

पार नहीं पाता है कोई बकते हैं बहुतेरे।

अपना भला देखता हूँ जस गाकर साँझ सबेरे।

मुझमें नहिं ऐसी करनी है जो तू आवे नेरे।

अपनी ओर देख कर माता तू मत आँखें फेरे।

कितने दुख कट जाते हैं जो तुम्हें नेह से टेरे।

लिए तुम्हारा नाम बिपत भी रहती है नहिं घेरे।

लाज आज जाती है जो हम करें उपाय घनेरे।

जन की पत रह जाती है पर तनिक तुम्हारे हेरे।

यही आस मेरे जी में है क्या तू नहीं निबेरे।

जग में सब कुछ पाते हैं तेरे चरणों के चेरे।1।

सुमिरन करने पीछे हरलाल ने लड़के के सर और छाती पर हाथ फेरा, कुछ पढ़ कर दो-तीन बार फूँका, फिर थोड़ी सी मली हुई पत्तियाँ मालिन के हाथ में देकर कहा, इसको पीस कर अभी बाबू के घाव पर लगा दे। पत्तियाँ अभी पीसी जा रही थीं इसी बीच लड़के ने आँखें खोल दीं, और धीरे-धीरे करवट भी ली। लड़के को आँखें खोलते और करवट लेते देखकर सबके जी में जी आया। पारवती के जी को भी बहुत कुछ ढाढ़स हुआ।

हरलाल जब सुमिरन करने लगा, और उसका बहुत ही ऊँचा सुर घर में से निकल कर बाहर फैलने लगा, उस घड़ी पारबती मर सी गयी। उसने सोचा जो कोई इसको सुनता होगा, क्या कहता होगा, एक भलेमानस के घर में इतनी रात गये यह कैसा गीत हो रहा है? क्या यह विचार उसके जी को डावांडोल ने करता होगा? जो डावांडोल करता होगा, तो वह हम लोगों को क्या समझता होगा? भले घर की बहू बेटी तो कभी न समझता होगा, क्या इससे भी बढ़कर और कोई दूसरी बात लाज की है? क्या यह हम लोगों के लिए धरती में गड़ जाने की बात नहीं है? पारबती जितना ही इन बातों को सोचने लगी, उतना ही दुखी होती गयी। उसका जी कहता था अभी हरलाल को घर से बाहर निकाल दूँ। पर एक तो उसका नेह के साथ दुरगा माता का सुमिरन कलेजे को पिघला रहा था, दूसरे लड़के की बुरी दशा ने उसको आपे में नहीं रखा था, इसलिए वह जैसा सोचती थी, कर नहीं सकती थी। जब सुमिरन के पूरा होते-होते दो-चार बार झाड़ फूँक करने ही से लड़के ने आँखें खोल दीं, उस घड़ी पारबती पहले की सब बातें भूल गयी, और हरलाल की उसको बहुत कुछ परतीत हुई।

जब बासमती हरलाल को लेने गयी, उस बेले पड़ोस की दोनों स्त्रियों ने लड़के के सर को भली-भाँति धो-धाकर उसपर कपड़े की पट्टी बाँध दी थीं। इस पट्टी को ठहर-ठहर कर वे दोनों भिंगो रही थीं। हरलाल ने आते ही यह सब देख लिया था, और नाक के छेद के पास हाथ ले जाकर और इसी भाँत की दूसरी जाँचों से उसने यह भी जान लिया था, लड़के को चेत अब हुआ ही चाहता है। वह अपना रंग जमाने के लिए ही आया था, इसलिए औषधी से काम न निकाल कर उसने अपनी ओझाई को चमकाना चाहा, और ऐसा ही किया। पीछे उसने पत्तियाँ कुछ दी थीं, पर यह दिखलावा था, यह पत्तियाँ भी ऐसी ही वैसी थीं, कहने-सुनने से लेता आया था, पर बात वही हुई, जो वह चाहता था, पत्तियाँ लगाई तक नहीं गयीं; और लड़के ने आँखें खोल दीं। हरलाल की ओझाई ही पक्की रही।

लड़के को आँख खोलते देखकर हरलाल की नस-नस फड़क उठी, उसने समझा अब मैंने सबके ऊपर अपना रंग जमा लिया। इसलिए अब वह अपनी दूसरी चाल चला। सबके देखते-ही-देखते वह हाथ पैर नचाने लगा, सर हिलाने लगा, आँखें निकाल लीं, मुँह को डरावना बना दिया और रह-रह कर ऐसा तड़पता था, जिसको सुनकर कलेजा दहल उठता। मालिन को छोड़कर और जितनी स्त्रियों वहाँ थीं, उसका यह रंग-ढंग देखकर घबड़ा गयीं। मालिन उसकी चाल को ताड़ गयी। भीतर-ही-भीतर बहुत सुखी हुई। कुछ घड़ी अनजान सी बनकर उसका रंग-ढंग देखती रही, पीछे बोली-आप कौन हैं!

हरलाल-मैं काली हँ रे, काली, डीह के थानवाली काली!!!

बासमती ने धूप और गूगुल अबकी बार बहुत सा जला कर कहा, आप काली माता हैं! कहाँ आयी हो महारानी?

हरलाल-कहाँ आयी हूँ रे, कहाँ आयी हूँ, इसी हरललवा ने बुलाया है, इसीके मारे आयी हूँ, यह मुझे इसी भाँत जहाँ तहाँ बुलाया करता है, यह नहीं जानता, इस लड़के ने अपनी करनी का फल पाया है, मैं इसे छोड़ थोड़े ही सकती हूँ।

बासमती आग पर धूप गिराते-गिराते बोली-लड़का आप ही का है, इसे जो आप न छोड़ेंगी, तो हम लोग कैसे जीयेंगी। इस से जो चूक हुई होगी, अनजान में हुई होगी, और जो जान में भी कोई चूक हुई हो, तो उसको जो आप न छमा करेंगी तो हम लोगों को दूसरा किसका भरोसा है।

हरलाल-अनजान! अनजान!! अनजान!!! अनजान रे अनजान! जो अनजान में कोई बात हुई होती, तो मैं इतना बिगड़ती क्यों? अब के छोकरे देवी देवता को कुछ समझते ही नहीं। परसों यह जूता पहने मेरे मन्दिर के चौतरे पर बेधड़क चढ़ गया। तनिक भी न डरा। यह न समझा, कलयुग है तो क्या, अब भी देवी देवता में बहुत कुछ सकत है।

बासमती-सकत है क्यों नहीं माता! यह कौन कहता है सकत नहीं है!!! पर मैं पाँव पड़ती हूँ, नाक रगड़ती हूँ, मत्था नवाती हँ, आप इस लड़के की चूक छमा करें! इस लड़के ने चूक तो बहुत बड़ी की है, पर आपकी छमा के आगे इसकी चूक कुछ नहीं है। जो आप इस लड़के की चूक छमा न करेंगी, तो हम सब आपके मन्दिर में धरना देकर मर जायेंगी, कभी न जीयेंगी।

हरलाल-छमा!! छमा!!! ऐसे ही छमा करें?

बासमती-कैसे छमा करोगी? माता! जो आप करने को कहेंगी, हमलोग जैसे होगा वह करेंगी, हमको छमा मिलनी चाहिए।

हरलाल-अच्छा, मैं छमा करूँगी, पर जो उपाय मैं बताती हूँ, वह करना होगा, जो यह उपाय न होगा, तो मैं कभी इस लड़के को न छोड़ूँगी। मैंने हरललवा के रोने गाने से इतना किया है, जो लड़के की आँखें खुल गयीं, नहीं तो अब इसकी आँखें न खुलतीं। मेरे ही कोप से आज यह उस भीड़ में उस टूटे हुए तारे पर गिरा, और इसका सर फूटा। जो मैं उपाय बतलाती हूँ जो वह न होगा, तो यह कभी अच्छा न होगा। और जो उपाय होने लगेगा तो यह दिन-दिन अच्छा होता जावेगा। क्यों, क्या कहती है? बोल!!!

बासमती-मैं क्या कहूँगी माता! जो आप कहेंगी वही होगा, कभी कुछ दूसरा भी हो सकता है! इस लड़के से बढ़कर हम लोगों को क्या प्यारा है?

हरलाल-अच्छा सुन रे सुन! जो तुम करेगी तो मैं बताती हूँ। देवहूती के गुण पर मैं रीझी हुई हूँ, जो वह सौ अधखिला फूल अपने हाथों से तोड़ कर एक महीने तक मुझको नित चढ़ावे तब तो मैं उसके निहोरे इस छोकरे को छोडूँगी, नहीं तो किसी भाँत न मानूँगी। बोल! क्या कहती है, ऐसा होगा?

बासमती-क्यों न होगा महारानी! यह कौन काम है, जो कोई बड़ा कठिन उपाय आप बतलातीं, तो इस लड़के के बचाने के लिए हम सब वह भी करतीं। इसमें क्या है?

हरलाल-अच्छा, जो तू मेरी बात मानती है तो ले मैं जाती हूँ, पर जान ले जो मेरी बात न हुई तो छ ही सात दिन के भीतर यह लड़का ऐसी जोखों में पड़ेगा, जिससे फिर इसका छुटकारा न होगा।

इतना कहने पीछे हरलाल का रंग-ढंग फिर पहले का सा हो गया, न अब उसका हाथ-पाँव हिलता था, और न उसमें वह सब डरानेवाली बातें रह गयी थीं। वह इस घड़ी बहुत ही धीरा पूरा जान पड़ता था, पर उसके मुँह पर थकावट रूखेपन के साथ झलक रही थी।

पारवती हरलाल का अभुआना देख और उसकी बातें सुन कर बड़े झंझट में पड़ गयी, पहले हरलाल के ऊपर जो उसका विचार था, उसके सुमिरन का ढंग देखकर और लड़के को कुछ सम्हला और चेत में आया पाकर, अब वह और भाँत का हो गया था। अब वह हरलाल को पाखंडी न समझकर भलामानस समझने लगी थी। इसलिए उसने उसकी बातों को धोखाधड़ी की बात न समझ कर निरी सच्ची बात समझा, और अपने लड़के की करनी पर बहुत दुखी हुई। पर सबसे झंझट की बात उसके लिए सौ अधखिले फूलों से एक महीने तक देवी की पूजा हुई। वह मन-ही-मन इन सब बातों को सोच रही थी। इसी बीच हरलाल ने फिर थोड़ी सी और कोई पत्ती मालिन के हाथ में देकर कहा, अब मैं जाता हूँ, तुम इस पत्ती को दो-चार बार और बाबू के घाव पर रगड़वा कर लगवाना, माई चाहेगी तो वह इसी से अच्छे हो जावेंगे, अब कोई दूसरी औखध न करनी पड़ेगी। मेरा बड़ा भाग है जो मेरे हाथों बाबू का कुछ भला हुआ, पर आज मैं बड़े जोखों में पड़ गया, ऐसा अचानक माता कभी मेरे ऊपर नहीं आयी। बासमती! जो तू न सम्हालती तो न जाने आज क्या हो जाता, देखना उनकी भेंट-पूजा की बात न भूलना। इतना कहकर वह चला गया। जब वह जाने लगा था, पारवती ने उसको बासमती के हाथ कुछ दिया था।


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