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उपन्यास

अधखिला फूल
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


फूल तोड़ने के लिए देवहूती नित्य जाती, नित्य उसका जी कामिनीमोहन की ओर खींचने के लिए बासमती उपाय करती। कामिनीमोहन भी उसको अपनाने के लिए कोई जतन उठा न रखता, बनाव सिंगार, सज धज सबको काम में लाता। इस पर पेड़ों से लपटी फूली हुई बेलें, समय का सुहावनापन, हरी-हरी डालियाँ, लहलही लताएँ, छिपे-छिपे अपना काम अलग करतीं। देवहूती लहू मांस से ही बनी है, जी उसको भी है, आँखें वह भी रखती है, कहाँ तक वह इन फंदों से बच सकती। धीरे-धीरे उसका जी न जाने कैसे करने लगा, अनजान में ही उसके कलेजे में न जाने कैसी एक कसक सी होने लगी। पर उसके जी में ही भीतर-ही-भीतर ये सब बातें ऐसी चुपचाप और ऐसी छिपे-छिपे होने लगीं जो बासमती की ऐसी चतुर स्त्री को भी उलझन में डाल रही थीं।

फूल तोड़ते चौबीस दिन हो गये। इतने दिनों में काम कुछ न निकला, यह बात बासमती के जी में आठ पहर खटकने लगी। कामिनीमोहन भी बेचैन हो चला था, इसलिए वह भी कभी-कभी बसमाती को जली कटी सुनाता, इससे बासमती और घबरायी। आज वह चुपचाप देवहूती के घर आयी, और सीधे उसकी कोठरी में चली गयी। वहाँ उसने देवहूती को सोया पाया, फिर क्या था, चटपट उसने अपना काम पूरा किया और वहाँ से चलती हुई।

पारबती ने बासमती को आते-जाते देख लिया था। बासमती क्यों आयी? और क्यों लगे पाँव चली गयी? इस बात का उसको बड़ा खटका हुआ। वह कई दिनों से देवहूती का रंग-ढंग देख रही थी, पर कोई बात जी में लाती न थी। क्यों जी में लाती नहीं थी? इसके लिए इस घड़ी मैं इतना ही कहता हूँ। उसके जी में कोई खटक नहीं थी-पर बासमती की आज की चाल ने उसको चौंका दिया। वह सोचने लगी, हो न हो कोई बात है। बासमती घर की मालिन है-उसके लिए कोई रोक नहीं-वह बे-अटक देवहूती के पास आ-जा सकती है-मैंने कभी उसको देवहूती के पास उठने-बैठने से नहीं रोका। फिर आज वह मेरी आँख बचा कर क्यों उसके पास गयी? और क्यों बिना मुझसे कुछ कहे-सुने यहाँ से चुपचाप चली गयी? ये बातें ऐसी हैं जिस से पाया जाता है, उसके मन में कोई चोरी है! चोर का जी आधा होता है, वह साह का सामना नहीं कर सकता। अपने मन की चोरी ही से वह इस घड़ी अपना मुँह मुझको न दिखला सकी। जिस काम को करने के लिए इस घड़ी वह यहाँ आयी थी, उस काम को करके वह मेरी ओर से बुरी थी, इसी से मेरे सामने आने का बल उसमें नहीं था। नहीं तो मेरे जी में तो कोई बात न थी। जो बुरा काम करता है, वह बस भर छिपने का पथ भी ढूँढ़ता है।

फिर सोचने लगी-देवहूती का रंग ढंग भी तो इन दिनों कुछ और हो गया है! वह इतनी अनमनी क्यों रहती है? मैं इन बातों पर दीठ नहीं डालती थी, समझती थी लड़की है, कोई बात होगी। पर यह कोई ऐसी वैसी बात नहीं है, कोई गहरी बात जान पड़ती है। नहीं तो, देवहूती को किस बात का दुख है? जो चाहती है, खाती है। जो चाहती है, पहनती है। मैं उसका मुँह देखती ही रहती हँ। एक भाई है, वह भी कभी उसको आधी बात नहीं कहता, फिर वह इतनी अनमनी क्यों? हाँ, यह मैं कह सकती हूँ वह सयानी हो गयी है! उसके दूसरे दिन हैं! पर सयानी वह आज तो नहीं हुई है-एक बरस से भी ऊपर हो गया। जब इतना दिन हो गया-और हँसी खेल ही में वह लगी रही, तो इधर दस पाँच दिन से-सयानी होने ही से वह अनमनी है, यह बात जी में नहीं समाती। फिर पड़ोस में नन्दकुमार, कामिनीकिशोर, नन्दकिशोर, देवमोहन, कामिनीमोहन सभी लड़के हैं-बात चलने पर देवहूती जैसे नन्दकुमार, नन्दकिशोर और देवमोहन नाम लेती है-वैसा बेअटक कामिनीमोहन का नाम क्यों नहीं लेती? फिर मौसेरे भाई कामिनीकिशोर को जब वह पुकारती है, तो क्या कारण है जो कामिनीमोहन का नाम उसके मुँह से निकल जाता है? और जो निकल जाता है, तो फिर अपने आप वह लजा क्यों जाती है? कोई टोकता भी तो नहीं। जब घर में कभी कोई बात कामिनीमोहन की उठती है, और देवहूती वहाँ बैठी रहती है-तो क्या कारण है जो वह इधर-उधर करने लगती है? क्यों वह वहाँ से उठ जाना चाहती है? क्यों उसकी बातें सुनने में उसको लाज लगती है? कामिनीमोहन का साथ बहुत दिनों से हमलोगों का है, ऐसे ही सदा उसकी बातें घर में होती आयी हैं, पर पहले देवहूती की ऐसी दशा तो कभी नहीं देखी गयी!! फिर थोड़े दिनों से उस के जी का ढंग ऐसा क्यों हो गया?

अब की बार पारबती का मुँह गम्भीर हो गया, वह फिर सोचने लगी-देवहूती का ढंग था, वह चार लड़कियों को लेकर सदा खेला करती, किसी को सर गूंधना, किसी को बेलबूटे बनाना, किसी को गुड़िया बनाना सिखलाती-किसी को माला गूँथना, किसी को फूल के गहने बनाना, किसी को पोत पिरोना बतलाती। किसी को छेड़ती-किसी को प्यार करती। पर आजकल ये सब बातें उसकी छूट सी गयी हैं-अकेले रहना उसको अच्छा लगता है-कोठे पर, कभी-कभी अपनी कोठरी में चुपचाप बैठी न जाने वह क्या सोचा करती है। दो, चार दिन से तो उसकी यह गत है-पास ही बैठी रहती है-और पुकारने पर कभी-कभी बोलती भी नहीं। सच्ची बात यह है-उसका जी किसी ओर खिंचा हुआ है-जब वहाँ से हटे तब तो दूसरी ओर लगे-किस ओर उसका जी खिंचा है-अब यह समझने को नहीं है-सब बात भली-भाँति समझ में आ गयी। पर इसमें चूक किसकी है? हमारी! जो अपने पति की बात नहीं मानती, उसका भला कभी नहीं होता। पति ने कहा था, जिस घर में ओझा का पाँव पड़ा, वही घर चौपट हुआ। फिर मैं क्यों उनकी बात भूल गयी, क्यों अपने घर में ओझा को बुलाया, जो बुलाया, तो अब भुगतेगा कौन?

पारबती ने धीरे-धीरे सब समझा, कुछ घबरायी, पीछे सम्हल गयी, सोचा घबरा कर क्या होगा, यह घबराने का समय नहीं है, जैसा रंग ढंग देखने में आता है, उससे बात अभी बहुत बिगड़ी नहीं पायी जाती, अभी बिगड़ने के लच्छन ही देखे जाते हैं, इस लिए घबराने से बिगड़ती हुई बात के बनाने का जतन करना अच्छा है। पारबती ने सोच कर ठीक किया, चाहे जो हो अब, आज से देवहूती को फूल तोड़ने के लिए न जाने दूँगी, इतना करने ही से सब झंझट दूर होगा। स्त्री कितना ही जीवट करे, पर देवी देवता की बातों में उसका जीवट काम नहीं करता। देवकिशोर अब तक भली-भाँति अच्छा भी नहीं हुआ था, इसलिए ठीक करने को उसने ठीक तो किया, पर थोड़े ही पीछे उसका जी फिर चंचल हो गया, उसने सोचा, देवी की पूजा को अधूरा छोड़ना ठीक नहीं; जैसे हो छ: दिन इस काम को और करना होगा। तो क्या बासमती भी पहले की भाँति साथ रहेगी? अब उसके जी में यह बात उठी। उसने सोचकर ठीक किया, हाँ! बासमती भी साथ रहेगी, जो देखने में हित बनी है, उससे बिगाड़ा क्यों किया जाय! न जाने वह क्या सोचे, और क्या करे, यह समय उससे बिगाड़ करने का नहीं है। फिर सुधार क्या हुआ, वे ही सब बातें तो हुईं-अब यह विचार उसको सताने लगा। पर इस घड़ी सर उसका चकरा रहा था, और जो अड़चनें सुधार में आन पड़ी थीं, वे सहज न थीं, इसलिए विचार के लिए दूसरा समय ठीक करके वह घर के दूसरे काम में लग गयी।


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